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****डॉ. प्रज्ञा शिधोरे***** 

हमारे सोलह संस्कारों के साथ भी संगीत का बड़ा महत्व है। यह परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। प्राचीन काल में वेद मंत्रों को गाया जाता था, कालांतर में वेद मंत्रों का पठन, गायन प्रचलन में कम है, परंतु समाप्त नहीं हुआ है और आधुनिक परिवेश में यह स्थान पारंपरिक गीत, लोक गीतों ने ले लिया है।

हित्य, संगीत और कला, जीवन रूपी वृक्ष के तने से निकली तीन शाखाएं हैं। ये तीनों ही भारतीय जीवन शैली की एक परंपरा, एक विचारधारा, एक व्यवस्था पद्धति, जिसे हम समाज कह सकते हैं, से जुड़ी रहती हैं। इसी समाज से जुड़ी व्यवस्था – संस्कार, परंपरा सामाजिक व्यवस्था, सामाजिक संस्कार, सामाजिक परंपरा कहलाती है। संस्कार शब्द का प्रयोग किसी व्यक्ति की शोभा बढ़ाने, उसे सुंदर और आकर्षक बनाने के लिए किया जाता है। शंकराचार्य जी के बह्मसूत्र में उल्लेख किया गया है कि किसी वस्तु, पदार्थ, आकृति में गुण और सौंदर्य आरोपित करना तथा उसकी त्रुटियों, दोषों को हटाने का नाम संस्कार है। संस्कारों का ही नाम ‘‘संस्कारस्य गुणाकानेन, दोषापनएनवा। ’’ अर्थात व्यक्ति या वस्तु के गुणोत्कर्ष और दोषापकर्ष की विधि ही संस्कार है। अंगिरा स्मृति के अनुसार ‘‘चित्रमक्रमादनेके रंगे उन्मील्यते शने, ब्रह्मण्यमपि तद वद स्यात विधिपूर्व ह्मे। ’’ अर्थात जिस प्रकार के अनेक रंगों के प्रयोग से कोई चित्र बनाया जाता है, उसी प्रकार विविध संस्कारों से मनुष्य को संवारा सुधारा और योग्य बनाया जाता है।

भारतीय संस्कृति में संस्कारों का महत्वपूर्ण स्थान है। मानव जीवन के जन्म और मृत्यु सहित सोलह ऐसे पड़ाव हैं जहां पर कोई न कोई संस्कार नाम का उत्सव कार्यक्रम निर्धारित किया गया है। इन्हें हमारी संस्कृति में सोलह संस्कार की संज्ञा दी गई है। प्राचीन भारत के युगद्रष्टा ऋषि -मुनियों ने मनुष्य जीवन की अवधि को सौ वर्ष मान कर उसे सोलह चरणों में विभक्त किया है।

संस्कार यह भारतीय जीवन शैली की सुदृढ़, सशक्त परंपरा है जिसे प्रत्येक भारतीय अपने जीवन में अपनाता है। मानव के जन्म से लेकर मृत्यु तक वह अनेक संस्कारों से परिपूर्ण रहता है। इन संस्कारों का अपना अस्तित्व, महत्व, वैशिष्ट है। समय -समय पर उसे विभिन्न संस्कारों से संस्कारित किया जाता है। भारतीय परंपरा में मुख्य रूप से सोलह संस्कारों का उल्लेख है, जो निम्नानुसार है –

१ . गर्भाधान – यह जन्म के पूर्व का संस्कार है। माता -पिता दिव्य शक्तियों का आहृान कर वैदिक विधि और मंत्रों द्वारा वंश की वृद्धि करने वाली संतान उत्पन्न करने हेतु माता गर्भ धारण करती है।

२ . पुंसवन – शास्त्रों के अनुसार गर्भाधान के तीसरे माह में यह संस्कार होता है। पुंसवन का शाब्दिक अर्थ होता है संतान प्राप्ति के लिए मंत्रोच्चारण करना।

३ . सीमंतोन्नयन – यह संस्कार जातक के निरोग, विवेकशील एवं संभ्रांत होने के लिए किया जाता है।

४ . जातकर्म – जन्म के तत्काल बाद किया जाने वाला संस्कार है। इसमें पिता जातक को घी और मधु देता है और शतायु होने की कामना करता है।

५ . नामकरण – ग्रहों, नक्षत्रों की गतिशीलता के अनुसार जातक की नाम राशि निश्चित की जाती है जो जातक के जन्म के १०वें या ११वें दिन संपन्न होती है।

