प्राचीन मंदिरों में विज्ञान

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वैज्ञानिकों ने तकनीकी जांच में पाया कि इन पत्थरों को बनाने के लिए एक आयताकार खाई तैयार की गई, जिसमें ग्रेनाइट पत्थर का चूर्ण, गन्ने से निर्मित चीनी (केन शुगर), नदी की रेत और कुछ अन्य यौगिक डालकर एक मिश्रण तैयार किया। इस मिश्रण से नींव भरी गई और  विभिन्न आकार के छिद्रयुक्त पत्थर तैयार किए गए।

तिबारी बाखली का महत्व

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काश...मैं भी धन्नासेठ बनता व अपनी मध्यकालीन भारतीय शैली में अपने गांव में विशाल तिबारी का निर्माण करवाकर अपने अतिथियों को आमंत्रित कर उनकी आंखें चुन्धियाता..। काश...कि हमारी सरकार विलेज टूरिज्म के बढावे में तिबारी/बाखली प्रमोट करती तो हमारी मध्यकालीन भारतीय सभ्यता ज़िंदा रहती व भौगोलिक व पर्यावरणीय दृष्टि से हम सुकून महसूस करते।

रोजगार से स्वावलम्बन की ओर

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स्वरोजगार हेतु सरकारी सहायता पा लेना चक्रव्यूह तोड़ने से कम उपलब्धि नहीं कही जाएगी, वैसे भी हमारे प्रवासी युवा सामान्य पृष्ठभूमि से वास्ता रखते हैं। स्वरोजगार की सभी कार्यवाहियां स्वीकृति एवं प्रशिक्षण आदि न्याय पंचायत स्तर पर होनी चाहिए।

संस्कृत  साहित्य  परम्परा

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कुमाऊं और गढ़वाल में कई ऐसे साक्ष्य प्राप्त हुए हैं जिनसे यह स्पष्ट हो जाता है कि उत्तराखंड में संस्कृत साहित्य की परंपरा मौजूद थी। इन साक्ष्यों तथा ऐतिहासिक धरोहरों में से अधिकतर बहुत ही जीर्ण-क्षीर्ण स्थिति में हैं। इन धरोहरों का रखरखाव तथा संस्कृत का प्रचार-प्रसार इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि उत्तराखंड की द्वितीय राज्यभाषा भी संस्कृत है।

लोग भाषा साहित्य संस्कृति

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सभ्यता खान-पान, रहन-सहन जैसी भौतिक चीजों से सम्बंधित है वहीं संस्कृति वस्तुतः जीवन के प्रति दृष्टिकोण है। इस तरह यह धर्म के ज्यादा निकट है। जिस तरह पृथ्वी के अन्दर का तारल्य और हलचल धरती के ऊपर की वनस्पतियों में अभिव्यक्त होती है, उसी तरह मानव के भीतर के आवेग-संवेग उसके व्यवहार में छलकते हैं और यही मनोभाव संस्कृति के उपादान बनते हैं।

दीपावली के परंपरागत मगर हटके पकवान

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दीपावली के शुभ अवसर पर घर-घर में मीठे नमकीन और चटाखेदार पकवान बनते है। जैसे लड्डू, बर्फी, गुझिया, सेव, चकली, चिवड़ा आदि। पारंपरिक पकवानों का अपना स्वाद है। मगर क्यों ना इस वर्ष परंपरागत पदार्थ कुछ अलग तरीक से बनाएं ठीक वैसे ही जैस बाजार में मिलते हैं, तो स्वाद भी बदलेगा, नयापन भी रहेगा। लोग तारीफ करगें सो अलग...

गिलगित को पाक के हाथ जाता देख क्यों चुपी रही तत्कालीन सरकार, बैठे जांच आयोग: कुलदीप चंद अग्निहोत्री

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देहरा महाराजा की ओर से समस्त जम्मू-कश्मीर के विलय के बाद भी पाकिस्तानी हमले और ब्रिटिश षड्यंत्र के चलते गिलगित बाल्टिस्तान भारत के हाथ से बाहर हो गया। लेकिन इसके बाद भी तत्कालीन नेहरू सरकार चुप रही। आखिर सरकार ने क्यों यह चुप्पी साधी थी, इसकी जांच के लिए शासन…

बैरी भये पालनहार

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‘बेटों ने तो गांव में भी कुछ नहीं छोड़ा है, मेरे लिए। वापस जाऊंगा तो लोगों को क्या कहूंगा। इसलिए लौट आया कि बेटे अपनी स्वार्थ लिप्सा में इतने गिर गये है कि उन लोगों ने अपना पता देने की जगह असहाय वृद्धाश्रम पहुंचाने के लिए अज्ञात व्यक्ति को पत्र…

संवेदनशील भारत की सेवागाथा

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कोरोना के प्रसार को रोकने के लिए प्रधानमंत्री ने रविवार 22 मार्च 2020 को जनता कर्फ़्यू का आवाहन किया और 25 मार्च को सारे देश में लॉकडाउन की घोषणा हुई।

“जिस पापी को गुण नहीं गोत्र प्यारा है, समझो उसने ही हमें यहां मारा है” राष्ट्रकवि दिनकर

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उठ मंदिर के दरवाजे से, जोर लगा खेतो में अपने। नेता नहीं, भुजा करती है, सत्य सदा जीवन के सपने।।   राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर वह कवि थे जिनकी कविताएं लोगों को जोश से भर देती थी। 23 सितंबर 1908 को बिहार के बेगूसराय में पैदा हुए रामधारी सिंह दिनकर को…

जानें हिन्दी दिवस का इतिहास

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देश में सबसे अधिक हिन्दी बोलने वालों की संख्या है और उत्तर भारत के अधिकतर राज्य की यह प्रमुख भाषा है हालांकि इस भाषा का इस्तेमाल देश के उन राज्यों में भी होता है जहाँ हिन्दी भाषी नहीं है या फिर कम हैं। हिन्दी भाषा को देश के अलग अलग…

भारतेंदू हरिश्चंद्र: आधुनिक हिन्दी साहित्य के पितामह

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बरषा सिर पर आ गई हरी हुई सब भूमि बागों में झूले पड़े, रहे भ्रमण-गण झूमि करके याद कुटुंब की फिरे विदेशी लोग बिछड़े प्रीतमवालियों के सिर पर छाया सोग खोल-खोल छाता चले लोग सड़क के बीच कीचड़ में जूते फँसे जैसे अघ में नीच भारतेंदु हरिश्चंद्र को उनके साहित्य…

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