यादें जीवंत हैं

श्री अटल बिहारी वाजपेयी महान कवि-साहित्यकार, देशहित चिंतक और एक महान राजनेता के रूप में आने वाली पीढ़ियों में भी सदैव याद किए जाते रहेंगे।

बात कई दशक प्ाुरानी है। उन दिनों मैं महात्मा गांधी इण्टर कॉलेज पाटन (बैसकारा) उन्नाव में पढ़ रहा था। 1975 में आपातकाल के बाद 1977 में इंदिरा गांधी को चुनाव में पराजित करने के लिए अटल जी के सुझाव पर  जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में समस्त विपक्षी नेताओं ने मिलकर जनता पार्टी का गठन तो कर लिया लेकिन जयप्रकाश  जी के अचानक निधन के पश्चात जनता पार्टी रूपी विपक्ष बिखरने लगा। तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई की सरकार को चौधरी चरण सिंह ने समर्थन वापस लेकर गिरा दिया।

उस समय जनता पार्टी में जनसंघ के कार्यकर्ताओं का अपमान सा होने लगा। यहां तक कि जनता पार्टी ने 4 अप्रैल 1980 को जो राष्ट्रीय कार्यकारिणी बुलाई उसमें जनसंघ के कार्यकर्ताओं को भाव नहीं दिया गया। अटल जी जनता पार्टी सदस्यों द्वारा भारतीय जनसंघ की इस उपेक्षा से बड़े आहत हो गए फिर भी बेमन ही जुड़े रहे। आडवाणी जी और नानाजी देशमुख ने मिलकर फीरोज शाह कोटला मैदान में जनसंघ की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक बुलाई थी। उसमें अटल जी बिना मन ही आए थे। उनका तर्क था कि हमारी इस अवस्था में हम दूसरी पार्टी बनाकर उसे कैसे चलाएंगे? हास्य कवि सूर्यप्रसाद द्विवेदी (काकाजी) भारतीय जनसंघ के प्रबल समर्थक थे। जनसंघ द्वारा नई पार्टी के गठन हेतु होने वाली बैठक में शामिल होने के लिए निमंत्रण पर वे भी बैसकारा (उन्नाव) से दिल्ली गए थे।

उन दिनों मैं कविताएं लिखने का श्रीगणेश कर रहा था। कॉलेज के एक समारोह हेतु एक कविता लिखकर मैं काकाजी को दिखाने गया था। काकाजी ने प्ूछा, ‘दिनेश कल दिल्ली चलोगे।’ मैं उनके प्रस्ताव पर न नहीं कर पाया। पाटन से देवकीनंदन चौधरी, कमला शंकर अवस्थी और दो-तीन और लोग थे जो रेल मार्ग से दिल्ली के लिए चल पड़े।

काकाजी ने सुविधानुसार एक गेस्ट हाउस में कमरा बुक करवा लिया। क्योंकि उस सभा में हमारा शामिल होना मुमकिन नहीं था। उस दिन सभा से पहले सबेरे ही देवकीनंदन चौधरी तथा काकाजी अटल जी से मिलने उनके पास गए। अटल जी नई पार्टी का गठन न करके जनसंघ को ही फिर से मजबूत करने के पक्ष में थे। देवकीनंदन जी ने कहा, ‘वाजपेयी जी, आप जैसा कहेंगे हम वैसा ही करेंगे, लेकिन इतनी बेइज्जती के बाद जनता पार्टी के साथ नहीं रहेंगे।’ छह अप्रैल की सभा में भारतीय जनता पार्टी का गठन कर लिया गया। इस नई पार्टी के अध्यक्ष अटल बिहारी वाजपेयी जी तथा लालकृष्ण आडवाणी जी महासचिव बनाए गए।

एक बार काकाजी मुझे उन्नाव के रामलीला मैदान की सभा में लिवा ले गए। भाजपा के अलावा अटल जी कान्यकुब्ज ब्राह्मण समाज से बटेसर के वाजपेयी थे। उन्हें अपने समाज से बड़ा लगाव था। देश के साथ वे अपने समाज के उत्थान के लिए भी प्रयासरत रहते थे। रामलीला मैदान में अटल जी मेरी ‘आजादी के बाद भारत’ वाली रचना सुनकर बड़े भावविभोर हुए। उन्होंने काकाजी से कहा, ‘द्विवेदी जी, देखना एक दिन ये बालक बहुत बड़ा कवि बनेगा।’ सन् 1975 में मैं जीविकोपार्जन हेतु मुंबई चला आया। उस समय कान्यकुब्ज मंडल-मुंबई के अध्यक्ष डॉ. गिरिजाशंकर त्रिवेदी (प्ाूर्व सम्पादक नवनीत हिंदी डाइजेस्ट) थे। मुंबई के बांद्रा रिक्लेमेशन के मैदान में भारतीय जनता पार्टी का अधिवेशन बुलाया गया था। जिसमें भारतीय जनता पार्टी के कई हजार कार्यकर्ता सम्मिलित हुए थे। काका द्वारा उन्नाव में डॉ. गिरिजाशंकर त्रिवेदी से मेरा परिचय कराने के कारण वे मुझ से बड़ा स्नेह करते थे। एक दिन त्रिवेदी जी ने फोन पर बताया कि आज अटल जी को मैंने नवनीत के कार्यालय में बुलाया है, अगर समय हो तो दो बजे के लगभग नवनीत के कार्यालय में आ जाओ। मैं समय से पहले उनके कार्यालय में पहुंच गया। अटल जी ठीक दो बजे अन्य दो कवियों के साथ नवनीत कार्यालय आ पहुंचे। मैंने श्रध्दा से उनके पांव छुए तो वे मुझे तुरंत पहचान गए। कहने लगे- ये बच्चा मुझे काकाजी के साथ उन्नाव के रामलीला मैदान में मिला था। वे मुंबई के कान्यकुब्ज भवन भी जाने वाले थे किंतु आडवाणी जी का बुलावा आ जाने से जल्दी ही नवनीत बुक लेकर वापस लौट गए।

