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***शंकर दास***

 पूर्वोत्तर में जो पहाडी राज्य है उसमें ईसाइयों की संख्या ज्यादा होने के कारण और असम जैसे समतल भूमिवाले राज्य में मुस्लिमों की संख्या ज्यादा होने के कारण यहां के भूमिपुत्रों के मन में शंका हमेशा रहती है। अपने अस्तित्व का संकट अनवरत उनके मन में रहता है। इसका समाधान करना केन्द्र और राज्य दोनों की जिम्मेदारी होती है। परंतु वास्तविकता में इसके विपरीत स्थिति ही दिखाई देती है।

      असम सहित अरुणाचल, नगाराज्य,मिजोरम, त्रिपुरा, मणिपुर, सिक्किम और मेघालय को लेकर भारत के पूर्व सीमा पर स्थित इस भू-भाग को पूर्वोत्तर नाम से जाना जाता है। केवल ३२ कि.मि. के भूभाग के माध्यम से भारत के साथ जुड़ा हुआ यह क्षेत्र चारों ओर से विदेश से घिरा हुआ है। यातायात के लिए दुर्गम, सैकड़ों जाति-जनजातियां, उनकी प्रकार की बोलियां, बाढ़ जैसे प्राकृतिक ताण्डव से हमेशा ग्रसित रहने वाले इस क्षेत्र में पहली नजर में प्रतिकूलता ही नजर आती है। अपने अस्तित्व को कायम रखने के लिए हो रहा अनवरत संघर्ष, बांग्लादेश से हो रहे अवैध प्रवेश को न रोक पाना आदि कई कारण हैं जिसके लिए इसे केंद्र सरकार पर निर्भर रहना पड़ता है। किन्तु आवश्यक सहयोग प्राप्त करने में हमेशा विफल रहता है। शायद इसलिए यहां के लोगों में एक मानसिकता निर्माण हो गई है कि ‘दिल्ली बहुत दूर है।’ और शायद इसलिये यहां की आम जनता सोचती है कि हमारा शोषण होता है। फलस्वरूप स्वाधीनता के ६ दशक बाद भी केन्द्र और राज्य का संबंध तनावपूर्ण और अविश्वास पूर्ण ही बना रहा।

      केंद्र और राज्य के संबंध को समझने के लिए पूर्वोत्तर के सातों राज्यों के बारे में संक्षिप्त जानकारी होना आवश्यक है।

      अरुणाचल प्रदेश : १९६२ से पहले तक  नेफा  नाम से जाना जाता था। सन १९७२, २० जनवरी में अरूणाचल बना और सन १९८६ से राज्यपाल शासित राज्य बना। कुल जनसंख्या १०,९१,११३ है। एक वर्ग कि.मी. में १३ लोग रहते है। १९ प्रमुख जनजातियां और ८५ अन्य छोटी- छोटी जनजातियां इस क्षेत्र में रहती हैं। ३०.२६% ईसाई, २९.०४%हिंदु, ११% बौद्ध, १.९% मुस्लिम, सिख, जैन और २६.२% दोनी पोलो (चन्द्र-सूर्य) को मानने वाले लोग यहां रहते हैं।

      नगालैंड : प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान बहुत से नगा लोगों को फ्रांस और यूरोप में भेजा गया था और युद्ध के बाद जब वे भारत वापस आए उन्हीं लोगों ने नागा नैशनालिस्ट मूवमेन्ट स्थापित की। सन् १९६३ में १ दिसम्बर को नगाराज्य का विकास हो इस लक्ष्य को सामने रखकर इसे भारत का १६वां राज्य बनाया गया। कुल जनसंख्या १९८८६३% है जिसमें ९०.२% ईसाई, ७.७% हिंदू, १.८% मुस्लिम आवादी है। १६ जनजातियों के इस प्रदेश में साक्षरता का प्रतिशत ८०.११% है।

      मणिपुर : २२३४७ वर्ग कि.मी. में फैले हुए मणिपुर की कुल जनसंख्या है २७,२१,७५६, साक्षरता ७९.८५% है। २१ जून १९७२ में मणिपुर को राज्य का दर्जा मिला। यहा हिंदू ४१.३९% ईसाई ४१.२९% और मुस्लिम हैं ८.४%।

