सामाजिक समरसता और कबीर

लगभग पांच सौ वर्ष पूर्व संत कबीर का आर्विभाव ऐसे समय में हुआ था जब सामाजिक मान-मर्यादाएं तिरोहित हो रही थीं और समाज के विभिन्न समुदायों में आपसी भाईचारे की भावना लुप्त हो चुकी थी। फलस्वरुप हिंसा, व्यभिचार, चोरी, छुआछूत, कर वृद्धि, संग्रहवृत्ति, छीना-झपटी आदि नानाविध कुप्रवृत्तियां समाज में अपना पैर जमा चुकी थीं। ऐसी विकट परिस्थिति में कबीर का उदय भारतीय समाज जीवन में क्रांतिदूत की तरह हुआ। समाज की बहुविध घटनाओं के साक्षी कबीर ने तन, मन और बुद्धि से निर्धन समाज में मानवीय गुणों की आधारशिला रखने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया। उनकी यह आधारशिला एक सुधारक की भावना से रखी गई, जिसका एकमात्र उद्देश्य था अहिंसा-मूलक समाज की पुनर्स्थापना करना, जिसमें सर्वधर्म समभाव की स्थापना, मैत्री, दया, शुचिता और परोपकार इन चार आधास्तंभों पर की जा सके। केवल मानवमात्र ही नहीं अपितु अन्य प्राणीजगत् तथा कीट-पतंगा भी निर्भय और स्वच्छंद वातावरण में जी सकें। ऐसी सामाजिक समरसता के क्रांतिदूत कबीर ने जनभाषा में सैकड़ों साखी सबद् तथा रंगेनी की रचना कर तत्कालीन समाज व्यवस्था को नई दिशा दी। आज भी कबीर की रचनाएं समाज को नई उर्जा, नई चेतना और सामाजिक समरसता की भावना को प्रगाढ़ता प्रदान करने की सीख देती हैं। कबीर की रचनाएं कालजयी और देशकाल की सीमा से परे मानवीय उत्थान की गाथा है। जिसके पोर-पोर में सामाजिक समरसता युक्त जीवनशैली की प्रेरणा मिलती है।

कबीर का सम्पूर्ण साहित्य अहिंसा मूलक समाजव्यवस्था का पक्षधर है। वस्तुतः कबीर उदारवादी समाजसुधारक थे। सर्वधर्म समभाव उनके चिंतन का मूल आधार है। कबीर अद्वैत वेदांत के सर्वश्रेष्ठ कवि माने जाते हैं। वे जीवन से पलायन की शिक्षा न देकर जीवन को उचित ढंग से जीने का मार्गदर्शन करते हैं। उनका अद्वैतवाद समाज में एकता का प्रेरक है। वे अंधानुकरण के मार्ग में भ्रमित और कुंठित समाज को घृणा, द्वेष, क्रोध और हिंसा का त्यागकर सत्यासत्य के विवेक पर आत्मिक मनोबल विकसित करने की सलाह देते हैं।

कबीर ने हिन्दू और मुसलमान दोनों ही धर्मों के अनुयायियों की जमकर खिंचाई की है। वे दोनोें ही धर्मों के लोगों को अपने आचरण की शुचिता पर अमल करने की सलाह देते हुए सर्वधर्म समभाव के सिद्धान्त को अपनाने की सलाह देते हैैं-

मुसलमान मारै करद सो, हिन्दू मारे तरवार।
कहै कबीर दोनूं मिलि, जैहैं यम के द्वार॥
हिन्दू के दाया नहीं, मिहर तुरके नाहिं।
कहै कबीर दोनूं गया, लख चौरासी माहिं॥

वे जानते थे कि सर्वधर्म समभाव से समाज को नई शक्ति मिलेगी और अहिंसामूलक समाज की नींव पर ही हिन्दू और मुसलमान दोनों अपने-अपने ईश्वर तथा पैगम्बर के बताए हुए मार्ग पर बढ़ते हुए समाज में जीने की कला से अवगत हो सकते हैं।

कबीर का विश्वास था कि मधुर वाणी की बदौलत समाज सुधार का कार्य प्रखरता से संभव है। कीर्तन, भजन और प्रवचन के माध्यम से वे लोकशिक्षा तथा लोकजागृति करने में सभी संत कवियों से बहुत आगे थे। दो टूक बात करने में उनका विश्वास था। शब्दों के भ्रमजाल में अथना दर्शन के कोरे चिंतन में उन्होंने शिष्यों और जनता को उलझाकर कभी नहीं रखा। सीधी बात तथा बिना लाग-लपेट के खरी-खरी बात कहनें में वे सिद्धहस्त थे। जो मूर्ख है या जिनमें सत्यभाषण को स्वीकारने का सामर्थ्य नहीं है, उनके सामने वे चुप रहना ही पसंद करते थे। सामाजिक समरसता के लिए उन्होंने वाणी पर नियंत्रण को शब्दशक्ति के प्रयोग के रूप में देखा-परखा तथा समाज को इसकी महती स्वीकार करने हेतु कहा-

