॥ राम सच्चिदानंद दिनेसा ॥

गोस्वामी तुलसीदास ने अपने महाकाव्य श्री राम चरित मानस के प्रारंभ में एक महत्वपूर्ण प्रसंग का वर्णन किया है। प्रयागराज में गंगा तट पर माघ मास में भारद्वाज आश्रम में महर्षि भारद्वाज और महर्षि याज्ञवल्क्य के बीच संवाद हुआ है। महर्षि भारद्वाज ने महर्षि याज्ञल्क्य से पूछा। भगवन् एक बात बताइए कि आशुतोष भगवान शंकर-जिनका निरंतर ध्यान करते हैं, ऐसे श्री राम आखिर हैं कौन?
राम कवनु प्रभु पूछउं तोही। कहिय बुझाई कृपानिधि मोहि
भारद्वाज ने आगे कहा कि महाराज, मैं वास्तव में बड़े भ्रम में हूं इसलिए श्री राम के बारे में इस प्रकार समझाइए ताकि मेरा भ्रम मिटे। भारद्वाज के इस प्रश्न का उत्तर देते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं कि हे मुनिश्रेष्ठ यद्यपि श्री राम को आप अच्छी तरह से जानते हैं, फिर भी मैं अपनी बुद्धि के अनुसार राम के बारे में आपकी जिज्ञासा को शांत करूंगा, आप उसे मन लगा कर सुने
जागबलिक बोले मुसकाई। तुम्ह हि विदित रघुपति प्रभुताई तात सुनह सादर मन लाई। कहड राम के कथा सुहाई
उक्त प्रश्न, जो महर्षि भारद्वाज ने याज्ञवल्क्य से पूछा था वह प्रश्न आज भी उतना ही महत्वपूर्ण और प्रासंगिक है। जिस राम के प्रति संपूर्ण समाज इतना श्रद्धावान है, जो उन्हें भगवान मानता है और बड़े भक्तिभाव से जिनकी पूजा करता है, वह राम आखिर हैं कौन? तत्व की दृष्टि से भी और स्थूल दृष्टि से भी। अतएव महर्षि याज्ञवक्ल्य ने भारद्वाज को उत्तर दिया-
राम सच्चिदानंद दिनेसा। नहिं तहं निशा मोह लवलेसा
सहज प्रकाश रूप भगवाना। नहिं तहं पुनिविग्यान विहाना
राम सच्चिदानंद प्रदान करने वाले सूर्य हैं, वहां मोहरूपी रात्रि (अंधकार) का कोई स्थान नहीं है। राम स्वभाव से प्रकाश रूप और सभी प्रकार से सांसारिक ऐश्वर्य और समृद्धि से युक्त हैं। राम नित्य ज्ञान स्वरूप है, जो अज्ञान रूपी अंधकार का सदैव नाश करते हैं।
रघुवंश में कालिदास ने राम को एक सूर्यवंशी राजा के रूप में प्रस्तुत करते हुए यह सिद्ध किया है कि किस प्रकार राम जीवन की मर्यादाओं के अनुसार जीते हुए मर्यादा पुरूषोत्तम के रूप में विश्व में प्रतिष्ठित हुए हैं और किस प्रकार संकट की घड़ियों में जीवन की चुनौती को स्वीकार करते हुए उन्होंने धर्म का आचरण किया है। इसी लिए वाल्मीकि रामायण में महर्षि वाल्मीकि ने राम का परिचय दिया
राम साक्षात विग्रहवान धर्म :
राम धर्म के साक्षात विग्रह हैं। महर्षि याज्ञवल्क्य ने भी राम के इसी स्वरूप का वर्णन करके महर्षि भारद्वाज को आनंद प्रदान किया। “रामहि सत्य अनादि अनूपम। सहा चित धन नित आनंद रूपम्” तुलसी का तो प्रतिपाद्य ही वह राम है जिन्हें वेद अभम, अगोवर अजन्मा, निर्गुण, निराकार कहते हैं। वे ही राम भक्तों के हितकारी अयोध्या नरेश दशरथ नंदन राम हैं। जिनकी कथा भगवान शंकर ने भगवती गौरी को सुनाई हैं।
