धार्मिक मान्यताओं को ठेस पहुँचाई जानी चाहिए?

क्या यह मध्य युग की वापसी है जब धार्मिक विचारों को लेकर बड़े-बड़े हत्याकांड हो रहे थे? या उस खुली बहस का प्रस्थान-बिंदु है, जो कभी न कभी तो होगी। ‘शार्ली एब्दो’ पर हुए हमले के बाद आतंकवाद की निंदा करने के अलावा कुछ लोगों ने यह सवाल भी उठाया था कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमा क्या हो? क्या किसी की धार्मिक मान्यताओं को ठेस पहुँचाई जानी चाहिए? फ्री स्पीच के मायने क्या कुछ भी बोलने की स्वतंत्रता है?

प्रति-प्रश्न है कि यदि अभिव्यक्ति एबसल्यूट नहीं है, तो क्या आस्था असीमित है? धर्म-विरोधी विचारों को भी व्यक्त किए जाने का हक क्यों नहीं है? पेरिस की कार्टून पत्रिका केवल इस्लाम पर ही व्यंग्य नहीं करती, उसके निशाने पर सभी धर्म हैं। पर इससे बदमज़गी बढ़ी। इसका असर सामाजिक जीवन पर पड़ रहा था। 2011 में नॉर्वे के 32 वर्षीय नौजवान एंडर्स बेहरिंग ब्रीविक ने एक सैरगाह में गोलियां चलाकर 80 लोगों की जान ले ली। मार्च 2019 में न्यूजीलैंड के क्राइस्टचर्च में एक हत्यारे ने दो मस्जिदों पर हमला करके 50 से ज्यादा लोगों की हत्या कर दी।

ऐसी घटनाओं की प्रतिक्रिया होती है। मीडिया प्रकाश की गति से भागता है। इन बातों का विद्युत-प्रभाव होता है। इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में इस प्रश्न पर हम मध्ययुगीन दृष्टि से विचार नहीं कर सकते। आने वाले वर्षों में यह सवाल और शिद्दत से उठने वाला है कि धार्मिक स्वतंत्रता के बरक्स क्या धर्म-विरोधी विचारों को भी व्यक्त करने की स्वतंत्रता नहीं होनी चाहिए? सिद्धांततः धार्मिक विचार की स्वतंत्रता में अपने विचार के प्रचार की स्वतंत्रता के साथ दूसरे के विचार के विरोध की स्वतंत्रता भी इसमें शामिल है। इसकी मर्यादा कहाँ और किस तरह निर्धारित होगी इसपर विचार किया जाना चाहिए।

ईशनिंदा को लेकर दुनिया के देशों में अलग-अलग नियम हैं। भारत में वह अपराध है, पर सजा सीमित है। पाकिस्तान में मौत की सजा है। फ्रांस के कानून व्यक्तिगत रूप से लोगों को ‘हेट स्पीच’ के विरुद्ध संरक्षण देते हैं, पर वहाँ ईशनिंदा अपराध नहीं है। फ्रांस ने 1791 में इसे अपराध के दायरे से बाहर कर दिया था। यूरोप का मानवाधिकार न्यायालय भी जिन मामलों पर सजा देता है, उन्हें भी फ्रांस में सजा नहीं दी जा सकती।

फ्रांस की अदालत ने ‘शार्ली एब्दो’ को दोषी नहीं माना। वहाँ धर्म की आलोचना की जा सकती है, पर किसी व्यक्ति या समुदाय के प्रति नफरत फैलाने का अधिकार नहीं है। यानी कि वहाँ यह कहा जा सकता है कि ईसाइयत खराब है, पर यह नहीं कि ईसाई लोग खराब होते हैं।

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