सरकार का चेहरा बदला, लक्ष्य नहीं

मंत्रिमंडल का दूसरा विस्तार और समूचा फेरबदल ही इस बात का प्रतीक है कि मोदी विभिन्न महत्वाकांक्षी योजनाओं तथा नीतियों का फल 2019 तक सामान्य लोगों तक पहुंचाने को कितने कटिबद्ध हैं। इसलिए मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर अनावश्यक दूर की कौड़ी नांपना बेमानी है।

नरेंद्र मोदी मंत्रिमंडल के दूसरे विस्तार और मंत्रियों के विभागों में महत्वपूर्ण फेरबदल को दो घटनाओं से समझ जा सकता है। पहली है जून महीने के अंतिम सप्ताह की जिसे कुछ समाचारपत्रों ने प्रकाशित भी किया। प्रधान मंत्री की अध्यक्षता में मंत्रालयों की महत्वपूर्ण बैठक चल रही थी जिसमें विभिन्न मंत्रालयों के कामकाज और मोदी सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाओं की प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत की जा रही थी। लगभग पूरा मंत्रिमंडल ही उस बैठक मे उपस्थित था। समूची सरकार के कामकाज की पड़ताल करने वाली यह संभवत: पहली बड़ी बैठक थी जो लगभग पांच घंटे चली। मंत्रालयों के सचिव अपने-अपने विभाग के कार्यक्रमों और योजनाओं की रिपोर्ट रख रहे थे और प्रधान मंत्री उनको ध्यान से सुन रहे थे। इसी बीच कुछ मंत्री अपने मोबाइल फोन पर व्यस्त दिखाई दिए। इस पर बताते हैं कि मोदी ने कहा कि जीवन कुछ घंटे मोबाइल फोन के बिना भी चल सकता है। प्रधान मंत्री का कहना था कि मंत्रियों को अपने मोबाइल फोन की बजाए अपने प्रकल्पों पर अधिक ध्यान देना चाहिए। ऐसी अगली बैठकों में मंत्रियों को अपने फोन का प्रयोग न करने की सलाह भी मिली। प्रधान मंत्री ने मंत्रियों से नवाचारी होने, चुनाव घोषणापत्र में किए गए वादों को ध्यान में रख कर उनका कार्यन्वयन करने और बजट में किए गए प्रावधानों के लाभ नीचे तक पहुंचाने की अपेक्षा की। बैठक का केंद्रीय विषय यह था कि विभिन्न योजनाओं और कार्यक्रमों पर अमल की क्या स्थिति है और ये निर्धारित अवधि में पूरी हो रही हैं या नहीं। मंत्रालयों से स्पष्ट कहा गया कि वे तय अपने कार्यक्रम तय समय में पूरा करें।
दूसरी घटना मंत्रिमंडल के ताजा विस्तार के समय की है। नए मंत्रियों से चाय पर चर्चा में प्रधान मंत्री ने उनसे कहा कि वे मंत्री बनने का जश्न मनाने की बजाए संसद के मानसून सत्र के लिए तैयारी करें और सत्र के बाद अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों में जाएं। मोदी ने कहा कि प्रधान मंत्री बनने के बाद चार महीने उन्होंने किस तरह अपने दायित्व को समझने में लगाए। यह तब जबकि मोदी गुजरात जैसे बड़े राज्य के मुख्यमंत्री पद का लंबा अनुभव लेकर आए थे। उनका सारा जोर पद की जिम्मेदारी का लाभ सुशासन के माध्यम से सामान्य लोगों तक पहुंचाने पर है। नवम्बर 2014 में मोदी सरकार के पहले विस्तार, जिसमें चार कैबिनेट मंत्री, तीन स्वतंत्र प्रभार वाले राज्यमंत्री और 14 अन्य राज्यमंत्री लिए गए और 5 जुलाई के दूसरे विस्तार जिसमें 19 नए राज्यमंत्री शामिल किए गए जबकि एक राज्यमंत्री प्रकाश जावडेकर को कैबिनेट का दर्जा दिया गया, जिसे ‘काम करने वाली सरकार’ के ‘मोदी मंत्र’ के परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। ताजा विस्तार के तुरंत बाद पांच पुराने मंत्रियों का इस्तीफा प्रमाण है इस बात का कि प्रधान मंत्री सरकार को दो वर्ष पूरे होने के बाद अपने किसी मंत्री का अपेक्षा से कमतर प्रदर्शन स्वीकार करने का जोखिम नहीं ले सकते। 5 जुलाई के विस्तार के बाद दो और मंत्रियों ने भी पद छोड़े अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री नज़मा हेपतुल्ला और भारी उद्योग तथा सार्वजनिक उद्यम राज्यमंत्री जी.एम. सिद्धेश्वर। हालांकि हेपतुल्ला की विदाई का कारण 75 वर्ष की आयुसीमा पार करना बताया गया; लेकिन बदले वातावरण में अल्पसंख्यक कल्याण मंत्रालय से अधिक कार्यक्षमता और सक्रियता की अपेक्षा से कोई इनकार नहीं कर सकता। सिद्धेश्वर को अपेक्षा से कमतर प्रदर्शन वाले पांच मंत्रियों के साथ ही पदत्याग करना था, लेकिन मंत्रिमंडल विस्तार के ही दिन उनका जन्मदिन होने से उनके अनुरोध पर उनका पदत्याग बाद में हुआ।

