महाराष्ट्र की शिक्षा व्यवस्था पर दृष्टिपात

महाराष्ट्र की शिक्षा व्यवस्था पर लेखक डॉ. दीपक मुकादम, प्रबंधन समिति सदस्य मुंबई विश्वविद्यालय के विचार उनके इस आलेख के माध्यम से प्रस्तुत किए गए है। 

” शिक्षा के संदर्भ में मैं इतना ही कह सकता हूँ कि मैं इसे, अत्यंत महत्वपूर्ण विषय के रूप में देखता हूँ जिसमें लोग सबसे अधिक वचनबद्ध हो सकते हैं।” दुर्भाग्यवश,  अब्राहम लिंकन के इस बुद्धिमत्तापूर्ण वक्तव्य को, महाराष्ट्र सरकार ने पूरी तरह अनदेखा कर दिया है। महाराष्ट्र सार्वजनिक विश्वविद्यालय अधिनियम, 1994 की निर्मिति के 25 बरसों बाद; वर्ष 2016 में इसमें संशोधन किया गया। इसे अमल में लाने में बहुत लंबा समय लगा। इससे महाराष्ट्र के 13 विश्वविद्यालयों, 21 मानद विश्वविद्यालयों तथा यहाँ के लगभग 33 लाख युवाओं के भविष्य के प्रति महाराष्ट्र सरकार का कड़ा रुख स्पष्ट रूप से जाहिर होता  है।  कहा जाता है कि वैश्विक विश्वविद्यालयों की श्रेणी में भारतीय विश्वविद्यालयों को स्थान न मिल पाने के बड़े कारणों में से एक- हमारी त्रुटिपूर्ण प्रशासन व्यवस्था एवं दृष्टिकोण है। महाराष्ट्र की उच्चतर शिक्षा के क्षेत्र में जारी वर्तमान गतिविधियों से यह बात शीशे की तरह स्पष्ट हो गई है कि विश्व के अग्रणी विश्वविद्यालयों की श्रेणी में, भारत के केवल गिने-चुने विश्वविद्यालय ही क्यों हैं?

महाराष्ट्र सार्वजनिक विश्वविद्यालय अधिनियम, 2016 को 1 मार्च, 2017 से लागू किया गया लेकिन इसमें गलत इरादों के साथ किए जा रहे संशोधनों का कोई अंत ही नहीं है जिसके फलस्वरूप इस अधिनियम को इसकी पूरी सशक्तता एवं पूर्णता के साथ लागू करने में बड़ा विलंब हो रहा है । महाराष्ट्र विधान परिषद ने 28 दिसंबर 2021 को,’ सार्वजनिक विश्वविद्यालय अधिनियम 2016 (तृतीय संशोधन) विधेयक’ पारित किया। इसके द्वारा प्रगत महाराष्ट्र की उच्च शिक्षा की गौरवशाली परंपरा को तोड़कर; उच्च शिक्षा के केंद्र कहे जाने वाले राज्य भर के विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता को कमजोर करने का जोरदार प्रयास किया गया। इस अधिनियम के अनुसार, महाराष्ट्र राज्य के विश्वविद्यालयों में कुलपति सीधे राज्यपाल द्वारा नियुक्त नहीं किए जाएँगे। राज्यपाल, सरकार द्वारा सिफारिश किए गए नामों पर केवल स्वीकृति दे सकते हैं। इस अधिनियम को, राज्य सरकार द्वारा माननीय राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी के अधिकारों को सीमित करने के लिए, जानबूझकर उठाए गए कदम के रूप में देखा जा रहा है।

इस अधिनियम में किए गए संशोधनों के अनुसार, शिक्षा मंत्री को पहले से अधिक अधिकार दिए गए हैं तथा उन्हें प्र-कुलपति(प्रो चांसलर) का पद भी प्रदान किया गया है। स्पष्टतः यह राज्यपाल की स्वायत्तता को सीमित करने तथा विश्वविद्यालय प्रशासन में राजकीय हस्तक्षेप को बढ़ावा देने का प्रयास है।

