| भारत में RSS न तो कोई राजनीतिक पार्टी है और न ही कोई गुप्त या हिंसक संगठन। यह एक स्वयंसेवक आधारित सांस्कृतिक संगठन है, जो लगभग 100 वर्षों से समाज के बीच रहकर काम कर रहा है। इसके बावजूद जैसे ही ‘फार-राइट’ का ठप्पा लगाया जाता है, लेखक भारतीय सामाजिक वास्तविकताओं को समझने की ज़िम्मेदारी से मुक्त हो जाता है और हर जन-आंदोलन, हर वैचारिक प्रभाव को उग्रवाद के रूप में पेश किया जाने लगता है। |
हिंदू समाज के संगठित उत्थान से वामपंथी इको-सिस्टम आखिर इतना डरा हुआ क्यों है, यह प्रश्न आज अचानक नहीं उठा है। यह डर वर्षों से भीतर ही भीतर पल रहा था, जो अब खुलकर सामने आने लगा है। भारत में ही नहींबल्कि वैश्विक स्तर पर भी एक वैचारिक विषवमन लगातार देखने को मिल रहा है। इसका ताज़ा उदाहरण 26 दिसंबर को The New York Times में प्रकाशित लेख “From the Shadows to Power: How the Hindu Right Reshaped India” है। इस लेख के माध्यम से वही पुराना लेफ्ट-लिबरल प्रोपेगंडा दोहराया गया है, जिसमें यह सिद्ध करने का प्रयास किया गया है कि हिंदू उत्थान ने भारत के तथाकथित धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को बदलकर रख दिया है।
यह लेख केवल Rashtriya Swayamsevak Sanghकी आलोचना भर नहीं है, बल्कि समाज के लिए काम कर रहे देश के सबसे बड़े सांस्कृतिक संगठन को बदनाम करने की एक सुनियोजित कोशिश है। इसमें एक वैचारिक कहानी गढ़ी गई है, जिसमें RSS को एक रहस्यमय, बेहद ताकतवर और ‘फार-राइट’ गुप्त संगठन के रूप में दिखाया गया है। पूरा चित्रण ऐसा है मानो RSS कोई गुप्त ‘इल्यूमिनाटी’ हो, जो पर्दे के पीछे बैठकर भारत की राजनीति, प्रशासन, न्यायपालिका और समाज को नियंत्रित कर रहा हो। यदि इस लेख और ऐसे ही अन्य लेखों पर भरोसा किया जाए, तो ऐसा लगता है मानो RSS ने भारत की संस्थाओं में ‘घुसपैठ’ कर ली है और चुपचाप देश के पंथनिरपेक्ष गणराज्य को कमजोर किया जा रहा है।
मसला यह नहीं है कि कोई विदेशी अख़बार RSS की आलोचना करता है। भारत में काम करने वाले संगठनों पर सवाल उठाना किसी भी मीडिया का अधिकार है। असली समस्या यह है कि यह आलोचना किस भाषा, किस दृष्टि और किस एजेंडे के साथ की जा रही है। इन लेखों में प्रयुक्त भाषा गहरे पूर्वाग्रह से भरी हुई है। इतिहास को चुन-चुनकर पेश किया गया है और ठोस प्रमाणों की जगह संकेतों, उपमाओं और आरोपों ने ले ली है। यह वही जानी-पहचानी लेफ्ट-लिबरल सोच है, जिसमें हिंदुओं का संगठित होना अपने आप में खतरा मान लिया जाता है।
‘फार-राइट’ जैसे शब्द यहाँ समझाने के लिए नहीं, बल्कि ठप्पा लगाने के लिए इस्तेमाल किए गए हैं। यह शब्द पश्चिमी राजनीति की शब्दावली से लिया गया है, जिसका भारतीय समाज और परिस्थितियों से कोई सीधा संबंध नहीं है। भारत में RSS न तो कोई राजनीतिक पार्टी है और न ही कोई गुप्त या हिंसक संगठन। यह एक स्वयंसेवक आधारित सांस्कृतिक संगठन है, जो लगभग 100 वर्षों से समाज के बीच रहकर काम कर रहा है। इसके बावजूद जैसे ही ‘फार-राइट’ का ठप्पा लगाया जाता है, लेखक भारतीय सामाजिक वास्तविकताओं को समझने की ज़िम्मेदारी से मुक्त हो जाता है और हर जन-आंदोलन, हर वैचारिक प्रभाव को उग्रवाद के रूप में पेश किया जाने लगता है।

दिलचस्प यह है कि लेख में ‘नाजी’ शब्द सीधे तौर पर नहीं बोला गया, लेकिन पूरी कहानी उसी दिशा में पाठक को ले जाती है। 1930-40 के दशक के यूरोप का संदर्भ, फासीवादी आंदोलनों की तस्वीरें, एम.एस. गोलवलकर के लेखन को हिटलर और यहूदियों से जोड़ने का प्रयास—यह सब इस तरह किया गया है कि आज के RSS को यूरोपीय फासीवाद के नैतिक बोझ से जोड़ दिया जाए। इन ऐतिहासिक संदर्भों की गंभीर पड़ताल नहीं की गई, न ही यह बताया गया कि भारतीय परिस्थितियाँ यूरोप से बिल्कुल भिन्न थीं।
पूरे लेख में ‘शैडोई कबाल’, ‘गुप्त संगठन’, ‘अर्धसैनिक अनुशासन’, ‘सुप्रीमेसी’, ‘संस्थाओं में घुसपैठ’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल वही भाषा है, जो पश्चिमी मीडिया तानाशाही आंदोलनों के लिए करता रहा है। सीधे आरोप न लगाकर, लेकिन संकेतों से पूरी कहानी भर दी जाती है, ताकि बाद में कहा जा सके कि कोई सीधा आरोप नहीं लगाया गया। असल उद्देश्य पूरा हो जाता है—हिंदुओं के सामाजिक संगठन को ही खतरनाक दिखाना।

