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*****अमोल पेडणेकर*******

 एडिसन की फोनोग्राम की खोज से सामाजिक क्रांति हो गई। आज संगीत के क्षेत्र में जो विविध कारोबार दिखाई देता है, उनकी जडें एडिसन के ग्रामोफोन के आविष्कार में हैं। उनके इस आविष्कार से सारी दुनिया में मानो सांस्कृतिक सुनामी आ गई। इसके बाद तो कैसेट, सीडी, एमपी – थ्री से इंटरनेट तक संगीत एक से एक पायदान चढ़ता रहा।

मा नव ने उत्क्रांति की प्रक्रिया दौरान संगीत को जन्म दिया। प्रथम प्रकृति से मिला संगीत बाद में दैनंदिन जीवन में आ गया। मन को छूने वाला संगीत धीरे -धीरे मनुष्य के जीवन का एक अटूट अंग बन गया। फिर भी संगीत को बाजार में क्रय -विक्रय की वस्तु बनने के लिए काफी वक्त लगा।

मानव जाति से जुड़ी प्राचीन संस्कृति के एक अंग के रूप में मनुष्य ने संगीत को काफी सहेजा और संवारा। संगीत का मनुष्य के मन से सीधा संबंध होने से वह जीवनशैली का अंग बन गया। जीवन के हर पड़ाव पर संगीत का साथ रहा। भारत ने हजारों बरसों में विभिन्न प्रकार के राजनीतिक एवं सांस्कृतिक आक्रमणों के बावजूद संगीत की रक्षा को प्राथमिकता दी है।

प्रकृति से मिला संगीत मनुष्य के जीवन में जन्म से लेकर मृत्यु तक के सभी उत्सवों -समारोहों के साथ जुड़ गया। वह ‘लोकसंगीत ’ बन गया। आगे चलकर उसे आभिजात्य स्वरूप प्राप्त हुआ। तब संगीत को राजाश्रय मिला। वह राजसभाओं में सुप्रतिष्ठित होे गया। वहां संगीत कलाकार को जीवनयापन हेतु आर्थिक सहायता उपलब्ध थी और कला की प्रगति के लिए प्रयास करने की अनुमति भी थी। धनाढ्य संगीत शौकिनों के दीवानखानों में मशहूर कलाकारों के निजी जलसें, महफिलें सजा करती थीं। कई ेरियासतों के राजाओं ने नामी -गिरामी संगीत कलाकारों को आश्रय दिया था। अच्छे कलाकार दरबार में होना, उस जमाने में प्रतिष्ठा का विषय था। यह परम्परा मुगल सल्तनत से अभी हाल तक जारी थी। संगीत को बाजार की वस्तु की प्राथमिक अथवा सुप्त अवस्था के रूप में इसे देखा जा सकता है।

फिलहाल संगीत क्षेत्र में व्यापक पैमाने पर बाजार का विस्तार दिखाई देता है। उसके मूल में एडिसन की फोनोग्राम की खोज है। इस आविष्कार से सामाजिक क्रांति हो गई। आज संगीत के क्षेत्र में जो विविध कारोबार दिखाई देता है, उनकी जडें एडिसन के ग्रामोफोन के आविष्कार में हैं। उनके इस आविष्कार से सारी दुनिया में मानो सांस्कृतिक सुनामी आ गई। फोनोग्राम ने आदमी की आवाज का संचय करना और उसे फिर से सुनना संभव बनाया। वे इस तरह का यंत्र अगर ईजाद न करते, तो आज दुनिया में हो रहा हजारों करोड़ रुपयों का व्यापार शायद नहीं होता। आवाज का संचय करने की बात हालांकि मनुष्य के दैनंदिन जीवन का हिस्सा नहीं है, परंतु वह संगीत का अनिवार्य अंग बन गई। इससे सृजन को जहां प्रोत्साहन मिला, वहीं संगीत को कारोबार की वस्तु के रूप में देखने की दृष्टि विकसित हुई।

सन १९२१ में संगीतकार एडवर्ड एल्गर ने इंग्लैंड में ‘हिज मास्टर्स वॉयस ’ (एचएमवी ) नाम से ध्वनिमुद्रिकाएं (रेकॉर्ड ) बनाकर बेचने वाली कंपनी की स्थापना की। देखते -देखते ‘एचएमवी ’ सारी दुनिया के संगीत शौकिनों के गले का हार बन गई। बेहतर संगीत के प्रति रुचि निर्माण होना और उस रुचि का व्यवसाय में परिवर्तन होना ये दोनों बातें एकसाथ हो सकती हैं इसे एचएमवी ने साबित कर दिखाया। एचएमवी का ग्रामोफोन के सामने बैठकर गीत सुन रहा कुत्ता संगीत क्षेत्रका लोकप्रिय प्रतीक चिह्न बन गया। सारी दुनिया की संगीत मंडी पर एचएमवी का साम्राज्य स्थापित हुआ। भारतीय संगीत के क्षेत्र में एचएमवी का नाम बडे गौरव से लिया जाता था। उसका भी अब इतिहास बनते दो दशक बीत चुके हैं।

