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मानव जाति पर फिलहाल अनेक संकटों का मानो पहाड़ ही टूट पड़ा है। मानव जाति की बढ़ती जनसंख्या तो एक बहुत बड़ा संकट है। फलस्वरूप प्रकृति का संतुलन बिगड़ रहा है। पिछले दो शतकों में जो औद्योगिकरण हुआ उसमें कोयला एवं खनिज तेल जैसे ईंधनों का अंधाधुंध इस्तेमाल किया गया। उसके ज्वलन से हवा में कार्बन डायआक्साइड़ की मात्रा बहुत बड़े पैमाने पर बढ़ गई है और पृथ्वी का तापमान बढ़ा है। नतीजा यह है कि कहीं बेमौसमी वर्षा, तो कहीं अकाल, तो कहीं विनाशकारी बाढ़ आ रही है। पेयजल पाना दुर्लभ एवं दुर्गम होता जा रहा है। इस तरह के संकटों के बादल पृथ्वी के सभी प्राणियों के सिर पर मंडरा रहे हैं। इस तरह की वैश्विक समस्याओं पर अंकुश रखने के निश्चित लक्ष्य क्या हो? तापमान का निश्चित स्तर क्या हो? तापमान के स्तर को नियंत्रित रखने के लिए जो प्रयास किए जाने वाले हैं उनकी कौनसी समय-सीमा हो? इन विषयों पर पेरिस में हुए सम्मेलन ने विश्वभर के १९५ देशों की सहमति से चर्चाएं हुईं। वर्ष २०१५ की सब से बड़ी विशेषता यह रही कि पर्यावरण का मुद्दा वैश्विक स्तर पर सभी देशों की दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा है। इसके पूर्व ‘वैश्विक तापमान’ पर विकसित एवं विकासशील देशों में विवाद छिड़ते थे, जो इस बार महसूस नहीं हुए।
मनुष्य की जीवनशैली में बहुत तेजी से परिवर्तन हो रहा है। अपने दैनंदिन व्यवहार दिन-ब-दिन अधिकाधिक ऊर्जा की मांग कर रहे हैं। जीवन में लगातार होने वाला विकास सुनहरे सपनें दिखा रहा है। भारत जैसा विकासशील देश अपने जीवन स्तर में विकसित राष्ट्रों की तरह परिवर्तन कर रहा है। अतः भारत ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण विश्व में ऊर्जा की मांग निरंतर बढ़ रही है। ‘कथित विकास’ की इस घुड़दौड़ में प्रकृति की ओर अनदेखा किया जा रहा है। प्रकृति में ईंधन का भंडार सीमित है। बढ़ती मांग के साथ इसमें वृद्धि नहीं, अपितु कमी ही आएगी।
परंतु सौभाग्य से मनुष्य के अंतरंग में स्वयं को एवं अपने स्नेहीजनों को बचाने की प्रबल इच्छा मौजूद होती है। मनुष्य के पास दूरदृष्टि रखने वाला दिमाग है। उस दिमाग में वैज्ञानिक विचार हैं। उसके हाथ में आज अद्भुत प्रोद्यौगिकी है। इससे मानव जाति पर आने वाला ईंधन संकट वह टाल सकेगा, यह उम्मीद भी है। आरंभ में अपनी शारीरिक ऊर्जा का इस्तेमाल करने वाला यह आम जीव अन्य जीवों की तरह वहीं नहीं रुका, परंतु लगातार ऊर्जा की खोज में रहा है। खेती के लिए बैलों की ऊर्जा, यातायात के लिए घोड़ों की, खच्चरों की, ऊंटों की ऊर्जा, डाक के लिए कबूतरों की ऊर्जा का उपयोग करना मानव ने सीखा। लेकिन बाद में पहिए की, वाष्प की खोज की तथा नए किस्म की ऊर्जा का इस्तेमाल कर उन पर चलने वाले यंत्रों को मानव ने आत्मसात किया। बाद में यातायात से लेकर उत्पादन, खेती, सेवा क्षेत्र में इस ऊर्जा का मानव ने उपयोग किया। मानव की ऊर्जा की भूख लगातार बढ़ती रही।
