राष्ट्रपति चुनाव की अनुगूंज

भारतीय गणतंत्र की यह खासियत है कि यहां के राष्ट्रपति निष्पक्ष होते रहे हैं। उन्होंने कभी भी कोई ऐसा कदम नहीं उठाया है जिससे पद की गरिमा का हनन हुआ हो। राष्ट्रपति बनते ही वे पार्टी की सीमा से आगे बढ़कर समूचे देश के सर्वमान्य हो जाते हैं।

राष्ट्रपति चुनाव की अधिसूचना जारी होने के बाद आखिरकार मंगलवार 21 जुलाई को सत्तापक्ष और विपक्ष ने अपने-अपने उम्मीदवार घोषित कर दिए है। एनडीए के केन्द्रीय नेतृत्व ने झारखण्ड की पूर्व राज्यपाल एवं ओड़िसा की पूर्व मंत्री द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति के लिए चुना है, तो वही विपक्ष ने पूर्व भाजपा नेता एवं पूर्व केन्द्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा को अपना उम्मीदवार बनाया है। इसके पूर्व एनडीए ने एपीजे अब्दुल कलाम, रामनाथ कोविंद और अब द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति के लिए चुनकर देश दुनिया में एक मिसाल पेश की है। राष्ट्रपति के लिए 18 जुलाई को मतदान होगा। आवश्यकता हुई तो 21 जुलाई को मतों की गिनती की जाएगी। यानी अधिकतम 21 जुलाई तक हमें पता चल जाएगा कि राष्ट्रपति के रूप में रामनाथ कोविंद के उत्तराधिकारी कौन होंगे। राष्ट्रपति देश के प्रथम नागरिक ही नहीं तीनों सेना के कमांडर भी हैं और देश के सारे विधायी आदेश उन्हीं के नाम से जारी होते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि हमारे संविधान निर्माताओं ने राष्ट्रपति को देश के अभिभावक के तौर पर देखा था। संविधान में राष्ट्रपति के अधिकार और कर्तव्य का विस्तार से विवरण है लेकिन उनको अभिभावक माना जाए ऐसा उल्लेख नहीं है। किंतु उनकी राष्ट्रपति की भूमिका और उनकी स्थिति देखते हुए यह आसानी से समझ में आता है। वस्तुतः राष्ट्रपति देश का ऐसा अभिभावक है जो केंद्र सरकार के कार्यों में अड़ंगा लगाने से बचेगा, जिससे असहमति होगी उस पर सुझाव देगा, किसी विधेयक को एक बार वापस कर देगा, प्रधानमंत्री सहित देश के किसी भी नेता से बुलाकर कभी भी बातचीत कर सकता है। सत्तापक्ष हो या विपक्ष, अनेक मुद्दों और समस्याओं को लेकर सभी राष्ट्रपति के पास जाते हैं। यहां तक कि विपक्ष भी कई मुद्दों पर राष्ट्रपति से ही अपेक्षा करता है कि वह हस्तक्षेप करें और सरकार को सही रास्ते पर लाएं। चूंकि हमारे देश में जनता द्वारा निर्वाचित लोकसभा की व्यवस्था है। उसका नेता जनता के निर्वाचित होते हैं, इसलिए उन्हें लोकतंत्र का सच्चा प्रतिनिधि माना जाता है। राष्ट्रपति के चुनाव में सांसदों और राज्य के विधायकों को वोट देने का अधिकार है। इस तरह वे सीधे जनता द्वारा निर्वाचित नहीं होते। बावजूद हम नहीं कह सकते कि जनता की भूमिका उनके निर्वाचन में नहीं है, क्योंकि सारे सांसद और विधायक जनता के वोट से ही चुनकर आते हैं। जो भी हो राष्ट्रपति के बारे में मूल कसौटी यही है कि उस पद पर ऐसे व्यक्तित्व को आरूढ़ होना चाहिए, जिसे अपने पद की गरिमा के साथ दायित्वों का आभास हो और जो कठिन और विपरीत परिस्थितियों में भी वही भूमिका निभाये, जो संविधान निर्माताओं ने उससे अपेक्षा की।

