एक दिन सदन में सिर्फ औरतों की बात, सराहनीय पहल!

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महिला सत्र के आयोजन के दौरान समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने कहा कि देश की आजादी में रानी लक्ष्मीबाई, बेगम हजरत महल, अवंतीबाई लोधी, चांद बीबी, कस्तूरबा गांधी और सरोजिनी नायडू समेत कई महिलाओं का योगदान रहा है। इतना ही नहीं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस दौरान प्रस्तावना रखते हुए कहा कि भारत के सबसे बड़े विधानमंडल का यह सत्र देश के सामने एक उदाहरण पेश करेगा कि आखिर महिला सदस्य क्या बोलना चाहती है। इस सत्र की विशेष बातें यह रही कि महिलाओं के लिए निर्धारित सत्र वाले दिन उत्तर प्रदेश के दोनों सदनों में पीठासीन अधिकारी भी महिलाएं ही रहीं। सदन दिनभर महिलाओं के स्वावलंबन, सुरक्षा और सम्मान के मुद्दे पर चर्चा करते हुए दिखाई दिया।

भारत में दुर्गा (शक्ति) पूजा के विविध स्वरूप

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शाक्त परम्पराओं के लिए देवी की शक्ति के रूप में उपासना एक आम पद्धति थी। शक्ति का अर्थ किसी का बल हो सकता है, किसी कार्य को करने की क्षमता भी हो सकती है। ये प्रकृति की सृजन और विनाश के रूप में स्वयं को जब दर्शाती है, तब ये शक्ति केवल शब्द नहीं देवी है। सामान्यतः दक्षिण भारत में ये श्री (लक्ष्मी) के रूप में और उत्तर भारत में चंडी (काली) के रूप में पूजित हैं। अपने अपने क्षेत्र की परम्पराओं के अनुसार इनकी उपासना के दो मुख्य ग्रन्थ भी प्रचलित हैं। ललिता सहस्त्रनाम जहाँ दक्षिण में अधिक पाया जाता है, उतर में दुर्गा सप्तशती (या चंडी पाठ) ज्यादा दिखता है।

कर्नाटक में हिन्दी के सेवक विद्याधर गुरुजी

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1937 में गांधी जी ने उन्हें हिन्दी के लिए काम करने को कहा। विद्याधर जी ने यादगिरी में छह पाठशालाएं प्रारम्भ कर 8,000 बीड़ी मजदूरों को हिन्दी सिखायी। तबसे उनके नाम के साथ ‘गुरुजी’ स्थायी रूप से जुड़ गया। भाग्यनगर (हैदराबाद) की ‘हिन्दी प्रचार सभा’ दक्षिण भारत में हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए काम करने वाली प्रमुख संस्था है। विद्याधर गुरुजी 23 वर्ष तक उसके अध्यक्ष रहे। विधानसभा और विधान परिषद में वे प्रायः हिन्दी में ही बोलते थे। 1962 में कर्नाटक के मुख्यमन्त्री रामकृष्ण हेगड़े ने उन्हें राज्यसभा में भेजने का प्रस्ताव किया; पर विद्याधर गुरुजी ने मना कर दिया।

हिन्दी के दधीचि पंडित श्रीनारायण चतुर्वेदी

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वे अंग्रेजी काल में उत्तर प्रदेश में शिक्षा प्रसार अधिकारी थे। एक बार तत्कालीन प्रदेश सचिव ने उन्हें यह आदेश जारी करने को कहा कि भविष्य में हिन्दी रोमन लिपि के माध्यम से पढ़ायी जाएगी। इस पर वे उससे भिड़ गये। उन्होंने साफ कह दिया कि चाहे आप मुझे बर्खास्त कर दें; पर मैं यह आदेश नहीं दूँगा। इस पर वह अंग्रेज अधिकारी चुप हो गया। उनके इस साहसी व्यवहार से देवनागरी लिपि की हत्या होने से बच गयी।

