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***** सरोज त्रिपाठी*****
२६ और २७ दिसंबर को नेपाल की राजधानी काठमांडू में संपन्न सार्क शिखर सम्मेलन से पूरी दुनिया को यह संदेश गया कि उसके सदस्य देशों में नजदीक रहकर भी दूरियां बरकरार हैं। इस शिखर सम्मेलन की एकमात्र उपलब्धि बिजली क्षेत्र में सहयोग का समझौता रहा। यह समझौता भी सम्मेलन के आखिरी क्षणों में ही हो सका। क्षेत्रीय यातायात और परिवहन संपर्क बढ़ाने के समझौतों पर हस्ताक्षर करने के प्रस्ताव को पाकिस्तानी अड़ंगे की वजह से छोड़ देना पड़ा। भारत व सार्क के अन्य देश इन समझौतों को आगे बढ़ाना चाहते थे, लेकिन पाकिस्तानी हठधर्मिता इसमें आड़े आ गई।
शिखर सम्मेलन के समापन से पहले सार्क के आठ सदस्य देशों -भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, मालदीव व श्रीलंका के विदेश मंत्रियों ने बिजली क्षेत्र में सहयोग की व्यवस्था के एक करार पर दस्तखत किए। इससे ग्रिड कनेक्टिविटी के जरिए सार्क देशों के बीच बिजली का व्यापार किया जा सकेगा। गौरतलब है कि पाकिस्तान के विरोध के चलते सार्क देशों के बीच मोटर वाहनों के आवागमन और रेल नेटवर्क संबंधी समझौते नहीं हो सके। सार्क सम्मेलन में पहली बार भाग ले रहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन में सार्क राष्ट्राध्यक्षों को आश्वस्त करने और उनमें आपसी विश्वास पैदा करने की कोशिश की। मोदी ने अपने संबोधन में व्यापार और आतंकवाद जैसे अहम मुद्दे उठाए और कहा कि हमें मिलकर रेल, रोड और बिजली के क्षेत्र में काम करने की जरूरत है।
सार्क देशों की स्थापना आपसी सहयोग के जरिए दक्षिण एशिया क्षेत्र में शांति, स्वतंत्रता, सामाजिक न्याय और आर्थिक समृद्धि हासिल करने के लिए की गई थी। लेकिन आसियान और यूरोपीय यूनियन जैसे दूसरे क्षेत्रीय संगठन जहां अपने मकसद में काफी आगे बढ़ गए, वहीं सार्क कहीं न कहीं ठहर सा गया है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने इस तथ्य को रेखांकित करते हुए कहा कि पिछले ३० वर्षों में सार्क कुछ हासिल नहीं कर पाया है। दुर्भाग्य से सार्क के तहत सदस्य देशों में कुछ व्यापार समझौतों पर हस्ताक्षर जरूर हुए, पर उनसे कुछ खास हासिल नहीं हो पाया। सार्क देशों में व्यापारिक लेनदेन की प्रक्रिया में आज भी बहुत सी बाधाएं हैं। सबसे बड़ी बात तो यह है कि सार्क देशों के बीच लोगों और उत्पादों की आवाजाही आज भी एक बड़ी चुनौती है। सार्क देशों में आंतरिक सुरक्षा को लेकर भी आपसी विश्वास की बेहद कमी है। सार्क संगठन को मजबूत बनाने के लिए जैसी राजनीतिक इच्छाशक्ति चाहिए थी वह सदस्य देशों में कतई नहीं दिखाई देती। दरअसल इस क्षेत्र का कूटनीतिक समीकरण आपसी व्यापारिक रिश्तों पर हावी रहा है, जबकि दुनिया के दूसरे संगठन सियासी मुद्दे परे रखकर आपसी कारोबार करते हैं। १० सदस्यीय आसियान या २७ सदस्यीय यूरोपियन यूनियन के कई सदस्य देशों के बीच भी राजनीतिक टकराव हैं; मगर इसे वे व्यापार पर हावी नहीं होने देते। सार्क को भी इसी मानसिकता से काम करने की जरुरत है।