जेहि इमि गावहिं वेद-बुध जाहि घरहिं मुनि ध्यान
सोइ दशरथ सुत भगत हित फौसलपति भगवान॥
भगवान शंकर अर्थात मनुष्य का विश्वास और भगवती गौरा पार्वती अर्थात मनुष्य की श्रद्धा – जब मनुष्य का विश्वास कहे और श्रद्धा सुने, तब राम प्रकट होते हैं, जिनका वर्णन किया है तुलसी ने
मंगल भवन अमंगल हारी द्रवड सो दशरथ अजिर बिहारी
राम वह हैं जो मंगल के धाम हैं, अमंगल का हरण करते है और जो दशरथ के आंगन में खेलते हुए सभी को सुख और आनंद प्रदान करते हैं
ऐसे दशरथनंदन राम की जन्म भूमि अयोध्या बनी। जिसके बारे में कहते हैं-
अष्टाचक्रा नवद्वारा देवानां पुर योध्या
तस्यां हिरष्यमय: कोश: स्वर्गा ज्योतिषावृत: (अर्थव वेद)
इसी महिमामयी अयोध्या में दशरथ के आंगन में भगवान पघारे और आज जिनका चरित्र शत सहस्रों वर्षों से भारत के जन-मन को अनुप्राणित करता रहा है और सुख प्रदान करता रहा है। भारत की जनता, उनमें भगवान का दर्शन करता है और उनके नाम स्मरण, चिंतन, मनन से स्वयं को धन्य अनुभव करती है। तुलसी ने लिखा-
सो सुख धाम राम कर नामा। अखिल लोकदायक विश्राम॥
ऐसी लोक धारणा है, विश्वास है कि अयोध्यापुरी में इक्ष्वाकु वंश के राजा दशरथ के यहां श्रीराम ने जन्म लेकर संपूर्ण मानवता का कल्याण किया और मनुष्य को अपना जीवन कैसे जीना चाहिए, यह अपने चरित्र के माध्यम से प्रमाणित किया। वाल्मीकि रामायण में एक ऐसा प्रसंग है कि भगवान विष्णु ने धरती पर प्रकट होने या अवतरित होने से पहले अपनी जन्मभूमि का निश्चय किया था
एवं दत्वा वरं देवो देवानां विष्णुरात्मवान
मानुष्ये चिंतयामास जन्मभूमिम थात्मन:
तत: पद्मपलाशाक्ष: कृत्वाऽत्मानं चतुर्विद्यम्।
पितंर रोचयामास तदा दशरथ नृपम्॥
जन्मभूमि के निश्चय के पश्चात, समय का निर्धारण हुआ। भगवान ने समय का निर्धारण किया। नौमी तिथि, मधुमास-वसंत ऋतु जिसके बारे में भगवान ने स्वयं कहा है कि ऋतुओं में मैं वसंत हूं-मासानां मार्गशीषौऽ ऋतुनां कुसुमाकर :- मासों (महीनों) में मैं मार्गशीर्ष और ऋतुओं में बसंत मैं हूं। भगवान ने निश्चय किया कि मधुमास में, जब न अधिक शीत होगी अथवा गर्मी होगी मैं पृथ्वी पर अवतरित हूंगा। तो जन्म का स्थान, समय, मुहूर्त काल आदि सभी भगवान ने निश्चित किया और मानस में तुलसी ने उसका सुंदर वर्णन किया
जोग लगन ग्रह वार तिथि सकल भए अनुकूल
चरू अरू अचर पच्छजुत सम जन्म सुख मूल
