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मोदी सरकार के चार साल के शासन में आंतरिक सुरक्षा की स्थिति में जबरदस्त सुधार हुआ है। हिंसा में कमी आई है, माओवादियों से पीड़ित जिलों की संख्या आधी रह गई है। पूर्वोत्तर में शांति है। केवल कश्मीर घाटी का बहुत छोटा-सा इलाका अशांत है। वहां भी सख्ती से निपटा जा रहा है, जिसके परिणाम भविष्य में दिखाई देंगे।

आंतरिक सुरक्षा पर बजट की राशि, जो 2014-15 में 56 हजार 312 करोड़ थी, 2018-19 में बढ़कर 1,07,503 करोड़ हो गई है। इसके कारण पुलिस एवं अर्धसैनिक बलों के आधुनिकीकरण करने हेतु पैसे की उपलब्धता में इजाफा हुआ है। इसका परिणाम आंतरिक सुरक्षा की गुणवत्ता पर निश्चित रूप से पड़ा है।

हिंसा में कमी

मोदी सरकार ने अपने चार वर्ष पूर्ण कर लिए हैं। इसलिए अब यह आवश्यक है कि देश को सुरक्षित रखने में उसका योगदान किस प्रकार का है, इसका समुचित विश्लेषण किया जाए। हम इसे दो भागों में बांट सकते हैं। पहली देश की आंतरिक सुरक्षा एवं दूसरी देश की बाह्य सुरक्षा। इसके पूर्व अनेक वर्षों तक आंतरिक्ष सुरक्षा में बड़े पैमाने पर हिंसाचार होता था और प्रत्येक वर्ष ढाई हजार भारतीय मारे जाते थे। इसके अलावा गंभीर रूप से घायलों की संख्या मारे गए लोगों की चार गुना होती थी।

इससे देश की प्रगति में बाधा उत्पन्न होती थी। आंतकवादी घटनाओं के कारण देश को बहुत नुकसान सहन करना पड़ता था। हजारों करोड़ की संपत्ति प्रति वर्ष बर्बाद होती थी। इसके अतिरिक्त देशद्रोही तत्व प्रति वर्ष सैकड़ों करोड़ रुपये जबरन जनता से वसूल करते थे। इतना ही नहीं, ये तत्व उस क्षेत्र में कोई भी विकास का कार्य नहीं होने देते थे। इससे देश की प्रगति धीमी पड़ गई थी। परंतु गत चार वर्षों में हिंसा कम हुई है एवं विकास ने भी रफ्तार पकड़ी है। सड़कें, रेल्वे लाइन एवं नए उद्योगों के साथ-साथ सामान्य जनता के लिए स्कूल, टी.वी. टॉवर्स का निर्माण एवं अन्य कार्यों को भी गति मिली है। विकास की द़ृष्टि से यह अच्छा ही है।

माओवाद से पीड़ित जिलों में पचास प्रतिशत कमी

यदि हम आंतरिक सुरक्षा के बड़ी चुनौती पर नजर डालें तो  पाते हैं कि सबसे ज्यादा विकास माओवाद से पीड़ित क्षेत्रों में हुआ है। इससे माओवादी हिंसाचार में सत्तर प्रतिशत तक हुई कमी है। माओवाद से पीड़ित क्षेत्र व जिलों की संख्या में 50% की कमी हुई है। अनेक माओवादियों ने आत्मसमर्पण कर दिया है। इतना ही नहीं, उनमें शामिल होनेवाले आदिवासियों की संख्या में भी कमी आई है। जिसके कारण माओवादियों को सशस्त्र जवानों की कमी पड़ रही है। यह बहुत अच्छी बात है।