एक बार मैं मुंबई बांद्रा में अटल जी के एक कार्यक्रम में गया था। मोरारजी देसाई के समय जनता पार्टी की सरकार गिर जाने के बाद बांद्रा में भाजपा के वरिष्ठ पदाधिकारी स्वर्गीय रामदास नायक ने बांद्रा (पश्चिम) के नासिका तालाब का सुंदरीकरण करवाया था। उसका उद्घाटन अटल जी को करना था। मैं समय से पहले ही वहां पहुंच गया। बांद्रा (पश्चिम) के स्टेशन रोड पर तालाब के पास भव्य मंच लगाया गया था। पब्लिक की बड़ी भीड़ थी। मैंने कार्यक्रम से पहले जाकर अटल जी के पांव छू लिए। उन्होंने खुश होकर कहा, ‘खुश रहो बेटा, यहां मुंबई कब आए।’ मैंने कहा, ‘चाचाजी, अब मैं यहीं बांद्रा-मुंबई में ही रहता हूं।’ थोड़ी देर बाद उन्होंने तालाब के किनारे लगी बत्तियों को जलाने का बटन दबाकर उन्हें जला दिया। वहां उपस्थित सब लोग तालियां बजाने लगे। अटल जी ने हंसते हुए कहा, ‘रामदास जी, मैं इस तरह तालाब के उद्घाटन से प्रसन्न नहीं हूं।’ रामदास जी ने चिंतित होकर प्ाूछा, ‘अटल जी, कार्यक्रम में कोई खामी रह गई है क्या?’ उन्होंने गंभीर होकर मुस्कराते हुए कहा, ‘मुझे इस तालाब का उद्घाटन बत्तियां जलाकर नहीं, तालाब के पानी में छलांग लगाकर करना चाहिए था।’ उनके इस वक्तव्य से उपस्थित जनता ठहाका लगाकर हंसने लगी।

उनके प्रधानमंत्री काल में जब वे घुटने के दर्द से व्याकुल हो गए तो डॉक्टरों ने उनके घुटने के ऑपरेशन का सुझाव दिया। मुंबई के बंबई अस्पताल में ऑपरेशन के दौरान उन्हें कई दिनों तक रहना पड़ा। ऑपरेशन कामयाब रहा। उस दौरान बहुत से कवि-साहित्यकारों ने उन्हें शुभकामनाएं भेजी थीं। मैंने भी कुछ मुक्तक लिखकर उन्हें शुभकामनाएं दी थीं। बाद में उन्होंने पीएम कार्यालय से धन्यवाद पत्र भी भिजवाया था। दुर्भाग्य से एसआरए के लिए रूम टूटने से बहुत प्ाुस्तकों के साथ वह पत्र भी कहीं खो गया। वाजपेयी जी जब कभी भगवंत नगर विधान सभा क्षेत्र के दौरे पर आते थे तो लालु ड़ंड के पेड़े और उनकी मशहूर चाय अवश्य पीते थे।

महालक्ष्मी के भाजपा अधिवेशन में आडवाणी जी ने अटल जी के पक्ष में रुझान देखकर घोेषणा कर दी थी कि अटल जी ही इस बार देश के प्रधानमंत्री बनेंगे। जिसका उपस्थित जन समुदाय ने करतल ध्वनि से स्वागत किया था।

स्वतंत्रता दिवस के दूसरे दिन 16 अगस्त के दिन अटल जी का इस संसार से बिदा होना भी सबके लिए एक संदेश है। उनके निधन पर देश की हर पार्टी के नेताओं ने श्रध्दांजलि देकर ये सिध्द कर दिया कि वे एक सर्वमान्य नेता थे। श्री अटल बिहारी वाजपेयी महान कवि-साहित्यकार, देशहित चिंतक और एक महान राजनेता के रूप में आने वाली पीढ़ियों में भी सदैव याद किए जाते रहेंगे। हम उन्हें इन यादों के दो शब्दों से भावभीनी श्रध्दांजलि अर्पित करते हैं।

कविता का दीप जला करके,

जो कम न हुए कभी एक भी मासा।

हैं कहते दिनेश अटल जी की,

किस भांति करें जग में परिभाषा।

जिनके क्षणभंगुर जीवन में,

क्षणमात्र को आई न पास निराशा।

इन्हीं विश्व के नेता अटल जी से ही,

रहेगी सदा इस देश को आशा॥

 

 

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