      मिजोरम : मि- आदमी, जो- पहाड, रम याने देश। अर्थात वनवासी लोगों का देश। मिजोरम १९८७ में भारत के २३  वें राज्य के नाते अस्तित्व में आया। कुल जनसंख्या है १०,९१०१८ उसमें .८७% ईसाई, ७% बौद्ध और ३.५५% हिंदू है।

      त्रिपुरा : यह भारत का तीसरा छोटा राज्य है। १०४९२ वर्ग कि.मी. में फैले हुए त्रिपुरा की कुल जनसंख्या है ३१,९११६८। १५ अक्टूवर १९४९ तक राजसत्ता था। १९५५ में राज्य पुनर्गठन के समय भारत में विलय हुआ था। सन् १९७२ में २१ जनवरी के दिन इसे पूर्ण राज्य का दर्जा मिला। १९७१ के बांग्लादेश के स्वतन्त्रता आन्दोलन के बाद त्रिपुरा में सशस्त्र क्रांति की शुरूआत हुई।

      मेघालय : उत्तर पूर्व में स्थित इस राज्य का क्षेत्रफल २२४२९ वर्ग कि.मी. है। यहां की जनसंख्या २९,७५००८ है। पहले यह असम राज्य का हिस्सा था। २१ जनवरी १९७२ को खासी, जयंतिया और गारो पहाड़ी जिले को मिलाकर नया राज्य बनाया गया। ८५% जनजातीय आबादी वाले इस प्रदेश में लगभग ४९% आवादी खासी जनजाति की है, दूसरे स्थान पर लगभग ३४% संख्या वाली गारो जनजाति है। इसके अतिरिक्त जयंतिया लोग हैं। कुल जनसंख्या का ६३.६% इसाई, १५.७% हिंदू, ४% मुसलिम, १६.७% प्रकृतिवादी लोग है। ११ प्रकार की भाषाएं यहां वोली जाती हैं।

      पूर्वोत्तर के सातों राज्यों में से असम को छोड़कर बाकी ६ राज्यों में सैकडों बोलियां बोलने वाली जनजाति के लोग रहते हैं। अधिकांश पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण यातायात अति दुर्गम होता है। भारत के अन्य प्रांतों की अपेक्षा यहां रहन-सहन, खान-पान में भिन्नता है। इसलिए भारत के अन्य प्रान्तों की समस्या और पूर्वोत्तर कीसमस्याओं में भी अन्तर है। स्वाधीन भारत में असम तथा पूर्वोत्तर के विकास की दृष्टि से जो भूमिका केन्द्र सरकार को लेनी चाहिए थी वास्तव में उसमें अनेक त्रुटियां रही हैं।

      असम का प्राचीन नाम कामरूप था। सन १२२८ में बर्मा के चीनी विजेता चाउ लुंग च्युकापा ने इस पर अधिकार कर लिया। वह ‘अहोम’ वंश का था। जिसने अहोम वंश की सत्ता यहां कायम की। सन् १८२६ में अंग्रेजों के साथ समझौता हुआ और असम अंग्रेजी सत्ता के अधीन हो गया। १९६० में असम की राजभाषा बंगाला भाषा था। १८२६ में इयाण्डाबु संधि के बाद अंग्रेज जब आए थे साथ में बंगला भाषा बोलने वाले कर्मचारियों  को साथ

 में लाए थे।

 फलस्वरूप सरकारी आफिस-कचहरी में बंगला भाषा का प्रचलन हुआ। १८७२ के बाद यहां अंग्रेजी भाषा का प्रचलन हुआ। दरअसल स्वाधीनता के तुरंत बाद असम की राजभाषा असमिया होनी चाहिए थी। किन्तु तेरह साल तक रुकने के बाद आखिर में असमी लोगों को आन्दोलन करना पडा। अपनी भाषा के लिए शहीद होना पड़ा फिर जाकर असम में असमिया भाषा का प्रचलन हुआ। कालेज के पाठ्यक्रम क्या और किस भाषा में हो इसके लिए भी आन्दोलन का ही रास्ता अपनाना पडा। १९७२ में फिर कई शहीद हुए, तब जाकर कॉलेजों में भी असमिया भाषा का प्रचलन हुआ।