इस नाते राष्ट्रपति का चुनाव भी महत्वपूर्ण हो जाता है। सामान्यतया मान लिया गया है कि राष्ट्रपति तो केंद्र सरकार का रबड़ स्टाम्प है, क्योंकि उसके पास ऐसे कुछ संवैधानिक अधिकार नहीं जिससे वह सरकार को अपने अनुसार कदम उठाने का आदेश या दिशा निर्देश दे सके। इसके बावजूद  राष्ट्रपति पद पर बैठे हुए व्यक्ति की भूमिका पर बहुत कुछ निर्भर करता है। पीछे कई वर्षों में जब किसी पार्टी को बहुमत नहीं मिला तो सरकार गठन में राष्ट्रपति की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई। इसी तरह देश के सामने उत्पन्न विकट परिस्थिति, जिनमें किंकर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति हो, राष्ट्रपति अभिभावक के तौर पर सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। इसलिए राष्ट्रपति पद पर कोई भी निर्वाचित हो जाए क्या फर्क पड़ता है, इस मानसिकता से बाहर आने की जरूरत है। हां ,यह प्रश्न उठ सकता है कि क्या राजनीतिक दलों के नेता भी राष्ट्रपति चुनाव के दौरान अपना राजनीतिक समीकरण बनाते हुए इस मुख्य पहलू को फोकस में रखते हैं? इसका उत्तर देने की आवश्यकता नहीं। जब भी राष्ट्रपति चुनाव आता है सरकार और विपक्ष दोनों अपने पक्ष में राजनीतिक समीकरण बनाने का पूरा प्रयास करते हैं। हालांकि जब एक पार्टी का वर्चस्व था तो सत्तारूढ़ पार्टी द्वारा घोषित उम्मीदवार के विजित होने में कोई समस्या नहीं थी। भारत की समस्या यह है कि यहां विपक्ष मोदी विरोध में किसी सीमा तक जाने के लिए तैयार है किंतु अनेक मुद्दों पर इनके बीच आपसी सहमति नहीं। इसलिए विपक्ष की वर्तमान कवायदों को लेकर कोई बहुत बड़ा निष्कर्ष निकालने की आवश्यकता नहीं है। ममता बनर्जी द्वारा बुलाई गई बैठक में पांच ऐसे दल नहीं आए जिनके मतों की संख्या राष्ट्रपति निर्वाचन की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। बीजू जनता दल, तेलंगाना राष्ट्र समिति, आम आदमी पार्टी, वाईएसआर कांग्रेस, अकाली दल ने ममता  बनर्जी की बैठक में भाग न लेकर जता दिया कि राष्ट्रपति चुनाव पर उनकी सोच वही नहीं है। आंकड़ों के अनुसार देखें तो नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाला राजग बहुमत से केवल 13,000 वोट दूर है। क्या विपक्ष ऐसी स्थिति पैदा कर सकता है जिसमें भाजपा इतने मतों की व्यवस्था न कर सके?

हम जानते हैं कि ऐसा नहीं हो सकता। ममता बनर्जी, कांग्रेस या अन्य दल भाजपा के विरुद्ध मोर्चाबंदी करते हैं, किंतु इनके बीच आपस की भी ऐसी सहमति नहीं जिससे राष्ट्रपति चुनाव जैसे महत्वपूर्ण अवसर पर ये एक पक्ष में खड़े हो जाएं। एक पार्टी द्वारा बुलाई गई बैठक में कुछ पार्टियां नहीं आती तो उन पार्टियों द्वारा बुलाई गई बैठक में भी दूसरे पक्ष की कुछ पार्टियां नहीं आती। ममता बनर्जी की बैठक में शरद पवार नहीं आए और शरद पवार बैठक बुलाएं तो ममता बनर्जी नकार दें। वैसे भी आज तक ऐसा नहीं हुआ जब सत्तारूढ़ पार्टी या गठबंधन को राष्ट्रपति के चुनाव में झटका लगा हो। स्वयं भाजपा की अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ही 2002 में राष्ट्रपति निर्वाचन के समय वोटों के लिहाज से काफी पीछे थी। इसके बावजूद डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलाम को विजय मिली। कारण, कलाम का व्यक्तित्व ऐसा था कि उन्हें भाजपा विरोधी दलों का भी वोट मिला। कहने का तात्पर्य है कि राष्ट्रपति चुनाव में उम्मीदवार की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही है।