समस्त ग्रह नक्षत्र अनुकूल हो गए। पांचांग की शुद्धि हुई, परातार ब्रस ने मनुज रूप में अवतरित होने की तैयारी की। वसंत ऋतु में रामजी का आविर्भाव हुआ। चैत्रे मधुरभाषी स्थान- चैत्रमास में जन्म लेने वाला शिशु मृदुभाषी होता है-ऐसे चैत्र मास का शुक्ल शुक्ल -अर्थात समुज्जवल विराट व्यक्तित्व का धनी। तिथि नौमी-ज्योतिष में नौमी तिथि को रिक्ता माना जाता है, जिसमें कोई मांगलिक कार्य नहीं किया जाता। नवमी तिथि का निषेध किया गया है। भगवान ने विचार किया-जो रिक्त है उसे मैं अपने अस्तित्व से पूर्ण करूंगा और भगवान राम भी नवमी तिथि पर अवतरित हुए और भगवती सीता का जन्म की तिथि शुक्ल नवमी ही है। अभिजीत मुहूर्त-पुनर्वसु नक्षत्र, भगवान का एक नाम पुनर्वसु भी है। विद्वानों ने कहा-अनधो विजयों नेता विश्वयोनि। पुनर्वसु का अर्थ है, जो पुन: स्थापित करे या बसावे, जो उजड़े हुए को बसा दे, अनाथ को सनाथ करे। मध्याह्न बेला, जब सूर्य आकाश में सर्वाधिक प्रकाश का वितरण करता है। उस समय सभी ग्रह अपने-अपने उच्च स्थान में विराजमान हो गए। शुभ लग्न-कर्क लग्न आ गया। लग्न में चंद्रमा के साथ बृहस्पति स्थापित हुए। वातावरण शुद्ध हो गया। प्रकृति मंगलमय हो गई। ऐसे शुभ मुहूर्त में राम ने धरती पर अवतरित होकर सभी को सुख एवं आनंद प्रदान किया। अयोध्या में महान उत्सव का आयोजन हुआ। अध्यात्म रामायण में जन्म के समय भगवान राम के स्वरूप का दर्शन कराया
विष्णोरर्ध महाभाग पुत्रमैक्ष्वा कुनंदनम्
लोहिताक्ष महाबाहूं रक्तोष्ठ दुन्दुमि स्वरम्॥
भगवान राम ने यहीं धरती पर चौदह वर्षों का वनवास काटकर, रावण को मारकर रामराज्य की स्थापना की जिसकी बीसवीं शती में महात्मा गांधी ने स्वतंत्र भारत में स्थापित करने का संकल्प लिया था। राम का राज्य कैसा था?
नहिं दरिद्र कोइ दुखी न दीना
नहिं कोइ अबुध न लच्छुन हीना
राम के राज्य में न कोई दुखी था, न हि कोई दीन था, सभी शिक्षित एवं दीक्षित थे, चरित्रवान एवं सभी मानवीय लक्षणों से युक्त थे। ऐसा ही महात्मा गांधी चाहते थे स्वतंत्र भारत का शासन। इसीलिए महात्मा गांधी ने राम राज्य की संकल्पना कांग्रेस को दी थी। दुर्भाग्यवश, इसे नहीं माना गया और उससे भी अधिक शर्मनाक यह रहा कि जहां भगवान राम का जन्म हुआ इस स्थान को ही तत्कालीन सरकारों द्वारा नकारा गया। यद्यपि इस तथ्य के स्पष्ट प्रमाण है कि जिस स्थान पर भगवान राम का जन्म हुआ था उस स्थान पर राजा विक्रमादित्य ने एक भव्य मंदिर का निर्माण कराया था और वहां बड़ी श्रद्धा और भावभक्ति से रामलला का पूजन-अर्चन-आराधन होता था, जिसे आक्रांता बाबर ने तोड़कर वहां मस्जिद का ढांचा खड़ा कर दिया था और कालांतर में उसका नाम बाबरी मस्जिद रख दिया गया। जहां न बाबर का जन्म हुआ था और न ही उसकी मृत्यु। तथापि, उस ढांचे के अन्दर गर्भगृह में रामलला की पूजा निरंतर होती रही। हमारे प्राचीन ग्रंथ ‘स्कंदपुराण’ में श्री रामजन्म भूमि के महात्म्य और उसके सीमांकन का स्पष्ट वर्णन है। राम जन्म भूमि स्थान पर भारत सरकार के पुरातत्व विभाग द्वारा खुदाई करने पर वहां जन्म स्थान के स्पष्ट प्रमाण मिले हैं। वहां एक राम चबूतरा है जिस पर वर्षों से अखंड संकीर्तन चल रहा