जयंती विशेष: डॉक्टर खूबचंद बघेल ने देश सेवा के लिए छोड़ी थी पढ़ाई!

Dr.Khubchand Baghel
Dr.Khubchand Baghel
भारत की आजादी से लेकर भारत के विकास में अहम योगदान देने वालों में डॉक्टर खूबचंद बघेल का नाम भी शामिल है। खूबचंद जी के अथक प्रयास की वजह से ही सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन देखने को मिला और उसका लाभ आज भी छत्तीसगढ़ और देश की जनता को मिल रहा है। खूबचंद ऐसे विचारक और चिंतक थे जिन्होंने हर समय देश की चिंता की और उसे सही दिशा में आगे ले जाने का प्रयास किया। इस दौरान उन्होंने अपने निजी स्वार्थ का ध्यान नहीं दिया और खुद का बलिदान भी दिया। आज देश की स्वतंत्रता और विकास खूबचंद जैसे लोगों की देन है जिस पर आज हमें गर्व होता है हालांकि दुख इस बात का भी होता है कि आजकल राजनीतिक पार्टियां अपने वोट बैंक के लिए देश को बेचने तक को तैयार है इन्हें देश से प्रेम नहीं बल्कि सत्ता से प्रेम है। 
 
डॉक्टर खूबचंद बघेल का जन्म छत्तीसगढ़ के रायपुर में 19 जुलाई 1900 में हुआ था इस साल उनकी 121वीं जयंती मनाई जा रही है। खूबचंद बघेल का पुश्तैनी काम खेती करना था इसलिए वह भी शुरुआत में खेती के साथ साथ गांव की ही प्राथमिक पाठशाला में शिक्षा आरम्भ की लेकिन बघेल जी एक मेधावी छात्र थे इसलिए उन्होंने पढ़ाई पर ज्यादा ध्यान दिया और शिक्षा में उच्च स्थान को प्राप्त किया। सन 1920 में खूबचंद बघेल को नागपुर के राबर्टस मेडिकल कॉलेज में एडमिशन मिल गया लेकिन उन्होंने देश के आंदोलन के लिए अपनी मेडिकल की पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी और सन 19221-22 के असहयोग आंदोलन में शामिल हो गये। डॉक्टर खूबचंद बघेल ने छात्रों को जागृत करने का बीड़ा उठाया और फिर गांव से लेकर शहर तक लोगों से मिलना शुरू किया। देश के युवाओं में राष्ट्रीय चेतना का बीज बोना सबसे जरुरी है क्योंकि देश का युवा ही नया इतिहास लिखता है और यह बात खूबचंद जी को बखूबी पता थी इसलिए ही उन्होंने युवाओं और छात्रों को संपर्क करना शुरू किया। झंडा सत्याग्रह में सैकड़ों स्वयंसेवकों ने डॉक्टर खूबचंद बघेल के नेतृत्व में यह आंदोलन किया। 
 
 
खूबचंद बघेल के आंदोलन में शामिल होने और पढ़ाई बीच में छोड़ने से उनका परिवार दुखी था जिसके बाद उन्हे फिर से मेडिकल की पढ़ाई के लिए भेजा गया और 1923 में बघेल ने अपनी मेडिकल की परीक्षा पास कर ली और रायगढ़ शासकीय अस्पताल में पहली नौकरी भी मिल गयी लेकिन कुछ वर्षों की नौकरी के बाद उन्होंने फिर से देश सेवा के लिए अपनी सरकारी नौकरी छोड़ दी और जंगल सत्याग्रह में शामिल हो गये। इसके बाद डाक्टर बघेल ने कभी पीछे नहीं देखा और लगातार स्वतंत्रता की लड़ाई में आगे बढ़ते गये। उन्होंने पिछड़ों और अछूतों के लिए भी काम किया और सभी के लिए आवाज उठाई।कई दलित नेताओं का चुनाव किया गया जिन्होंने सभी दलितों और शोषितों को आगे लाने का काम किया।      
 
 
छत्तीसगढ़ के अलग राज्य का सपना खूबचंद ने बहुत पहले ही देखा था लेकिन वह उनके समय में पूरा नहीं हो सका। हालांकि उन्होंने अलग राज्य का बीच जो बोया था वह 2000 में अंकुरित हो गया और छत्तीसगढ़ को अलग राज्य का दर्जा मिल गया लेकिन उन्हें वह सम्मान नहीं मिल सका जिसके वह हकदार थे। छत्तीसगढ़ को अलग राज्य का दर्जा देने का श्रेय तत्कालीन सरकार ने ले लिया। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस अधिवेशन के भी सदस्य रहे और तमाम आंदोलनों में भाग भी लिया था। 1932 में रायपुर कांग्रेस के सदस्य बनाए गये और इसी साल उन्होंने “द्वितीय सविनय अवज्ञा” आंदोलन में भाग लिया। गांधी के आंदोलन “करो या मरो Do or Die” और भारत छोड़ो आंदोलन में भी भाग लिया था। डॉक्टर खूबचंद बघेल ने समय समय पर आंदोलनों में भाग लिया और जेल भी गये लेकिन उन्होंने कभी भी अपना विचार नहीं त्यागा और पूरा जीवन देश की सेवा करते रहे। 22 फरवरी 1969 को उनकी हार्ट अटैक से मौत हो गयी। 
 
 
 
 
 
 
     
  

 

 
 
 
                
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 

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