“नरेंद्र मोदी कहते हैं, ‘मैं देश के 140 करोड़ लोगों का प्रधान मंत्री हूं, मेरे लिए सभी समान हैं। उनके द्वारा व्यक्त यह कथन उन पर हुए संघ संस्कार एवं विचारों का आविष्कार है। हिंदू धर्म इस देश की पहचान है। मुसलमानों की जातिगत पहचान मुस्लिम के रूप में हो सकती है, परंतु उनकी सांस्कृतिक पहचान भारतीय है। यह विचार इस समाज में एक ऐसी व्यवस्था बनाने के संकल्प को प्रकट करता है, जिसमें सबकी दृष्टि एवं दिशा एक ही हो।”
डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने 1925 में कुछ युवाओं के सहयोग से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की और इस वर्ष विजयादशमी पर इस अद्भुत संघ यात्रा के 100 वर्ष पूरे हो रहे हैं। संघ की स्थापना के बाद से ही संघ सदैव युगानुकूल रहा है। आज देश और समाज का हर वर्ग संघ से जुड़ा हुआ है। आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ देश के कोने-कोने में फैल चुका है। लाखों स्वयंसेवक प्रतिदिन संघ की शाखाओं में नियमित रूप से शामिल हो रहे हैं। हजारों प्रचारकों ने अपना जीवन संघ के कार्य में समर्पित कर दिया है। आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ देश में समाजहितों से जुड़े लाखों उपक्रम चला रहा है। संघ से जुड़े सैकड़ों संगठनों का एक नेटवर्क तैयार हो चुका है और इसके माध्यम से संघ के स्वयंसेवक जीवन के हर क्षेत्र में राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर छात्रों से लेकर श्रमिकों तक, सामाजिक से लेकर राजनैतिक तक, स्वास्थ्य से लेकर ग्रामीण विकास तक, आपदा प्रबंधन से लेकर राहत कार्यों तक, धार्मिक कार्यक्रमों से लेकर समाज के किसी भी क्षेत्र का नाम लें, संघ की प्रेरणा से स्थापित संगठन हर जगह कार्य कर रहे हैं। उनमें से कई संगठन अपने क्षेत्र में अत्यधिक प्रभावशाली भी हैं। सभी क्षेत्रों में संघ की यह प्रगति अनेक बाधाओं को पार करके प्राप्त हुई है।
1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद संघ पर उस कृत्य का झूठा आरोप लगाया गया और संघ पर प्रतिबंध लगा दिया गया। 1975 में इंदिरा गांधी ने आपातकाल के दौरान संघ पर निशाना साधा। जब उन्हें एहसास हुआ कि संघ को रोकना सम्भव नहीं है तो उन्होंने विघ्नसंतोषी लोगों को खुश करने के लिए ‘हिंदू आतंकवाद’ और ‘भगवा आतंकवाद’ जैसी अवधारणाएं गढ़ीं। संघ ने न केवल लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीकों से इन हमलों का विरोध किया बल्कि ऐसे प्रत्येक हमले के बाद उन्हें सफलतापूर्वक हराया भी।
हर आक्रमण का सफलतापूर्वक सामना करने की इस कहानी के पीछे संघ की सकारात्मक दृष्टि ही हैं। रा. स्व. संघ राष्ट्रीय एकता के लिए प्रतिबद्ध है। सुरक्षा, सामाजिक एकता, हजारों सेवा कार्य, समाज एवं राष्ट्र हितों से जुड़े आंदोलन जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर कार्य करने वाले संघ ने कभी भी राष्ट्र-धर्म से जुड़े हुए मामलों से समझौता नहीं किया। इससे समाज में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रति सम्मान और सद्भावना का भाव समय-समय पर निर्माण होता गया।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रेरणा से कार्य करने वाले हजारों संगठन हैं। प्रत्येक संगठन के कार्य का विषय भिन्न होगा, पर उन सब का उद्देश्य और चिंतन एक दिशा में है। हमारे देश की सर्वांगीण उन्नति में हम अपना योगदान कैसे दे सकते हैं, हमारा भारत देश सामर्थ्यवान, वैभवशाली, समृद्ध कैसे बन सकता है, भारत सामर्थ्यवान, सम्पन्न, समृद्ध होना ही केंद्र बिंदु है। सामर्थ्यवान, सम्पन्न, वैभवशाली कोई भी देश हो सकता है। शक्तिशाली कोई भी बन सकता है। आज अमेरिका विश्व का सम्पन्न शक्तिमान देश है, किंतु यशस्वी नहीं है। भारत का यश मूल्यवान होना चाहिए एवं मौलिक होना चाहिए। संघ का चिंतन है कि अपने नागरिकों का राष्ट्रीय और सामाजिक चेतना का स्तर बढ़ाकर उन्हें चरित्रवान व सामर्थ्यवान बनाकर अपने राष्ट्र के प्रति जागरूक बनाना। भारत का दर्शन क्या है? इसका तत्वज्ञान क्या है? हमारे राष्ट्र का सामर्थ्यशाली इतिहास परम्परा किस प्रकार है? हमारे राष्ट्र की विश्व-जगत में विशेषता क्या है?