है। बाहर की परिक्रमा में भगवान वराह की मूर्ति है। वहां के खंबों पर भगवान शंकर, गणपति, श्री हनुमानजी की मूर्तियां अंकित हैं। तब श्री रामजन्म भूमि की सत्यता और उसकी यथार्थता पर कोई संदेह कैसे कर सकता है? तो उस श्रीराम जन्मभूमि पर श्री राम मंदिर का भव्य निर्माण केवल हिन्दुओं को नहीं बल्कि संपूर्ण भारतीयों के लिए प्रेरणा और आत्म गौरव की बात है। यह बात इसलिए यहां उल्लेखित करना और भी अधिक समीचीन और प्रासंगिक है कि मारीशस जैसे देश में, जहां केवल 52% हिन्दू हैं बाकी सभी मुसलमान, क्रिश्चियन, डच, अफ्रीकन लोग हैं, वहां की संसद ने सर्वानुमति से एक अधिनियम पारित करके अपने देश में रामायण सेंटर की स्थापना की है। वर्ष 2001 में मारीशस की संसद ने एक अधिनियम पारित किया जिसका नाम रामायण सेंटर अधिनियम 2001 है। इसके उद्देश्य में कहा गया है कि इस सेंटर का उद्देश्य रामायण का प्रचार-प्रसार करना होगा। साथ ही रामायण से निस्तृत आध्यात्मिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक मूल्यों का संवर्धन करना होगा। ढे िीेोीं रपव िीेिेसरींश ींहश ठरारूरप रपव … साथ ही एक महत्वपूर्ण उद्देश्य और है कि समाज के हिन्दू समाज और विशेष रूप से संपूर्ण समाज के बौद्धिक तथा नैतिक उत्कर्ष और उसे आगे बढ़ाने के लिए काम करेगा (ढे र्िीेींळवश र्सीळवरपलश रपव र्ीीििेीीं ीें ींहश …)
मारीशस जैसा देश, जहां हिन्दुओं की संख्या आधे से थोड़ी ही अधिक है, वहां के लोगों ने राम और रामायण के महत्व को स्वीकार करते हुए रामायण सेंटर की स्थापना की है और उसके प्रांगण में आध्यात्मिक खंड एक भव्य राम मंदिर का निर्माण हुआ है। यदि यह काम मारीशस में हो सकता है, तो अयोध्या भारत में क्यों नहीं? यह एक यश प्रश्न है, जहां श्री राम का जन्म हुआ है, जहां के संपूर्ण जन जीवन में राम बसे हुए हैं। जब किसी परिवार में किसी बालक का जन्म होता है तो बधाइयां गाई जाती हैं और उसमें कहा जाता है कि उक्त परिवार में राम का जन्म हुआ है और जब किसी की मृत्यु होती है तो उसके पार्थिव शरीर को श्मशान घाट तक ले जाते समय सब कहते हैं “राम नाम सत्य है”। इस प्रकार भारत का संपूर्ण जीवन ही राममय है और व्यक्ति उसे ही प्रणाम करके अपने को धन्य करता है सीब राम भय सब जग जानी। करहूं प्रणाम जोरि जुग पारि। मारीशस की संसद में जब रामायण सेंटर पर बहस हो रही थी उस समय वहां के सूचना व प्रसारण मंत्री श्री पी.जी हा ने जो बहस में भाग लेते हुए जो कहा वह हम सब भारतीयों को एक दृष्टि देता है।
ढहश ठरारूरपर रिशिरश्री ीें ींहश र्हीारप ाळपव रप रलर्लेीपीं ेष …
अतएव आज अयोध्या में जन्मभूमि पर भगवान श्री राम का भव्य मंदिर का निर्माण न केवल आवश्यकता है, बल्कि अनिवार्यता भी है।

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