वर्तमान संदर्भ में झांसी की रानी का चरित्र

बचपन के वे दिन याद आते हैं, जब पाठ्य पुस्तकों में सुंदर कविता रहती थी जो आज भी हमें कंठस्थ है। ‘यह कदम्ब पे़ड अगर मां होता यमुना तीरे मैं भी उस पर बैठ कन्हैया बनता धीरे-धीरे।’ कृष्ण के व्यक्तित्व को बाल हृदय में डालने, एवं घर-घर में कृष्ण बनने की यह अनोखी प्रक्रिया सचमुच अद्भुत थी।

हमारी पांचवी की पाठ्य पुस्तक में सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता ‘खूब ल़डी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी’ ने तो हमारे तन-मन पर ऐसा जादू किया कि आज भी उसका असर नहीं उतरा है। कविता कंठस्थ कर खूब जोर-शोर से केवल गाते ही नहीं थे, बल्कि घर की पुरानी ओढ़नी का फेटा बांधकर मां की पुरानी सा़डी का कच्छा बनाकर पहन लेते, पुरानी गु़िडया को पीठ पर बांध झूठमूठ के घो़डे पर सवार हो कमचीनुमा लक़डी की तलवार को साथ ले ऐसी रपेट लगाते कि घर का आंगन भी हिल जाता। कविता के हर शब्द में भरा ओज, मन को जोश से भर देने वाली वह लय रोम-रोम में रानी के स्वरूप को भर देती।

आज ये सारी कविताएं पाठ्य पुस्तकों से निकल गईं हैं। हिंदी की चिन्धी कर अंग्रेजी के साम्राज्य ने बाल मन से लेकर युवा मन को माटी की ऊर्जा के परे यंत्रवत बना दिया है। ये चलती-फिरती कठपुतली मात्र पैसे कमाने की मशीन बन गए हैं। इस भूमि के प्रति भाव-भावनाएं श्रद्धा-भक्ति लुप्त हो गई है। जिन अंग्रेजों को इस देश से मार भगाने के लिए जिसने मात्र 23 वर्ष की उम्र में अपने प्राणों की आहुति दी, उस रानी के देश में आज अंग्रेज तो चले गए पर अंग्रेजी आज भी सरचढ़ कर बोल रही है। रानी का अस्तित्व युवा मन से मिट चुका है। संस्कारों के क्षरण के साथ ही प्रेरणा देने वाले व्यक्तित्व भी बदल चुके हैं। हमारा दुर्भाग्य है कि हमारे देश का आई. टी. सेक्टर का युवा जो अपनी बुद्धिमत्ता की धाक विदेश में जमाता है, पर अपने ही देश के महान व्यक्तित्व को पहचानने में असमर्थता दिखाता है। मा. सुधा मुर्तिजी का संस्मरण प्रमाण है कि जब वे ओजस्विनी सम्मान ले झांसी की रानी की घो़डे पर सवार प्रतिमा का प्रतीक चिन्ह साथ ले यात्रा कर रही थीं, तब अगल-बगल बैठे उच्च शिक्षित युवा वर्ग इस प्रतिमा को पहचान नहीं पाए आखिर उन युवाओं को उन्होंने वह ओजस्वी चरित्र बताया तब उन्हें महसूस हुआ कि वे इस देश के इतिहास से कितने अनभिज्ञ हैं। आज लगभग देश के कई युवाओं की यही स्थिति है। इसके लिए कौन दोषी है? हमारी आज की शिक्षा अर्थ एवं कामनाओं के बीच फंसकर रह गई है। मन में विचार आते ही लगता है कि समय आने पर ऐसे युवा जिनके हाथों में राष्ट्र के कल का भविष्य है, क्या मां भारती की रक्षा कर पाएंगे?

निराशा के गर्त में भी टाइम्स ऑफ इंंडिया में छपे उस सर्वे रिपोर्ट जो विदेशी धरती पर किया गया, उसमें दस महान नारियों में झांसी की रानी का नाम सम्मिलित था, कहीं न कहीं हमें आशान्वित करता है। इन विपरीत परिस्थितियों में भी मैंने तो निश्चय किया था कि रानी के चरित्र को जन-जन के मन में जगाना ही है। हर युवा के हृदय मेें रेखांकित करना ही है। जीवन में अवसर सहज आते गए। राष्ट्र सेविका समिति का कार्य करते वक्त वं. लक्ष्मी बाई केळकर (मौसीजी) ने तीन आदर्श सामने रखे, जिसमें कुशल नेतृत्व के लिए झांसी की रानी का चरित्र अनायास ही सामने आया और कथा रूप में चरित्र बताने का शौक बढ़ता ही गया। यह स्वर्ण अवसर आगे और मिला, जब संगठन ने रानी की स्मृति में 1857 की 125वीं वर्षगांठ वर्ष 1982 में पूरे वर्ष मनाने का निश्चय किया। उद्देश्य वही था, रानी के चरित्र को जन-जन में पुन: जगाना। इस अवसर ने मेरे अंदर के कवि मन को झकझोरा। रानी के जीवन के हर प्रसंग को काव्यमय पंक्तियों में गूथना शुरू किया। ‘गीत संग्राम लक्ष्मी’ का यह प्रयोग गीतबद्ध कर स्थान-स्थान पर चरित्र कथन के साथ लिया, परंतु रोमांच के क्षण वे थे, जब झांसी की धरती पर 19 नवंबर 1982 को रानी के जन्मदिन पर इस प्रयोग को प्रस्तुत करने का अवसर हमें मिला। यह आयोजन लक्ष्मीबाई केळकर की प्रेरणाशक्ति से मा. श्रीमती लक्ष्मीवाकण (उज्जैन) द्वारा वीरांगना लक्ष्मीबाई (झांसी की रानी) के लिए आयोजित किया गया। 3 लक्ष्मियों का अद्भुत संयोग सम्मेलन भव्य और तेजस्वी होना ही था। पूरा झांसी का परिसर रानी की जय-जयकार से गूंज उठा