हमारे राष्ट्र का विश्व की दृष्टि से कर्तव्य क्या है? वैश्विक जागृति में हमारा दायित्व क्या है? भारतीय नागरिकों एवं कार्यकर्ताओं का संघ इन विषयों के संदर्भ में प्रबोधन करने का कार्य करता है और जागृत हुए समाज की समस्त शक्तियों एवं क्षमताओं के साथ समर्थ भारत के निर्माण हेतु समाज की चेतना बढ़ाने का कार्य कर रहा है। संघ के स्वयंसेवकों का समाज से रिश्ता पानी में घुली चीनी जैसा होता है। समाज स्वयंसेवकों से कुछ नैतिकताओं, मूल्यों और प्रभावी कार्य की अपेक्षा रखता है। दूसरी ओर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ किसी भी कार्य का श्रेय नहीं लेता क्योंकि वह समाज की प्रेरणा से समाज के लिए कार्य करता है। संघ के कार्य की अनूठी स्थिति या संयोग के पीछे कोई चमत्कार नहीं है। समाज में सह-अस्तित्व का यह सम्बंध ही संघ की असली ताकत है। संघ ने इसी की सहायता से भारत तथा विश्व के सामाजिक जीवन के हर क्षेत्र को प्रभावित किया है। इस वर्ष राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना के 100 वर्ष पूरे हो रहे हैं।
डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार जी ने प्रथम कहा कि हां, ‘मैं कहता हूं, यह हिंदू राष्ट्र है’ इस ऐतिहासिक उद्गार से हिंदू समाज में हिंदू के रूप में अपनी पहचान का प्रश्न पैदा हुआ। हम कौन है? इस प्रश्न से हिंदू मन गहरी नींद से जागरूक हो गया। देश का सारा हिंदू समाज धीरे-धीरे अपना परिचय हिंदू के रूप में देने लगा। हिंदू के रूप में अपनी जो सामर्थ्यशाली, वैभव सम्पन्न पहचान है, वह पहचान कश्मीर से कन्याकुमारी तक के सम्पूर्ण भारत में सुप्त शक्ति की तरह थी। उस पहचान पर जो धूल जमी थी, उसे स्वच्छ करने का काम डॉक्टर हेडगेवार से लेकर अब तक संघ कर रहा है। परिणाम क्या हुआ? हिंदूओं में जागरण निर्माण हुआ। हिंदू तत्वों के संदर्भ में चर्चाएं होने लगी और विस्मृति में गई हुई हिंदू संस्कृति, मंदिर, विचार, परम्परा, संस्कार के संदर्भ में हिंदू समाज में जागृत दृष्टि आ गई। हिंदू राष्ट्र का चिंतन यह हमारा प्राण था, उस स्व-भाव के संदर्भ में समाज मन में जागरण संघ ने निर्माण किया। परिणामस्वरूप उस संकल्प के पीछे सारा देश खड़ा हो गया। वर्तमान में जो राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक, आर्थिक क्षेत्र से लेकर वैश्विक क्षेत्र तक जो राष्ट्र के रूप में सकारात्मक परिणाम महसूस हो रहा है, यह परिणाम संघ ने समाज के सहयोग से निर्माण किया है। आज ठीक 100 वर्ष के प्रयास से भारत देश के समग्र हिंदुओं में एक विश्वास निर्माण होते दिखाई दे रहा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक रह चुके वर्तमान प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत एक राष्ट्र के रूप में विकसित हो रहा है।
संघ कार्य के संदर्भ में जिनकी स्थिति स्पष्ट है, वह संघ को समझ जाते हैं और जो नहीं समझते हैं वह संघ के संदर्भ में प्रश्न खड़ा करते हैं। हिंदुत्व-द्वेषियों का प्रश्न होता है कि हिंदुओं के जागृत राष्ट्र में गैर-हिंदुओं का क्या होगा? क्या उन्हें पीटा जाएगा या देश से निकाल दिया जाएगा? हिंदू जागरण क्या है? मुस्लिम, क्रिश्चन, पारसी आदि भी इस देश में रहते हैं? वे हिंदू नहीं है, उनका क्या? मुस्लिम, ईसाई, पारसी अपनी-अपनी पूजा पद्धतियां अपनाते हैं, परंतु हिंदू धर्म कोई पूजा पद्धति नहीं बल्कि एक जीवन पद्धति है। हिंदू कोई जाति नहीं है जिसे हिंदू धर्म कहा जाता है। इसका कोई एक ईश्वर नहीं है, कोई एक प्रार्थना पद्धति नहीं