पूर्वोत्तर भारत शांति की ओर

ऐसा लग रहा है कि पूर्वोत्तर भारत की प्रगति भी अब तेजी से हो रही है। इस भाग में होने वाले विद्रोह में बहुत कमी आई है चाहे वह फिर नागाओं द्वारा हों, मणिपुरी लोगों द्वारा हों, या असम में उल्फा के लोगों द्वारा हों। विद्रोह के कारण होनेवाली हिंसा में कमी होने के कारण इस क्षेत्र में शांति की प्रस्थापना हुई है, पर्यटन में बढ़ोत्तरी हुई है एवं आर्थिक मोर्चे पर गति बढ़ी है। यही नहीं, पूर्वोत्तर में संबंध सुधारने की सरकारी नीति के कारण पूर्वोत्तर भारत का पड़ोसी देशों से संम्बध बढ़ रहा है। इसके कारण युवकों को बड़े पैमाने पर रोजगार मिल रहा है। आशा की जा सकती है कि देश का सबसे पुराना विद्रोह अर्थात नागा विद्रोह अब समाप्त हो जाएगा। पूर्वोत्तर का सबसे हिंसाग्रस्त राज्य मणिपुर है। वहां अब सरकार खेलों को बढ़ावा दे रही है। जिससे युवकों को खेल के क्षेत्र में प्रगति करने का अवसर मिल रहे हैं। इसके कारण पूरे पूर्वोत्तर में शांति होने की संभावना काफी बढ़ रही है।

हिंसाचार केवल कश्मीर घाटी में

यदि हम जम्मू-कश्मीर की ओर देखें तो नजर आता है कि लद्दाख तथा जम्मू-उधमपुर के भाग में पूरी शांति है। यहां शांति को भंग करने के लिए पाकिस्तान एल.ओ.सी. एवं अंतराष्ट्रीय सीमा पर भारी गोलाबारी करता है। कश्मीर घाटी में आतंकवादियों को मारने में भारतीय सुरक्षा बलों को बड़ी सफलता मिली है। सन 2017 में 250 से ज्यादा आतंकवादी मारे गए। परंतु अभी भी कुछ युवक आतंकवादियों के दुष्प्रचार में आकर आतंकवाद की ओर अग्रसर होते हैं। इसके कारण पत्थर फेंकने एवं हिंसा की घटनाओं में वृद्धि हुई है।

यहां आवश्यकता इस बात की है कि इन बहके हुए युवकों को भारत की मुख्यधारा में शामिल किया जाए जिससे वे भी अपना सामान्य जीवन व्यतीत करते हुए देश की प्रगति में शामिल हों। हम आशा करें कि कश्मीर घाटी के वरिष्ठ जन, वहां की संस्थाएं, मौलवी, राजनीतिक दल ऐसे युवकों से मिलकर उन्हें हिंसा के रास्ते से बाहर लाएं एवं आतंक वादी घटनाओं में शामिल होने से रोकें। यही समय है जब घाटी में पर्यटन बढ़ सकता है। जिसके कारण युवकों को रोजगार मिलेगा। कश्मीर घाटी में अच्छा शासन युवकों हेतु रोजगार सृजन के कार्यक्रम चला सकता है। इसके कारण आंतकवाद में निश्चित कमी आएगी।

वर्तमान भारत की जनसंख्या 125 करोड़ है। इसमें कश्मीर की दो करोड़ है। अर्थात भारत की जनसंख्या की तुलना में कश्मीर की जनसंख्या दो प्रतिशत से भी कम है। हिंसाचार केवल कश्मीर घाटी में होता है जहां केवल तीस लाख के आसपास लोग रहते हैं। इसमें से भी कुछ ही युवा हिंसक गतिविधियों में भाग लेते हैं। यह कहा जाता है कि देश की जनसंख्या का नगण्य प्रतिशत ही इन घटनाओं में भाग लेता है। परंतु मीडिया द्वारा इसे भरपूर महत्व दिया जाता है। इसके कारण देश के अन्य भाग में रहने वाले समझते हैं कि शायद कल ही कश्मीर भारत से अलग हो जाएगा। इसीलिए इसे अकारण महत्व नहीं दिया जाना चाहिए। हिंसा की घटनाओं को समाचार पत्रों द्वारा कम महत्व दिया जाना चाहिए। कई अच्छी घटनाएं भी कश्मीर में हो रही हैं। जैसे शोपिया में बनाई जा रही सुरंग जो श्रीनगर और कारगिल के बीच का अंतर काफी कम करेगी। इसके कारण पर्यटन बढ़ेगा। झेलम नदी पर बनाए गए बांध से कश्मीर घाटी में विद्युत आपूर्ति बढ़ेगी या फिर वैष्णव देवी में बनाया गया रोपवे है, जिसके कारण पर्यटन और बढ़ेगा। ऐसी  खबरों को महत्व दिया जाना चाहिए, न कि हिंसा से संबंधित खबरों को।

