प्राणिमात्र की सेवा

बढ़ते तापमान, सिमटते जंगलों, सूखते जल स्रोतों तथा बढ़ते शहरीकरण के कारण आज असंख्य पक्षी आवासविहीन हो गए हैं। यहां तक कि उन्हें पेयजल भी नहीं मिल पाता, जिस कारण आकाश में उड़ते हुए पक्षी बेहोश होकर जमीन पर गिर पडते हैं। ऐसी स्थिति में पक्षियों को पेयजल उपलब्ध कराने हेतु राजस्थान में ‘अपना संस्थान’ के माध्यम से अनेक गांवों एवं शहरों में प्रेरक प्रयास हुए हैं।

मनुष्य, जीव सृष्टि और प्रकृति के बीच एक कोमल संतुलन होना चाहिए। यह बात हमारे पूर्वजों को पता थी और उन्होंने इसका बराबर ध्यान रखा। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार हमारी फसलों की 15 से 18 प्रतिशत उपज कीट परागणकर्ताओं के कारण होती है। बागवानी उत्पादों की आधे से अधिक उपज कीट परागण से ही संभव है। बादाम जैसे पौधे में तो सौ प्रतिशत कीट से ही परागण होता है। कीट परागण में मधुमक्खियां, तितलियां आदि कीट पंतंगों की बड़ी भूमिका होती है। कई मधुमक्खियां ऐसी होती हैं जो आधा किमी से आगे नहीं जा पाती। उन्हें उसी परिधि में हर दिन और हर मौसम में पराग चाहिए। अर्थात् विभिन्न प्रकार के पेड़-पौधे होंगे और उन पर अलग-अलग समय पर फूल-फल आएंगे तो उन्हें पराग मिलेगा। इसलिए जैव विविधता मानव जीवन के लिए बहुत आवश्यक है।

कई पक्षी दो-तीन किमी से आगे नीं जा पाते हैं। कई बार दिखाई देता है कि हम नासमझी में नीम के पौधे रोपने़ शुरू करते हैं तो पता चलता है कि 50 किमी तक नीम ही रोप देते हैंं। नीम की निंबोली साल में सिर्फ बीस दिन के लिए आती है और उसमें पुष्प भी बीस दिन के लिए आते हैं। जो पक्षी अपनी सीमा से आगे नहीं जा पाते वे कुछ दिन में मर जाते हैं। इसीलिए आज फल भक्षी पक्षियों की संख्या 10 प्रतिशत से भी कम रह गई है। प्रकृति में तीन लाख प्रकार के ‘फ्लावरिंग प्लांट’ यानि पुष्प वाले पौधे हैं जिन्हें ‘एनजीओस्पम्स’ कहा जाता है और डेढ़ लाख प्रकार के कीट हैं। ये कीट और पुष्प वाले पौधे एक दूसरे पर निर्भर होते हैं। इसलिए जैव विविधता का संरक्षण परम आवश्यक है। पौधा रोपण करते समय हमें चार-छह प्रकार के ही पौधे न लगाकर सभी प्रकार पेड़-पौधे, जो उस क्षेत्र में पारंपरिक रूप से उगते आए हैं, रोपित करने चाहिए। कई ऐसे पक्षी हैं जिन्हें हम ‘ग्राउंड नेस्टिंग बर्ड’ कहते हैं, जो दो-ढाई फुट ऊंची झाड़ियों में ही अपने घोंसले बनाते हैं। इसलिए छोटे और बडे़ सभी प्रकार के पौधे रोपित करने जरूरी है।

अनेक पेड़-पौधे ऐसे हैं जो ऐसे कीट-पतंगों को आश्रय देते हैं जो हमारी फसलों को अनेक प्रकार के हानिकारक कीटों से बचाते हैं। ऐसे करीब 50-60 प्रकार के कीट होते हैं। फसलों पर कीड़ा कैसे लगता है? इसे भिंडी के पौधे से समझ सकते हैं। प्रकृति ने भिंडी के पौधे को ऐसी क्षमता दी है कि उसकी फसल ऐसे खुशबूदार तत्वों का संश्लेषण करती है जिनके कारण अनेक प्रकार के कीट वहां आते हैं और भिंडी के पौधे पर अपना अंडा छोड़ जाते हैं। उस अंडे में से जो लारवा निकलता है वह उस फसल को नष्ट कर देता है। यही वास्तव में फसल को नुकसान पहुंचाने वाला कीड़ा है। बहुत सारी फसलें ऐसी हैं जिनमें किसी कीट का प्रकोप होने पर उनमें से ऐसे खुशबूदार रसायनों का संश्लेषण होता है कि जमीन में रहने वाली चींटियां और अन्य जंतु बाहर आते हैं और फसल को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों को नष्ट कर देते हैं।