      पहली तेल रिफाइनरी असम की वारूनी में स्थापित हुआ। रिफाइनरी असम में होनी चाहिए थी फिर इसके लिए आन्दोलन शुरू हुआ – कई लोग शहीद हुए तब सन् १९६२ में जाकर गुवाहाटी में पहली रिफाइनरी स्थापित हुई।

      एशिया की अन्यंत वृहत्तम नदी है ब्रह्मपुत्र जिसकी लम्बाई  २९००कि.मी.है। यह पूर्वोतर के सम्पूर्ण दो भाग करते हुए बहती है। पुर्वोत्तर में लगभग ९०० कि.मी. इसकी लम्बाई है। जहां एकमात्र शराईघाट पुल उत्तर और दक्षिण असम को जोड़ता था। कई कोशिशों, आन्दोलनों के बाद और दो पुल बने अब चौथा पुल पिछले पंद्रह सालों से बन रहा है। कब तक पूर्ण होगा अभी कहना जल्दबाजी होगा। एक पुल बनने में पंद्रह-बीस साल लगना – यह बात यहां के लोगों की समझ से परे है।

      १९६२ में चीन ने भारत पर आक्रमण किया। चीनी सैनिक अरूणाचल के बोएडिला तक पहुंच गये थे। इस समय भारतीय सैनिकों को सीमा पर भेजने के बजाय तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने एक वक्तव्य दिया था। उन्होंने कहा था ङ्गचू हशरीीं सेशी ींे ींहश शिेश्रिश ेष ईीराङ्घ जो आज भी यहां के लोगों को केन्द्रीय सरकार के दायित्व न निभाने की याद दिलाता है। इसलिए यहां के लोगों को लगता है बिना आन्दोलन के हमको केन्द्र से कुछ भी मिलने वाला नहीं है, दो चार लोगों को बलिदान देना ही पड़ेगा। हर बात के लिए आन्दोलन का एक सिलसिला शुरु हो गया है।

      १९७९ में एक ऐतिहासिक आन्दोलन शुरू हुआ। बंाग्लादेश से हो रही अवैध घुसपैठ ने भयंकर रूप धारण कर लिया था। सांसद हिरालाल पाटोवारी का देहान्त होने के कारण मध्यकालिन निर्वाचन घोषित हुए। उसी समय पता चला कि मतदाता सूची में एक ही विधान सभा के क्षेत्र में प्राय: ३२ हजार नए नाम जुड गए। चारों तरफ आतंकमय परिवेश निर्माण हो गया जब पता चला ये सारे अवैध रूप से आने वाले बांग्लादेशी हैं।

      तब नवम्बर ६ तारीख को असम छात्र संगठन के नेतृत्व में आन्दोलन शुरू हो गया। बांग्लादेशियों को बाहर निकालने के बजाय राज्य और केन्द्र सरकार की ओर से घुसपैठियों को संरक्षण और आन्दोलन को दबाने के प्रयास शुरू हुए। आन्दोलन और जोर पकड़ने लगा। असम के साहित्यिक, बुद्धिजीवी, कलाक्षेत्र के, सामाजिक क्षेत्र के, हर क्षेत्र के लोग जुड़ने लगे और देखते ही देखते इसने एक जन आन्दोलन का रूप ले लिया। इसी बीच१९८० में चुनाव आ गया। इसका विरोध हुआ। आखिर ३ महीनों के  बाद निर्वाचन को स्थगित करना पड़ा। पुलिस-मिलिटरी का अत्याचार बढ़ने लगा। केन्द्र और राज्य की सरकारें आन्दोलन को दबाने के लिए हर प्रकार का हथकंडे अपनाती रहीं। सन् १९८३ में सरकार के द्वारा सामरिक शक्ति के आधार पर निर्वाचन किया गया था। इसमें कांग्रेस और कम्युनिस्ट दोनों दलों ने भाग लिया था और केवल १०% मतदान हुआ था। हितेश्वर सइकिया को मुख्यमन्त्री बनाया गया। असम के जनगण ने इस सरकार को अवैध सरकार घोषित किया। प्रचण्ड विरोध को झेलते हुए ३ महीने तक सरकार चलाने बाद आखिर इस सरकार को भंग करना पड़ा। तब तक ८५० लोग शहीद हो चुके थे। आन्दोलन का भयंकर रूप देखकर केन्द्रीय सरकार भयभीत हो गई थी। इसी बीच प्रधान मन्त्री इंदिरा गांधी की हत्या हो गई। राजीव गांधी प्रधान मन्त्री बने। कई दौर वार्तालाप के बाद भारत सरकार, असम सरकार और आन्दोलनकारी नेतृत्व के बीछ में एक समझौता हुआ जिसका नाम है ईीरा अललेीव.

