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 ***ज्ञानदेव आहूजा ***  

    

 कभी भारत का हिस्सा रहे पाकिस्तान में इस समय ६ प्रांत हैं। इनमें से एक सिंध प्रांत की आबादी लगभग ३ करोड़ १० लाख है। इस ३ करोड़ में सिंधी भाषा-भाषी लगभग २ करोड़ हैं, जिनमें हिंदू सिंधी लगभग ३० लाख एवं शेष सिंधी मुसलमान हैं।
      लगभग सभी सिंधी हिंदू आजीविका के लिए व्यापार करते हैं। २० प्रतिशत सिंधी हिंदुओं के पास अपनी खेती-बाड़ी भी है। सन १९४७ में भारत के बंटवारे के बाद पाकिस्तान से भारत आए सिंधी हिंदुओं के पास जो जमीन जायदाद थी, उस पर अधिकांशत: भारत के विभिन्न प्रांतों से गए मुसलमानों का कब्जा है। इन मुसलमानों को वहां की तत्कालीन सरकार द्वारा क्लेम देकर कब्जा करवाया गया था। इन्हें आज भी वहां मुहाजिर कहा जाता है। मुहाजिर का अर्थ शरणार्थी या रिफ्यूजी है।
    सिंध में कुल २३ जिले हैं जो इस प्रकार हैं-१. कराची, २. जामशोरो, ३. हैदराबाद सिंध, ४. टंडो मोहम्मद खान, ५. टंडो अल्लहयार, ६. ठट्टो, ७. बदीन, ८. मीरपुर खास, ९. उमर कोट, १०. मिट्ठी, ११. सांघर, १२. बेनजीराबाद, १३. नौशौरो १३. फिरोज, १४. खैरपुर, १५. सक्खर, १६. ला़डकाना, १७. कंबज शहजाद कोट, १८. जैकमाबाद, १९. दादू, २०. शिकारपुर, २१. कशमीर, २२. घोटकी, २३. मटियारी।
विभाजन से पूर्व कराची और हैदराबाद में,जहां हिंदू रहा करते थे, वहां अब भारत से गए मुहाजिर मुसलमान रहते हैं। वहां की सरकार ने हिंदुओं के व्यापारिक प्रतिष्ठान, दुकानें एवं मकान इन मुसलमान मुहाजिरों को आवंटित कर दिए थे। अत: सिंध के बड़े शहरों में मूल सिंधी बहुत कम और मुहाजिर ज्यादा रहते हैं। यहां का सारा थोक एवं खुदरा व्यापार उनके हाथ में ही है। यहां तक कि कराची बंदरगाह से संबंद्ध मर्चेंट नेवी पर भी मुहाजिरों का कब्जा है।
मुहाजिरों का आतंक
    यहां यह बताना भी आवश्यक है कि भारत के बंटवारे के समय पाकिस्तान के पंजाब, पख्तूनिस्तान, बलूचिस्तान आदि में हिंदुओं को लूटा गया, मारपीट हुई, बहन-बेटियों की इज्जत लूटी गई, किंतु सिंध प्रांत में ऐसा बहुत कम हुआ। सिंध के मूल सिंधी मुसलमानों ने हिंदुओं को बहुत परेशान नहीं किया। थोड़ी बहुत घटनाएं अगर हुई भी तो यहां से गए मुहाजिरों के कारण हुईं। हां, संपत्ति अवश्य छोड़कर आना पड़ा।
    सिंध में मुहाजिर अभी भी लुटेरोें जैसा रूप बनाए हुए हैं। मूल सिंधी एवं मुहाजिरों का सामंजस्य वहां आज भी नहीं है। इसके विपरीत भारत में शरणार्थी बनकर जो सिंधी हिंदू आए थे, वे सभी जगह बाकी हिंदू समाज के साथ समरस हो गए हैं। पाकिस्तान के सिंध प्रांत में सिंधी मुसलमानों एवं मुहाजिरों का संघर्ष, लड़ाई, झगड़े आज भी जारी हैं। कभी-कभी तो बड़े-बड़े गुटों में भारी मात्रा में खून-खराबा भी हो जाता है।
    मूल सिंधी अब हिंदुओं को याद करते रोते हैं। भारत से सिंधी हिंदू, संत, महात्मा या साहित्यकारों, लेखकों, दर्शनार्थियों का प्रतिनिधि मंडल जब पाकिस्तान जाता है तो सिंध में न केवल उनका भव्य स्वागत किया जाता है, अपितु उनके लिए पलक-पांवडे बिछाए जाते हैं।
समान पूर्वज
