विकलांगों की समस्याएं एवं पुनर्वसन

सिर्फ विकलांग दिवस पर एक दिन स्मरण करने से विकलांगों की पुनर्वसन की समस्या सुलझ नहीं सकती। उसमें आनेवाली बाधाएं- अधिकारियों, सरकार की निष्क्रियता, भ्रष्टाचार, अपात्र व्यक्तियों को बहाल की जानेवाली सुविधाएं, पात्र व्यक्तियों को कुछ लाभ न होना आदि में जब तक कुछ परिवर्तन नहीं होता, तब तक विकलांगों को मुख्य प्रवाह में लाना मुश्किल होगा।

विकलांग बनने की कहीं कोई मांग नहीं करता और किसे किस कोटि की विकलांगता मिले, इसका भी जन्म पाने के पहले किसी को पता नहीं होता। फिर भी एक बार विकलांगता प्राप्त होने पर उन बालकों को और उनके माता-पिताओं, परिवारों, रिश्तेदारों सभी को कितनी ही समस्याओं से जूझना पड़ता है। अंध, कर्णबधीर, मतिमंद, बहुविकलांग, अस्थिव्यंग्य आदि विभिन्न प्रकार की विकलांगता के अनुसार उनकी वे समस्याएं विभिन्न प्रकार की ही दिखाई देती हैं।

विकलांग होने के कुछ वैद्यकीय कारण होते हैं, इसमें विश्वास करनेवाले कुछ लोग होते हैं, तो भाग्य को इसके मूल में देखते सोचनेवाले लोग भी समाज में पाए जाते हैं। वास्तव में विकलांग बने व्यक्तियों को खुद कितनी सारी कठिनाइयां झेलनी पड़ती हैं। इसलिए उनका परिवार, उनके रिश्तेदार, मित्र परिवार और समाज, सभी उनकी विकलांगता का मन से स्वीकार करें, उन्हें उनकी विकलांगता के साथ स्वीकारें और साथ ही उन्हें समाज प्रवाह में समा लेने, उनकी जीवनयात्रा सुगम-सुलभ हो, इसके लिए उन्हें आधार देने की आवश्यकता है।

मूलत: विकलांगता किस कारण प्राप्त हुई, उसका मूल कारण खोजना जरूरी है। उसकी विकलांगता का निदान जल्द हो, तो उसकी वैद्यकीय चिकित्सा कर उसका पुनर्वसन करना आसान होगा। उचित चिकित्सा तथा आवश्यक शिक्षा के माध्यम से विकलांगता की तीव्रता को कम किया जा सकता है।

विकलांग व्यक्ति को अपना माननेवाले, उसकी सहायता करनेवाले, मानवता की दृष्टि से उसे देखनेवाले बहुत से लोग हैं। उसी के साथ विकलांगता यह पाप का फल है, ऐसा मानकर उसका तिरस्कार करनेवाले लोग भी पाए जाते हैं। इस तरह अलग-अलग दृष्टिकोण न रखते हुए सभी अगर उनका पुनर्वसन करने के लिए अपनी ओर से प्रयास करें तो वह स्वस्थ समाज के निर्माण की दृष्टि से काफी उपयुक्त साबित होगा।

आधुनिक युग में विकलांग व्यक्ति भी अपने कर्तृत्व के बल पर उत्तुंग उड़ान भर सकते हैं, यह कई बार साबित हुआ है। उन्हें मौका मिलना ही केवल जरूरी होता है। उचित मौका मिलते ही उनके व्यक्तित्व के सुप्त गुणों को अवसर मिलता है और वे अपना कर्तृत्व सफलतापूर्वक दिखाते हैं। इसी कारण विशेष सामर्थ्यवान व्यक्ति ऐसा उन्हें बहाल किया नामकरण आज सभी को पसंद आया दिखाई दे रहा है। भगवान ने या प्रकृति ने उन्हें कहीं कुछ कम दिया हो, तो और कुछ बढ़ाचढ़ाकर दिया हुआ भी होता है। तभी तो उन्हें विकलांग न कहते ‘विशेष सामर्थ्यवान व्यक्ति’ कहना ही उचित होगा।

ऐसे सामर्थ्यवान व्यक्तियों के पुनर्वसन का उत्तरदायित्व समाज ने अगर उठाया, तो बहुत सारा काम हो सकता है, लेकिन परिवार, मित्र-दोस्त और समाज ये सभी यह उत्तरदायित्व सरकार को सौंपते छुटकारा पाना चाहते हैं। ऐसा करना सरासर गलत तथा दु:खदायी है।
विकलांगों का पुनर्वसन करने के प्रयास सरकार भी अपनी ओर से कर ही रही है, फिर भी उसके दौरान निष्क्रियता, भ्रष्टाचार, विकलांगता के जाली प्रमाणपत्र प्राप्त कर नौकरियां और अन्य सुविधाएं प्राप्त करना आदि बहुत सारी समस्याओं के कारण सरकार भी उचित मात्रा में सफल होती दिखाई नहीं देती।