है। शैव, वैष्णव, लिंगायत, जैन, माहेश्वरी जो विभिन्न तरीकों और प्रथाओं से विभिन्न देवताओं की पूजा करते हैं, जो ईश्वर में विश्वास रखते हैं और जो नहीं रखते, जो शक्ति की पूजा करते हैं, यज्ञ करते हैं और नास्तिक हैं, ये सभी हिंदू शब्द के अंतर्गत आ सकते हैं। इसलिए हिंदू धर्म में कोई एक प्रार्थना पद्धति नहीं है। जिस प्रकार विभिन्न देवताओं, महापुरुषों, शक्ति और प्रतीकों की पूजा करने वाले हिंदू हो सकते हैं, उसी प्रकार वे भी हो सकते हैं जो अल्लाह, ईसा मसीह और अन्यों की पूजा करते हैं।
हिंदू होने का अर्थ वन, जल, प्राणी और सभी जीवों के संरक्षण एवं संवर्धन से है। हिंदू होने का अर्थ है किसी न किसी रूप में पृथ्वी के संरक्षण के लिए कटिबद्ध होना भी है। अन्य धर्मियों को सम्मान देना, प्रार्थना करने की स्वतंत्रता, अन्य देवताओं को आदर की दृष्टि से देखना, यह हिंदू होने का अर्थ है। यदि आप किसी भी ईश्वर की प्रार्थना करते हैं, विश्वास रखते हैं तो भी हिंदू धर्म उनको विचारों की स्वतंत्रता देता हैं। नरेंद्र मोदी कहते हैं, ‘मैं देश के 140 करोड़ लोगों का प्रधान मंत्री हूं, मेरे लिए सभी समान हैं। उनके द्वारा व्यक्त यह कथन उन पर हुए संघ संस्कार एवं विचारों का आविष्कार है। हिंदू धर्म इस देश की पहचान है। मुसलमानों की जातिगत पहचान मुस्लिम के रूप में हो सकती है, परंतु उनकी सांस्कृतिक पहचान भारतीय है। यह विचार इस समाज में एक ऐसी व्यवस्था बनाने के संकल्प को प्रकट करता है, जिसमें सबकी दृष्टि एवं दिशा एक ही हो।
यदि हम एकजुट रहेंगे तो हम विश्व प्रतिस्पर्धा में टिके रहेंगे। दूर-दूर के देश हमारे बीच फूट डालने का प्रयास करेंगे। हमें इन अलगाववादियों से सावधान रहना होगा, जो देश को बांटना चाहते हैं। हमें अमेरिका, रूस, ब्रिटेन जैसे किसी भी शक्तिशाली देश के साथ स्थाई रूप से जुड़ने की गलती नहीं करनी चाहिए, यदि हम उन पर निर्भर रहने के आदी हो गए तो हम हमेशा कमजोर रहेंगे। हमें अपने पैरों पर खड़ा होकर अपनी सक्षम नौसेना, वायु सेना, थल सेना बनानी होगी। हमें व्यापार पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, यह सोचना चाहिए कि व्यापार मार्ग कैसे सुरक्षित रहेंगे। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में 11 वर्षों में भारत विश्व का शक्तिशाली देश बनने की दिशा में मार्गक्रमण कर रहा है। तब से दुनिया के दूसरे देश हमें सम्मान से देखने लगें हैं। ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान को जिस तरह से भारत ने सबक सिखाया है उससे विकसित भारत की सामरिक शक्ति का दर्शन विश्व को हुआ है। संघ का ही एक संस्कार गीत है – ‘स्वतंत्रता को सार्थक करने शक्ति का आधार चाहिए’।
देश में इन दिनों अनुसूचित जाति के लोगों के उत्पीड़न के नाम पर एक गहरा षड्यंत्र चल रहा है। साथ में भाषावाद, प्रांतवाद,जातिवाद को लेकर समाज को तोड़ने का सतत प्रयास भी हो रहा है। हिंदू समाज को तोड़ने और राष्ट्रवाद के ज्वार को समाप्त करने तथा मोदी सरकार को बदनाम करने का यह षड्यंत्र है। इसमें देशी-विदेशी ताकतें शामिल हैं। इन सबसे सावधान रहने की आवश्यकता है। हिंदू धर्म के विकास में अनुसूचित जाति के लोगों तथा सभी जाति-पंथ एवं प्रांत का बड़ा योगदान है। आज हम 79 वां स्वतंत्रता दिवस मना रहे हैं। देश ने हर क्षेत्र में प्रगति की है, किंतु सामाजिक क्षेत्र में आज भी जो प्रगति होनी चाहिए थी, वह नहीं हुई है। लोगों के साथ सम्मान का व्यवहार नहीं हो रहा है। अनुसूचित जाति के लोगों के लिए अलग कुआं, अलग श्मशान घाट अभी भी हैं। हिंदुओं को अभी तक यह ज्ञान नहीं हुआ कि उनके ऐसे ही बुरे बर्तावों से मुसलमानों ने यहां करीब 800 वर्ष तक और अंग्रेजों ने 150 वर्ष तक राज किया है। संगत-पंगत की परिपाटी चलाई जानी चाहिए। सम्पूर्ण समाज में एक साथ भोजन और संगत-पंगत से ही समरसता आएगी।