जैसा हम जानते हैं, राष्ट्रपति का निर्वाचन अप्रत्यक्ष मतदान द्वारा होता है। इसमें जनता की जगह जनता के चुने हुए प्रतिनिधि मतदान करते हैं। इसे एक निर्वाचन मंडल या इलेक्ट्रोल कॉलेज के रूप में जाना जाता है। इस चुनाव में अपनाई जाने वाली आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली की विधि के अनुसार प्रत्येक मत का अपना एक वेटेज या मूल्य होता है। सांसदों के मत का मूल्य निश्चित है किंतु विधायकों के मत का मूल्य अलग-अलग राज्यों की जनसंख्या पर निर्भर करता है। जैसे सबसे अधिक जनसंख्या वाले राज्य उत्तर प्रदेश के एक विधायक के वोट का मूल्य 208 है। दूसरी ओर सबसे कम जनसंख्या वाले सिक्किम के मत का मूल्य केवल सात है। एक सांसद के मत का वेटेज 708 है। कुल 776 सांसदों के वोट से इसे गुना कर दे दो या 5,49,408 बैठता है। इसी तरह विधायकों के सामूहिक वोट यानी 4120 के अनुसार यह 5,49,474 तक चला जाता है। राष्ट्रपति चुनाव में एकल हस्तांतरण समानुपातिक प्रणाली के अनुसार कुल मत 10 लाख 98 हजार 882 है। सांसदों और विधायकों को मिलाकर कुल 4809 वोट पड़ेंगे। इनमें राज्यसभा एवं लोकसभा को मिलाकर कुल 776 सांसद एवं सभी विधानसभाओं के कुल 4120  विधायक शामिल हैं। हालांकि 2017 और 2022 के राजनीतिक समीकरण में काफी बदलाव भी है। मसलन, भाजपा के साथ तब शिवसेना और अकाली दल थे। इस बार वे दोनों अलग हैं। तमिलनाडु में तब अन्नाद्रमुक सत्ता में थी आज वह बाहर है। राजस्थान, छत्तीसगढ़ की सत्ता में भी भाजपा नहीं है तथा मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश में भाजपा के विधायकों की संख्या कम हुई है। कुल मिलाकर 2017 में 21 राज्यों में राजग की सरकार थी और अब केवल 17 राज्यों में ही है। आज भाजपा और राजग के पास महाराष्ट्र, तमिलनाडु और झारखंड जैसे राज्य नहीं है।

विपक्ष एक शब्द अवश्य है किंतु इसका अर्थ यह नहीं कि इसमें शामिल सभी दल एक छाते के नीचे खड़े हैं। सबकी अपनी स्थानीय राजनीतिक आवश्यकता तथा संवैधानिक मूल्यों और राष्ट्रपति पद की गरिमा को लेकर अपने विचार हो सकते हैं। एक ओर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन अनुशासित एवं एकजुट है तो दूसरी ओर बिखरा हुआ विपक्ष, जो 2024 के पूर्व की राजनीति को अपने अनुसार करवाने के लिए यहां सक्रिय है। आंध्र के मुख्यमंत्री जगनमोहन रेड्डी तथा उड़ीसा के नवीन पटनायक प्रायः राष्ट्रीय क्षितिज पर विपक्ष की राजनीतिक भूमिका निभाते नहीं दिखते। बीजद के पास 30,000 से ज्यादा मत हैं। वाईएसआर कांग्रेस के पास 40,000 से ज्यादा। 2012 के चुनाव में उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक की सलाह पर ही राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने पी ए संगमा को राष्ट्रपति का उम्मीदवार बनाया था। इन दोनों पार्टियों के मत पिछली बार रामनाथ कोविंद के ही पक्ष में गए थे। इस बार भी इनके राजग उम्मीदवार के पक्ष में ही मतदान देने की संभावनाएं हैं। इस कारण नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा घोषित राष्ट्रपति उम्मीदवार की विजय सुनिश्चित हो जाती है।