शिखर सम्मेलन में पाकिस्तान ने चीन को भी सार्क में पूर्ण सदस्य या डायलॉग पार्टनर के तौर पर शामिल करने की मांग उठाई। पाक ने दक्षिण कोरिया को सार्क का पूर्ण सदस्य बनाए जाने का भी सुझाव दिया। ज्ञातव्य है कि २००५ से सार्क में चीन, दक्षिण कोरिया, अमेरिका, यूरोपीय यूनियन, ईरान, बर्मा और जापान प्रेक्षक बनाए गए हैं। भारत सार्क में चीन को सदस्यता दिए जाने के खिलाफ है। भारत के मुताबिक बेहतर होगा कि पहले सार्क के मौजूदा सदस्यों के बीच में आपसी समझ बने। इस संबंध में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सार्क देशों के नागरिकों को तीन से पांच साल का व्यावसायिक वीजा जारी करने और इससे जुड़ी प्रक्रियाओं को सरल बनाने संबंधी घोषणा महत्वपूर्ण है। प्राय: दो सार्क देशों के बीच किसी खास तरह के कारोबारी अवसर सामने आने पर वीजा का मामला आड़े आ जाता है और दोनों को उस मौके से हाथ धोना पड़ता है। अगर प्रक्रिया सरल होगी तो निश्चित रूप से आपसी लेन देन बढ़ेगा। भारत को ऐसे और भी कदम उठाने होंगे ताकि पड़ोसियों से व्यापारिक संबंधों को गति दी जा सके और आपसी विश्वास बढ़ाया जा सके।
सार्क के क्षितिज पर चीन की झलक के दूरगामी असर होने वाले हैं। पिछले एक दशक से दक्षिण एशिया में अपना प्रभाव बढ़ाने के प्रयास में चीन जोरदार तरीके से जुटा हुआ है। सार्क शिखर सम्मेलन में चीन का प्रतिनिधित्व करने वाले उप विदेश मंत्री ल्यू झेनमिन ने दक्षिण एशिया में बुनियादी ढांचे के विकास के लिए ३० बिलियन डॉलर निवेश करने तथा दक्षिण एशियाई विद्यार्थियों को १० हजार स्कॉलरशिप देने का वादा किया है। नेपाल, श्रीलंका और मालदीव को चीन की मदद और निवेश से काफी फायदा हुआ है। काठमांडू की जिस बिल्डिंग में १८वां शिखर सम्मेलन संपन्न हुआ वह चीन द्वारा बनाई गई है। इस समय नेपाल में चीन का निवेश भारत से कहीं ज्यादा है। दक्षिण एशिया के देश चीन की आर्थिक ताकत से भलीभांति परिचित हैं। चीन दक्षिण एशिया में ३० बिलियन डॉलर से ज्यादा निवेश कर चुका है। वह सार्क देशों को २५ बिलियन डॉलर का ऋण रियाचती दर पर दे चुका है।
नेपाल, श्रीलंका और पाकिस्तान, चीन को सार्क की सदस्यता दिए जाने के पक्ष में हैं। भूटान के अतिरिक्त सभी सार्क देशों से चीन के आर्थिक और राजनीतिक संबंध काफी मजबूत हो चुके हैं। दो साल पहले भूटान ने बीजिंग में अपना दूतावास खोलने तथा थिम्फू में चीनी राजदूत को अपना निवास स्थान लेने की अनुमति देने का प्रयास किया था। उस समय भारत ने भूटान के इस रवैए के प्रति अपनी नाराजगी जाहिर की थी। बाद में चीन के साथ इस नजदीकी की पहल करने वाली सत्तारूढ पार्टी भूटानी चुनाव में पराजित हो गई। नई भूटानी सरकार ने अपनी चीनी नीति में बदलाव कर लिया। मौजूदा भूटान सरकार की नीति भारत के अनुकूल है। इतना तय है कि आगामी वर्षों में सार्क में चीन के प्रवेश का मुद्दा एक गंभीर मुद्दे के तौर पर उठने वाला है।