इस संशोधन विधेयक में प्रस्तावित अव्यवसायिक एवं शुद्ध राजनीति से प्रेरित अहितकारी बदलाव, शिक्षा क्षेत्र को पूर्णतया बीमार एवं अराजक बनाने के लिए किए गए हैं जो कोरोनावायरस से भी घातक सिद्ध होंगे।

यह समझ से बाहर की बात है कि महाराष्ट्र में शिक्षा के क्षेत्र में, लंबे समय से व्याप्त कई बड़ी एवं असंख्य अनसुलझी समस्याओं जैसे -सरकार के पास शिक्षकों की सेवा से संबंधित लंबित प्रकरण, शिक्षकों को करियर एडवांसमेंट स्कीम से मिलने वाले लाभ, पेंशन स्कीमों, संस्थाओं को दिए जा रही अवैतनिक निधियाँ, शैक्षणिक प्रशासन के कार्यों के लिए छठवें वेतन आयोग से संबंधित लाभ, मुंबई के कई इंजीनियरिंग कॉलेजों के शिक्षकों को वेतन न दिेए जाने, नेट/ सेट उत्तीर्ण न किए शिक्षकों के नियमितीकरण आदि मुद्दे पहले से ही लंबित हैं। अफसोस की बात है कि उपर्युक्त प्रातिनिधिक एवं महाराष्ट्र में शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े हितधारकों की अनगिनत समस्याओं का करने के बजाय, मौजूदा सरकार- महाराष्ट्र सार्वजनिक विश्वविद्यालय अधिनियम 2016 के संशोधनों को एक माध्यम बना रही है। ऐसा माध्यम जो राज्यपाल के संवैधानिक अधिकारों को सीमित कर, फलस्वरूप इस कदम के नकारात्मक एवं दीर्घकालीन प्रभाव को अनदेखा कर रहा है।

यह विधेयक, सरकार द्वारा किसी भी विश्वविद्यालय के कुलपति को नियुक्त करने के अधिकार को नियंत्रित एवं केंद्रित करने तथा शिक्षा मंत्री को प्र-कुलपति( प्रो-चांसलर) के तौर पर, राज्यपाल को सिफारिशें भेजने की अनुमति देता है- जो कि स्वयं विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति होते हैं।

महाराष्ट्र विधान परिषद ने, महाराष्ट्र सार्वजनिक विश्वविद्यालय अधिनियम -2016 (तृतीय संशोधन) पारित किया है जो राज्य द्वारा संचालित विश्वविद्यालयों के संदर्भ में, उच्चतर एवं तकनीकी शिक्षा मंत्री को ज्यादा अधिकार देता है।

संशोधन विधेयक दर्शाता है कि राज्यपाल की स्वायत्तता से समझौता किया जा रहा है, वहीं शिक्षा मंत्री को अधिक सशक्त बनाया जा रहा है। ऐसा कर, विश्वविद्यालयों एवं उनके कामकाज में राजनीति का अधिक से अधिक हस्तक्षेप बढ़ाने का मार्ग खोला जा रहा है जो कि महाराष्ट्र के युवाओं के लिए बहुत घातक साबित होगा।

महाराष्ट्र सरकार को, इन मुद्दों के राजनीतिकरण के बजाय यह समझना चाहिए कि अपेक्षाकृत नए एवं छोटे भारतीय राज्यों ने भी केंद्रीय विश्वविद्यालयों को स्थापित करने की बड़ी पहल की है। महाराष्ट्र में एक भी विश्वविद्यालय ऐसा नहीं है जो पूरी तरह केंद्रीय विश्वविद्यालय कहलाया जा सके। सरकार को राजनीति करना छोड़कर एवं युवाओं की जिंदगियों से खिलवाड़ बंद कर- मुक्त, उत्तरदायित्व पूर्ण एवं वैश्विक दृष्टिकोण युक्त नीति अपनानी चाहिए।

डॉ. दीपक मुकादम

प्रबंधन समिति सदस्य

मुंबई विश्वविद्यालय।

 

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