खाद्य सुरक्षा और स्वास्थ्य के लिए भी जरूरी

यह समझना नितांत आवश्यक है कि यदि प्रकृति का संतुलन नहीं रहा और हम प्रकृति के मित्र कीटों को आश्रय देने वाले पेड़-पौधों को नष्ट करते रहेे तथा जमीन में रहने वाली चींटियां रासायनिक खाद एवं कीटनाशकों से नष्ट होती रहेंगी तो हमें अपनी फसलों को बचाने के लिए अधिक से अधिक कीटनाशकों का प्रयोग करना पड़ेगा। कीटनाशकों के अधिक प्रयोग से मिट्टी ही नहीं हमारे जल संसाधन भी प्रदूषित होने लगते हैं। कुछ साल पहले कोकाकोला में कीटनाशक पाया गया। कोकाकोला की ‘रेसिपी’ में कीटनाशकों को पेय में मिलाना शामिल नहीं है। फसलों में जो कीटनाशक छिड़के गए वे अंतत: उन टयूबवैलों तक भी पहुुंच गए, जिनका पानी कोकाकोला प्लांट तक जाता है। जिस कंपनी के पास जलशोधन की बेहतरीन तकनीक है वह भी उस प्रदूषित जल से कीटनाशकों को अलग नहीं कर पाई। कहने का अभिप्राय है कि प्रकृति मंेंं जो जैव विधितता है वह केवल देखने के लिए नहीं, बल्कि हमारे सम्पूर्ण आहार चक्र को बनाए रखने के लिए, हमारी खाद्य सुरक्षा और हमारे स्वास्थ्य के लिए भी बहुत आवश्यक है।

पक्षियों के लिए कृत्रिम घरौंदे

आजकल पूरी दुनिया में तापमान बढ़ रहा है। चिलचिलाती धूप पड़ती है और पेड़ों की संख्या भी कम हुई है। ऐसी स्थिति में अनेक पक्षियों को कहीं आश्रय और पानी नहीं मिल पाता तो वे उस धूप में बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़ते हैं। इसलिए पिछले दो साल से राजस्थान के विभिन्न इलाकों में घरों और पेड़ों पर ‘परिण्डे’ बांधने का प्रयोग शुरू किया गया है ताकि प्यासे पक्षियों को कम से कम पानी तो मिल जाए। पहले जो नदियां व झरने पूरे साल बहते थे, वे अब समाप्त हो गए हैं और पक्षियों को पीने के लिए पानी नहीं मिल पाता। इसलिए मिट्टी के अथवा किसी पुराने बर्तन को ‘परिण्डे’ (एक प्रकार का बर्तन) का आकार देकर उसमें पानी भर कर टांग दिया जाता है। लोग उसमें प्रतिदिन पानी डालते हैं ताकि वहां रहने वाले अथवा वहां से गुजरने वाले पक्षियों को पीने का पानी मिलता रहे। भोजन की खोज में दूर से आ रहे पक्षी को यदि रास्ते में आश्रय मिल जाए तो वह बेहोश होकर नहीं गिरेगा। पक्षियों को आश्रय प्रदान करने के उद्देश्य से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों ने ‘परिण्डे’ बांधने का यह प्रयोग शुरू किया है।

राजस्थान में यह प्रयोग ‘अपना संस्थान’ के माध्यम से चल रहा है। पहले लोग टूटी हुई मटकी के नीचे के भाग को ‘परिण्डे’ के रूप में इस्तेमाल करते थे। यह हमारी पुरानी परम्परा है जिसे फिर से जिंदा करने का प्रयास किया जा रहा है। संघ स्वयंसेवकों के अलावा कुछ दूसरे स्वयंसेवी संगठन और प्रकृति प्रेमी भी अब इससे जुड़ने लगे हैं। कुछ बस्तियों में तो ‘परिण्डे’ बांधने का कार्यक्रम समारोहपूर्वक किया जाता है। कई सौ लोग अपने-अपने ‘परिण्डे’ लेकर एक स्थान पर एकत्र होते हैं और समारोह के बाद अपने-अपने घरों में जाकर उन्हें बांधते हैं। वे ही उनकी नियमित देखभाल और उनमें पानी भरने का काम करते हैं।