देश में कुछ ऐसे तत्व हैं जो नरेंद्र मोदी को प्रधान मंत्री के रूप में नहीं देखना चाहते। साथ में देश को परमवैभव तक पहुंचाने की राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की मनीषा में रुकावटें डालने वाले नकारात्मक तत्व भी इस देश में है। इसके लिए वे हिंदू वोट को विभाजित करना चाहते हैं। लम्बे समय के बाद 2014 से लेकर अब तक के आम चुनाव में वामपंथियों, राष्ट्र विरोधी, परिवारवादी राजनीतिक पार्टियों को करारी हार मिली है। यह हार उनको बर्दाश्त नहीं हो पा रही है। इसलिए वे संघ और मोदी सरकार के पीछे हाथ धोकर पड़े हैं। इन दिनों भारत में एक गहरा षड्यंत्र चल रहा है। भाषावाद, जातिवाद, प्रांतवाद जैसे विभिन्न विवादों के सहारे, हारे हुए सभी विरोधी अपनी बंजर हुई राजनीतिक जमीन को उपजाऊ बनाना चाहते हैं।
बावजूद इसके आज विकसित होने की दिशा में मार्गक्रमण कर रहा समर्थ भारत बदल रहा है, भारत में हिंदू जाग रहा है। ‘सर्वे भवंतु सुखिनः’ इस देश की मौलिकता है। इस मौलिकता को काटने वाला कोई भी सम्प्रदाय-मतप्रवाह वर्तमान भारत का नागरिक स्वीकार नहीं करेगा। समूचे भारत में राजनीतिक, सामाजिक, आध्यात्मिक, सांस्कृतिक आदि क्षेत्रों में जो सकारात्मक परिवर्तन दिखाई दे रहा है, यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 वर्षों के कार्य का सुखद परिणाम है। संघ के 100 वर्ष के प्रवास में राष्ट्र के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए देश के गांवों, शहरों, जिलों, तहसीलों में लाखों की संख्या में समर्पित स्वयंसेवक खड़े हुए हैं। परम वैभवशाली राष्ट्र के निर्माण के लिए, अपना सर्वस्व अर्पण करने के लिए ये सभी तैयार हैं। भविष्य में हम विकसित समर्थ भारत का जो दर्शन करना चाहते हैं, वह अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अथक प्रयासों के कारण समीप आता दिखाई दे रहा है, परंतु इस मार्ग के रोड़ों को पहचानना भी बहुत आवश्यक है।
जिस प्रकार भारत में आंतरिक स्तर पर षड्यंत्र किए जा रहे हैं, उसी प्रकार वैश्विक स्तर पर उसे विकसित राष्ट्र बनने से रोकने के प्रयास भी किए जा रहे हैं। पाकिस्तान की अणुबम गिराने की धमकी को कोरी धमकी समझना भी खतरे से खाली नहीं होगा क्योंकि यह धमकी पाकिस्तान का चोला ओढ़कर अमेरिका दे रहा है। यूक्रेन-रूस या इजराइल-ईरान युद्ध में कमजोर कड़ी को हथियार और अन्य साधन उपलब्ध करवाना, जिस प्रकार अमेरिका की चाल रही, उसी प्रकार पाकिस्तान को सामने रखकर भारत के विरुद्ध षड्यंत्र करना भी उसकी रणनीति का हिस्सा है। टैरिफ तो उसका सीधा वार है ही। अत: भारत को समर्थ या कहें विकसित राष्ट्र की दिशा में आगे बढ़ते समय इन सभी बातों की ओर ध्यान देना आवश्यक होगा। संघ की सीख ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ तो है ही, परंतु स्व संरक्षण करना भी संघ सिखाता है। अत: सामर्थ्यवान राष्ट्र बनने की दिशा में आगे बढ़ते समय भारत को इन सभी षड्यंत्रों से सावधान रहना होगा, तभी संघ का विश्वगुरु भारत का संकल्प सिद्ध हो सकेगा। साथ ही संघ को सामान्य नागरिकों का सामर्थ्य और क्षात्रतेज, संयम बढ़ाने की दृष्टि से भी काम करना होगा तथा समाज का निरंतर जागरण करना होगा।