ऐसी बानी बोलिये, मन का आपा खोय।
औरन को शीलत करै, आपहुं शीतल होय॥

कबीर सौहार्द्र, समता और मित्रता के अनुयायी हैं। किसी के मन को दुखाने में भी वे हिंसा का प्रतिरुप देखते थे। दया भाव उनकी रग-रग में कूट-कूट कर भरा था। जीवों को पीड़ा पहुंचाने पर उनके हृदय में एक टीस उभर कर आती थी। कबीर के मन में अपने विरोधियों के प्रति कभी कुटिलता के भाव स्वप्न में भी नहीं आए। वे इन मानवीय गुणों को सामाजिक समरसता की पूंजी के रूप में देखते हैं। तभी तो वे नि:संकोच कहते हैं-

कपट कुटिलता छांडि कै, सबसों मित्रहि भाव
कृपावान सस ज्ञानवान, बैरभाव नहिं काव।

कथनी और करनी की एकरूपता व्यक्ति-विकास तथा सामाजिक समरसता के लिए जरूरी है। जब तक सामान्यस्तर से लेकर जीवन के उच्चस्तरों पर बैठे सुधीजनों की कथनी और करनी में अंतर परिलक्षित होगा, तब तक सभ्य और सुसंस्कृत समाज की कल्पना एक छलावा और स्वयं के साथ बेइमानी ही है। वर्तमान समाज में आज कथनी और करनी में निरंतर दूरी दिखाई देती है। समाज में चारों और हिंसा और बरबादी के अलावा कुछ भी नजर नहीं आता। आज यदि सम्पूर्ण समाज तथा विश्व को किसी चीज की आवश्यकता है तो वह है कबीर की कथनी और करनी में निहित एकरूपता की भावना को स्वीकार करने की। ‘विश्व शांति’ की कल्पना को साकार करने और हिंसा से विश्व समुदाय को परावृत्त करने की दिशा में कबीर की निम्नपंक्तियां अधिक सटीक प्रतीत होती हैं। विश्व समुदाय जो अनेक बार की तरह इस बार भी निरीह और निरपराध लोगों के लहू से रंजित है, उससे मुक्ति के लिए कबीर के साहित्य में निहित समरसता के गुणों को वर्तमान में अपनाने की आवश्यकता है, जिससे वैश्विक स्तर पर आपसी सौहार्द्र की भावना की वृद्धि होगी-

कहंता तो बहु मिला, गहंता मिली न कोय।
सो कहंता वहि जान दे, जो न गहंता होय॥

वस्तुतः कबीर का सम्पूर्ण साहित्य अहिंसामूलक सामाजिक समरसता की ओर बढ़ने का मार्ग प्रशस्त करता है, जिसमें मैत्री, मुदिता, अपरिग्रह, सत्य आदि मानवीय गुणों से जीवन का अभिषेक होता है। सामाजिक समरसता के मूल में निहित पीड़ितों और शोषितों की आवाज को हिन्दी साहित्य में सबसे पहले कबीर ने उठाया है। उन्होंने केवल आवाज ही नहीं उठाई, अपितु उसका समाधान भी खोज निकाला है। उन्होंने सामाजिक समरसता के लिए अहिंसा की भावना कों ब्रम्हास्र के रूप में उपयोग में लाया। हृदय परिवर्तन की दिशा में कबीर ने जनजागरण का महत्वपूर्ण कार्य किया है। कबीर की अहिंसा पीड़ितों और शोषितों की आत्मा की स्वतंत्रता के रूप में परिलक्षित होती है, जिसके मूल में कबीर ने सत्य की आधारशिला रखी, जिस पर सामाजिक एकता, समता और मानव-बंधुत्व का ध्वज लहराता नजर आता है। संभव है कि गांधी के ‘सत्य’ और ‘अहिंसा’ की मूल प्रेरणा में कहीं न कहीं कबीर के ‘सत्य’ और अहिंसा की ताकत काम कर गई हो। वर्तमान में भारत ही नहीं वैश्विक धरातल पर भी सामाजिक समरसता की पुनर्स्थापना हेतु कबीर के साहित्य में निहित दोहे, साखी, सबद तथा रमैनी के कथ्य को परिभाषित कर आचरण में उतारने की आवश्यकता है जिससे व्यक्ति की बुद्धि प्रक्षालित हो तथा सामाजिक सरोकारों का पुनर्मार्जन हो।

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