विश्वकर्मा: अखिल विश्व के कर्ताधर्ता

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हे सुव्रत ! सुनिए, शिल्पकर्म (इसमें हजार से अधिक प्रकार के अभियांत्रिकी और उत्पादन कर्म आएंगे) निश्चित ही लोकों का उपकार करने वाला है। शारीरिक श्रमपूर्वक धनार्जन करना पुण्य कहा जाता है। उसका उल्लंघन करना ही पाप है, अर्थात् बिना परिश्रम किये भोजन करना ही पाप है। यह व्यवस्था सामान्य है, विशेष में यही है कि धर्मशास्त्र की आज्ञानुसार किये गए कर्म का फल पुण्य है और इसके विपरीत किये गए कर्म का फल पाप है। यही कारण है कि संत रैदास को नानाविध भय और प्रलोभन दिए जाने पर भी उन्होंने धर्मपरायणता नहीं छोड़ी, अपितु धर्मनिष्ठ बने रहे। लेखक ने जो पुस्तक की समीक्षा लिखी है वह अत्यंत तार्किक और गहन तुलनात्मक शोध का परिणाम है जिसका दूरगामी प्रभाव होगा। उचित मार्गदर्शन के अभाव में, धनलोलुपता में अथवा आर्ष ग्रंथों को न समझने के कारण आज के अभिनव नव बौद्ध और मूर्खजन की स्थिति और भी चिंतनीय है। वामपंथ और ईसाईयत में घोर शत्रुता रही, अंबेडकर इस्लाम के कटु आलोचक रहे और साथ इस इस्लाम और ईसाइयों के रक्तरंजित युद्ध अनेकों बार हुए हैं, किन्तु वामपंथ, ईसाईयत, इस्लाम एवं शास्त्रविषयक अज्ञानता, ये चारों आज एक साथ सनातनी सिद्धांतों के विरुद्ध खड़े हो गए हैं। 

विश्‍वकर्मा और उनके शास्‍त्र

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उत्तरबौद्धकाल से ही शिल्‍पकारों के लिए वर्धकी या वढ्ढकी संज्ञा का प्रयोग होता आया है। 'मिलिन्‍दपन्‍हो' में वर्णित शिल्‍पों में वढ्ढकी के योगदान और कामकाज की सुंदर चर्चा आई है जो नक्‍शा बनाकर नगर नियोजन का कार्य करते थे। यह बहुत प्रामाणिक संदर्भ है, इसी के आसपास सौंदरानंद महाकाव्य, हरिवंश (महाभारत खिल) आदि में भी अष्‍टाष्‍टपद यानी चौंसठपद वास्‍तु पूर्वक कपिलवस्‍तु और द्वारका के न्‍यास का संदर्भ आया है। हरिवंश, ब्रह्मवैवर्त, मत्स्य आदि पुराणों में वास्‍तु के देवता के रूप में विश्‍वकर्मा का स्‍मरण किया गया है...।

नमो स्वतंत्र भारत की ध्वजा, नमो, नमो

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रामधारी सिंह जी दिनकर ने यह कविता रची थी। तिरंगे को समर्पित यह कविता किस प्रकार आज नरेंद्र मोदी के नमो को उच्चारित और मंडित करती है। यह एक चमत्कार ही है। नरेंद्र मोदी जी को भी नमो कहते हैं। दिनकर की के शब्द तो तिरंगे को ही समर्पित हैं किंतु इसमें गूंजता नमो राग का आज के नमो से साम्य किसी दैवीय संयोग से कम नहीं लगता.. आज यह कविता उन Narendra Modi जी को समर्पित, जो तिरंगे के सम्मान हेतु इस कविता के प्रत्येक शब्द को अपनी सांसों से जीवंत करते हैं।

हिन्दी बने राष्ट्र भाषा    

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इसमें कोई दो मत नहीं है कि स्वतंत्रता के लगभग साढ़े सात दशक बाद भी देश की अपनी राष्ट्र भाषा नहीं है। जब देश का एक राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रीय प्रतीक है। यहां तक कि राष्ट्रीय पशु-पक्षी भी एक है, तो ऐसे में महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि देश की अपनी राष्ट्र भाषा क्यों नहीं होनी चाहिए? भारतीय भाषाओं को अंग्रेजी की पिछलग्गू भाषा के रूप में क्यों बने रहना चाहिए? इस पर विचार किया जाना चाहिए। देशहित में हिन्दी को न्यायपालिका से लेकर कार्यपालिका की भाषा बनाया जाना चाहिए।

तमिल काव्य में राष्ट्रवादी स्वर: सुब्रह्मण्य भारती

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भारती का प्रिय गान बंकिम चन्द्र का वन्दे मातरम् था। 1905 में काशी में हुए कांग्रेस अधिवेशन में सुप्रसिद्ध गायिका सरला देवी ने यह गीत गाया। भारती भी उस अधिवेशन में थे। बस तभी से यह गान उनका जीवन प्राण बन गया। मद्रास लौटकर भारती ने उस गीत का उसी लय में तमिल में पद्यानुवाद किया, जो आगे चलकर तमिलनाडु के घर-घर में गूँज उठा।सुब्रह्मण्य भारती ने जहाँ गद्य और पद्य की लगभग 400 रचनाओं का सृजन किया, वहाँ उन्होंने स्वदेश मित्रम, चक्रवर्तिनी, इण्डिया, सूर्योदयम, कर्मयोगी आदि तमिल पत्रों तथा बाल भारत नामक अंग्रेजी साप्ताहिक के सम्पादन में भी सहयोग किया। अंग्रेज शासन के विरुद्ध स्वराज्य सभा के आयोजन के लिए भारती को जेल जाना पड़ा। कोलकाता जाकर उन्होंने बम बनाना, पिस्तौल चलाना और गुरिल्ला युद्ध का भी प्रशिक्षण लिया। वे गरम दल के नेता लोकमान्य तिलक के सम्पर्क में भी रहे।

