फिल्म संगीत और रेडियो

रेडियो; बीते कल का हो, आज का, उसका आधार, उसके कार्यक्रमों की धुरी भारतीय फिल्म संगीत और उससे जुड़ी हस्तियां ही हैं। फिल्म संगीत के माध्यम से रेडियो ने और रेडियो के माध्यम से फिल्म संगीत ने विश्व भर में भारत की विजय पताका फहराई है।

भारतीय संस्कृति में संगीत को एक अहम स्थान प्राप्त है। भारत के कण-कण में संगीत बसा है। भारत की हवाओं में, फिजाओं में, परिंदों की चहक तक में संगीत है। यहां का हर मौसम, हर त्योहार, हर रीति-रिवाज, हर मांगलिक कार्य संगीत के बिना अधूरा है। आत्मा का ताप… असह्य मनोव्यथा… रुदन… क्रंदन… संगीत के चरणों में ही त्राण पाते हैं। जन्म से लेकर मृत्यु तक संगीत हमारे साथ रहता है। ऐसी स्थिति में भारतीय फिल्मों का संगीत से ओत-प्रोत होना स्वाभाविक ही है। फिल्में चूंकि समाज का दर्पण होती हैं, अत: इन संगीतमयी सामाजिक परंपराओं के दर्शन फिल्मों में भी होते हैं। विश्व के किसी भी अन्य देश में फिल्मों में संगीत को इतना महत्व नहीं दिया जाता जितना कि भारत में। भारत के फिल्मकार गीत रहित फिल्में बनाने का साहस बड़ी मुश्किल से जुटा पाते हैं। यही कारण है भारत में जैसे ही सवाक् फिल्मों के निर्माण शुरू हुए वैसे ही इनमें गीतों का समावेश हो गया। 14 मार्च 1931 को प्रदर्शित भारत की पहली बोलती फिल्म ‘आलम आरा’ में 7 गाने शामिल थे। इसी फिल्म से हिंदी फिल्म संगीत का आरंभ हुआ।

वैसे भारतीय फिल्मों में गीत-संगीत का जुड़ाव मूक फिल्मों के दौर से ही शुरू हो गया था। मूक फिल्मों के समय संगीतकारों का एक दल अपने वाद्य-यंत्रों के साथ सिनेमा हॉल के स्टेज के सामने एक निश्चित स्थान में बैठकर फिल्म की स्थिति और घटनाओं के अनुरूप गीत-संगीत प्रस्तुत करता था। मूक सिनेमा जब सवाक् हुआ तो ये सारी चीजें तिरोहित होकर सिनेमा की रीलों में समा गईं… यही नहीं कलाकार संवाद भी बोलने लगे। कलाकारों को पर्दे पर बोलते और गाते देखना लोगों को अचंभित कर गया, ‘दृश्य’ और ‘श्रव्य’ का ये अनोखा मिलन दर्शकों के लिए एक अजूबे से कम न था।

‘दृश्य’ और ‘श्रव्य’ से उपजे इस माध्यम ने मनोरंजन के क्षेत्र में अनेकानेक संभावनाओं के द्वार भी खोल दिए। गीत-संगीत के शौकीनों को सिनेमा का संगीत पक्ष चुंबक की तरह खींचने लगा। इस ‘खिंचाव’ को देखकर फिल्म कंपनियों में अपनी फिल्मों में अधिक से अधिक गाने डालने की होड़ लग गई, मदन थिएटर्स कलकत्ता की फिल्म ‘इंद्र सभा’ में 71 गाने थे।
उन दिनों गानों की रिकॉर्डिंग स्टूडियोज में नहीं, सुनसान पार्कों में प्रात: काल के समय होती थी ताकि शोर-शराबा और दीगर आवाजें रिकॉर्ड न हो जाएं। कलाकारों को अपने गाने स्वयं गाने होते थे। माइक और वाद्य बजाने वाले साजिंदों की स्थिति के अनुसार उनके चलने-फिरने और अभिनय की सीमाएं बंध जाती थीं। शूटिंग के दौरान साजिंदों, उनके साजों, माइक और अन्य रिकॉर्डिंग-यंत्रों को कैमरे से छुपाना एक समस्या बन जाती थी। रिकॉर्डिंग का मूल्यांकन कर पाना मुश्किल हो जाता था। इन सारी अड़चनों के कारण पार्श्व-गायन की आवश्यकता बड़ी शिद्दत से महसूस की जाने लगी, ताकि गायक-अभिनेता अपने गीत अलग से रिकॉर्ड करवाकर शूटिंग के समय बोलों पर अपने होंठ हिलाकर गाने का अभिनय कर दें जिसे आज के दौर में लिप-सिंक कहते हैं।