बांग्लादेशियों को खोजना प्रत्येक भारतीय का कर्तव्य

यद्यपि आतंकवादी हमले में कमी आई है फिर भी बांग्लादेश से घुसपैठ कम नहीं हो रही है। आज करोड़ों बांग्लादेशी भारत में बस गए हैं। कइयों को पुलिस ने पकड़ा भी है। इसलिए आवश्यकता है कि प्रत्येक भारतीय पुलिस की आंख और कान बनकर बांग्लादेशियों को कैसे खोजें, इसका प्रशिक्षण लें ताकि हम अपने अपने देश में रह रहे अवैध बांग्लादेशियों को खोजकर उन्हें पुलिस के सुपुर्द कर सकें। न्यायालयों में भी इसकी जल्द सुनवाई हो एवं उन्हें सजा मिले। उसके बाद उन्हें बांग्लादेश भेजा जाना चाहिए। कुछ दिनों पूर्व खबर मिली थी कि इतने सालों बाद बांग्लादेश ने अनेक अवैध बांग्लादेशियों को वापस लिया था। इसके अतिरिक्त जो बांग्लादेशी भारत में छिपे हैं सभी राज्य सरकारों को एक साथ अभियान चलाकर उन्हें पकड़कर भारत के बाहर निकालना चाहिए क्योंकि ये लोग अब भारत की सुरक्षा हेतु खतरा बनते जा रहे हैं। राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर असम की तरह भारत के सभी राज्यों में बनना चाहिए एवं उसके आधार पर घुसपैठियों की पहचान होनी चाहिए एवं उन्हें पकड़ा जाना चाहिए। इससे हमें घुसपैठ रोकने में सहायता मिलेगी।

तस्करी, अवैध व्यापार पर रोक लगे

आंतरिक सुरक्षा की अनेक चुनौतियों का हमने सफलता पूर्वक सामना किया है। परंतु इन चुनौतियों का स्वरूप अब बदल रहा है। इसलिए इस तरफ ध्यान देना आवश्यक है। नई चुनौतियां जो देश के सामने हैं उनमें  तस्करी/अवैध व्यापार प्रमुख हैं। देश की जमीनी सीमा एवं समुद्री सीमा से होने वाली तस्करी से नकली करेंसी, अफीम, गांजा एवं अन्य कई सामान देश में लाए जाते हैं। इससे देश का बहुत नुकसान होता है एवं अवैध व्यापार को बढ़ावा मिलता है। इसे रोकना अत्यंत आवश्यक है। हमारी समुद्री सीमा में अन्य देशों के जहाज मछलियां पकड़ते हैं जिससे हमें नुकसान होता है। इसे भी रोकना आवश्यक है।

