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2019 का आम चुनाव टेक्नॉलॉजी और सोशल मीडिया की रणभूमि पर लड़ा जाएगा। नेता, राजनीतिक दल और चुनावों को कवर करने वाला मीडिया जितनी जल्दी इसे समझ जाए उतना ही अच्छा है। डिजिटल क्रांति का यह चमत्कार है।

तेलंगाना में हैदराबाद के रहने वाले उदय मोगारम बैडमिंटन के दीवाने हैं। उनकी ये दिवानगी इस कदर जूनून में बदल गई है कि वे भारत को अगले ओलम्पिक में बैडमिंटन का स्वर्णपदक दिलवाना चाहते हैं। पेशे से इंजीनियर उदय अब कोच बन गए हैं; लेकिन कोचिंग के गुर वे सीखते हैं इंटरनेट से। इंटरनेट पर दुनिया के श्रेष्ठतम खिलाडियों के वीडियो वे लगातार देखते हैं। उनमें से वे खेल की बारीकियां सीखकर अपने शागिर्दों को सिखाते हैं। उदय का जुनून रंग लाया है और अब उनके दो शिष्य राष्ट्रीय स्तर पर बैडमिंटन खेल रहे हैं। ये पिछले चार साल में सूचना प्रोद्यौगिकी में आए बदलाव से संभव हो पाया है। सुगमता से डेटा की उपलब्धता, बेहतर स्पीड सस्ते मोबाइल डेटा और सस्ते स्मार्ट फोन के कारण उदय अपना सपना पूरा होते देख पा रहे हैं।

महाराष्ट्र में पुणे के पास जुन्नर तालुका में सलीम पठान अपने लिए लड़की देखने गए। दोनों ने एक दूसरे को पसंद भी किया परंतु नगमा ने शादी से इनकार कर दिया क्योंकि नगमा को लगा कि शादी के बाद वह कॉलेज दूर होने के कारण पढ़ाई जारी नहीं रख नहीं पाएंगी। सलीम पठान ने उसे एक फोन दिया और कहा कि वह फोन पर ही अपने सारे पाठ्यक्रम को पढ़ सकती है। नगमा और सलीम ने शादी की और नगमा इंटरनेट के जरिये आगे पढ़ भी रही है।

डाकोर में गुजरात के रहने वाले मोहनभाई पटेल कई होटल चलाते  हैं। उनके ज्यादातर कर्मचारी दूसरे प्रदेशों से है। वे महीनों घर नहीं जा पाते थे। असंतोष रहता था। मोहनभाई पटेल ने अपने सभी कर्मचारियों को नया फोन खरीद कर दिया और उन्हें दी वीडियो कॉल की सुविधा। अब हर कर्मचारी तकरीबन हर रोज अपने घर वीडियो कॉल करके घर से जुड़ा रहता है।

ये तीन उदाहरण देश के तीन कोनों के हैं और सभी असल जिंदगियों के हैं। ये तीनों ही बताते हैं कि किस तरह से सूचना क्रांति से आए क्रांतिकारी बदलाव उनकी जिंदगी को सुगम और सुंदर बना रहे हैं। ये बदलाव पूरे देश में आम आदमी की जिंदगी को अलग-अलग तरह से प्रभावित कर रहे हैं। पिछले कुछ सालों में सूचनाओं के आदान- प्रदान में बुनियादी बदलाव हुए हैं। राजनीति, व्यवसाय, खेल, मनोरंजन, मीडिया, शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन, संवाद, कृषि और यहां तक कि व्यक्तिगत सम्बंधों में भी सूचना और संचार क्रांति ने एक नए तरीके से छुआ है। सच कहें तो अब कुछ ऐसा नहीं रहा गया है जो इससे अछूता रह गया हो। आज से कुछ बरस पहले जो शब्द नहीं थेे, वे आज अहम हो गए हैं। व्हाट्सएप, ओला, वीडियो कॉल, यूट्युब, डाउनलोड, अपलोड, स्क्रीनशॉट, डेटा, फेसबुक, ट्विटर ये शब्द आज से एक दशक पहले कहां थे?

