हर गांव में गौचर हो

ग्रामों में गौचर की व्यवस्था टूट जाने से पशुओं, पशुपालकों, समाज और सरकार के लिए समस्या उत्पन्न हो गई है। गौचर को पुनः स्थापित किया जाए तो सभी का लाभ होगा। समस्त महाजन पिछले 16 वर्षों से इस क्षेत्र में काम कर रही है। बहुत काम हुआ है, बहुत होना बाकी है।

गाय एक धार्मिक प्राणी है। मालिक को यदि बुखार आए तो आंगन में बंधी गाय को पता चल जाता है कि मालिक बीमार हैं। वह जंगल में जाकर वैसी ही वनस्पति खाकर आती है, जिससे उसके गोमूत्र और दूध से उसका मालिक ठीक हो जाता है। कई जगह यह सुना है, देखा है और महसूस भी किया है। धार्मिक जीवन में भी उसका महत्व है। यदि हम कोई पवित्र काम कर रहे हों तो गोबर की लिपाई से शुरू करते हैं।

आप खुद अनुभव कर सकते हैं कि 10 दिन भी गाय पाली हो तो उसके साथ आपकी माया ममता कितनी बढ़ जाती है। वह दूध दे रही है और आप उसके माथे या शरीर पर धीरे-धीरे ममता से हाथ फेर रहे हो तो वह दूध ज्यादा देती है। वह तो उसके शरीर से झरा एक स्राव होता है। अपने जीवन में आप इसका अनुभव कर सकते हैं। यह वास्तविकता है कि यदि किसी जीव से आप स्नेह करते हैं तो वह भी आपसे वैसा ही स्नेह करता है। कुत्ते का अनुभव आपको आया होगा। जब तक आप उससे प्यार करते हैं, तब तक वह आप पर भौंकता नहीं है। कुत्ते में एक खासियत होती है। वह तुरंत समझ जाता है कि कौन गलत इरादे से उसे देख रहा है। वह फौरन भौंकना शुरू कर देता है। मतलब वह विचारों को भी सूंघ लेता है।

गौशाला और पांजरापोल में फर्क है। गौशाला वह है जो दुधारू गायों और उनका प्रबंध करती है। पांजरापोल का मतलब है ऐसे गौवंश या भैसवंश की व्यवस्था जो अब दूध नहीं देते या कोई काम नहीं कर सकते। जो गाय दूध नहीं दे रही है, जो बैल काम नहीं कर सकते, उम्र हो गई है और बैलगाड़ी या हलआदि नहीं चला पा रहे हैं, कम उम्र के बछड़े या पाड़े, जो किसी काम नहीं आ रहे हैं उन्हें पांजरापोल में रखा जाता है; क्योंकि समाज उनका बोझ नहीं उठा पाता। पशुपालक उन्हें संभाल नहीं पाते। उनके मन में स्वार्थ जगता है पशु दूध दें तो पैसा मिले। जो दूध नहीं देते उन्हें चारा खिलाता रहूंगा तो नुकसान होगा। ऐसे बछड़े, पाड़े, गाय, बैल पांजरापोल में आश्रय पाते हैं।

इसका कारण है। पहले गांव-गांव में गौचर होते थे और गायों को खिलाने का कोई खर्च नहीं आता था। सुबह से शाम वह चरागाह में जाती थी, पेट भरकर आती थी। चारा भी कुदरती बारिश में इतना पैदा हो जाता था कि साल-साल चलता था। उसके अलावा खेती में भी ज्वार, मका, बाजरी जैसे मोटे अनाज होते थे, जिसके तने-पत्ते गायों के भोजन के काम आते थे। आजकल तो नकद फसलों का जमाना आ गया है। पशुचारा पैदा नहीं हो रहा है। सारे गौचर या तो बिक चुके हैं या लोगों ने हथिया लिए हैं। इसकी वजह से भी चारों की बहुत कमी महसूस होने लगी है।

