| बैतूल जेल में श्रीगुरुजी के बंदी रहने के समय को दुखद किंतु ऐतिहासिक काल कहा जाता है। श्री गुरुजी ने इस विकट, दुधूर्ष अग्निपरीक्षा के समय में अद्भुत धैर्य का परिचय देते हुए बैतूल जेल से अनेकों पत्रों व संवादों के माध्यम से देश भर के स्वयंसेवकों के मनोबल को बनाए रखा था तथा देश के वातावरण में राष्ट्रीयता का प्रवाह भी बनाए रखा था। |
सर्वविदित है कि परम पूजनीय श्रीगुरुजी माधव सदाशिवराव गोलवलकर बैतूल के कारागार के बैरक क्र. 1 में रह चुके हैं। वे यहाँ 1 जनवरी 1949 से 6 जून 1949 तक बंदी रहे थे। बैतूल कारागार के जिस बैरक में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय परमपूजनीय सरसंघचालक श्रीगुरुजी को बंदी बनाकर रखा गया था वह कक्ष आज भी एक लघु स्मारक के रूप में रिक्त रहता है। इस कक्ष में श्री गुरुजी का एक चित्र लगा हुआ है व उनके कारागार प्रवास के संदर्भ में कक्ष की दीवार पर संक्षिप्त लेखन भी है। बैतूल जेल के इस लघु स्मारक को अब एक भव्य, दिव्य स्मारक में परिवर्तित करने की चाह देश भर के स्वयंसेवकों में है।
वर्ष 2017 में परमपूजनीय सरसंघचालक डॉ. मोहनराव जी भागवत ने भी जेल के इस कक्ष में जाकर श्रीगुरुजी को श्रद्धासुमन अर्पित किए थे।
गांधी जी की दुखद हत्या के पश्चात् नेहरू सरकार ने आरएसएस पर प्रतिबंध लगा दिया था। श्री गुरुजी सहित 20 हजार अग्रणी स्वयंसेवक गिरफ्तार कर लिए गए थे। उस समय के प्रसिद्ध मराठी समाचार पत्र ‘केसरी’ के संपादक केतकर जी सरकार व संघ के मध्य संवाद करा रहे थे।
केतकर जी 12 व 16 जनवरी 1649 को श्री गुरुजी से सिवनी कारागार में मिले थे। उन्होंने श्री गुरुजी से संघ के सत्याग्रह को समाप्त करने का आग्रह किया। श्रीगुरुजी ने परिस्थितियों का आकलन किया व आंदोलन स्थगित कर दिया। 22 जनवरी को संघ के सत्याग्रह प्रभारी महावीर जी ने आंदोलन स्थगित करने की घोषणा कर दी। तब जाकर कहीं सरकार ने राहत की साँस ली थी।
यह भी एक स्मरणीय तथ्य है कि नेहरू जी की हठधर्मिता से संघ पर 1948 में लगे प्रतिबंध हटाने की भूमिका भी बैतूल जेल के बैरक क्र. 1 में ही लिखी गई थी।
देश के प्रमुख समाचार पत्र ‘द ट्रिब्यून’ ने 22 जन. 1949 को संघ प्रतिबंध को अनैतिक बताते हुए लिखा – “अब नेहरू सरकार को संघ से प्रतिबंध हटा लेना चाहिए”।
संघ के इस आंदोलन के प्रति देश की जनता में बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए नेहरू सरकार घबरा गई थी। सरकार ने तत्काल ही पाँसा फेंका और प. मौलिचन्द्र शर्मा को संघ से चर्चा करने हेतु आगे बढ़ाया।
इस समय तक श्री गुरुजी को सिवनी कारागार से बैतूल कारागार में स्थानांतरित किया जा चुका था। 10 जुलाई को मौलिचन्द्र शर्मा श्री गुरुजी से भेंट करने बैतूल जेल आए थे। बैतूल जेल से ही श्री गुरुजी एवं मौलिचन्द्र शर्मा की चर्चा के आधार पर नेहरू जी ने 12 जुलाई को संघ से प्रतिबंध हटाया था व 13 जुलाई को प्रातः समय में श्री गुरुजी को बैतूल जेल से मुक्त कर दिया गया था। (संदर्भ – श्री गुरुजी समग्र, खंड 2, पृष्ठ 45)

बैतूल जेल से निकलने के तत्काल बाद ही श्री गुरुजी जीटी एक्सप्रेस से नागपुर चले गए थे। श्री गुरुजी के बैतूल से प्रस्थान के समय का एक किस्सा संघ क्षेत्रों में बहुधा ही कहा सुना जाता है। कहा जाता है कि श्री गुरुजी ने बैतूल स्टेशन पर छोड़ने आए स्वयंसेवकों से कहा था – “जिस दिन बैतूल में संघ का कार्य सुदृढ़ और संपुष्ट हो जाएगा उस दिन समूचे देश में संघ विचार सुदृढ़ हो जाएगा”।