क्या कभी सोचा था कि उत्तर भारत से चेन्नई गया व्यक्ति अपनी पत्नी के लिए कांजीवरम सिल्क की साड़ी पसंद करते हुए पहले व्हाट्सएप पर कुछ साड़ियों के चित्र भेजेगा और फिर ऑनलाइन ही पत्नी लखनऊ में बैठे-बैठे अपनी पसंदीदा एक साड़ी चुन लेगी। या फिर कभी कल्पना की कि न्यूयार्क में पढ़ने गए अपने बेटे को कोल्हापुर में बैठी मां आनलाइन वीडियो कॉल के जरिए मनपसंद डिश बनाना सिखाएगी। सूचना प्रौद्योगिकी ने अकल्पनीय को साकार करने काकाम किया है।

इससे पहले हुए औद्योगिक या तकनीकी परिवर्तनों ने भी दुनिया में बड़े-बड़े बदलाव किए हैं। पाषण युग से लेकर औद्योगिक युग तक मानव सभ्यता का विकास क्रांतिकारी रहा है। लेकिन इसके पहले की युगांतकारी क्रांतियों में और आज की सूचना क्रांति में एक मूलभूत अंतर है। अब से पहले जो भी परिवर्तन आए उसमें परिवर्तन लाने वालों और परिवर्तन से प्रभावित होने वालों में एक गहरी खाई थी। वैज्ञानिकों, आविष्कारकों, उद्योगपतियों की एक अलग जमात थी। आविष्कारों से प्रभावित होने वाले नए उत्पादक, आविष्कारों, खोजों का उपयोग तो करते थे, पर उसमें उनकी सक्रिय सहभागिता नहीं होती थी। आमतौर से वे दूरस्थ या ”passive” उपयोगकर्ता बने रहते थे।

सूचना और संचार क्रांति में अब तकरीबन हर उपयोगकर्ता एक सक्रिय भूमिका निभाता है। आज हर दिन 100 करोड़ लोग व्हाट्सएप का उपयोग करते हैं। चार साल पहले यह संख्या नगण्य थी। हर दिन दुनिया की 60 भाषाओं में 5500 करोड़ से ज्यादा संदेशों का आदान- प्रदान व्हाट्सएप के जारिये होता है। साढ़े चार सौ करोड़ से ज्यादा चित्रों और 100 करोड़ से ज्यादा वीडियो सिर्फ व्हाट्सएप जैसे एप के जरिये हर रोज भेजे जाते हैं। भारत में ही यूट्यूब के करीब 18 करोड़ करोड़ उपयोगकर्ता है। हर साल यह संख्या चार गुना के हिसाब से बढ़ रही है। भारत अब फेसबुक के उपयोगकर्ताओं की दृष्टि से दुनिया में पहले नंबर का देश बन गया है। अप्रैल 2018 में भारत में फेसबुक का इस्तेमाल करने वालों की संख्या 27 करोड़ तक पहुंच गई है।

यह संभव हुआ है दुनिया और देश में आई टी के विकास और तंत्र के फैलने से। आज तकरीबन देश के 90% हिस्से फाइबर ऑप्टिकल्स के तारों से जुड़ गए हैं। फाइबर ऑप्टिकल्स द्वारा बड़ी मात्रा में डेटा एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाया जा सकता है। इसी के कारण 4-जी यानि फोर्थ जनरेशन की संचार सेवाएं अलग-अलग कम्पनियां देश के नागरिकों को दे पा रही हैं। 4-जी की विशेषता है कि आप एक क्लिक के द्वारा एक बड़ी वीडियो फाइल को देश के दूरस्थ कोने में पलक झपकते ही भेज सकते हैं। इसके अनोखे उपयोगों में बताने की आवश्यकता नहीं है। एक उदाहरण ही काफी होगा इसका फायदा बताने के लिए। मुंबई में वाशी की मंडी में आम के छांटने के काम में लगा बिहारी मजदूर पहले बेतिया जिले के अपने गांव में जब पैसे भजने जाता था, उसे मनीआर्डर करना पड़ता था। आज वह किसी भी एप से बैंक ट्रांसफर के जरिए तुरंत अपने पैसे परिवार तक पहुंचा देता है। इसके लिए सिर्फ उसे अपने फोन में कुछ बटन दबाने पड़ते हैं। सरकार द्वारा बनाए गए एप भीम के ही आज डेढ़ करोड़ से अधिक डाउनलोड हो चुके हैं। चालीस लाख लोग इसका सक्रिय इस्तेमाल कर रहे हैं। आम आदमी की सक्रियता बताती है कि वह नए संचार माध्यमों का दूरस्थ उपयोगकर्ता नहीं बल्कि उनका सक्रिय सहयोगी है। व्हाट्सएप, ट्विटर या फेसबुक का इस्तमोल करने वाले लगातार नए कंटेट का निर्माण कर रहे हैं। अब आम लोग इतना कंटेंट स्वयं बना रहे हैं कि कभी-कभी तो लगता हैं कि आगे आने वाले दिनों में “जननिर्मित कंटेट” ही कंटेंट का मुख्य आधार हो जाएगा।