यह और भी अजीब लगता है जब RSS की वास्तविक कार्यप्रणाली को देखा जाए। RSS की शाखाएँ खुले मैदानों और मोहल्लों के पार्कों में लगती हैं। कोई भी व्यक्ति वहाँ आ सकता है, चाहे वह सदस्य हो या न हो। संघ से जुड़े लोग अपनी पहचान छिपाते नहीं हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं अपने संघ-सम्बंध को सार्वजनिक रूप से स्वीकार करते हैं। मंत्री, सांसद, न्यायाधीश, अधिकारी और अन्य पेशेवर लोग भी खुले तौर पर संघ से अपने संबंध बताते हैं। फिर भी RSS को गुप्त ‘इल्यूमिनाटी’ की तरह पेश किया जाता है। असल में असहजता गोपनीयता से नहीं, बल्कि संगठन के विशाल सामाजिक विस्तार से है।
‘घुसपैठ’ का आरोप भी बिना किसी प्रमाण के लगाया गया है। न कोई दस्तावेज, न कोई आदेश-प्रणाली, न कोई वित्तीय नेटवर्क। केवल विचारधारा की समानता को साजिश का प्रमाण मान लिया गया है। यदि यही तर्क दशकों से विश्वविद्यालयों, मीडिया और बौद्धिक संस्थानों पर हावी वामपंथी प्रभाव पर लगाया जाए, तो वही लोग इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कहकर बचाव में उतर आएँगे।

इतिहास के संदर्भ में भी वही चयनात्मक दृष्टि दिखाई देती है। गांधी हत्या का उल्लेख बार-बार किया जाता है, लेकिन यह तथ्य जानबूझकर छोड़ दिया जाता है कि भारतीय अदालतें RSS को एक संगठन के रूप में इस मामले में दशकों पहले बरी कर चुकी हैं। अदालतों के फैसले स्वीकार कर लिए जाएँ तो पूरी कहानी ढह जाती है, इसलिए संकेत अधूरे छोड़े जाते हैं।
वर्तमान घटनाओं में भी यही पैटर्न है। उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था सुधार के लिए की गई कार्रवाइयों को उनके संदर्भ से काटकर धार्मिक दमन के रूप में दिखाया जाता है। 2017 से पहले दंगे, गैंगवार और अपराध किस स्तर पर थे, यह बताने की ज़रूरत नहीं समझी जाती। कारणों को हटाकर केवल कार्रवाई दिखाई जाती है, ताकि शासन तानाशाही और जनसमर्थन भीड़-मानसिकता लगे।
जब बात संघ से जुड़े सेवा कार्यों की आती है, तब लेफ्ट-लिबरल मीडिया की असली परेशानी सामने आती है। शिक्षा, स्वास्थ्य, आपदा-राहत, योग, अनाथालय, वृद्धाश्रम—इन सबको ‘वैचारिक नियंत्रण’ का साधन बताया जाता है। यही काम यदि विदेशी फंडिंग वाले NGO या सोरोस-USAID से जुड़े संस्थान करें, तो वे लोकतंत्र और मानवाधिकार के रक्षक कहलाते हैं। समस्या काम से नहीं, बल्कि उस आत्मनिर्भर सामाजिक ढाँचे से है, जो बिना विदेशी धन और वैचारिक प्रमाणपत्र के खड़ा हो गया है।

सच यह है कि संघ का कार्य केवल वर्तमान तक सीमित नहीं रहा है। कश्मीर के भारत में विलय से लेकर 1962, 1965 और 1971 के युद्धों तक, गोवा के स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर गुजरात भूकंप जैसी आपदाओं तक—संघ के स्वयंसेवक हर संकट में समाज और राष्ट्र के साथ खड़े रहे हैं। विद्या भारती, भारतीय किसान संघ, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, सेवा भारती, मेडीकोज ऑर्गेनाइजेशन जैसे हजारों प्रकल्प समाज में चल रहे हैं, जो राष्ट्र निर्माण की प्रेरणा से संचालित हैं।

संघ का प्रयास किसी एक पंथ या पूजा-पद्धति तक सीमित नहीं है। वह हर उस व्यक्ति को साथ जोड़ने का प्रयास करता है, जो राष्ट्रनिष्ठ विचारधारा को मानता है—चाहे वह हिंदू हो, मुस्लिम हो या ईसाई। व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण की यह यात्रा 1925 से निरंतर चल रही है।
यही कारण है कि वामपंथी इको-सिस्टम और चर्च-आधारित व इस्लामी इको-सिस्टम को संघ से चिढ़ है। वे जानते हैं कि जिस समाज को जाति, भाषा, मत और पंथ से ऊपर उठाकर संगठित कर दिया गया, उसे बाँटना आसान नहीं रहेगा।
संघ का लक्ष्य समाज की इस ऊर्जा को जोड़कर भारत को उसके परम वैभव शिखर तक पहुँचाना है—वही लक्ष्य, जो संघ की प्रार्थना में प्रतिदिन दोहराया जाता है—
समुत्कर्ष निःश्रेयसस्यैकमुग्रम्…
परं वैभवं नेतुमेतत् स्वराष्ट्रम्…
भारत माता की जय—
इसी भाव के साथ स्वयंसेवक कार्य करता है।
और शायद यही भाव वामपंथी इको-सिस्टम को सबसे अधिक असहज करता है।
“इस बारे में आपकी क्या राय है? नीचे कमेंट्स में बताएं।”
- दीपक कुमार द्विवेदी