बैतूल जेल में श्रीगुरुजी के बंदी रहने के समय को दुखद किंतु ऐतिहासिक काल कहा जाता है। श्री गुरुजी ने इस विकट, दुधूर्ष अग्निपरीक्षा के समय में अद्भुत धैर्य का परिचय देते हुए बैतूल जेल से अनेकों पत्रों व संवादों के माध्यम से देश भर के स्वयंसेवकों के मनोबल को बनाए रखा था तथा देश के वातावरण में राष्ट्रीयता का प्रवाह भी बनाए रखा था। समूचे देश के लाखों स्वयंसेवकों व सामान्य जनता श्रीगुरुजी के संदेशों हेतु बैतूल जेल की ओर टकटकी लगाए देखते रहती थी। बैतूल देश की धड़कनों के केंद्र में आ गया था। बैतूल जेल में रहते हुए ही श्री गुरुजी ने नेहरू सरकार पर इतना दबाव बना लिया था कि नेहरू सरकार को न चाहते हुए भी श्री गुरुजी को जेल से मुक्त करना पड़ा था।
श्री गुरुजी के बैतूल जेल में बंदी रहने के मध्य उन्होंने देश भर में ऐसा वातावरण निर्मित कर दिया था कि गृह मंत्री वल्लभभाई पटेल ने भी नेहरू जी पर अंगुली उठाते हुए 27 फरवरी 1948 को एक पत्र लिखा था – “बापू की हत्या की जाँच में हो रही प्रगति पर मैंने प्रायः प्रतिदिन ध्यान दिया है। सभी प्रमुख अपराधियों ने अपनी गतिविधियों के लम्बे और विस्तृत वक्तव्य दिए हैं। उन वक्तव्यों से यह बात भी स्पष्ट रूप से उभर कर आती है कि इस सारे मामले में संघ कहीं भी संलिप्त नहीं है।”
(संदर्भ – 1.श्री गुरुजी समग्र दर्शन-2, पृष्ठ 2-10, संदर्भ 2. पहली अग्नि परीक्षा, मामा माणिकचंद्र वाजपेयी, पृष्ठ 23-24, संदर्भ 3. Sardar Patel’s Correspondence, Vol. VI PAGE 56)
श्री गुरुजी को बैतूल कारागार में नाना प्रकार से प्रताड़ित किया गया था। उन्हें भोजन, पहनने को कपड़े व कंबल आदि अत्यंत निम्नस्तरीय प्रकार के दिए जाते थे। कष्ट, प्रताड़ना, व निम्न स्तरीय भोजन, वस्त्र से उत्पन्न कष्ट से श्रीगुरुजी को कोई अन्तर नहीं पड़ता था। वे तो निस्पृह योगी थे। बिना भगवा पहने ही एक महान सन्यासी थे। उन्होंने बैतूल जेल में मिले उस सम्पूर्ण गरल को नीलकंठ बन अपने कंठ में स्थिर कर दिया था। बैतूल जेल उनके लिए एक साधना केंद्र हो गई थी।
बैतूल कारागार में श्रीगुरूजी ने संघ का संविधान तैयार करने के कार्य को प्रारंभ व पूर्ण किया था व अपने हस्ताक्षर के साथ इसे जारी किया था।
श्रीगुरुजी गोलवलकर का बैतूल जेल प्रवास संघ के इतिहास का एक निर्णायक मोड़ था और बैतूल की यह जेल संघ के संविधान की जन्मस्थली।
बैतूल कारागार में रहते हुए श्रीगुरुजी ने संघ की राजनाति में शुचिता, पवित्रता व समाज योगदान के संदर्भ में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल के साथ बहुत व्यापक पत्राचार किया। इन पत्रों को बाद में “Justice on Trial” नामक पुस्तक में प्रकाशित भी किया गया था।
श्री गुरुजी ने तत्कालीन नेहरूवियन सरकार से आग्रह किया था कि यदि संघ के विरुद्ध कोई साक्ष्य है तो उसे सार्वजनिक किया जाए, अन्यथा प्रतिबंध हटाकर स्वयंसेवकों को राष्ट्र निर्माण में योगदान देने दिया जाए। बैतूल कारागार में रहने के मध्य श्री गुरुजी उस समय के उदारवादी नेता टी.आर.वी. शास्त्री से सतत् संपर्क में थे। शास्त्री जी ने भी नेहरू-गांधी की सरकार और गुरुजी के बीच मध्यस्थता की थी।
उस समय की जवाहर लाल नेहरू की आत्ममुग्ध, अंग्रेजीदां शैली से चलने वाली सरकार ने संघ पर नाना प्रकार के आरोप लगाए थे। श्री गुरुजी ने जेल में रहते हुए ही समूचे राष्ट्र को स्पष्ट कर दिया था कि संघ एक घोर राष्ट्रवादी, संस्कृति केंद्रित व समाज आधारित संगठन मात्र है।
उस समय के तत्कालीन गृह सचिव आर.एन. बनर्जी ने, गांधी हत्या में संघ की संलिप्तता के मिथ के संदर्भ में सार्वजनिक तौर पर कहा था कि सम्पूर्ण, गहन व सघन जांच की गई है जिसमें संघ का गांधी जी की हत्या में रज मात्र भी भूमिका नहीं दिखती है।
आज बैतूल जिले की यह ऐतिहासिक जेल निजी क्षेत्र को विक्रित की जाकर तोड़े जाने के कगार पर है। आवश्यकता इस बात की है कि जेल परिसर में निर्मित इस ‘गुरुजी कक्ष’ को या ‘संघ संविधान जन्म कक्ष’ को सुरक्षित रखकर एक स्मारक के रूप में सुरक्षित रखा जाए। समूचा देश बैतूल जेल के इस कक्ष को एक विशाल, भव्य स्मारक के रूप में देखना चाहता है।
– डॉ. प्रवीण दाताराम गुगनानी