      ठीक उससे पहले असम के प्रतिनिधित्व के बिना ही असम के लिए एक नया कानून लाया गया था – जिसका नाम है- खचऊढ अलीं १९८३ खिश्रश्रशसरश्र (चळसीरपींी ऊशींशीाळपरींळेप लू ढीळर्लीपरश्र) अलीं. १९८३. इस कानून का प्रावधान ही ऐसा रखा गया था जिसके कारण बांग्लादेशी घुसपैठी देश से बाहर न निकल सकें। फलस्वरूप और गति से बांग्लादेश से घुसपैठ होने लगी। वर्तमान में यहां के नौ जिले मुसलमान बहुल बन गए हैं।

      ‘खचऊढ हटाओ असम बचाओ’ का नारा बुलन्द होने लगा। अभी मामला कानून का है। इस ‘खचऊढ’ के खिलाफ कानूनी कारवाई करते-करते ३२ साल लग गए। आखिर २००५ में इस कानून को खारिज करते हुए उच्चतम् न्यायालय को कहना पड़ा कि ये कानून बांग्लादेशी घुसपैठियों को देश से बाहर निकालने में न केवल बाधक है, अपितु संरक्षण देने वाला है। इसलिए इस कानून को खारिज किया जाता है।

       केन्द्र सरकार का रवैया इसमें भी विवादास्पद ही रहा हैं। ‘खचऊढ’ कानून को ही थोड़ा इधर-उधर करके फिर से लागू करने की केन्द्र सरकार की कोशिश ने पूर्वोत्तर को देखने की दृष्टि प्रकट कर दी। उच्चतम् न्यायालय ने इस कोशिश को भी नाकाम किया।

      जिस ‘खचऊढ’ कानून को १५-१०-१९८३ में केवल असम के लिए लागू किया गया था, जिसका प्रारूप तैयार करने वाला उस समय का कांग्रेस का विधायक आब्दुल मुहिव मजुमदार था, इसको खारिज करने के बाद १३-७-२००५ में ढळाशी ेष खपवळर में एक वक्तव्य में उसने कहा था – ‘खचऊढ’ कानून अपना उद्देश्य पूरा कर चुका है अब इसकी कोई आवश्यकता नहीं है। इससे पता चलता है किस उद्देश्य से इस कानून को बनाया गया था। इस कानून को लेकर ३२ साल कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार ने जो राजनीति की, असम के हित के विपरीत जो रवैया अपनाया, उससे यहां के लोगों के मन में भय-अविश्वास का भाव निर्माण होना स्वाभाविक है। आज भी समाज में केन्द्र सरकार पर संदेह और विरोध का भाव दिखाई देता है।

 जैसे पहले बताया गया है कि बांग्लादेश के युद्ध के तुरंत बाद त्रिपुरा में सशस्त्र विद्रोह शुरु हो गया था। छरींळेपरश्र ङळलशीरींळेप ऋीेपीं ेष ढीर्ळिीीर (छङऋढ) के पीछे न्यूजीलैण्ड का चर्च है। त्रिपुरा को ईसा के राज्य में बदलना इनका मकसद है। इसलिए इरिींळीीं उहरीलह ेष ढीर्ळिीीर का गठन हुआ था। उद्देश्य सफल न होने के कारण आतंकवाद का सहारा लेना पडा और सम्पूर्ण त्रिपुरा आतंकवाद की चपेट में आ गया। लोग भुगत रहे थे और केन्द्र सरकार अनदेखी करती रही। फलस्वरूप यहां भी एक विरोध भाव केन्द्र सरकार के प्रति दिखाई देता है।