फोनोग्राम अथवा ग्रामोफोन जैसे आवाज का संचय करने की प्रौद्योगिकी से संगीत बहुश्रुत हुआ, सर्वदूर फैला। संगीत घरानों की दीवारें ढहने लगीं और फिर हर संगीत घराने ने अपनी शैली बनाए रखने के लिए नए -नए प्रयोग शुरू किए। इन सभी घरानों में आपस में शुरू हुई कलात्मक जंग संगीत के लिए उपयोगी ही रही। दरबारी संगीत, महफिलों का संगीत व्यावसायिक होने लगा। इससे संगीत में बाजार की संस्कृति पनपने लगीे। ध्वनिमुद्रण की प्रौद्योगिकी से संगीत के लिए एक नई चुनौती उपस्थित हुई। बीसवीं सदी के आरंभ में ही भारत में आ पहुंची इस प्रौद्योगिकी को संगीत विश् व के उस जमाने के कलाकारों ने आत्मसात करने के प्रयास किए और उसमें सफलता भी पाई। ध्वनिमुद्रिकाओं से संगीत के स्तर में कोई गिरावट नहीं आई, बल्कि नई प्रौद्योगिकी से संगीत का अर्थशास्त्र ही बदल गया। संगीत विश् व में क्रांति हुई। जनसाधारण अपनी पसंद का संगीत चाहे जब सुन सका। लोग इस माध्यम पर फिदा हो गए। ग्रामोफोन कंपनियों ने व्यावसायिक दृष्टिकोण रखते हुए उस जमाने के कई विख्यात कलाकारों के गायन -वादन की ध्वनिमुद्रिकाएं बनाईं। आकाशवाणी पर उनका प्रसारण होने लगा।

फिर भी ध्वनिमुद्रिका में अंकित संगीत की फौरन कॉपी करना संभव नहीं था। संगीत को एक जगह से दूसरी जगह ले जाना केवल ध्वनिमुद्रिका से ही संभव था। इस स्थिति को बाद में कैसेट प्रौद्योगिकी ने बदल दिया और संगीत के बाजार में वाकई कुछ प्रभाव दिखाई देने लगे। कम खर्चेमें कैसेट पर गीत सुनना और उन्हें एक जगह से दूसरी जगह ले जाना सहज, सरल होने से संगीत प्रेमियों ने उसे स्वीकार कर लिया। कैसेट की नई प्रौद्योगिकी को बल देनेवाली, चलते -फिरते संगीत का आनंद दिलानेवाली ‘कैसेट प्लेअर ’ की तकनीक विकसित हुई। बाजार में आई इस नई तकनीक के जरिए संगीत के प्रसार में और आसानी हुई। हर आयु वर्ग के किसी भी व्यक्ति के लिए अपनी पसंद के संगीत का आनंद लेना संभव हुआ।

