कटाक्ष और हास्य का तानाबाना

पुस्तक के लेखक पढ़े-लिखे विद्वान हैं। जन्म 1956 में हुआ है। जीवन के 57 पड़ाव पार कर चुके हैं। राजनीतिशास्त्र में एम. ए. की पढ़ाई पूरी की है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय और अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में लेखन कार्य की शुरुआत की है। विजय कुमार ने अपने गुरुओं को किसी प्रकार से निराश नहीं किया है। इनके दोनों गुरु मजे हुये राजनेता और प्रकांड विद्वान हैं। सामाजिक और राजनीतिक विषयों में इनकी गहरी अभिरुचि हैं। यही कारण है कि इन्होंने इन विषयों में व्यंग्य शैली में अपने लेखों को लिखा है। जहां व्यंग्य होता है वहां हास्य विना बुलाये अपने आप आ जाता है।

‘नेताजी का डी. एन. ए.’ के आरंभ में ही विजय कुमार ने डी. एन. ए. की परिभाषा दे दी है, जिससे पुस्तक के पाठकों को सामग्री के बारे में कोई आशंका न हो। व्यंग्य लिखना कोई आसान काम नहीं होता है। यहां निगाहें कहीं होती हैं और निशाना कहीं दूर होता है। पूऱा व्यंग्य लेख पढ़ जाने के बाद ही लेखक के आशय को समझा जाता है और फिर हंसी अपने आप आ जाती है और लेखक का उद्देश्य पूरा हो जाता है।

पुस्तक में कुल 49 लेख हैं। सबके सब अपने आप में पूर्ण हैं। यही लेखक की विशेषता है। पूरी पुस्तक पढ़ने में कहीं भी बोझिलपन का एहसास नहीं होता है। पढ़ने की शुरुआत कीजिए, एक ही बैठक में पूरी पुस्तक पढ़ जाने का मन कहता है।
लेखक ने बताया है कि किसी व्यक्ति या वस्तु की आंतरिक संरचना को डी. एन. ए. कहते हैं। इससे उसकी कई पीढ़ियों की जानकारी हो जाती है। आज विज्ञान इतना उन्नत हो गया है कि इससे मानव ही क्या पशु-पक्षी, घास-फूस, फल, सब्जी तक का डी. एन. ए. पता चल जाता है। इससे पुस्तैनी बीमारी का पता चलता है, जिससे रोगों के निदान, चिकित्सा के क्षेत्र में मदद मिलती है।

लेखक ने प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह का डी. एन. ए. खोजने का निर्णय किया। बाद में उसने सोचा कि प्रधानमंत्री के बारे में क्यों माथापच्ची की जाये। क्यों न उसके पहले अपने नगराध्यक्ष के डी. एन. ए. के बारे में पता लगा लिया जाये। अगले दिन सवेरे-सवेरे ही नगराध्यक्ष के आवास पर जा धमका गया। वहां भारी भीड़ जमा थी। सबके हाथ में कागज थे। किसी को गली की समस्या थी, तो कोई बिजली के खंभे से परेशान था। कई नौकरी के लिये आये थे, तो किसी को कस्बे में दुकान चाहिए थी। सभी को वे कमरे के अंदर ले जाकर बात करते थे। किसी पर गरम हो जाते थे, तो किसी को हड़काने लगते थे।

उनका बार-बार रंग बदलना देखकर लेखक को सहज में पता चल गया कि नगराध्यक्ष में गिरगिट का कुछ अंश है। नगराध्यक्ष एक दिन किसी विद्यालय के पुस्तक विमोचन समारोह में गये। लेखक भी उनके साथ हो लिये। बड़ी ही सधी हुयी भाषा में उन्होंने देश भक्ति का बखान करना शुरू कर दिया। बाद में पता चला कि वे कुछ दिनों तक भारत माता की जय वालों के साथ भी थे। एक दिन नगराध्यक्ष कुछ ठेकेदारों से बड़ी चालाकी से बात कर रहे थे। उससे पता चल गया कि नगराध्यक्ष के पूर्वजों के संबंध लोमड़ी से भी थे।

इसी प्रकार लेखक ने सेक्युलर के बारे में भी लिखा है। सेक्युलर महोदय ऐसे व्यक्ति थे जो ईसाइयों और मुसलमानों के कर्मकांड में जाते थे, लेकिन हिन्दुओं के उत्सवों से उन्हें सख्त नफरत थी। 70 साल की उम्र में उनका देहांत हो गया। मरते तो सभी हैं और वे भी मर गये। अब सवाल यह उठा कि उनका अंतिम संस्कार कैसे किया जाये। मुसलमान-ईसाई वे थे नहीं, हिन्दू कर्मकांड में भी उनका विश्वास नहीं था। इसलिये उनके शव को चिथड़े में लपेट जंगल में ले जाकर पेड़ की डाली में लटका दिया गया।

‘पत्थर की खिचड़ी’ को केवल लेखक ही पका सकता है। बुढ़िया के घर जाकर भटका राही किस प्रकार से खिचड़ी पकाकर खा सकता है, यह बात पत्थर की खिचडी के लेख से जानी जा सकती है। बुढ़िया खिचड़ी के लिये कोई सामान देने को तैयार नहीं थी लेकिन राहगीर ने अपने चातुर्य के बल से बुढ़िया से चावल, दाल, नमक, थाली और घी सब कुछ लेकर खिचड़ी पका ही ली और बुढ़िया को भी खिचड़ी का स्वाद चखा दिया।

विजय कुमार ने अपने व्यंग्य लेखों में मंत्री से लेकर संतरी तक सब पर संयत भाषा में प्रहार किया है। उन्होंने श्रीमती सोनिया गांधी, उनके पुत्र राहुल गांधी, डॉ. मनमोहन सिंह, लालू प्रसाद यादव, राम विलास पासवान, मायावती, पी. चिंदबरम, दिग्विजय सिंह, नितिन गड़करी तक को अपने व्यंग्य विषय की सामग्री बनाया है। भाषा बहुत सधी हुई है। किसी पर अनर्गल दोषारोपण नहीं किया गया है। यदि कुछ किया गया है तो वह कटाक्ष है।

दिल्ली को लेखक ने लुटेरों की दिल्ली-लुटियन दिल्ली की संज्ञा दी है। लुटेरों ने दिल्ली को खूब लूटा है। वह आज भी लूटी जा रही है।

विजय कुमार को एक रात स्वप्न में भोलेनाथ दिखारी पड़ गये। शंकर ने उनसे कहा कि बेटा मांग लो, जो कुछ तुम्हें चाहिये। व्यापारी बनना चाहते हो, उद्योगपति बनना चाहते हो, अमीर बनना चाहते हो, जो कुछ बनना चाहते हो वह वरदान मुझसे मांग लो। मैं तुम पर अति प्रसन्न हूं। लेखक ने उनसे कहा कि मुझे नेता बनने का वरदान दे दो। नेता बनने पर मुझे हर चीज अपने आप मिल जायेगी। मुझे किसी चीज के लिये पूंजी की व्यवस्था नहीं करनी पड़ेगी।

विशाल अनुभव के धनी विजय कुमार ने इस पुस्तक के एक लेख में लेखकों की व्यथा-कथा का वर्णन किया है। पुस्तक, पठनीय है। सरल भाषा में लिखी गयी इस पुस्तक में निरंतरता है। लेखक का प्रयास सर्वथा सराहनीय है।
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