इस सूचना और संचार क्रांति का समाज जीवन के हर अंग पर व्यापक असर पड़ रहा है। लेकिन एक क्षेत्र ऐसा है जिस पर इसका प्रभाव सबसे ज्यादा दिखाई दे रहा है। वह है मनोरंजन और मीडिया का क्षेत्र। इंटरनेट के बढ़ते उपयोग तथा मोबाइल डेटा की सहज उपलब्धता ने मीडिया क्षेत्र को मानो झंझोड सा दिया है। सितम्बर 2016 से पहले भारत में मोबाइल डेटा के उपयोग में दुनिया के सबसे नीचे के देशों में आता था। उस समय तक डेटा की कीमतें भी बहुत ऊंची थीं। एक समय तो ऐसा था जब एक जीबी डेटा के लिए 1000 रुपये तक देने पड़ते थे। उस पर भी स्पीड रामभरोसे रहती थी। एक सामान्य ई-मेल डाउनलोड करने करने के लिए लम्बा समय लग जाया करता था। आज भारत में मोबाइल डेटा की रफ्तार, उपलब्धता और कीमतें तीनों ही सहज और सुगम हो गई हैं।

अब भारत 150 करोड़ जीबी डेटा हर महीने इस्तेमाल करता है। इसके उपयोग में अब अपना देश दुनिया में पहले नंबर का देश हो गया है। वही डेटा इतना किफायती हो गया है कि आज यह तकरीबन 3 रुपये प्रति जीबी में उपलब्ध है। सरकार ने भी व्यापक नीतिगत परिवर्तन किए है और आज 4-जी नहीं बल्कि 5-जी की भी बात होने लगी है।

मीडिया के मुख्य साधनों अर्थात टेलीविजन, अखबार और रेडियो तीनों इससे अछूते नहीं रहे हैं। अब ज्यादातर लोगों के लिए खबरों का प्राथमिक और त्वरित स्रोत उनका मोबाइल फोन हो गया है। मोबाइल पर इंटरनेट की तेज स्पीड और आसानी से इस्तेमाल किए जाने वाले एप्स की बदौलत अब लोग खबरों की पहली भनक तुरंत ही पा जाते हैं। आई पी एल जैसा टूर्नामेंट इस साल पहली बार ज्यादातार भारतीयों ने टीवी की बनिस्बत मोबाइल एप्स (जैसे हॉटस्टार) के जरिए अपने फोन पर देखा। यानी समाचार, खेल और मनोरंजन तीनों की दुनिया अब मोबाइल की छोटी सी दुनिया में सिमटती जा  रही है। अब कोई भी खबर सबसे ज्यादा व्हाट्सएप के माध्यम से फैलती है। यही खबरों के संग्रहण का प्रमुख माध्यम हो गया है। इसी तरह फेसबुक और ट्विटर जैसे सोशल मीडिया प्लेटफार्म अब समाचारों के संकलन, सम्पादन, सम्प्रेषण और उनके विस्तारण के प्रभावी माध्याम हो गए हैं। ये सभी माध्यम पाठक, दर्शक, श्रोता को समाचार का सक्रिय हिस्सा रखते हैं। वह अपनी इच्छानुसार इन पर अपनी राय जाहिर कर सकता है। चाहे तो कांटछांट कर अपनी टिप्पणी के साथ लाखों लोगों तक पहुंचा सकता है। साथ ही अब नागरिक पत्रकारिता ने भी अपनी एक जगह बना ली है। यानी हर नागरिक स्वयं खबर देने वाला बन सकता है। इस सब ने आमजन की समाचारों के निर्माण और उनकी दिशा में एक खास किस्म की सहभागिता की जमीन तैयार की है। इस सहभागिता नेमीडिया का लोकतंत्रीकरण कर दिया है।