६ . निष्क्रमण – जन्म के चौथे सप्ताह सूर्य दर्शन कराना। इस संस्कार के माध्यम से बालक को घर से बाहर निकाला जाता है।

७ . अन्नप्राशन – जन्म के बाद ६ठवें माह में बालक का अन्न से संपर्क कराया जाता है। यह संस्कार भी वैदिक रीतियों एवं विधि -विधान पूर्वक संपन्न किया जाता है।

८ . मुंडन – मानव मस्तिष्क में नए उपयोगी विचार एवं संस्कार डालने के लिए उसे पहले शुद्ध करने का प्रयास किया जाता है, इसी प्रयास का अध्यात्मिक स्वरूप मुंडन है।

९ . कर्ण -छेद – यह संस्कार भी धार्मिक विधान से संपन्न किया जाता है। वैदिक धर्म में कर्ण छेदन को ज्ञान संकलन का माध्यम माना गया है।

१० . विद्यारंभ – जातक को लिखने -पढ़ने की सीख देना आरंभ किया जाता है।

११ . उपनयन – सोलह संस्कारों में उपनयन को अत्यधिक महत्वपूर्ण संस्कार माना गया है। उपनयन अर्थात तीसरी आंख। ऐसा माना जाता है कि इस संस्कार के पश्चात बच्चे में ज्ञान की पात्रता स्वयमेव आ जाती है।

१२ . वेदारंभ – आज के परिवेश में इसे उच्च अध्ययन कह सकते हैं। जिसे प्राचीन समय में वेदारंभ कहते थे। आज के परिवेश में वेदों की जगह अन्य विषयों का समावेश हो गया है।

१३ . केशांत – दाढ़ी और मूंछों का आना युवक के किशोरावस्था के लक्षण होते हैं। पहली बार इस पर उस्तरा चलाना एक संस्कार माना जाता है।

१४ . समावर्तन – विद्याध्ययन समाप्त कर वापस घर लौटना भी संस्कार होता था। प्राचीन काल में गुरुकुल से लौटते समय पूरे वैदिक मंत्रों के साथ यह क्रिया संपन्न की जाती थी।

१५ . विवाह – नर एवं नारी के रक्त, नाड़ी, गुण, गण आदि के परीक्षण के उपरांत दोनों के परिणय की तिथि निश्चित कर वह संपन्न होना विवाह संस्कार कहलाता है। यह आत्मीयता -निर्वाह का सर्वोच्च संबंध है।

१६ . अंत्येष्टि – भारतीय संस्कृति में गर्भाधान से प्रारंभ संस्कार का अंत मृत्यु उपरांत दाह संस्कार के साथ होता है। अंत्येष्टि का शाब्दिक अर्थ होता है शरीर का अंत। इस संस्कार को भी वैदिक मंत्रों के साथ संपन्न किया जाता है।

इन सोलह संस्कारों के साथ हमारी भारतीय परंपरा में संगीत का भी बड़ा महत्व है। भारतीय जीवन शैली के प्रत्येक पहलू से संगीत जुड़ा है। इसी प्रकार हमारे सोलह संस्कारों के साथ भी संगीत का बड़ा महत्व है। भारत वर्ष में अनेक प्रांत, अनेक भाषा होते हुए भी संस्कारों की परंपरा सभी जगह है, उसे प्रस्तुत करने के तरीके अलग -अलग हो सकते हैं। इन सभी संस्कारों को पारंपरिक तरीके से और गेय रूप में भी मनाया जाता है। इन संस्कारों के समय जो गीत गाए जाते हैं उनमें से कुछ तो पारंपरिक हैं और कुछ समयानुकूल नई रचना कर गाए जाने लगे हैं। यह परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है, यह आधुनिक काल की देन नहीं है। प्राचीन काल में वेद मंत्रों को गाया जाता था, कालांतर में वेद मंत्रों का पठन, गायन प्रचलन में कम है, परंतु समाप्त नहीं हुआ है और आधुनिक परिवेश में यह स्थान पारंपरिक गीत, लोक गीतों ने ले लिया है।

उपरोक्त सोलह संस्कारों में उल्लेख किया गया है कि प्रत्येक संस्कार वैदिक मंत्रों के साथ संपन्न किया जाता रहा है। यह सभी मंत्र गेय रहते थे, अर्थात इनका संबंध संगीत के साथ निश्चित ही रहा। आधुनिक काल में मंत्रों का अधिक प्रचलन नहीं है फिर भी अनेक संस्कारों में प्रासंगिक गीत गाने का प्रचलन आज भी है।

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