भारती पत्रिका के संस्थापक : दादा भाई

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आज सब ओर अंग्रेजीकरण का वातावरण है। संस्कृत को मृत भाषा माना जाता है। ऐसे में श्री गिरिराज शास्त्री (दादा भाई) ने संस्कृत की मासिक पत्रिका ‘भारती’ का कुशल संचालन कर लोगों को एक नयी राह दिखाई है। दादा भाई का जन्म नौ सितम्बर, 1919 (अनंत चतुर्दशी) को राजस्थान के भरतपुर जिले के कामां नगर में आचार्य आनंदीलाल और श्रीमती चंद्राबाई के घर में हुआ था। इनके पूर्वज राजवैद्य थे। कक्षा छह के बाद दादा भाई ने संस्कृत की प्रवेशिका, उपाध्याय तथा शास्त्री उपाधियां ली। यजुर्वेद का विशेष अध्ययन करते हुए उन्होंने इंटरमीडियेट की परीक्षा भी उत्तीर्ण की। स्वस्थ व सुडौल शरीर होने के कारण लोग इन्हें पहलवान भी कहते थे। 13 वर्ष की अवस्था में उनका विवाह हो गया था। शिक्षा पूर्णकर वे जयपुर के रथखाना विद्यालय में संस्कृत पढ़ाने लगे। 1942 में वे जयपुर में ही स्वयंसेवक बने। व्यायाम के शौकीन दादाभाई को शाखा के खेल, सूर्यनमस्कार आदि बहुत अच्छे लगे और वे संघ में ही रम गये। इसके बाद उन्होंने 1943, 44 तथा 45 में तीनों संघ शिक्षा वर्ग का प्रशिक्षण भी प्राप्त किया।

युग प्रवर्तक भारतेन्दु हरिश्चन्द्र

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भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की राष्ट्रीय भावना का स्वर ‘नील देवी’ और ‘भारत दुर्दशा’ नाटकों में परिलक्षित होता है। अनेक साहित्यकार तो भारत दुर्दशा नाटक से ही राष्ट्र भावना के जागरण का प्रारम्भ मानते हैं। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने अनेक विधाओं में साहित्य की रचना की। उनके साहित्यिक व्यक्तित्व से प्रभावित होकर पण्डित रामेश्वर दत्त व्यास ने उन्हें ‘भारतेन्दु’ की उपाधि से विभूषित किया।प्रख्यात साहित्यकार डा. श्यामसुन्दर व्यास ने लिखा है - जिस दिन से भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने अपने भारत दुर्दशा नाटक के प्रारम्भ में समस्त देशवासियों को सम्बोधित कर देश की गिरी हुई अवस्था पर आँसू बहाने को आमन्त्रित किया, इस देश और यहाँ के साहित्य के इतिहास में वह दिन किसी अन्य महापुरुष के जन्म-दिवस से किसी प्रकार कम महत्वपूर्ण नहीं है।भारतेन्दु हिन्दी में नाटक विधा तथा खड़ी बोली के जनक माने जाते हैं। साहित्य निर्माण में डूबे रहने के बाद भी वे सामाजिक सरोकारों से अछूते नहीं थे। उन्होंने स्त्री शिक्षा का सदा पक्ष लिया। 17 वर्ष की अवस्था में उन्होंने एक पाठशाला खोली, जो अब हरिश्चन्द्र डिग्री कालिज बन गया है।

हिंदी जगत के युग प्रवर्तक भारतेंदु हरिश्चंद्र

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भारतीय पत्रकारिता व हिंदी साहित्य के पितामह भारतेंदु जी ने अपनी लेखनी के माध्यम से अंग्रेज सरकार को तो हिला ही दिया था और भारतीय समाज को भी एक नयी दिशा देने का प्रयास किया था । उनका आर्विभाव ऐसे समय में हुआ था जब भारत की धरती विदेशियों के बूटों तले रौंदी जा रही थी। भारत की जनता अंग्रेजों से भयभीत थी, गरीब थी, असहाय थी, बेबस थी। भारत अंग्रेज शासन के भ्रष्टाचार से कराह रहा था। एक ओर जहां अंग्रेज भारतीय जनमानस पर अत्याचार  कर रहे थे वहीं भारतीय समाज अंधविश्वासों और रुढ़िवादी  परम्पराओं से जकड़ा  हुआ था। भारतेंदु जी ने अपनी लेखनी के माध्यम से तत्कालीन राजनैतिक समझ और चेतना को स्वर दिया। सामाजिक  स्तर पर घर कर गये पराधीनता के बोझ को झकझोरा । बचपन में देखे गए प्रथम स्वतंत्रता संग्राम  का भी  उनके मन पर गहरा प्रभाव पड़ा था । 

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