मीडिया में जन सहभागिता के बढ़ने के कारण मीडिया के स्वरूप, कंटेंट और प्रभाव तीनों में अमूलचूल बदलाव होने शुरू हो गया है। अब आप समाचारों के लिए सिर्फ  सम्पादक की दृष्टि या उसकी विचारधारा से बंधे नहीं है। कुछ समय पहले तक सम्पादक ही तय कर देते थे कि कौन सी खबर किस रूप में और किस दृष्टि से परोसी जाएगी। अपने से अलग विचार को छुपाना आमतौर पर मीडिया में हो जाता था। कई बार इसके वैचारिक और राजनीतिक कारण होते थे। इसलीए सोशल मीडिया के आने से पहले समाचार माध्यमों पर सम्पादकों और उनके मालिकों का पूरा कब्जा था। कई खबरों को तोड़मरोड़ कर भी पेश कर दिया जाता था। सोशल मीडिया आने के पश्चात ऐसा करना काफी मुश्किल हो गया है। हालांकि सोशल मीडिया की विश्वसनीयता को लेकर कई बार प्रश्न उठते हैं। परंतु फिर भी इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि लोकतंत्र के स्वस्थ विकास में इंटरनेट आधारित समाचार तंत्र एक खासी भूमिका निभा रहा है।

अपने देश में आने वाले बारह महीने राजनीतिक हलचल के रहेंगे। 2019 के आम चुनावों में सोशल मीडिया की एक बड़ी भूमिका होगी। आज के दिन सूचनातंत्र का एक तरह से समतलीकरण हो गया है। इसका अर्थ है कि कोई भी घटना या समाचार फिलहाल ‘लोकल’ नहीं रह गया है। हर खबर जिस पल और रूप में बेंगलुरु में बैठे एक आईटी विशेषज्ञ को हासिल है वह बस्तर के जगदलपुर इलाके के  स्थानीय दुकानदार को भी उतनी ही सुगमता से उपलब्ध है। यानि हर नेता के पास अपनी बात सीधे देश के कोने-कोने में पहुंचाने का त्वरित और किफायती माध्यम आज मौजूद है। इसलिए 2019 के चुनावों में जितना महत्व राजनीतिक गठजोड़ों, जातीय समीकरणों और ज्वलंत मुद्दों का है, उतना ही या उससे भी ज्यादा महत्व संचार के नए माध्यमों के ’स्मार्ट’ इस्तेमाल का भी है। याद रखने की बात है कि 2019 का चुनाव देश का प्रधानमंत्री चुनने के लिए होगा। जो भी नेता फोन का स्मार्ट इस्तेमाल करके मतदाताओं के दिल तक अपनी बात पहुंचा देगा, वह बाजी मार लेगा। ये चुनाव देश में 4-जी की उपलब्धता के बाद होने वाले पहले आम चुनाव हैं। इस मायने में ये आम चुनाव पिछले सभी चुनावों से भिन्न होंगें। जो भी सिर्फ पारंपारिक अभियान शैली, मुद्दे और समीकरणों में उलझा रहेगा। वह घाटे में रहेगा। इसलिए 2019 का आम चुनाव टेक्नॉलॉजी और सोशल मीडिया की रणभूमि पर लड़ा जाएगा। नेता, राजनीतिक दल और चुनावों को कवर करने वाला मीडिया जितनी जल्दी इस बात को समझ जाए उतना ही अच्छा है।

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