विकलांगों के पुनर्वसन करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभानेवाले ‘मा. आयुक्त-अपंग कल्याण’ इस पद पर काम करना यह मानो एक सजा मानी जाती है, क्योंकि अपना काम करने के दौरान विकलांगों के हित में योजनाओं का आयोजन करने के बजाय, कोर्ट-अदालत, कर्मचारियों के विवादों की पैरवी, संचालकों के आवेदनों की पैरवी आदि में ही समय गंवाना पड़ता है। शासन को चाहिए, कि इस काम के लिए एक स्वतंत्र पद निर्माण कर, उस आयुक्त द्वारा सिर्फ विकलांगों के पुनर्वसन का काम ही होगा, तो सही माने में वह गतिमान बनेगा।

विकलांगों के लिए समाज में बाधारहित माहौल निर्माण करना निहायत जरूरी है। इसके माने केवल रैम्प बांधना, विशेष आसन-व्यवस्था करना ऐसा न होकर सारे समाज के अंदर वे समाहित हो सके ऐसा माहौल निर्माण करना। उदाहरण के रूप में- रास्ते, पदपथ आदि पर हुए अतिक्रमण, रास्तों के ऊपर लटकाए साईनबोर्ड, यातायात आदि बातों से उनके घूमने-फिरने पर बहुत सारे बंधन आते हैं। उन सभी पर गौर कर गहराई से सोचकर कुछ इलाज करना आवश्यक है। विकलांग व्यक्ति अधिनियम 1995 के तहत पारित हुए कानून के प्रावधानों के अनुसार कार्यवाही करते हुए नौकरियों में 3 प्रतिशत आरक्षण, नगरपालिका, महापालिका और अन्य स्थानीय स्वराज्य संस्थाओं के तथा सरकार के बजट में से 3 प्रतिशत राशि उनके पुनर्वसन करने के लिए खर्च करना और उसके साथ अन्य प्रावधानों को लेकर उचित कार्यवाही अगर की गई तो ही विकलांगों के पुनर्वसन का कार्य गतिमान होगा।

समाज में से दृष्टिहीन, कर्णबधीर, अस्थिव्यंग्य वाले, मनोविकलांग और कुष्ठरोग से मुक्त ऐसे सभी विकलांग व्यक्तियों को देखते समय उनकी विकलांगता को अनदेखा कर उनमें मौजूद सामर्थ्य पर गौर करते हुए, उनके व्यक्तित्त्व के अंदर के सुप्त सामर्थ्य को विकसित कर सभी विकलांगों को समान अवसर प्राप्त होकर समाज जीवन में उनका भरपूर सहयोग मिले तथा उनके हक-अधिकारों की रक्षा हो, इस उद्देश्य से ‘विकलांग व्यक्ति समान अवसर, अधिकारों की रक्षा तथा संपूर्ण सहयोग अधिनियम 1995’ यह केंद्रीय कानून बना हुआ है। उस पर सही तरीके से अमल होने से पुनर्वसन बड़े पैमाने पर हो सकता है। फिर भी बहुत सारे लोगों को इस कानून के बारे में कोई जानकारी तक नहीं है।

महाराष्ट्र सरकार ने नागपुर अधिवेशन के दौरान विकलांग कृति रूपरेखा 2000 घोषित की थी, फिर भी उस पर तनिक भी कार्यवाही नहीं हुई। यह रूपरेखा सरकार की ओर से आंखों में सिर्फ धूल झोंकना ही मानो था। रूपरेखा की प्रतियां सभी को बांटी गईं, लेकिन कार्यवाही कुछ भी हुई नहीं। इस रूपरेखा पर कार्यवाही अगर की जाती, तो विकलांग पुनर्वसन को कुछ नई दिशा प्राप्त हो जाती।

महाराष्ट्र के पड़ोसी गोवा, कर्नाटक, गुजरात जैसे छोटे राज्यों ने विकलांग पुनर्वसन के क्षेत्र में किया हुआ ठोस कार्य तुरंत आंखों में समानेलायक ही है। गोवा जैसा बहुत ही छोटा राज्य भी विकलांगों को प्रति मास रु. 2000/- से रु. 3000/- सानुग्रह अनुदान के रूप में देता है। नौकरियां, व्यवसाय तथा और भी छोटे बड़े कामों में उन्हें उचित मात्रा में सहयोगी बना लेता है। इन राज्यों की तुलना में महाराष्ट्र शासन का काम काफी कुछ ओछा लगता है। इन राज्यों ने विकलांगों के पुनर्वसन की अपनी कुछ नीति निर्धारित की है। महाराष्ट्र राज्य ने आजतक विकलांगों से संबंधित अपनी नीति निर्धारित ही की नहीं है।

