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****डॉ. देवेनचन्द्र दास सुदामा****

 वर्तमान भारत सरकार की दृष्टि पूर्वोत्तर की तरफ सकारात्मक लग रही है, परन्तु त्रिपुरा को छोड़ कर शेष राज्यों की सरकारें ठीक से काम नहीं कर रही हैं। फिर विकास कैसे होगा? यही क्यों, शासकीय स्तर पर इतना भ्रष्टाचार है कि ८० प्रतिशत राशि लोगों की जेब में ही चली जाती है, फिर मात्र २० प्रतिशत से कितना विकास होगा? इसके अलावा शेष भारत के लोग पूर्वोत्तर को हमेशा उपेक्षा की दृष्टि से ही देखते हैं।

      अनादि काल से पूर्वोत्तर भारत अखण्ड सांस्कृतिक महाभारत का अभिन्न अंग रहा है। अंग्रेज अपनी विभेद नीति के आधार पर भारतवर्ष के तीन टुकड़े कर स्वतंत्रता प्रदान कर चले गए। पूर्वोेत्तर भारत का बड़ा हिस्सा पूर्व पाकिस्तान अर्थात आज का बांग्लादेश बन गया। पूर्वात्तर भारत के प्रमुख प्रांत ‘असम’ को भी पूर्व-पाकिस्तान में शामिल किया था, परंतु कई महान नेताओं की तत्परता के कारण संभव नहीं हुआ। किन्तु भौगोलिक दृष्टि से पूर्वोत्तर को शेष भारत केे साथ संकीर्ण भूमि से ही संपर्कित होकर रहना पड़ा।

 स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् देश में जो सरकार आई उस सरकार ने पूर्वोत्तर के प्रति जितना ध्यान देना चाहिए था उतना नहीं दिया। जिसके कारण पूर्वोत्तर क्षेत्र का विकास बिल्कुल धीमा हो गया। इधर प्रांतीय शासन में जो सरकार आई वह भी उतनी ताकतवर नहीं थी कि केंद्रीय सरकार पर दबाव डाल कर विकास की गति तेज कर सके। इन्हीं कारणों से सर्व प्रथम नगालैण्ड में विद्रोह की आग भड़की थी।

 भौगोलिक दृष्टि से शेष भारत का सम्पर्क संकीर्ण होने के कारण पूर्वोत्तर के प्रति शेष भारत का ध्यान भी संकीर्ण हो गया। वर्तमान उत्तर बंगाल का क्षेत्र बांग्लादेश और भूटान के बीच का संकरा क्षेत्र बन कर रहा है। अस्सी के दशक तक इस प्रांत के साथ शेष भारत का संपर्क कम हुआ था, जिसके कारण यातायात परिवहन की व्यवस्था की उपलब्धता नगण्य थी। रेल मार्ग अंग्रेजी शाासन में ही शुरू हुआ था, परन्तु नाममात्र ही था। इस प्रांत में अनेक पहाड़ हैं और बारिश भी बहुत होती है, नदियों की संख्या बहुत है। वर्षाकाल में बाढ़ के कारण सड़क संपर्क टूट जाता है। नदियों पर पुल बहुत कम थे। लकड़ी के पुल कुछ ही वर्षों में नष्ट हो जाते थे। अत्यधिक वर्षा के कारण सड़क खराब हो जाती थी, जिसके कारण इस क्षेत्र के लोगों का जीना दूभर हो जाता था। उधर पर्वतीय क्षेत्र की स्थिति और भी दयनीय हो जाती थी और कमोबेश आज भी है। प्रांतीय सरकारों को केंद्रीय सरकार पर जितना दबाव डालना चाहिए उतना संभव नहीं होता था। उधर केंद्रीय सरकार पूर्वोत्तर के प्रति सौतेली मां सा प्यार देती रही। सन १९६२ के चीनी आक्रमण और सन १९६५ में पाकिस्तान के हमले के पश्चात भारत सरकार की दृष्टि में कुछ हद तक सुधार हुआ। रेल और सड़क मार्गों के विकास के लिए कुछ करने का प्रयास हुआ, किन्तु गति बिल्कुल धीमी रही। देश में राजनैतिक उतार-चढ़ाव भी एक कारण रहा।