आपसी बातचीत को लेकर भारत और पाकिस्तान में जारी तल्खी का असर पूरे सार्क सम्मेलन में दिखाई दिया। नवाज शरीफ ने अपने १५ मिनट के भाषण में आतंकवाद के मुद्दे पर कुछ नहीं कहा; जबकि नरेंद्र मोदी ने मुंबई हमले का जिक्र करते हुए कहा कि हमें सीमाओं के पार अपराध और आतंकवाद को रोकने के लिए साथ आना होगा। भारत के प्रधानमंत्री ने सार्क नेताओं से एक होकर आतंकवाद से मुकाबला करने की गुजारिश की। उन्होंने कहा कि अगर हम एक दूसरे की सुरक्षा और लोगों की जिंदगी के प्रति संवेदनशील हों, तो ही हम अपनी दोस्ती मजबूत कर पाएंगे, सहयोग बढ़ा पाएंगे और स्थिरता ला पाएंगे। उन्होंने जोर देकर कहा कि आतंकवाद और देश के भीतर होने वाले अपराधों से मुकाबले के संकल्प को पूरा करने के लिए हमें साथ मिलकर काम करना चाहिए। मोदी ने आगे कहा कि अच्छा पड़ोसी सबकी चाहत होती है।…. अगर हम एक दूसरे की सुरक्षा और लोगों की जिंदगी को लेकर संवेदनशील हैं, तो हमें आपसी दोस्ती और सहयोग को गहरा करते हुए क्षेत्र में शांति को बढ़ाना होगा। काठमांडू शिखर सम्मेलन का समापन हर तरह के आतंकवाद को निर्मूल करने के लिए सामूहिक प्रयास की घोषणा के साथ हुआ। इस तरह आतंकवाद के मसले पर पाकिस्तान शिखर सम्मेलन में अलग-थलग पड़ गया। यह भारत के लिए संतोष की बात रही।
अपनी प्रचुर प्राकृतिक संपदा और १.०५ बिलियन मानव संसाधन के बूते सार्क अमेरिका और चीन के बाद सबसे समृद्ध इलाका होने की क्षमता रखता है। २०२५-२६ तक भारत में मध्य वर्ग की आबादी ५५ करोड़ हो जाने की संभावना है। यह ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस, इटली और स्पेन की २०२५-२६ की संभावित ३३ करोड़ आबादी से कहीं ज्यादा होगी। इसके बावजूद सार्क देश दुनिया के सबसे गरीब देशों की श्रेणी में गिने जाते हैं। सार्क देशों का आपसी व्यवहार उनके कुल व्यापार का सिर्फ १० फीसदी है जबकि आसियान देशों का यह आंकड़ा ३२ प्रतिशत तथा यूरोपीय यूनियन के देशों का आंकड़ा ५० प्रतिशत है।
भारत और पाकिस्तान को आसियान देशों को सफलता का मॉडल अपने सामने रखना चाहिए। १९७५ में आसियान देशों ने दोस्ती और सहयोग की संधि पर दस्तखत किए थे। उन्होंने आपसी विवादों को शांतिपूर्ण तरीके से निपटाने और धमकी तथा बल प्रयोग पर अमल न करने का सिद्धांत अख्तियार किया। १९९४ में आसियान देशों ने संवाद और आपसी विश्वास बढ़ाने के लिए एक क्षेत्रीय फोरम का गठन किया। यदि सार्क देश भी इसी तरह का फोरम गठित करें तो उनमें कूटनीतिक संबंधों को प्रगाढ़ करने की संभावना बढ़ सकती है।
पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारी का परिचय देते हुए आपसी विवादों के निपटारे के लिए आतंकवाद का रास्ता हमेशा-हमेशा के लिए भूल जाना चाहिए। यह एक भौगोलिक सचाई है कि भारत सार्क का सबसे बड़ा देश है। आर्थिक दृष्टि से भी वह इस इलाके का सबसे मजबूत देश है। उसकी सीमाएं अफगानिस्तान को छोड़कर सभी सार्क देशों से जुड़ी हुई हैं। जैसा कि भारत के प्रधानमंत्री मोदी ने कहा है, “हमें मालूम है कि भारत को नेतृत्व देना है और हम अपनी भूमिका निभाएंगे।” सार्क देशों को यह समझना ही होगा कि सार्क की सफलता के लिए हिमालय की ऊंचाई वाली दूरदर्शिता और साहस की जरूरत है। उम्मीद की जानी चाहिए कि २०१६ में इस्लामाबाद में होने वाले आगामी सार्क सम्मेलन में सदस्य देशों मे आपसी सहयोग का एक नया अध्याय खुलेगा।
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