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देश की राजनीति किस दिशा में जा रही है, यह जानने के लिए बिहार का जनमानस जानना आवश्यक होता है। बिहार में होने वाले विधान सभा चुनाव भारत के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा, उनकी मित्र पार्टियों तथा जनता परिवार की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। चाहे कुछ हो जाए बिहार की राजनीति से ‘जाति’ कहीं नहीं जाती। बिहार के चुनावों में दलित वोटों पर किसका अधिक अधिकार है यह सिद्ध करने के लिए बिहारी नेताओं में वाक्युद्ध प्रारंभ हो चुका है। पिछले ४० सालों में बिहार में दलितों के वोट बैंक को ध्यान में रखकर हर पार्टी अपनी रणनीति बना रही है। बाबू जगजीवन राम से लेकर जीतनराम मांझी तक अनेक लोगों ने दलित मतों पर अपना वर्चस्व दिखाकर दलित नेतृत्व संभालने का प्रयत्न किया है। परंतु वास्तविक रूप से देखा जाए तो दलितों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति में अधिक परिवर्तन दिखाई नहीं देता। बिहार के चुनावों में प्रत्येक धर्म, जाति और जनजाति के विभाजन का फायदा किस पार्टी को कितना मिलेगा इस बात पर तय होता है कि सत्ता किसके हाथ में होगी। बिहार के चुनाव किसी लहर के आधार पर नहीं वरन जातीय समीकरणों के आधार पर जीते जाएंगे। जिसके समीकरण जुड़ेंगे वही सफल होगा। इसीलिए चुनाव सामने आते ही दलित नेताओं का स्वार्थ सामने आ गया है। एनडीए के सहयोगी जीतनराम मांझी ने एनडीए के दूसरे सहयोगी रामविलास पासवान के लिए कहा है कि ‘पासवान दलितों के असली नेता नहीं हैं। पासवान ने अभी तक परिवारवाद की ही राजनीति की है।’ इस प्रकार का सीधा आरोप करते हुए जीतनराम मांझी ने सीधे नेतृत्व के मुद्दे को ही छेड़ दिया है। एनडीए में अपने घटते वजन और अपनी पार्टी के अधिकतर नेताओं के भाजपा में शामिल हो जाने के कारण मांझी नाराज हैं। मांझी और पासवान दोनों ही दलित नेतृत्व को अपने हाथ में रखना चाहते हैं। दोनों में से किसके हाथ में दलित नेतृत्व रहेगा इसका फैसला आने वाले चुनावों में होगा। अत: इस विधान सभा चुनाव में बिहार की दशा और दिशा की चर्चा होने के बजाय जातिगत समीकरण, दलितों का नेतृत्व, उनका रूठना-मनाना, आरोप-प्रत्यारोप ही चर्चा के विषय बनते हैं, जो बिहार चुनावों में विकास के मुद्दों का अभाव दर्शाने के लिए पर्याप्त हैं।
लालू प्रसाद यादव की सरकार के कार्यकाल को ‘जंगलराज’ कहा जाता था और नितीश सरकार के कार्यकाल को ‘विकासराज’। ये परस्पर विरोधी ध्रुव इन चुनावों में एक साथ आए हैं। इन दोनों का हाथ मिलाना कई लोगों को हजम नहीं हुआ। इस गठबंधन की सबसे कमजोर कड़ी यह है कि यह गठबंधन केवल ‘वरिष्ठ नेताओं’ के बीच हुआ है। दोनों पार्टियों के कार्यकर्ताओं के मन मिलना तो दूर उनमें एक दूसरे के प्रति सहानुभूति तक नहीं है। ऊपरी तौर पर सहकार्य करना और अंदर ही अंदर एक दूसरे को हराने के लिए जी-जान से मेहनत करना, लालू और नितीश समर्थकों में यही भावना है। अत: यहां दोनों के राजनैतिक अस्तित्व का भी प्रश्न है। लगातार नौ सालों तक सत्ता में रहने के बाद नितीश कुमार को भाजपा जातिवादी लगने लगी। नितीश कुमार के इस खोखलेपन को ध्यान में रखते हुए बिहार के मतदाताओं