 पूर्वोत्तर भारत में पहले चार ही राज्य थे – असम, नेफा, मणिपुर और त्रिपुरा। पहले ही उल्लेख किया गया है कि सर्वप्रथम नगाभूमि में अलगाववादी विद्रोह तेज हुआ, सार्वभौमिकता तो नहीं मिली, परन्तु एक राज्य बना। उधर मिजो जिले के निवासियों ने भी आंदोलन शुरू कर दिया, इधर खासी-जयंतिया और गारो पहाड़ी जिले के निवासी भी राज्य के लिए कूद पड़े। केंद्रीय सरकार ने उनकी मांग स्वीकार कर मिजोरम, मेघालय नाम से अलग राज्य बनाए। नेफा को ‘अरुणाचल’ नाम से अलग राज्य का रूप दिया। इतना होते हुए भी इन प्रांतों में विकास की गति तेज नहीं हुई। इसका प्रमुख कारण है भारत सरकार से प्राप्त अनुदान पर्याप्त नहीं है। जो आता है उसका प्रयोग भी सही ढंग से नहीं होता है।

 शेष भारत के लोग पूर्वोत्तर को नहीं जानते हैं। अनपढ ही नहीं अपितु अनेक पढ़े-लिखे लोग भी पूर्वोत्तर भारत के बारे में नहीं जानते हैं। एक समय नगा-विद्रोह बहुत प्रख्यात हो गया था जिसके कारण नगालैण्ड का नाम कमोबेश जानते हैं। असम का नाम न जानने वाले लोग मुझे बहुत मिले। हां, यह भी ठीक है कि पूर्वोत्तर के बारे में शेष भारत के लोगों को ज्ञात करने वाले लोगों की संख्या भी बहुत कम है। पूर्वोत्तर भारत से राज्यसभा और लोकसभा में सांसद निर्वाचित होकर जाते हैं, परन्तु उनमें से दो एक के अलावा राष्ट्रभर में चमकने वाले सांसदों की संख्या बहुत कम है। पहले भी उल्लेख किया गया है कि पूर्वोत्तर राज्य में प्रमुख है ‘असम’। असम चाय और तेल के लिए प्रख्यात है। भारत के कुछ लोग चाय के लिए ही असम को जानते हैं परन्तु यह भी शायद चालीस प्रतिशत से कम होगा।