इसलिए राष्ट्रपति चुनाव का परिणाम किसके पक्ष में जाएगा इसे लेकर किसी तरह के संशय या अनिश्चय की अवस्था में रहने की जरूरत नहीं। किंतु विपक्ष के लिए अपनी राजनीति के लिए स्वयं को राजनीतिक रूप से सत्तारूढ़ गठबंधन से अलग दिखाना अनिवार्य लगता है इसलिए उसकी कवायद चल रही है। मूल बात यह है कि क्या सत्तारूढ़ भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन के मत से निर्वाचित राष्ट्रपति की भूमिका विपक्ष के लिए अलग हो जाएगी? या विपक्ष द्वारा राष्ट्रपति निर्वाचित हो जाए तो उसकी भूमिका सरकार के प्रतिकूल हो जाएगी? आजाद भारत के इतिहास में अभी तक मोटा-मोटी सभी राष्ट्रपतियों की भूमिका राजनीतिक रूप से निरपेक्ष और निष्पक्ष मानी गई है।

1996 में किसी दल को बहुमत नहीं मिला, लेकिन भाजपा को 161 सीटें प्राप्त हो गई जो सबसे ज्यादा थी। तब डॉ.शंकर दयाल शर्मा राष्ट्रपति थे जो इस पद पर आने के पहले कांग्रेस के नेता थे लेकिन उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी को सरकार बनाने का निमंत्रण दिया। यह अलग बात है कि वह सरकार 13 दिनों में ही गिर गई,

क्योंकि कम्युनिस्ट पार्टियों की गोलबंदी से संयुक्त मोर्चा का गठन हो गया जिसे कांग्रेस ने बाहर से समर्थन दे दिया। डॉ शंकर दयाल शर्मा ने कांग्रेस को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित नहीं किया था। भारत में संसदीय लोकतांत्रिक प्रणाली इसीलिए अन्य अनेक देशों से बेहतर मानी जाती है कि यहां राष्ट्रपति पद पर बैठा कोई व्यक्ति भले उसकी राजनीतिक पृष्ठभूमि कुछ भी रही हो, दल निरपेक्ष होकर ही भूमिका निभाता है। हमने पड़ोसी नेपाल में देखा कि वहां की राष्ट्रपति विद्या भंडारी ने किस तरह संविधान की अनदेखी करते हुए पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के पक्ष में फैसले किए। रामनाथ कोविंद भाजपा के सदस्य थे। उनका चुनाव भी भाजपा, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन और इनका साथ देने वाले कुछ अन्य दलों के मतों से ही हुआ। बावजूद कोई यह नहीं कह सकता कि उन्होंने मोदी सरकार या अन्य भाजपा सरकारों के लिए किसी अवसर पर पक्षपातपूर्ण भूमिका निभाई। इसलिए भारत में यह भय किसी को नहीं होना चाहिए कि राष्ट्रपति पद पर बैठने वाला व्यक्ति भले उसका किसी दल या नेता से कितना भी मतभेद हो संवैधानिक मर्यादा व गरिमा का अतिक्रमण कर विरोधी या पक्षपात पूर्ण भूमिका निभाएगा। इसलिए इस बारे में निश्चिंत हो जाना चाहिए। इस दृष्टि से देखें तो राजनीतिक दलों को अवश्य एक बार विचार करना चाहिए कि क्या राष्ट्रपति चुनाव को लेकर भी राजनीतिक मोर्चाबंदी और ऐसी कवायद आवश्यक है?

 

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