किसी भी देश में प्रति व्यक्ति ऊर्जा के उपयोग का उस देश के जीवन पर किस तरह प्रभाव है इसकी पहचान की जा सकती है। इस दृष्टि से देखें तो विश्व के देशों में भारत का स्थान बहुत पीछे है। ऊर्जा किसी भी देश के विकास का पैमाना है। देश की लगातार बढ़ती जनसंख्या और विकास को गति देने के लिए ऊर्जा की मांग बढ़ रही है। जल, पवन एवं कोयला ऊर्जा के प्राकृतिक स्रोत हैं। लेकिन इन संसाधनों की भी एक सीमा है। हमारी मांग उत्पादन के मुकाबले बहुत अधिक है। प्राकृतिक साधनों की सीमाएं होने के कारण पर्यावरण सुरक्षा की दृष्टि से आवश्यकता के अनुसार बिजली का उत्पादन करना संभव नहीं हो पा रहा है। ऊर्जा की कमी के कारण विकास का पहिया पूर्ण गति से नहीं घूम रहा है। इस स्थिति में सूरज की अपारंपारिक ऊर्जा की ओर हमें मुड़ना होगा।
भारतीय उपासना में नदियों, पर्वतों, वृक्षों के साथ सूर्य, चंद्र, वरुण की उपासना करने की हमारी महान परंपरा है। यह चराचर विश्व की ऊर्जा का स्रोत है। इसके कारण ही इस सृष्टि का अस्तित्व बना हुआ है। भारतीय संस्कृति में सूर्योपासना हजारों वर्षों से जारी है। इसके पीछे विज्ञान है। सूर्य अक्षय ऊर्जा का स्रोत है। भारत में सूरज की किरणें बारहों मास उपलब्ध हैं। भारत प्रति वर्ष लगभग तीन हजार घंटे सूर्य की प्रखरता प्राप्त करता है। यह पांच हजार ट्रिलियन ऊर्जा जितना है।
पर्यावरण की समस्या मुंह बाये खड़ी है और ऊर्जा का भी कोई विकल्प नहीं है। इस स्थिति में दुनिया में सब का ध्यान ऊर्जा के अपारंपरिक एवं अक्षय ऊर्जा स्रोतों की ओर गया है। पंचमहाभूतों में सूरज एवं पवन का उपयोग कर ऊर्जा उत्पादन करने की प्रक्रिया पर पिछले कुछ दशकों से लगातार अनुसंधान हो रहा है और भारत को भी इस स्रोत की ओर ध्यान देने की आवश्यकता है। सन २०२२ तक देश के प्रत्येक घर में २४ घंटे बिजली आपूर्ति करना अर्थात ‘ऊर्जावान भारत’ करने का संकल्प भारत के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने किया है। भारत की अर्थव्यवस्था शक्तिशाली बनानी हो तो उसकी सहायक ऊर्जा का उत्पादन महत्वपूर्ण होगा। देश को अभी ऊर्जा के मामले में बहुत रास्ता तय करना है, यह वास्तविकता है। जिस देश में ऊर्जा व उसकी मात्रा अधिक उस देश की अर्थव्यवस्था समर्थ होती है।
पर्यावरण के लाभों के साथ ही इस अक्षय ऊर्जा के अन्य अनेक लाभ हैं। भारत में अक्षय ऊर्जा के स्रोत की उपलब्धता देखते हुए सौर एवं पवन आधारित मध्यम आकार की बिजली परियोजनाएं देश के ग्रामीण एवं शहरी इलाकों में स्थापित की जा सकेंगी। एक बार भारत के ग्रामीण इलाकों में पर्याप्त मात्रा में बिजली परियोजनाएं स्थापित हो जाएं तो वहां उद्योगों की मात्रा बढ़ेगी। उत्पादन केंद्र बढेंगे। इससे ग्रामीण इलाकों में विकास का पहिया घूमने में मदद मिलेगी और ‘ऊर्जावान भारत’ की मोदी की कल्पना प्रत्यक्ष साकार होगी। भारत का ऊर्जा उत्पादन, विशेष रूप से अक्षय ऊर्जा स्रोतों से बढ़ाया गया तो भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास में आधारभूत सहायता प्राप्त होगी, इसमें कोई संदेह नहीं है। हम सब का इस ऊर्जा विकास में सहयोग करना ‘ऊर्जावान भारत’ के निर्माण में सहायता करना ही साबित होगा।

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