हर गांव, शहर और जंगल की जरूरत

यह प्रयोग देशभर में शुरू करने की जरूरत है। वैसे जहां-जहां जाग्रति आ रही है वहां ये प्रयोग शुरू हो रहा है। हरियाणा के जींद में सेवा भारती कार्यकर्ताओं ने पक्षियों के रहने के लिए एक हजार घरौंदे बना कर उन्हें शहर के विभिन्न पार्कों व अन्य स्थानों पर टांगने का लक्ष्य रखा है ताकि पक्षी बिना किसी अवरोध के रह सकें। क्योंकि शहरों में पक्षियों के रहने के स्थान समाप्त हो गए हैं और जिन मकानों में वे रहने का प्रयास करते हैं वहां से उनके घोंसले या तो तोड़ दिये जाते हैं अथवा लोग उन्हें वहां रहने नहीं देते। पक्षी विहार के लिए सेवा भारती के जिला सचिव श्री दीपक कौशिक ने 265 फुट लम्बी पेंटिंग 4.30 घंटे में तैयार की। जागरूकता पैदा करने के लिए यह अच्छा प्रयोग है।

प्राणिमात्र की सेवा हमारी प्राचीन परम्परा है जिसे हर गांव और हर जगह फिर से जिंदा करने की जरूरत है। पहले नदियां, झरने बारह महीने बहते थे ओर बहुत हरियाली रहती थी, जिसके कारण जमीन में से पानी पूरे साल रिसता रहता था। अब चूंकि पेड़ कट गए हैं, जंगलों से मिट्टी का कटाव हो रहा हैं इसलिए जो नदियां पहले आठ-दस महीने बहती थी वे आजकल दो महीने भी नहीं बहतीं। इसलिए ‘परिण्डों’ की जरूरत हर शहर और हर गांव में ही नहीं, बल्कि जंगलों में भी है। आजकल कुछ स्थानों पर वन्य जीवों के लिए भी पानी की टंकियां या गड्ढे बनाने का चलन शुरू हुआ है। यह अच्छी बात है। आज खासतौर से गर्मी के मौसम में जंगल में भी जल का भीषण अभाव रहता है जिसके कारण कई बार वन्य जीव पानी की तलाश में मानव बस्तियों में आ जाते हैं। यदि उन्हें जंगल में ही पानी मिल जाए तो वे मानव बस्तियों में नहीं आएंगे।

अपना संस्थान द्वारा वर्ष 2018 मे ं26,000 ‘परिण्डे’ विभिन्न सामाजिक संगठनों, व्यक्तियों के सहयोग से वितरित किए गए हैं। इससे पूर्व वर्ष 2017 में भी 25,000 ‘परिण्डे’ बांधे गए। इस साल 2019 में अपना संस्थान ने 50 हजार स्थानों पर परिण्डे बांधने का लक्ष्य निर्धारित किया है। हम “न त्वहं कामये राज्यं न मोक्षं न स्वगर्ं नापुनर्भवम्। कामये दु:खतप्तानां प्राणिनामार्तिनाशनम्॥ (़मैं न राज्य की कामना करता हूं और न ही मुझे स्वर्ग और मोक्ष चाहिए, मेरी तो बस यही कामना है कि मैं हर प्राणि के दु:ख दूर कर सकूं)” भाव से प्राणिमात्र की सेवा करने की बात करते हैं। इसलिए बढ़ते तापमान, सिमटते जंगलों, सूखते जल स्रोतों तथा बढ़ते शहरीकरण के कारण आवासविहीन हो रहे पक्षियों को आवास और पेयजल उपलब्ध कराने के जो प्रयोग राजस्थान में हुए हैं उन्हें पूरे देश में प्रारंभ करने की आवश्यकता है।

 

 

आपकी प्रतिक्रिया...