1935 में फिल्म ‘भाग्यचक्र’ उर्फ ‘धूप छांव’ से भारत में पार्श्व गायन पद्धति का श्री गणेश हुआ और इसके साथ ही जन्म हुआ रिकॉर्डिंग स्टूडियोज और ग्रामोफोन रिकॉर्ड्स बनाने वाली कंपनियों का। इनके जरिए फिल्मी गाने ग्रामोफोन-रिकॉर्डों में ढलकर लोगों तक पहुंचने लगे। अब लोगों को अपना मन पसंद गाना सुनने के लिए बार-बार सिनेमा घर जाने की आवश्यकता नहीं थी… अब उनके सामने एक सस्ता और सुलभ साधन उपलब्ध था… यही नहीं ग्रामोफोन रिकॉर्डों के कारण अच्छे गीत-संगीत का योगदान स्वीकारा जाने लगा। फिल्मों के गानों से उपजे ‘श्रव्य’ के इस माध्यम ने कारोबारियों का ध्यान अपनी ओर खींचा और इसके व्यवसायीकरण का विचार उनके मन में अंगड़ाइयां लेने लगा।

ध्वनि-तरंगों की खोज और उसके इस्तेमाल से उपजे-वायरलैस-ब्रॉडकास्टिंग के कई सफल प्रयोग हो चुके थे। 1906 में जन्मी रेडियो-ब्रॉडकास्टिंग की संकल्पना इटली के मारकोनी नामक वैज्ञानिक ने यथार्थ रूप में बदल दी थी। इसका पहला प्रयोग इंग्लैंड में 1921 में हो चुका था। इस प्रगति से उत्साहित होकर ब्रिटेन और सिलोन के कुछ संगीत प्रेमियों ने 1925 में कोलंबों में ‘सिलोन वायरलैस क्लब’ की स्थापना की जिसमें स्थानीय लोगों के लिए ग्रामोफोन-संगीत प्रसारित होता था यही ’सिलोन वायरलैस क्लब‘ आगे चलकर ‘रेडियो सिलोन’ में परिवर्तित हुआ।

मांग और पूर्ति एक दूसरे के पर्याय होते हैं और यही आधार बनती है व्यापार-व्यवसाय की संभावनाओं का। फिल्म-संगीत और रेडियो की जुगलबंदी से क्या कोई उद्योग पैदा हो सकता है? इस पर अनुसंधान और अन्वेषण होने लगे…परिणाम स्वरूप रिकॉर्ड बनाने वाली कंपनियों और प्रसार केंद्र स्थापित होने लगे… और इनसे जुड़े कई अन्य उत्पाद भी।

भारत में 1936 में ऑल इंडिया रेडियो की स्थापना हुई। अक्टूबर 1939 में विदेशी प्रसारण आरंभ हुआ। 1950 तक ऑल इंडिया रेडियो विश्व का सर्वश्रेष्ठ रेडियो स्टेशन बन चुका था; जिसका स्वरूप बी. बी. सी. लंदन की तर्ज पर तैयार किया गया था। ये शिक्षा, सूचना, मनोरंजन में अग्रणी था और इसके पास देश के बेहतरीन लेखकों, उद्घोषकों, प्रस्तुतकर्ताओं, कलाकारों और निर्माताओं की भरमार थी। 1947 के भारत विभाजन से कुछ प्रतिभाएं पाकिस्तान पलायन कर गईं पर शीघ्र ही उनकी पूर्ति भी हो गई।

पर इसी समय तीन चीजें एक साथ हुई जिन्होंने ऑल इंडिया रेडियो के पंख कतरने शुरू कर दिए और भारत में कमर्शियल रेडियो का जन्म हुआ…लेकिन विदेशी धरती पर एक अनचाहे बच्चे की तरह।