 प्राचीन धरोहर, तीर्थ आदि के लिए प्रांत मशहूर हो जाता है। पुरी के जगन्नाथ मंदिर के लिए उडीसा प्रख्यात है, बनारस, मथुरा-वृन्दावन, हरिद्वार के लिए उत्तर प्रदेश, वैष्णवदेवी, अमरनाथ के लिए जम्मू- कश्मीर प्रख्यात है। पूर्वोत्तर में भी अनेक तीर्थ और प्राचीन धरोहर अवश्य हैं। जैसे असम का ‘कामाख्याधाम’, त्रिपुरा का ‘त्रिपुरेश्वरी मंदिर’, अरुणाचल प्रदेश का परशुराम कुण्ड, तवांग का प्राचीन ‘बौद्ध मठ’ आदि, परन्तु इन सबके बारे में शेष भारत के लोग बहुत कम जानते हैं। हिमालय का नजारा देखने के लिए देश-विदेश से लोग कश्मीर, हिमाचल, उत्तराखण्ड, दार्जिलिंग जाते हैं। परन्तु अरूणाचल प्रदेश में बहुत कम आते हैं, किन्तु अरूणाचल के प्राकृतिक दृश्य कश्मीर, हिमाचल, उत्तराखण्ड से कम नहीं हैं। इसका एक ही कारण है, इन सब का प्रचार-प्रसार देश-विदेशों में जिस प्रकार होना चाहिए था उस प्रकार नहीं हो पाया। इसका प्रमुख कारण है इन राज्यों की सरकारें और स्वयंसेवी संस्थाओं की कमजोरी और महत्व का अभाव। काजीरंगा एक सींग वाले गेंडे के लिए मशहूर अवश्य है, परन्तु यहां भी बहुत कम लोग आते हैं। कला-संस्कृति, साहित्य और खेल-कूद में भी पूर्वोेत्तर के जाने-माने लोग बहुत कम हुए हैं। मध्ययुगीन असमिया साहित्य किसी भी भारतीय साहित्य से कम नहीं है, पर देश के लोग नहीं जानते हैं इसका प्रमुख कारण है उस महान साहित्य का हिन्दी, अंग्रेजी और अन्यान्य भारतीय भाषाओं में अनुवाद बहुत कम हुए हैं। अब तक पूर्वोत्तर के दो साहित्यकारों को ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला है। वे हैं-डॉ.वीरेन्द्र कुमार भट्टाचार्य और डॉ. मामीन रयचम गोस्वामी (इन्दिरा गोस्वामी), डॉ. वीरेन्द्र कुमार भट्टाचार्य को शेष भारत के अधिकाधिक लोग बंगाली ही समझते हैं। इन दो विभूतियों के साहित्य का अन्यान्य भारतीय भाषाओं में अनुवाद बहुत कम हुआ है।

 डॉ. भूपेन हाजरिक को भी पहले लोग बंगाल के निवासी के रूप में ही जानते थे। असमिया के रूप में शेष भारत के लोग कुछ दिन पहले से ही जानते हैं। मणिपुर की मेरी कोम को भी आज कल भारत के लोग जानने लगे हैं। मणिपुरी नृत्य और असम के बिहू गीत और नृत्य मीडिया के माध्यम से प्रख्यात हो गया है, किन्तु यह भी देश के चालीस प्रतिशत से कम लोग ही जानते हैं।

 १९८० के बाद असम के साथ साथ सारे पूर्वोत्तर में उग्रवाद-आतंकवाद प्रारंभ हुआ। समूचे पूर्वोत्तर के सभी जाति-उपजाति, गिरिवनवासियों के युवक देशोध्दार के नाम पर उग्रवादी-आतंकवादी बनकर देश को लूटने लगे। प्रशासन को भी अपने कब्जे में कर लिया है। क्षेत्र का विकास ठप हो गया। उधर प्रशासन में भ्रष्टाचार साधारण सी बात हो गई। प्रशासन के ऊपर से नीचे तक भ्रष्टाचार ही भ्रष्टाचार है। सरकारी बजट की अस्सी फीसदी रकम भ्रष्टाचारियों की जेब में जाती है, बाकी बीस प्रतिशत से विकास कितना हो सकता है, ये सब को मालूम है। केंद्रीय सरकार से जो राशि आती है उसकी हालत भी ऐसी ही होती है।

 वर्तमान भारत सरकार की दृष्टि पूर्वोत्तर की तरफ सकारात्मक लग रही है, परन्तु प्रांतीय सरकारे ठीक से काम न करने पर विकास कैसे हो सकता है? केवल त्रिपुरा इसका अपवाद है।

 पहले ही उल्लेख किया गया है कि शेष भारत के लोग पूर्वोत्तर को हमेशा उपेक्षा की दृष्टि से देखते हैं। अधिकाधिक लोगों में पूर्वोत्तर के बारे में जानते-परखने की उत्सुकता नहीं है, जिसके कारण पूर्वोत्तर को शेष भारत से उपेक्षित होकर रहना पड़ा है।

  मो.ः ०९४३५४०३३३६

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