1) ‘चंडिके तेरी जय-जयकार चंडिके तेरी जय-जयकार’

2) जय-जयकार करो लक्ष्मी का जो रणचंडी का अवतार

200-300 तरुणियों के मुख से रानी के नाम की गूंज ने आकाश को गुंजित कर दिया। उस दिन लगा कि रानी आज भी युवाओं के मन के किसी कोने मेें विद्यमान हैं।

झांसी का किला लगभग ध्वस्त हो चुका है, पर उस पर कदम रखते ही उसके कण-कण में विद्यमान ऊर्जा, रानी के घो़डों की टाप, कानों में गूंजने लगती है। झांसी के बुर्ज आज भी लोगों को अपनी ओर बुलाते हैं, और कहते हैं-

झांसी के बुर्ज बुलाते हैं बीता इतिहास सुनाते हैं
लो अश्व पुन: दौ़डो इस पर कण-कण से आवाज उठाते हैं
है आंदोलित हम सबका मन, फिर सफल क्यों नहीं यह जीवन
इस धरती का है आकर्षण, बिजली का इस पर है घर्षण
नित हर कण से गर्जन-तर्जन, करता हम सबको आह्वान
इस माटी को लेकर जाएंगे, जन-जन में इसे जगाएंगे
मन में नव शक्ति संचरण, फिर सफल क्यों न हो यह जीवन

किले के बुर्ज पर ही प्रस्फुटित यह स्फूर्त काव्य रचना वहां के दिव्य कंपन की सत्यता को प्रमाणित करते हैं। जिसने इस माटी को छुआ उस ऊर्जा की अनुभूति हृदय से किया, समझो उसका जीवन सार्थक हो गया।

इन ब्ाुर्जों के दिव्य आह्वान ने ही आगे चलकर अग्नि में घी की आहुति का काम किया। मन की ज्वाला भ़डक उठी। 1997 में जब सेवा प्रकल्प के रूप मे छत्रावास खोला तो इसका नाम तेजस्विनी कन्या छात्रावास रखा। छात्रावास का भवन बना, तब इस भवन के प्रवेश द्वार को झांसी के किले का रूप दिया गया। स्वतंत्रता संग्राम के यज्ञ कुंड में ख़डी ओजस्वी रानी की प्रतिमा स्थापित की गई तथा ‘ इदं मम् राष्ट्राय स्वाहा:’ का संदेश देता प्रवेश द्वार लोगों के आकर्षण का केंद्र बना।

18 जून 1857 की वह शाम रानी का इस संसार से दिव्य गमन का क्षण आज की युवतियों को दिव्य संदेश दे गया।

स्वतंत्रता संग्राम यज्ञ की ज्वाला भ़डक उठी
समर यज्ञ की ज्वाला में एक दिव्य ज्योति जा मिली
झेल वार प्रति वार अंत तक बेसुध शरीर संवारा
बाबा की कुटिया में जाकर अंतिम बार निहारा
दामोदर को सौंप सुरक्षित, स्वयं दिव्य पथ चली॥1॥
छू न सके अरि अंतिम क्षण तक अग्निशिखा की लौ को
हुआ समर्पित तेज तेज को शेष बचा था अब जो
इदं न मम् राष्ट्राय स्वाहा, दिव्य मंत्र से घिरी॥2॥
समर यज्ञ की ज्वाला में एक दिव्य ज्योति जा मिली
तीर्थ स्थल हो गई धरा वह, जहां समाधि बनी

रानी का यह दिव्य समर्पण, अंतिम क्षणों में भी शील की रक्षा। तेजस्विता तथा संघर्ष स्वयं के अस्तित्व की रक्षा के लिए नहीं, राष्ट्र की रक्षा के लिए किया गया। क्या हम वर्तमान में इस दिव्यता से राष्ट्र की भव्यता का संकल्प ले सकते हैं? तो युवाओं का उत्तर हां होना चाहिए, जिन्हें इस धरती से थो़डा भी प्यार है, वह निश्चित रूप से हां में ही उत्तर देगा, ऐसा आज भी मैं विश्वास करती हूं।

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