1948 में सिलोन (अब श्रीलंका) को स्वतंत्रता मिली। अंग्रेजों ने कोलंबो स्थित, दक्षिण पूर्वी एशिया के बेहतरीन शॉर्ट-वेव ट्रांसमीटर्स, जिनकी कमांड लॉर्ड माउंटबैटन के हाथ थी, सिलोन यानी श्रीलंका सरकार को भेंट में दे दी। इन्हीं ट्रांसमीटर्स पर श्रीलंका सरकार ने ‘ऑल एशिया कमर्शियल ब्रॉडकास्टिंग सर्विस’ अंग्रेजी और तमिल में बड़े जोर-शोर से शुरू की। 100 किलोवॉट के इन ट्रांसमीटर्स की पहुंच न केवल एशिया बल्कि अफ्रीका तक थी। यही नहीं श्रीलंका सरकार को ग्रामोफोन रिकॉर्ड्स का एक विशाल भंडार भी अंग्रेजों से प्राप्त हुआ।

और इधर भारत के पहले प्रसारण मंत्री डॉ. बी. वी. केसकर, जिन्हें कमर्शियल ब्रॉडकास्टर रेडियो सिलोन का ‘पितामह‘ मानते हैं, के मन में कुछ और ही चल रहा था। उन्होंने आते ही ‘ऑल इंडिया रेडियो’ को अफसरशाही के शिकंजे में कस दिया। ऑल इंडिया रेडियो की परंपरागत चली आ रही रचनात्मकता पर अंकुश लगा दिया। गजब तो तब हुआ, जब उन्होंने भारतीय फिल्म संगीत को भारतीय संस्कृति के विरुद्ध कहकर उसे पूरी तरह बैन कर दिया। ऑल इंडिया रेडियो के फिल्मी-गीतों के खजाने को या तो फेंक दिया गया या नष्ट कर दिया गया। लेकिन दूर-दराज के अनजाने द्वीप श्रीलंका ने उन्हें बड़े प्यार से सहेज कर रखा। यही नहीं, उसमें इजाफा किया और विश्व में हिंदी फिल्म संगीत की सबसे बड़ी लाइब्रेरी का गौरव हासिल किया। है न विचित्र विडंबना! पैदा कहीं हुआ और परवान कहीं चढ़ा।

इस अवसर को रेडियो सिलोन के व्यवस्थापकों ने एक वरदान के रूप में लिया। उन्होंने इस वरदान को दोनों हाथों से बटोर लिया। 30 मार्च 1950 को उन्होंने भारतीय फिल्मी गानों का प्रसारण शुरू कर दिया। जैसा कि सब जानते हैं; 1950 का दशक हिंदी फिल्मी गानों का स्वर्ण युग माना जाता है; इन गानों के सुनने के लिए श्रोता चुंबक की तरह रेडियो सिलोन की ओर खिंचने लगे। फिल्म संगीत के सारंग से उभरे गानों के मोती प्राय: सारे एशिया और अफ्रीका महाद्वीपों में अपना आफताब बिखेरने लगे। रेडियो सिलोन की लोकप्रियता दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ने लगी।

रेडियो की इस लोकप्रियता ने भारतीय उत्पादकों को भी अपनी ओर खींचा। उत्पादकों की नब्ज को पकड़ते हुए एक अंग्रेज डैनियल मोलीना ने समस्त एशिया के विज्ञापनों को बुक करने के लिए मुंबई में रेडियो एडवर्टीजिंग सर्विसेस की स्थापना की। इसके एवज में उन्हें भारी कमीशन प्राप्त होने लगा। उस दौर में ये विज्ञापन रेडियो पर उपस्थित उद्घोषक द्वारा बोलकर किए जाते थे। बाद में इसी एजेंसी की एक उप एजेंसी ने विज्ञापनदाताओं के लिए विज्ञापन ही नहीं कार्यक्रमों का निर्माण भी आरंभ किया। इन कार्यक्रमों की आधारशिला भी हिंदी फिल्मी गाने ही थे। इस एजेंसी द्वारा निर्मित ‘ओवलटीन फुलवारी’, ‘कोलगेट-रंग-तरंग’, ‘लक्स सितारों के साथी’, ‘बिनाका गीतमाला’ जैसे कार्यक्रमों ने फिल्म संगीत की बुनियाद पर सारे एशिया में धूम मचा दी। मनमोहन कृष्ण, हमीद सायानी, सुनील दत्त, हसन रिजवी और अमीन सायानी जैसे विश्वविख्यात ब्रॉडकास्टर दिए।