सत्ता संभालने के बाद मोदी को चुनाव अभियान के दौरान किए “मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिमम गवर्नेस” के अपने वादे की याद बखूबी थी। इसलिए उन्होंने कई मंत्रालयों का पुनर्गठन किया और यूपीए सरकार में बनाए गए मंत्रियों के अनगिनत समूह, कमेटियां खत्म कर दी थीं। इनसे सरकार की निर्णय-क्षमता इतनी अधिक प्रभावित थी कि डॉ. मनमोहन सिंह सरकार फैसले करने के मामले में ‘लकवाग्रस्त’ सरकार कही जाती थी। मोदी ने हर पखवाड़े विभिन्न मंत्रालयों के कामकाज की समीक्षा की भी शुरूआत की जिससे निर्णय प्रक्रिया में तेजी आई। केंद्र सरकार के बड़े प्रशानिक अधिकारियों और सचिवों की बैठकें भी शुरू हुईं जिनमें प्रशासनिक कामकाज की प्रगति और बाधाओं की पड़ताल और उनका समाधान ढूंढा जाने लगा। अपने मंत्रालयों और विभागों के लक्ष्य पूरे करने के लिए मंत्रियों और सचिवों के काम के घंटे बढ़ गए। प्रधान मंत्री के स्वयं लगातार कई-कई घंटे अनथक काम करने की खबरें लोगों को चमत्कृत करती रहीं। 2014 में मोदी के आने के साल भर के भीतर ही सरकार चुस्त-दुरूस्त हो गई। इसलिए जब ताजा विस्तार के बाद मंत्रिमंडल की संख्या 78 पर पहुंच गई तो कुछ लोगों को “मिनिमम गवर्नमेंट” की याद आई। लेकिन ध्यान से देखें तो पाएंगे कि इसका सम्बंध मंत्रियों की संख्या से कम, प्रशासनिक कार्यप्रणाली में तेजी से अधिक था ताकि निर्णयों में तेजी आ सके।

विस्तार से पहले मोदी ने मीडिया को बताया था कि अब किस तरह कैबिनेट नोट पखवाड़े या महीने भर में तैयार हो जाते हैं और किस तरह फाइलें एकाध अपवाद छोड़ कर किसी मंत्रालय या विभाग में निरर्थक रुकती नहीं। पहले नोटिंग्स में ही तीन-चार महीने लग जाते थे और फाइलें महीनों, बल्कि साल-साल भर पड़ी रहती थीं। यह सरकार का प्रदर्शन ही है जिस पर मोदी का जोर है। और सरकार तेजी से फैसले करने तथा उन पर निर्धारित समय में अचूक अमल से सफल हो सकती है। इसलिए नवम्बर 2014 के और ताजा विस्तार से पहले पार्टी स्तर पर और सरकार के भी माध्यम से राजग के सभी संभावित मंत्रियों के संसद तथा उनके कार्यक्षेत्र में प्रदर्शन तथा सक्रियता की जांच-पड़ताल की गई। किसी विषय-विशेष में उनकी विशेषज्ञता को आंका गया। और निश्चित मानदंडों पर खरे उतरे सांसदों में से मंत्री बनाए गए। नए मंत्रियों की नियुक्ति इस बात की प्रतीक है कि मोदी एक निर्णयक्षम सरकार चाहते हैं जिसे 2019 में जनता को अपने किए काम का हिसाब देना है। मोदी ने सरकार बनने के बाद के शुरूआती दौर में कहा था कि विपक्ष उनसे पांच साल बाद सरकार के कामकाज का हिसाब मांगे तो बेहतर। स्पष्ट है, सरकार के गठन से लेकर दूसरे विस्तार तक मोदी ने अपने इस कथन का स्मरण रखा है।

