ग्रामीण भारत की आजीविका को मजबूती देने में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा), 2005 की भूमिका ऐतिहासिक रही है। बीते दो दशकों में इस कानून ने केवल न्यूनतम आय सुरक्षा ही नहीं दी, बल्कि ग्रामीण मजदूरों को सम्मानजनक रोजगार का कानूनी अधिकार भी सुनिश्चित किया। वित्तीय वर्ष 2024-25 में अब तक 220 करोड़ से अधिक व्यक्ति-दिवस का रोजगार सृजित होना और महिलाओं की भागीदारी का 58 प्रतिशत से ऊपर पहुंचना इस योजना की व्यापक स्वीकार्यता और सामाजिक प्रभाव को दर्शाता है। कोविड-19 जैसे संकट के समय मनरेगा ने ग्रामीण पलायन रोकने और करोड़ों परिवारों को आजीविका का संबल देने में निर्णायक भूमिका निभाई।
इसी पृष्ठभूमि में 16 दिसंबर 2025 को लोकसभा में केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने ‘विकसित भारत—गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) (वीबी—जी राम जी) विधेयक, 2025’ प्रस्तुत किया। यह विधेयक मनरेगा अधिनियम को निरस्त कर ग्रामीण रोजगार के लिए एक नया ढांचा स्थापित करता है। सरकार का दावा है कि यह बदलाव ‘विकसित भारत 2047’ के विजन के अनुरूप है, जबकि आलोचक इसे अधिकार-आधारित व्यवस्था से पीछे हटने के रूप में देख रहे हैं।
क्या बदलेगा नए कानून में?
मनरेगा की सबसे बड़ी विशेषता उसका डिमांड-ड्रिवन स्वरूप था— काम मांगने पर सरकार की जिम्मेदारी होती थी कि रोजगार उपलब्ध कराया जाए। नए विधेयक में यह अधिकार कमजोर पड़ता दिखता है। अब रोजगार की वैधानिक गारंटी की जगह केंद्र सरकार की एक योजना का स्वरूप सामने आता है, जिसमें काम मांगने के अधिकार का स्पष्ट उल्लेख नहीं है। यही पहलू विपक्ष और सामाजिक संगठनों की सबसे बड़ी चिंता का कारण है।
हालांकि, सरकार ने रोजगार गारंटी के दिनों को 100 से बढ़ाकर 125 दिन करने का प्रस्ताव रखा है। महंगाई, ग्रामीण बेरोजगारी और जलवायु अस्थिरता के दौर में यह एक सकारात्मक संकेत हो सकता है। लेकिन व्यवहारिक सच्चाई यह है कि पिछले पांच वर्षों में मनरेगा के तहत औसतन 50-55 दिन से अधिक का रोजगार शायद ही उपलब्ध हो पाया हो। ऐसे में सवाल यह है कि अतिरिक्त 25 दिन की गारंटी कागजों तक सीमित न रह जाए।
![]()
काम के स्वरूप में भी बड़ा बदलाव प्रस्तावित है। मनरेगा की व्यापक कार्यसूची की जगह अब चार प्राथमिक क्षेत्र तय किए गए हैं— जल सुरक्षा, कोर ग्रामीण अवसंरचना, आजीविका-संबंधित परिसंपत्तियां और जलवायु परिवर्तन से निपटने वाले कार्य। इन परिसंपत्तियों को पीएम गति शक्ति से जुड़े राष्ट्रीय डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर स्टैक में मैप किया जाएगा। सरकार का तर्क है कि इससे टिकाऊ और उपयोगी परिसंपत्तियां बनेंगी और पहले की तरह गुणवत्ताहीन कार्यों की पुनरावृत्ति नहीं होगी।