    वहां का सिंधी मुसलमान सिंध के आखिरी महाराजा सम्राट दाहिर सेन को अपना पूर्वज एवं आदर्श मानने लगा है। शहीद हेमू कालानी, संत कंवर राम, साई टेऊंराम आदि संतों और शहीदों को अपना संत और शहीद मानने लगा है। इनकी जयंती एवं बलिदान दिवस इत्यादि अनेक कार्यक्रम बहुत ही श्रद्धा एवं उल्लास के साथ सिंधी मुसलमानों के द्वारा मनाए जाने लगे हैं। इससे भी आगे बढ़कर अनेक सिंधी-मुसलमान भगवान श्री राम और श्री कृष्ण को अपना देवता, पैगंबर या भगवान मानने लगे हैं।
    वहां स्थित मुख्य मंदिरों जैसे साधुबेला, कालका देवी, वरुण देव मंदिर, झूलेलाल या जिंदा पीर मंदिर इत्यादि की सुरक्षा का भार सिंधी मुसलमान ही वहन करते हैं। वैसे पूरे सिंध प्रांत में वर्तमान में लगभग ३०० मंदिर हैं जिनकी सुरक्षा व्यवस्था सिंधी मुसलमान ही संभाले हुए हैं। वहां के मंदिरों की हिंदू-सिंधी समितियों ने सुरक्षा व्यवस्था का भार सिंधी मुसलमान को सौंपा हुआ है।
सिंध के सीमांत पर स्थित हिंगलाज माता, जो पूरे सिंध प्रांत की सभी जातियों, समाजों की कुल देवी हैं, के दर्शनों के लिए अब मुसलमान भी जाने लगे हैं।
जिये सिंध आंदोलन
    सिंध के सिंधी मुसलमानों ने जिये सिंध कौमी मूवमेंट चला रखा था। इनकी बड़ी-बड़ी सभाएं होती थीं। कई-कई बार तो चार-पांच लाख तक की जनता इन कार्यक्रमों में इकट्ठा हो जाती थी। पहले ‘जिये सिंध’ आंदोलन गुलाम मोहम्मद सैयद एवं रमेश भट्टी ने चलाया था फिर इसे बशीर अहमद खान कुरैशी ने आगे बढाया।
    बशीर अहमद खान कुरैशी का कहना था कि अगर भारत सरकार उनको सहयोग दें तो वे सिंध को भारत में मिला दें या पाकिस्तान से बांग्लादेश की तर्ज पर इसे अलग कर दें; पर भारत सरकार द्वारा सहयोग करना तो दूर उल्टे पाकिस्तान की सिंध-विरोधी केंद्रीय सरकार को सहयोग किया जाता रहा है। सिंध प्रांत में पाकिस्तानी सरकार द्वारा विशेष ध्यान भी नहीं दिया जा रहा है। अभी कुछ दिनों पहले १३ फरवरी को ही सिंधी हिंदू लड़की रिंकल कुमारी का अपहरण कर मुहाजिरों द्वारा जबरन निकाह एवं धर्मांतरण कराया गया, जिसके विरोध में सिंध के हिंदुओं से ज्यादा जिये सिंध कौमी मूवमेंट के नेतृत्व में आंदोलन इत्यादि किए गए।
जागे भारत सरकार
     सारांश यह है कि पाकिस्तान में सिंध प्रांत की स्थिति बड़ी ही खराब एवं दयनीय है। सिंध प्रांत आजादी के समय जैसा था, आज उससे भी अधिक दयनीय एवं पिछड़ा हुआ है। सिर्फ मुहाजिरों की कालोनियों एवं शहरों में ही विकास हुआ है। सिंध का मुसलमान गांव, कस्बे, नगर एवं बस्तियों में अब भी भारी पिछड़ी एवं बेहद खराब स्थिति में है। पाकिस्तान की केंद्र सरकार भी इनको पिछड़ा ही रखना चाहती है। पाकिस्तानी सरकार मुहाजिरों को पूरा समर्थन दे रही है एवं सिंध के मुसलमानों एवं हिंदुओं के साथ सौतेला व्यवहार किया जा रहा है, जिसके चलते सिंधी मुसलमानों में सरकार के प्रति भारी आक्रोश है।
     वैसे भी सिंध की सीमाएं जैसलमेर, बाड़मेर, जोधपुर एवं बीकानेर से लगी हुई हैं। जरूरत इस बात की है कि भारत सरकार बारूद के ढेर पर बैठे हुए पाकिस्तान के सिंध प्रांत एवं वहां की जनता के प्रति मानवता का दृष्टिकोण रखते हुए ‘जिये सिंध आंदोलन’ को पूर्ण समर्थन दें।
     भारत में रहने वाले हिंदू समाज को भी सिंध में छटपटाने वाले सिंधी भाइयों का नैतिक एवं आर्थिक सहयोग करना चाहिए ताकि भारत के राष्ट्रगान में सम्मिलित ‘सिंध’ शब्द की व्यावहारिकता सिद्ध हो सके। जय सिंध, जय भारत, जय हिंदुस्तान।

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