निश्चय ही भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में कोई नेता प्रांतों, वर्गों या जातियों को उचित प्रतिनिधित्व देने की जरूरत से आंखें नहीं मूंद सकता। इसी तरह राज्य विधान सभाओं के चुनाव के लिए संतुलन साधने की राजनैतिक आवश्यकता को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। ताजा विस्तार में उत्तर प्रदेश, गुजरात और उत्तराखंड से विभिन्न जाति-वर्गों से मंत्री बनाए जाने को राजनैतिक विश्लेषकों ने चुनावी जरूरत से जोड़ने में देर नहीं लगाई। लेकिन पंजाब, जहां चुनाव अगले साल है, से किसी को मंत्री नहीं बनाया गया। और महाराष्ट्र से रामदास आठवले और डॉ. सुभाष भामरे के मंत्री बनाए जाने से भी चुनावों का कोई सीधा सम्बंध नहीं।

मंत्रिमंडल का ‘विस्तार’ शब्द पर मोदी का जोर पहले से तय काम निर्धारित समय में करने वाली सरकार की मजबूती के लक्ष्य को दिखाता है। बाद में हुआ फेरबदल भी इसकी पुष्टि करता है जहां चौधरी वीरेंद्र सिंह जैसे कद्दावर मंत्री समेत कुछ के विभाग बदले गए। मानव संसाधन मंत्री के रूप में जावडेकर की तरक्की (वे अकेले मंत्री हैं जिनका पद बढ़ा) भी मोदी सरकार में कार्यक्षम होने को ही मान्यता मिलने की पुष्टि करती है। जावडेकर को प्रकृति तथा पर्यावरण के संरक्षण से समझौता किए बगैर पर्यावरण मंत्रालय को ‘विकास के रास्ते में अडंगेबाज’ की छवि से निकालने का पुरस्कार मिलना उचित ही था। इस पृष्ठभूमि में स्मृति ईरानी के मंत्रालय बदल और इसे उनकी पदावनति बताने के जुमलों की सुशासन तथा निर्णयक्षमता के लिए मंत्रिमंडल में फेरबदल करने के मोदी व्यापक लक्ष्य से कोई सुसंगति नहीं बैठती। आइआइएम जैसे संस्थानों की स्वायत्तता जैसे कुछ मुद्दों पर प्रधान मंत्री कार्यालय से मानव संसाधन मंत्रालय के विवाद और ईरानी का अक्सर विवादों में उलझ जाना भी उनके मंत्रालय बदल की वजह नहीं हो सकते। मंत्रालयों के वरिष्ठ अफसरों में प्रक्रियागत मुद्दों पर दोराय होना आम बात है जिसका हल निकल आता है और वैचारिक संघर्ष में विवादों से बचा नहीं जा सकता। अधिक संभावना इस बात की है कि वेमुला प्रकरण के बाद ईरानी के बहाने दलित बनाम गैर-दलित का व्यापक षड्यंत्र सिरे चढ़ाने की कोशिश को नाकाम करने के लिए यह बदल हुआ हो। लेकिन उत्तर प्रदेश, बिहार और बाकी हिस्सों के बुनकरों के लिए घोषित पैकेज पर अमल और टेक्सटाइल्स क्षेत्र को नई ऊर्जा देने का काम भी खासा अहम है। इसी तरह जयंत सिन्हा को महत्वपूर्ण वित्त से नागरिक उड्डयन में भेजने का अर्थ नई उड्डयन नीति, जिससे घरेलू हवाई यात्रा सस्ती और सुगम होनी है, तथा नए हवाई अड्डों के निर्माण की महत्वाकांक्षी योजना को उनके हार्वर्ड में अर्जित प्रबंधकीय कौशल से साधने का उद्देश्य है। दरअसल मंत्रिमंडल का दूसरा विस्तार और समूचा फेरबदल ही इस बात का प्रतीक है कि मोदी विभिन्न महत्वाकांक्षी योजनाओं तथा नीतियों का फल 2019 तक सामान्य लोगों तक पहुंचाने को कितने कटिबद्ध हैं।
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