संगीत की मंडी हमेशा आभासी रही है। फलस्वरूप इस क्षेत्र में व्यापार के तौर -तरीके लगातार बदलते रहेे हैं। बदलती आधुनिक प्रौद्योगिकी का संगीत के व्यापार से सीधा संबंध रहा है, इसका हमें बहुत देर से अंदाजा हुआ। इंटरनेट के कारण संगीत की उपलब्धता और ही बढ़ गई है। वैश् विक स्तर का तथा सर्वत्र निर्माण हो रहा संगीत इंटरनेट से बड़ी आसानी से उपलब्ध होने लगा। स्टीव जॉब के जीवन में संगीत का क्या स्थान था इसकी अपेक्षा उसकी प्रौद्योगिकी ने विश् व संगीत को क्या दिया इस पर अधिक गौर किया जाना चाहिए। उसकी ‘आयट्यून्स ’ की संकल्पना ने दुनियाभर के संगीत को नए आयाम दिए। संगीत की मंडी को नए रूप में पेश करनेवाली इस संकल्पना को सारी दुनिया में स्वीकार किया गया। संगीत की बिक्री करनेवाली ‘आयट्यून्स ’ नामक यह नई प्रणाली कुछ वर्ष पहले भारत आते ही भारतीय संगीत शौकिनों में मानो उल्लास की लहर आ गई। फिर भी कैसेट, सीडी, एमपी -थ्री तथा पायरसी के कारण भारतीय संगीत विश् व के समक्ष अस्तित्व का संकट और अधिक गहरा हुआ है। जब कैसेटस् का जमाना था तब अर्थात सन १९८० से २००० के दौरान कैसेट बिक्री के आंकडों ने बहुत सारे आर्थिक कीर्तिमान स्थापित किए थे। एचएमवी, टी सीरिज, टीप्स, वीनस आदि कंपनियों के साथ और छोटी -छोटी कंपनियां भी जोरों पर थीं। आरंभ में कैसेटस् के विकल्प के रूप में सीडी बाजार में आई। वह थी केवल ऑडियो सीडी। उसे बाजार में आघात पहुंचाया एमपी -थ्री ने। एमपी -थ्री के कारण पहले के ८ -१० गीतों की अपेक्षा ५० से १०० या उससे भी ज्यादा गीत देना संभव हुआ। उससे कैसेट और सीडी की बिक्री पर बड़े पैमाने पर असर हुआ। अब तो ‘पायरसी ’ का बोलबाला है। नई तकनीकों के कारण संगीत की चोरी अर्थात ‘पायरसी ’ बहुत आसान हो गई है। न कोई रेकार्डिंग का खर्च करना होता है, न सरकार को कोई कर देना होता है। इसका संगीत क्षेत्र पर बडा बुरा असर हो रहा है। ध्वनिमुद्रण कर उसे बेचना कभी फायदेमंद कारोबार था, लेकिन ९० के दशक के पश् चात आई ‘पायरसी ’ ने सारे गणित बिगाड़ दिए। यहां तक कि एचएमवी जैसी प्रतिष्ठित पुरानी कंपनी को अपना बोरिया समेटना पड़ा।

संगीत उपलब्ध करानेवाले कैसेटस् और सीडी की एक से बढ़ कर एक दुकानें अब कालबाह्य हुई हैं। अपने प्यारे कलाकार, गायक का गीत पायरसी के माध्यम से अब सस्ते में मिलने से संगीत शौकीन खुश होे रहा था कि ‘आयट्यून्स ’ की संकल्पना आई। इंटरनेट के जरिए संगीत को आपके कंप्यूटर में उतारने की यह संकल्पना हैे। वह भारतीय बाजार में दाखिल हुई। यू ट्यूब जैसे सोशल नेटवर्किंग में संगीत मुफ्त उपलब्ध हो जाने से उसके बाजार में दाम बदल गए। लगातार आती नई प्रौद्योगिकी से सीडी, एम्पी -थ्री और आगे वीसीडी, डीवीडी बाजार में आ पहुंची। उसका अगला कदम था मोबाइल, आयपैड और इंटरनेट।

संगीत क्षेत्र के बाजार में लगातार होते नए – नए परिवर्तनों के कारण इस क्षेत्र में चुनौतियों एवं चैतन्यता का माहौल निरंतर रहा है। संगीत क्षेत्र में किसी एक का एकाधिकार नहीं रहा। सीडी से यू ट्यूब तक प्रवाही एवं सकारात्मक गतिशीलता को संगीत क्षेत्र अनुभव कर रहा है। पुराना विदा हो चुका है और नया बाजार विकसित हो रहा है। हर बदलाव के साथ संगीत सुनने की प्रवृत्ति विकसित हो रही है और संगीत के बाजार में विभिन्न संकल्पनाओं के जरिए उसका रूपांतरण हो रहा है।

कालानुसार परिवर्तित नई संकल्पनाओं की चुनौती स्वीकार करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं होता। जीवनभर संगीत का ही चिंतन -मनन करनेवाले सृजनशील कलाकार के मन में प्रति दिन नया संगीत प्रस्फुटित हो यही असली ताकद है। एक ही राग जीवनभर जस के तस गानेवाला कलाकार भारतीय संगीत में अव्वल दर्जेका नहीं माना जाता। संगीत के व्यवसाय पर भी यही नियम लागू होता होगा। नई -नई तकनीकों ने संगीत के क्षेत्र में लगातार चुनौतियां खडी कीं, यह सच है। फिर भी उससे संगीत के सर्वांगीण विकास में सहायता ही मिली है। संगीत -गीत को सर्वदूर पहुंचाने की क्षमता इसी प्रौद्योगिकी से संभव हुई और कलाकार के प्रत्यक्ष में उपस्थित न होते हुए भी उसके संगीत को दुनिया के किसी भी कोने में पहुंचाना संभव हुआ है।

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