विकलांगों के पुनर्वसन करने के क्षेत्र में कितनी ही संस्थाएं कार्यरत हैं। विकलांगों का पुनर्वसन करते समय उन बच्चों में आत्मविश्वास जगाना-बढ़ाना बड़ा भारी महत्व होता है।उस उद्देश्य से विद्यालयीन शिक्षा के साथ ही उन्हें व्यवसायाभिमुख (Vocational) शिक्षा देकर स्वावलंबी बनाना काफी महत्वपूर्ण है। स्वावलंबन एवं आत्मविश्वास इन दो परों के बल ही ये बच्चे स्पर्द्धा के इस युग में भी बड़ी निर्भयता से अपना स्थान निर्माण करेंगे।

विकलांगों के जीवन में बहुत सारी समस्याएं होती हैं। शिक्षा, नौकरी, धंधा-कारोबार आदि में कितनी ही बाधाएं सामने खडी होती हैं। विकलांग व्यक्ति कानून 1995 के अनुसार विकलांगों की सभी बाधाएं हटाने के लिए हर एक राज्य में एक आयुक्त (विकलांग कल्याण) की नियुक्ति की गई है, लेकिन सरकारी कामकाज के दौरान सभी ओर ढिलाई को तो हम सभी अनुभव करते हैं। वही जो इन विकलांग व्यक्तियों के संबंध में भी होता है। उसके परिणामस्वरूप विकलांगों को उचित न्याय मिलने में कठिनाई होती है। पुणे शहर में अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद ने विकलांग व्यक्तियों के लिए न्याय केंद्र दि. 5 नवंबर 2006 को आरंभ किया है। इस न्याय केंद्र के माध्यम से कुछ अधिवक्ता (वकील) बंधुओं ने और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने बहुत से विकलांग व्यक्तियों को न्याय का लाभ दिलाया है- उदा. नौकरी में उचित काम देना, व्यवसाय करने महापालिका से स्टॉल का प्रबंध किया जाना, नौकरी में पदोन्नति प्राप्त करा देना, धोखा पीड़ितों को न्याय दिलाना आदि।

विकलांगों के पुनर्वसन की दिशा में और एक महत्वपूर्ण प्रयोग माने एकात्मिक शिक्षा। फिर भी सरकार की मानसिकता ऐसी है कि केवल साधारण विद्यालय में ही विकलांगों को पढ़ाकर यह समस्या हल हो सकती है। वास्तव में तीव्र विकलांग छात्रों को ऐसे विशेष विद्यालय ही जरूरी होते हैं। उनके चलने-फिरने की, यहां-वहां जाने की कुछ सीमाएं होती हैं, उससे ऐसे तीव्र विकलांग बच्चों के विद्यालय होना जरूरी होू-ता है। वे इस एकात्मिक शिक्षा योजना से लाभ उठा नहीं सकते। इसके फलस्वरूप दिल्ली के एक विद्यालय में एक अभिनव योजना आरंभ हुई। ऐसे इस तीव्र विकलांग छात्रों के विद्यालय में साधारण छात्रों को प्रवेश देकर, एकात्मिक शिक्षा के लाभ उन्हें प्राप्त करना संभव हुआ। उसे वहां Reverse Intergration कहा जाता है। सरकार अगर ऐसे विद्यालयों को मान्यता दे, तो पुनर्वसन का इस महत्वपूर्ण चरण तक पहुंचना आसान होगा।

विकलांगता न हो, इसलिए शुरू-शुरू में ही प्रतिबंधात्मक टीका लगाना, स्वास्थ्य जांच, जनजागृति, वैद्यकीय चिकित्सा, सफाई, बुरी लतों से दूर रहना, उचित आहार-विहार, शीघ्र निदान आदि के द्वारा विकलांगता टाली जा सकती है। उसके लिए बड़े पैमाने पर जन जागरण होना जरूरी है।

प्रति वर्ष 3 दिसंबर ‘विश्व विकलांग दिवस’ के रूप में मनाया जाता है और विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है, लेकिन सिर्फ उस एक दिन स्मरण करने से पुनर्वसन की समस्या सुलझ नहीं सकती। उसमें आनेवाली बाधाएं- अधिकारियों की/सरकार की निष्क्रियता, भ्रष्टाचार, अपात्र व्यक्तियों को बहाल की जानेवाली सुविधाएं, पात्र व्यक्तियों को कुछ लाभ न होना आदि में जब तक कुछ परिवर्तन नहीं होता, तब तक विकलांगों को मुख्य प्रवाह में लाना मुश्किल होगा।

उस दृष्टि से विद्यालय, सामाजिक संस्थाएं, सामाजिक कार्यकर्ता, राजनीतिक दल तथा संगठन आदि समाज के सभी घटकों से सहयोग तथा प्रयास ये सभी बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
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