सीमा सुरक्षा और अधिक बेहतर बनाने के लिए आधुनिक टेक्नालाजी की आवश्यकता

आनेवाले साल में बांग्लादेश की सीमा पर तार की बा़ड़ लगाई जाए। यह प्रयत्न हम पिछले कई वर्षों से कर रहे हैं। इससे बांग्लादेशी घुसपैठ रोकने में हमें सहायता मिलेगी। गृह मंत्रालय को सभी सीमाओं अर्थात भारत-पाक, भारत- म्यांमार, भारत-नेपाल सीमा पर और अधिक अच्छी चौकसी हेतु आधुनिक तकनीक का उपयोग करना चाहिए। इसके लिये योजना बन गई थी; परंतु उस पर कार्रवाई पूरी नहीं हुई। वह जल्द से जल्द पूरी होनी चाहिए। गत चार वर्षों में हमारी समुद्री सीमा की सुरक्षा में निश्चित रूप से सुधार आया है। देश के समुद्र में मछली मारनेवाली नौकाओं पर ऑटोमाटिक आईडेन्टिफिकेशन सिस्टम लगाने की आवश्यकता है। इसके कारण ऐसी नौकाओं की रडार के माध्यम से निगरानी की जा सकेगी। आशा करें कि आनेवाले वर्ष में यह काम पूरा हो जाएगा जिससे हमारी समुद्री सीमा और सुरक्षित हो जाएगी। समुद्री सुरक्षा को और बढ़ाने हेतु पुलिस ट्रेनिंग, उन्हें नई नौकाएं देना, उनके लिए बंदरगाहों की सुविधा, गुप्तचरी की गुणवत्ता बढ़ना आवश्यक है। आगामी समय में इस पर ध्यान देना आवश्यक है।

नेशनल इंटेलिजेन्स ग्रिड स्थापित हो

इसके अतिरिक्त कई महत्वपूर्ण साधन देश में तैनात करने की आवश्यकता है। उसमें से एक है नेशनल इंटेलिजेन्स ग्रिड अर्थात राष्ट्रीय गुप्तचार संस्था का जाल। हमारे यहां गुप्त जानकारी उपलब्ध तो हो जाती है। परंतु वह समय पर सब जगह नहीं पंहुचती। ऐसा कहा जाता है कि गुप्त जानकारी यदि समय पर उपलब्ध हो जाए तो हम अधिक सिद्धता से आनेवाले खतरे का मुकाबला कर सकते हैं।

जाति, धर्म एवं अन्य कारणों से अचानक होनेवाले दंगों देश का बहुत अधिक नुकसान होता है। उदाहरण स्वरूप कोरेगाव-भीमा या औरंगाबाद के जातीय दंगे। इन पर नजर रखने हेतु गुप्तचार संस्थाओं को और ज्यादा मजबूत बनाना होगा। एक टोल फ्री टेलिफोन नम्बर होना चाहिए जिसके माध्याम से सामान्य नागरिक भी अपने चारों ओर होनेवाली इस प्रकार की घटनाओं की जानकारी इन संस्थाओं को दे सकें। जानकारी देनेवाले का नाम गुप्त रखकर परिस्थिति पर निगाह रखी जा सकती है।

सोशल मीडिया का अनुचित उपयोग कर अनेक भड़काऊ पोस्ट, वीडियो या लेख लिखे जाते हैं। इस प्रकार के देशद्रोही कार्य पर नजर रख उसे तुरंत रोका जाना चाहिए। ऐसे पोस्ट डालनेवाले को सोशल मीडिया का ही उपयोग करके अर्थात याहू, गूगल, यू-ट्यूब पर पकड़ना चाहिए। सोशल मीडिया का अनुचित उपयोग कर हिंसा भड़काने के काम को रोकना ही होगा।

गत चार वर्षों में हमने बहुत प्रगति की है फिर भी बहुत कुछ करना बाकी है। इसलिए सभी देशप्रेमी नागरिक सुरक्षा दलों के कान आंख बनें एवं किसी भी गलत काम की सूचना सुरक्षा दलों को दें। देश के सामने चुनौतियां इतनी ज्यादा हैं कि केवल पुलिस या अर्ध सैनिक दल उसमें पार पाने में समक्ष नहीं हैं। प्रत्येक भारतीय यदि इन चुनौतियों को स्वयं की चुनौती मानकर चलें तो हम इनका पूरी तैयारी के साथ मुकाबला कर सकते हैं। आशा करें कि प्रत्येक देशभक्त नागरिक अपने देश के लिए कुछ समय निश्चित ही खर्च करेगा।

 

 

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