दूसरी बात यह कि रासायनिक खाद के चक्कर में गोबर खाद की अवहेलना की जा रही है। इसलिए लोग जो गाय या भैंस दूध नहीं देती, जो बैल काम के नहीं रहे, या फिर जो बछड़ें या पाड़ें हैं उन्हें खिलाना बेमतलब का समझने लगे। उन्हें आर्थिक बोझ मानकर घर से भगा देते हैं और रास्तों पर या पाजंरापोल के दरवाजे पर छोड़ देते हैं। कहते हैं मैं नहीं संभाल सकता, अब आप संभालो।  उन्हें जीवदया की भावना से जैन और दूसरे समाज के लोगों ने एक-दूसरे से मिलकर बड़े पैमाने पर संभालना शुरू किया। लेकिन यदि गौचरों की व्यवस्था पुनर्स्थापित होती है तो किसानों में जागृति आएगी। नकद फसलों की जगह मोटे अनाजों की खेती होगी। हर गांव में इससे जीवों का आश्रय स्थान फिर से खड़ा हो सकता है।

18 से 20 हजार गौशालाएं हैं, जिन्हें पांजरापोल कहते हैं।  उनमें से 3,215 संस्थाएं ‘भारतीय जीवजंतु बोर्ड’ में रजिस्टर करें इसके लिए हमारे प्रयास चालू हैं। भारत में साढ़े छह लाख गांव हैं। हर गांव ही गौशाला है, पांजरापोल है। हर गांव को दूध, जैविक खाद चाहिए, सारी व्यवस्थाएं चाहिए। हर गांव में गोचर होता ही है। हर गांव में खेती भी तो होती है। खेती में ऐसा अनाज उगाए कि चारा पशुओं के काम आए। गौचर को तैयार कर दें तो वह एक समन्वित व्यवस्था हो जाएगी। कुल मिलाकर कोई 25 हजार पशु शालाएं होंगी, जो समाज के आर्थिक सहयोग पर चलती हैं। अतः गौचर की व्यवस्था ज्यादा जरूरी है। गांव की जरूरत गांव में ही पूरी होनी चाहिए।

गांव में बहुत बुरे हाल हैं। उस पर ध्यान देना जरूरी है। सरकारी तंत्र को भी जागरूक रहकर हर गांव में गौचर तैयार करने चाहिए। इससे पशुपालन बढ़ेगा, पशुपालन बढ़ेगा तो दूध उत्पादन बढ़ेगा और जैविक खाद भी बढ़ेगा। हर गांव में तालाब बने। इससे पूरा समाज लाभान्वित होगा।

हर जगह बुरे हाल नहीं हैं। लेकिन अच्छी व्यवस्था भी नहीं है। अच्छी परिस्थितियां बनाने के लिए लोग पूरी मेहनत कर रहे हैं; लेकिन सरकार का सहयोग पूरी ताकत से मिलता नहीं है। समाज से पैसा जुटाकर करना होता है। समाज से पैसा आया तो अब सौ पशु और आ गए। समस्या यह होती है कि पहले क्या करें- चारा लाए या शेड बनवाए। जब पैसे का ज्यादा जुगाड़ हो जाता है तो पहले निर्माण कार्य शुरू हो जाता है। और यदि ज्यादा पैसा नहीं है, तो निर्माण कार्य थोडा कच्चा-पक्का कर देते हैं; क्योंकि पशुओं के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण चारा है। मैं भारत भर घूमा हूं। मैंने देखा है कि कई जगह बहुत अच्छी व्यवस्था है। लेकिन कुल मिलाकर लगता है कि इसमें और बहुत सुधार हो सकता है।

समस्त महाजन की स्थापना 2002 में हुई और गुजरात की गौेशाला और पांजरापोल को कार्यान्वित करने का प्रयास शुरू हुआ। लगातार 16 साल से यह प्रयास जारी है। सोलह साल में गुजरात में परिस्थिति काफी अच्छी हो गई है। पहले 200-300 पशु रखते थे। अब 2000 भी रख सकते हैं इतना बल तो आया है उनमें। इससे भी अधिक अच्छी व्यवस्था कर सकते हैं। जितना अच्छा करेंगे उतना समाज के हित में है, लाभ में है।