ने जदयू को लोकसभा चुनावों में हराकर उनकी जगह दिखा दी। राजद और जदयू का गठबंधन राजनैतिक है, सामाजिक नहीं। अत: उसका परिणाम आज भी समाज के मन पर नहीं हुआ है। अत: लालू प्रसाद यादव के लिए यह अंतिम लड़ाई की तरह ही है। कांग्रेस इस चुनाव में केवल दर्शक की भूमिका निभा रही है। कांग्रेस और राहुल गांधी ने भी लालू यादव को भाव न देने का मन बना लिया है। कांग्रेस के द्वारा लालू यादव को लगभग ‘अपराधी’ घोषित कर दिया गया है। अत: इस बार पूरी उम्मीद है कि अब लालू यादव और उनके प्रत्याशियों की ओर से कांग्रेस के उम्मीदवारों को हर कीमत पर परास्त करने का प्रयत्न किया जाएगा। नितीश कुमार-लालू यादव-कांग्रेस यह गंठबंधन ही आंतरिक विरोधाभासों से ग्रस्त है।
भाजपा दिल्ली चुनावों के बाद समझदार हो गई है। साल भर में बदले समीकरण, जातीय अस्मिता इत्यादि के कारण यह चुनाव न भाजपा के लिए आसान होंगे, न जनता परिवार के लिए। परंतु पिछले १५ महीनों में मोदी सरकार ने बिहार की जनता के लिए जो कार्य किए हैं उसे बिहार की जनता गंभीरता से देख रही है। जयप्रकाश नारायण के गांव में स्मारक की स्थापना, बिहार के एक बड़े भूभाग को समाहित करने वाला ‘ईस्ट वेस्ट कॉरिडोर’को मान्यता देकर मोदी ने बिहार को विकास का संदेश दिया है। बोधगया में आईएमआई की स्थापना का महत्वपूर्ण निर्णय भी मोदी ने लिया है। बिहार के भाजपा कार्यकर्ताओं में यह विश्वास है कि पिछले लोकसभा चुनाव में जिन ८ लोकसभा सीटों पर भाजपा को जीत हासिल नहीं हुई थी उन सीटोें सहित ४८ सीटों पर भी भाजपा को विजय प्राप्त होगी। इसका कारण यह है कि एक लंबी कालावधि से पिछड़े हुए राज्य को भी मोदी की आवश्यकता है। भाजपा के नेता सकारात्मक मुद्दों को लेकर चुनाव लड़ रहे हैं। नरेंद्र मोदी ने किस प्रकार पिछले १५ महीनों में बिहार की रुकी हुई योजनाओं को पुन: शुरू किया, अगर भाजपा सत्ता में आती है तो केंद्र और राज्य सरकार मिलकर किस तरह बिहार को विकास की दिशा में ले जाएगी, आदि बातें भाजपा के नेताओं के द्वारा बताई जा रही हैं। लालू यादव और नितीश कुमार भले ही जातीयता के मुद्दे पर चुनाव लड रहे हों फिर भी भाजपा नेता बिहार के विकास को ही चुनाव का मुद्दा बना रहे हैं। बिहार को ‘जंगलराज’ में किसने परिवर्तित किया, जब भाजपा और जदयू मिलकर राज्य चला रहे थे तो राज्य का विकास हो रहा था, बिहार में शांति और संतोष का वातावरण था। परंतु जैसे ही नितीश कुमार ने भाजपा का साथ छोड़ा उसके बाद ढाई साल में ही बिहार ‘जंगलराज पार्ट टू’ बन गया। ढाई साल में नितीश कुमार ने उन सारे कामों पर पानी फेर दिया जो साढ़े सात सालों में उसने भाजपा के साथ मिलकर किए थे।
बिहार को जंगलराज में किसने धकेला? इस प्रश्न का उत्तर बिहार की जनता लालू और नितीश कुमार से निश्चित ही मांगेगी। परस्पर विरोधी नितीश कुमार, लालू यादव और कांग्रेस की केकड़े के समान प्रवृत्ति ही जनता परिवार को नष्ट कर देगी। सुशील मोदी की साफ सुथरी प्रतिमा और मोदी के द्वारा १५ महीनों में दिए गए सहयोग का परिणाम बिहार में लोकसभा चुनावों की तरह ही भाजपा और उसकी सहयोगी पार्टियों को मिलेगा, ऐसी स्थिति अब दिखाई दे रही है।

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