रेडियो सिलोन की हिंदी सर्विस अब तक मात्र प्रायोजित कार्यक्रमों पर चल रही थी। तत्कालीन डायरेक्टर कमर्शियल सर्विस मिस्टर क्लिफर्ड डोड ने इसे एक ‘ब्रैंड’ के रूप में स्थापित करने का निश्चय कर लिया। इसके लिए उन्होंने इसकी बागडोर प्रतिभाशाली और पूरी तरह समर्पित ब्रॉडकास्टर विजय किशोर दुबे के हाथ में सौंपी। दुबे जी ने सबसे पहले इस सेवा को अंग्रेजी के प्रभुत्व से आजाद किया क्योंकि अब तक जो प्रायोजित कार्यक्रम हो रहे थे वे सब मशहूर अंग्रेजी कार्यक्रमों की कार्बन-कॉपी मात्र थे। उन्होंने फिल्म संगीत की प्रस्तुति को विभिन्न प्रारूपों में ढाला…अपनी सूझ-बूझ और ज्ञान से ‘फारमेट्स’ बनाए… उन्हें नाम दिए… उनकी शीर्षक धुनें बनाईं और रेडियो सिलोन की हिंदी सर्विस के माध्यम से भारतीय फिल्म संगीत नई उड़ाने भरने लगा…

क्लिफर्ड डोड की लीडरशिप और विजय किशोर दुबे की मेहनत और लगन ने हिंदी सर्विस एक दुधारू गाय में बदल दिया जो न केवल करोड़ों की आय श्रीलंका सरकार को कराने लगी, बल्कि एशिया महाद्वीप के श्रोताओं के लिए एक तीर्थ स्थान बन गई। यही नहीं… रेडियो पर रेडियो सिलोन आना; उसके बिकने की गारंटी बन गया।

पड़ोसी देश में उभरते और भारतीय फिल्म संगीत के माध्यम से भारत के श्रोताओं के दिलों पर झंडे गाड़ते रेडियो सिलोन की कामयाबी और लोकप्रियता ने ‘ऑल इंडिया रेडियो’ने, जो 1956 में ‘आकाशवाणी’ नाम धारण कर चुका था, फिल्मी संगीत की अहमियत को पहचाना और अक्टूबर 1957 में उसने रेडियो सिलोन की तर्ज पर ‘विविध-भारती’ सेवा आरंभ की। उसमें फिल्मी गाने और उन पर आधारित प्रोग्राम तो आने लगे पर ‘विज्ञापन’अभी भी वर्जित थे।

प्रायोजित कार्यक्रम, जो रेडियो सिलोन की लोकप्रियता और कमाई का आधार थे, का निर्माण बाहरी निर्माताओं द्वारा करवाया जाता था। इससे कार्यक्रमों के प्रारूपों और प्रस्तुतिकरण में ताजगी और विविधता रहती थी। इस बात को समझने में विविध भारती को तीन वर्ष लग गए। बहराल ‘देर आयद दुरुस्त आयद’… और 3 मई 1970 को विविध भारती पूरी तरह रेडियो सिलोन को टक्कर देने लगा। फिर क्या था? रेडियो और फिल्म संगीत की एक और अजस्र धारा बह निकली और संगीत प्रेमियों को संगीत की भरपूर खुराक देने लगी।

1950-1970 के युग को रेडियो का ‘स्वर्ण युग’ माना जाता है। उस दौर का कंटेंट, भाषा, ब्रॉडकास्टर्स की आवाजें उनका प्रस्तुतिकरण सब कुछ सर्वश्रेष्ठ था। आज भले ही तकनीकी-विकास पाकर रेडियो एफ.एम. ब्रॉडकास्टिंग में ढल चुका है। इससे उच्च-स्तरीय ध्वनि और साफ-सुथरा प्रसारण तो हमें मिला है…नित नए-नए रेडियो स्टेशनों की संख्या में भी इजाफा हो रहा है, पर ‘क्वालिटी’ कहीं पीछे छूटती जा रही है। कंटैंट, भाषा, प्रस्तुतिकरण और वाणी की शुद्धता जैसे शब्द अब शायद किताबों तक ही सीमित होकर रह गए हैं। पर एक चीज आज भी नहीं बदली। रेडियो; बीते कल का हो, आज का, उसका आधार, उसके कार्यक्रमों की धुरी भारतीय फिल्म संगीत और उससे जुड़ी हस्तियां ही हैं। फिल्म संगीत के माध्यम से रेडियो ने और रेडियो के माध्यम से फिल्म संगीत ने विश्व भर में भारत की विजय पताका फहराई है; इसमें कोई संदेह नहीं। फिल्म संगीत और रेडियो एक-दूसरे के पूरक हैं और हमेशा रहेंगे।
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