कृषि सीजन के दौरान 60 दिनों का ‘पॉज’ प्रावधान भी किया गया है, ताकि मजदूर खेती में उपलब्ध रहें। यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था की वास्तविकताओं को ध्यान में रखता है, लेकिन आपदा या संकट के समय यही प्रावधान सुरक्षा कवच को कमजोर भी कर सकता है। मजदूरी भुगतान साप्ताहिक या अधिकतम पखवाड़े में करने का प्रस्ताव स्वागतयोग्य है, क्योंकि भुगतान में देरी मनरेगा की पुरानी समस्या रही है।
डिजिटल व्यवस्था को भी सुदृढ़ किया गया है— बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण, जीपीएस निगरानी, मोबाइल ऐप डैशबोर्ड और साप्ताहिक सार्वजनिक प्रकटीकरण जैसे उपाय पारदर्शिता बढ़ा सकते हैं। हालांकि, डिजिटल साक्षरता और नेटवर्क की कमी से जूझ रहे मजदूरों के लिए यह एक नई चुनौती भी बन सकती है।

वित्तीय ढांचे पर सबसे बड़ा सवाल
नए विधेयक का सबसे प्रमुख पहलू उसका वित्तीय ढांचा है। मनरेगा में जहां केंद्र सरकार की हिस्सेदारी 90 से 100 प्रतिशत तक रही, वहीं अब इसे केंद्र प्रायोजित योजना बना दिया गया है। सामान्य राज्यों के लिए 60:40 और विशेष राज्यों के लिए 90:10 का अनुपात तय किया गया है। इसके साथ ही केंद्र सरकार वार्षिक ‘नॉर्मेटिव अलोकेशन’ तय करेगी, जिससे अधिक खर्च का बोझ राज्यों पर आएगा।
सरकार का कहना है कि इससे राज्यों की जवाबदेही बढ़ेगी और संसाधनों का संतुलित वितरण होगा। लेकिन आशंका यह है कि गरीब और पिछड़े राज्यों के लिए अतिरिक्त वित्तीय बोझ उठाना आसान नहीं होगा। यदि राज्य समय पर अपना अंशदान नहीं दे पाए, तो रोजगार की उपलब्धता प्रभावित होगी और योजना डिमांड-ड्रिवन की बजाय सप्लाई-ड्रिवन बन सकती है— जो मनरेगा की मूल भावना के विपरीत है।
नाम से आगे की बहस
विपक्ष इस बदलाव को केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि वैचारिक कदम मान रहा है। उनके अनुसार ‘गांधी’ नाम हटाना श्रम की गरिमा और अधिकार-आधारित सोच से दूरी का संकेत है। सरकार का तर्क है कि नाम से अधिक महत्वपूर्ण परिणाम हैं— और आज का ग्रामीण भारत केवल मजदूरी नहीं, बल्कि स्थायी आजीविका, कौशल और जलवायु लचीलेपन की मांग कर रहा है।
ग्रामीण भारत में बुनियादी सुविधाओं का विस्तार हुआ है, लेकिन असमानताएं अब भी मौजूद हैं। ऐसे में सवाल यही है कि क्या नया कानून रोजगार को अधिकार के रूप में मजबूत करेगा या उसे सरकारी विवेक पर निर्भर बना देगा।
वीबी—जी राम जी विधेयक की सफलता इसी संतुलन पर निर्भर करेगी। यदि 125 दिन का रोजगार वास्तव में उपलब्ध हो, टिकाऊ परिसंपत्तियां बनें और केंद्र-राज्य सहयोग पारदर्शी रहे, तो यह ग्रामीण भारत को नई दिशा दे सकता है। लेकिन यदि वित्तीय बोझ और नॉर्मेटिव अलोकेशन से अधिकार सीमित हुए, तो यह सुरक्षा कवच में सेंध भी लगा सकता है। संसद में बहस को नाम और राजनीति से ऊपर उठकर इन वास्तविक मुद्दों पर केंद्रित होना चाहिए— ताकि विकसित भारत का सपना गांव के अंतिम व्यक्ति तक सम्मानजनक श्रम और स्थायी आजीविका के रूप में पहुंचे।
— डॉ. संतोष झा
“इस बारे में आपकी क्या राय है? नीचे कमेंट्स में बताएं।”

