प्रमोद भार्गव को डॉ. सरोजिनी कुलश्रेष्ठ सम्मान

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शिवपुरी। प्रसिद्ध लेखक एवं पत्रकार प्रमोद भार्गव को उपन्यास एवं कहानी लेखन के क्षेत्र में डॉ. सरोजिनी कुलश्रेष्ठ सम्मान दिया जाएगा।मध्यप्रदेश लेखक संघ द्वारा प्रतिवर्ष यह सम्मान ऐसे लेखक को दिया जाता है, जिसने उपन्यास और कहानी लेखन के क्षेत्र में देश में अपनी विशेष पहचान व प्रतिष्ठा बनाकर प्रदेश…

एक थी प्रगति

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नारी के बारे अश्लील लिखा तो वो सच्चा नारी विमर्श और कहीं नारी शालीनता के साथ कर्तव्यपरायण हो गई तो वो दकियानूस, पिछड़ी, मानों विमर्श ने नारियों का ठेका इन प्रगतिशीलों को, वादियों को दे रखा हो। और, दलित विमर्श की तो बात ही मत पूछो इस शब्द को तो इतना आइसोलेट किया कि एक छोटे से खाने में कैद हो गया।

खामोश! प्रिंस टूर पर हैं…

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“देश उबल रहा है, किसान उबल रहे हैं, अदालत उबल रही हैं मगर राजकुमार कहीं ठण्ड में दुबके बैठे हैं। उनके टुटपुंजिये प्रवक्ता ही ऊटपटांग बयान देकर भाग निकलते हैं बस। खाामोश, चूंकि प्रिंंस टूर पर है।”

आज फिर आपकी कमी सी है…

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जगजीत सिंह को सुनना एक पूरी जिंदगी को जीने जैसा है। जिस तरह वो इश्क करने वालों को लुभाते थे, वैसे ही अपनी जिंदगी की ढ़लान पर खड़े लोगों को उनका बचपन भी याद दिलाते थे। अपने ‘लाइव’ कार्यक्रमों में जब वे ‘वो कागज की कश्ती, वो बारिश का पानी सुनाते’ तो कई लोगों की आंखों के किनारे बरबस ही भीग जाते थे।

पंचर, कपलिंग और टाइमपास लोकतंत्र

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लोकतंत्र की क्या कहिए। कब पंचर हो जाए। कब तक स्टेपनी साथ दे। कब इंजिन सहमति दे जाए। कब कौन पत्ते फैंट दे। कब कौन तीन पत्ती शो कर दे। कब गुलाम और इक्का मिलकर बादशाह को पंचर कर दे। कब ताश की दुक्की ट्रंप बन जाए। चाय, अखबार और चैनलों में पसरे हुए जनता के दिन इस बहाने कितने लोकतांत्रिक ढंग से कट जाते हैं।

मानसून का आ जाना कोरोना में..

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“घर ही नहीं बाहर भी ये मौसम और ये दूरी सभी को अखर रही है.. कि कब कोरोना का सत्यानास जाए और पहले की तरह हम खूब खाए पियें और हुलसकर अपनों से गले मिलें, जिससे बारिश की बूंदों में प्रेम की फुहार मिलकर बरसे...”

हिंसक आंदोलन का लेखाजोखा

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नक्सलली आंदोलन, उसके कार्यकर्ताओं की निष्ठा, संघर्षशीलता, गरीब आदिवासियों में उनकी पैठ के साथ-साथ उसके जनविरोधी स्वरूप को समझने के लिए स्व. पत्रकार प्रकाश कोलवणकर की यह मराठी किताब उपयोगी साबित होगी।

जंग जिंदगी की

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“कुछ दिन बाद डॉ. अनूप स्वयं को थोड़ा स्वस्थ महसूस करने लगे। उन्हें अपने मरीज याद आने लगे थे। वे कोरोना वायरस के दुष्प्रभाव को खुद भुगतचुके थे। उन्होंने कोरोना के रोगियों को बचाने की मन में ठान ली और पुन... मरीजों की सेवा करने हेतु अपना रक्षा- कवच पहन कर, योद्धा बन हॉस्पीटल पहुंच गए। जिंदगी की जंग फिर शुरू हो गई थी!”

इत्ते टेंशन…

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“चीनी चपटा नासमिटा कोरोना, अम्पन तूफान, पाकिस्तान से टिड्डियों का आतंकी हमला, ये मजदूर अलग नी मान रिये... उधर अपनी फटी जेब वाले भिया भी नित नई हेयर स्टाइल में टिड्डियों से भी खतरनाक हमला सरकार पर बोलते हैं। अब आप ही बताव कि इत्ते टेंशन में कोई मजे में कैसे रहे?”

भारत बोध के संघर्ष में मोदी का आंकलन

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भारतीय सभ्यता लम्बे अरसे तक संघर्षों में फंसी रही, तो इसका एक कारण यह भी माना जाता है कि भारत ने सेमेटिक पंथो और भारतीय पंथों का कभी भी यथार्थ की खुरदुरी भूमि पर आकलन नहीं किया। हम अपनी उदात्तता का प्रक्षेपण अन्य पंथों पर करते रहे और उनके यथार्थ का सामना करने से अब भी बचते रहे हैं।

भारतीय नृत्य के आराध्य न ट रा ज

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भरतमुनि ने नाट्यशास्त्र की नींव रखी और भगवान शिव अर्थात नटराज बन गए संपूर्ण भारतीय नृत्य के आराध्य दैवत। नटराज अर्थात नाट्य और उससे संबंधित कलाओं पर राज करने वाला, याने नटराज। नृत्यकला नाट्य के बिना अधूरी है और नाट्य नृत्यकला के बिना अधूरा है।

तानसेन न सही कानसेन तो बनें

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आप जो सुन रहे हैं उसकी तरंगें, उसके बोल, उसके वाद्यों की झंकारें अगर आपके मन मस्तिष्क तक नहीं पहुंचतीं और आपको आल्हादित नहीं करतीं तो आपका संगीत सुनना व्यर्थ होगा। अत: अच्छा संगीत सुनें, तानसेन ना सही पर कानसेन जरूर बनें।

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