      मिजोरम में भी लालडेंगा के नेतृत्व में १९५९ से १९६६ तक सशस्त्र विद्रोह शुरू हुआ था। १९८६ में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के साथ चळूे झशरलश अललेीव हुआ था। भारत के प्रधान मंत्री को कहना पड़ा ‘आप ईसाई बने रहो‘। कांग्रेस को वोट देते रहो। यह देश के लिए ही दुर्भाग्य की बात है। डेलळरश्रळीीं र्उेीपलळश्र ेष छरसरश्ररपव (छडउछ) जिसका गठन हुआ स्वाधीन नगालैंड के लिए। जिसका नारा है ङ्गछरसरश्ररपव षेी उहीळीींङ्घ। (छडउछ) ने भारत सरकार के विरोध में सशस्त्र विद्रोह शुरू किया था। १९८० से स्वाधीन राष्ट्र के नाम पर यह विदेशी पैसों और शत्रु राष्ट्र की ताकत के आधार पर भारत विरोधी षडयन्त्रों में लिप्त रहा है। १९८८ में इसाक मुईवा और एस.एस. खापलंग दोनों के मत विरोध के कारण संगठन दो भागों में बंट गया था। शान्ति वार्ता के नाम पर केन्द्रीय सरकार ने केवल राजनैतिक लाभ लेने का प्रयास किया और आज नगालैण्ड के जनगण त्रस्त हैं, हताश हैं सरकार पर से विश्वास ही उड गया है। अभी इसी साल अगस्त महीने में केन्द्र की  नई सरकार ने खापलांग के साथ समझौता करके एक अच्छी शुरूआत की है। लोगों के मन में विश्वास निर्माण हुआ है कि अब कुछ अच्छा होगा।

      पूर्वोत्तर में जो पहाड़ी राज्य है उसमें ईसाइयों की संख्या ज्यादा होने के कारण और असम जैसे समतल भूमि वाले राज्य में मुस्लिमों की संख्या ज्यादा होने के कारण यहां के भूमिपुत्रों के मन में शंका हमेशा रहती है। अपने अस्तित्व का संकट अनवरत उनके मन में रहता है। इसका समाधान करना केन्द्र और राज्य दोनों की जिम्मेदारी होती है। परंतु वास्तविकता में इसके विपरीत स्थिति ही दिखाई देती है। हर समय छोट-छोटे गुटों में छोटा-बड़ा संघर्ष होता रहता है। इसको सुलझाने के बजाय राजनैतिक लाभ के लिए कई दल और सरकार के लोग आग में घी डालने का काम करते हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है।

      केन्द्रीय सरकार के द्वारा कुछ अच्छी पहल भी की गई है। अरुणाचल प्रदेश में राज भाषा के नातेे हिन्दी का प्रचलन करके उसे शेष भारत से जोड़ा गया है। नगालैण्ड में भी हिन्दी का प्रचलन अच्छी शुरुआत है। प्रान्तों में विवादित सीमाओं की समस्या, समय समय पर हुए विवाद, देश हित में सीमान्त प्रान्त के नाते कर सकने वाले विविध कार्य, यातायात की सुचारू व्यवस्था, कच्चे माल पर आधारित उद्योग, शिक्षा के क्षेत्र में विकास, कुछ उच्च शिक्षा के लिए संस्थान आदि यदि केन्द्रीय सरकार और राज्य सरकार साथ मिलकर करते हैं तो पूर्वोत्तर के लोगों में भी स्वाभिमान जगेगा। अभी जो अलगाव भाव की एक मानसिकता निर्माण हुई है वह समाप्त हो जाएगी।

      केन्द्रीय सरकार का दायित्व है सम्पूर्ण भारत की एकता और अखण्डता को कायम रखे। ये संविधान प्रदत्त कर्तव्य भी है। इसलिए आवश्यक है कि केन्द्रीय सरकार विदेश से घिरे हुए इस पूर्वोत्तर के प्रति विशेष ध्यान दें।

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