संकल्पित मातृत्व की प्रतिक जीजा माता

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वीर प्रसुता भारत माता की कोख सदा ही दिव्य मातृत्व से सुशोभित रही है। अपने राष्ट्र की सुरक्षा एवं उसे वैभव शिखर पर ले जाने में जितना पुरुषों का योगदान है उनसे कहीं अधिक माताओं की संकल्प शक्ति का है। आदि काल से अब तक माताओं की संकल्पित संतती की कामनाओं ने ही राष्ट्र की सुरक्षा एवं सरकारों की धरोहर को अबाधित रूप से बचाए रखा।

भारत की वीरांगनाएं-

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भारत की विरांगनाओं को भी समय-समय पर अपनी प्रजारूपी संतानों की रक्षा हेतु हमने चण्डिका रूप धारण करते देखा है। किसी ने अपनी कायर पुरुष संतानों को वाक्बाणों से प्रताड़ित कर युध्द के लिए प्रेरित किया तो किसी ने सीधे खड्ग धारण कर युध्दभूमि पर अपना रणकौशल दिखा कर अमृतमय मृत्यु का वरण किया है।

योग: कर्मसु कौशलं

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     योगेश्वर श्री कृष्ण ने गीता में अर्जुन को उपदेश देते हुए कहा है ‘‘योग: कर्मसु कौशलं।‘‘ अर्थात योग जीवन जीने की कला है। योग कार्य करने का कौशल सिखाती है। योग सत्य को जीवन में उतारने का माध्यम है।

खूब लडी मर्दानी

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झांसी की रानी लक्ष्मीबाई अटूट राष्ट्रनिष्ठा एव अंतिम क्षणों तक सतीत्व रक्षा के प्रति जागृत थी। यह बोध आज की पीढ़ी के लिए सचमुच प्रेरणादाई है। आज की युवा पीढ़ी को चाहिए कि वह रानी के बलिदान को व्यर्थ न जाने दे। २५ मई (शास

वर्तमान संदर्भ में झांसी की रानी का चरित्र

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बचपन के वे दिन याद आते हैं, जब पाठ्य पुस्तकों में सुंदर कविता रहती थी जो आज भी हमें कंठस्थ है। ‘यह कदम्ब पे़ड अगर मां होता यमुना तीरे मैं भी उस पर बैठ कन्हैया बनता धीरे-धीरे।’ कृष्ण के व्यक्तित्व को बाल हृदय में डालने, एवं घर-घर में कृष्ण बनने की यह अनोखी प्रक्रिया सचमुच अद्भुत थी।

वीर माताएं

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जननी और जन्मभूमि को स्वर्ग से श्रेष्ठता की कड़ी में जिन माताओं ने अपने नौजवान पुत्रों को स्वतंत्रता की बलिवेदी पर “इदं न मम्, इदं राष्ट्राय स्वाहा:” कह कर मातृभूमि को स्वतंत्र करने न्यौछावर कर दिया उन माताओं की अन्तरमन की भावना को समझना, उनकी वेदनाओं को उतनी ही तीव्रता से अनुभव करना शायद वर्तमान में असंभव सा लगता है।

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