गौशाला है तो दूध आएगा। गांवों और शहरों को पौष्टिक आहार मिलेगा। कुपोषण से बचने का यह एक मार्ग है। मान लीजिए कि गाय का आहार रोज 100 रुपया का है, रखरखाव, कर्मचारी, दूध निकालना उसके बछड़े को खिलाना-पिलाना आदि पर एक गाय पर सालाना 36000 रु. चाहिए। इस खर्च को बचाना है तो गांव में गौचर चाहिए। गौचर नहीं है तो चारा खरीदना पड़ेगा।

उसी तरह से पांजरापोल के पशु हैं। उसे रोज का दस किलो सूखा चारा खिलाते हैं तो 30 से 40 रूपये का खर्च आता है। उसी आधार पर यह भी काम कर सकते हैं। लोग 12 हजार में एक पशु दत्तक भी लेते हैं या चारा भी अपने आप से उगाते हैं तो व्यवस्था के तौर पर मैं मानता हूं कि समाज, सरकार और किसान पशुपालक इन चारों की संयुक्त व्यवस्था होनी चाहिए। क्योंकि पशु पालकों से पशु आते हैं। किसानों को जैविक खाद की जरूरत है। समाज को दान करना है और सरकार की नैतिक जिम्मेदारी है। चारों मिलकर यह व्यवस्था जितनी बढ़िया करें उतना समाज को, सरकार को, पर्यावरण को सब को लाभ है।

हम लोग अभी तक एक हजार से ज्यादा पांजरापोल और गौशालाओं को मदद कर चुके हैं। हमारे कार्य की शैली ऐसी है कि हम पूरी मदद नहीं करते। हम ऑक्सीजन के तौर पर थोड़ी सहायता करते हैं और उन्हें अपने पैरों पर खड़े रहने के लिए प्रेरित करते हैं। सब हम दे देंगे तो वे खुद कुछ करने वाले नहीं हैं। इसलिए हम सावधानी बरतते हैं, कुछ सहायता करते हैं, प्रशिक्षण देते हैं। लोगों को स्वयं भार उठाने के लिए प्रेरित करते हैं।

जब बाढ़ आती है तो गौशालाओं में सर्वत्र कीचड़ हो जाता है। संकट में फंस जाते हैं। इस बार अगस्त महीने में बाढ़ आई। हमारी पूरी टीम काम में लग गई। गुजरात और राजस्थान और हर गोशाला में जाकर उनकी तकलीफें समझकर मरम्मत, कीचड़ निकालना, समय पर चारा डालना इसमें जैन समाज का बहुत अच्छा सहयोग मिला। अकाल भी आता है तो अकाल में दो चीजें चाहिए- पानी और चारा। चारा हम विशेष तौर पर देते हैं। इससे हर संस्था को एक सपोर्ट मिलता है। मैं तो यह मानता हूं कि जितनी संस्थाएं हैं वे संस्थाएं नहीं रहे, वे सारे संस्थान हो जाएं। सारे गांवों में पांजरापोल, गोशाला हो। सभी गावों को अच्छे से विकसित किया जाए। सभी गांवों में पशुशाला (animal shelter)  हों, निर्धारित गलियां, गौचर भूमि हों। अभी हमने मंत्री अजीत सिंदोरी से मुलाकात कीे। हमने उनसे कहा कि अगर शहर में पशु कहीं भी घूमते रहें तो कैसे होगा। अतः कुछ व्यवस्था निर्धारित की जाए ताकि यातायात जाम न हो।

चाहे गौ हो या अन्य पशु सभी जीव पवित्र हैं। सभी में कुछ न कुछ क्षमता है। अतः गौ या पशु कल्याण के लिए स्वतंत्र मंत्रालय की संकल्पना बहुत अच्छी है। सरकार यदि इस सुझाव को स्वीकार करती है और राज्य स्तर के मंत्री भी नियुक्त करती है तो बहुत बडा काम हो जाएगा। केवल गौ का कल्याण करने से चक्र पूरा नहीं होगा। यह मंत्रालय सभी प्राणियों के कल्याण के लिए हो। भारत के सभी जीवों की सेवा हो यही मेंरी मनीषा है।

 

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