| दुर्गानंद नाडकर्णी केवल संघ के प्रचारक नहीं थे, बल्कि राष्ट्रनिर्माण की प्रक्रिया के एक सर्जक व्यक्तित्व थे। आज के युवाओं के लिए यह श्रद्धांजलि सभा शोक नहीं, बल्कि दिशादर्शन थी। यदि व्यक्ति, समाज और राष्ट्र का निर्माण करना है, तो पहले मनुष्यों को जोड़ना सीखना होगा। |
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भारत की ग्रामीण पृष्ठभूमि से लेकर वैश्विक स्तर तक प्रभावी रूप से कैसे पहुँचा? यह प्रश्न अनेक लोगों के मन में कौतूहल उत्पन्न करता है। इतनी व्यापक भौगोलिक सीमा, विविध भाषाएँ, संस्कृतियाँ, श्रद्धाएँ और सामाजिक संरचनाएँ होते हुए भी संघ का कार्य भारत में ही नहीं, देश के बाहर भी कैसे स्वीकार किया गया? इसका उत्तर केवल संगठनात्मक ढाँचे में नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा गढ़े गए मनुष्यों के आचरण और उनके दैनिक व्यवहार में निहित है। इस उत्तर की खोज करते समय संघ की नियमावली या औपचारिक संरचना से अधिक, संघ के स्वयंसेवकों के मानस को समझना आवश्यक हो जाता है। वह मानस अर्थात सामान्य स्वयंसेवक, विस्तारक और विशेषतः प्रचारकों से संबंधित है।
संघ का विस्तार किसी लिखित नियमों के कारण नहीं हुआ, क्योंकि संघ में कोई लिखित नियम नहीं हैं। यह विस्तार प्रचारकों और स्वयंसेवकों के समर्पित जीवन के कारण संभव हुआ। प्रचारक केवल पूर्णकालिक कार्यकर्ता नहीं होता, बल्कि वह समाज से संवाद करने वाला, समाज-मन के भावविश्व में उतरने वाला और अपने आचरण तथा दैनिक व्यवहार के माध्यम से विचारों को संप्रेषित करने वाला विशिष्ट व्यक्तित्व होता है। इस प्रचारक परंपरा का सजीव और मूर्त उदाहरण थे वरिष्ठ प्रचारक दुर्गानंद नाडकर्णी।
दुर्गानंद नाडकर्णी का हाल ही में लातूर में निधन हुआ। कोकण प्रांत के मुंबई स्थित संघ कार्यालय यशवंत भवन में आयोजित किया गया था. रा. स्व. संघ के पूर्व सरकार्यवाह एवं वर्तमान अखिल भारतीय कार्यकारणी सदस्य मा. भैय्याजी जोशी प्रमुख वक्ता के रूप में उपस्थित थे. यह श्रद्धांजलि सभा केवल शोक व्यक्त करने का अवसर नहीं थी, बल्कि यह इस प्रश्न का उत्तर भी थी कि संघ कैसे बढ़ता है। उपस्थित कार्यकर्ताओं की दुर्गानंद नाडकर्णी से जुड़ी स्मृतियाँ सुनते समय कभी हँसी, कभी आश्चर्य और कभी आँखों में आँसू आ जाते थे, परंतु कहीं भी रूखी गंभीरता नहीं थी। क्योंकि दुर्गानंद नाडकर्णी का संपूर्ण जीवन विविध रंगों एवं तरंगों से भरा हुआ था, कठोर, परंतु करुणा से परिपूर्ण; विनोदी किंतु लक्ष्य से कभी विचलित न होने वाला, मनुष्य निर्माण करते समय मनुष्यों को सहेजने वाला, भावनाओं और कर्तव्य के बीच संतुलन को भली-भाँति समझने वाला।
यशवंत भवन में आयोजित यह श्रद्धांजलि सभा केवल शोकसभा नहीं थी, बल्कि संघ की कार्यपद्धति को समझने की एक खुली किताब थी। सामान्यतः श्रद्धांजलि सभाएँ गंभीर वातावरण, नम आँखें और संयत शब्दों से भरी होती हैं, परंतु इस सभा में एक अलग ही दृश्य था। अनुभव सुनते समय कभी हँसी के फव्वारे छूटते थे, कभी आँखें भर आती थीं और कभी यह आश्चर्य होता था कि “भारत माता की सेवा और हिंदू समाज संगठन का कार्य इस प्रकार भी किया जा सकता है?”
दुर्गानंद नाडकर्णी ने प्रचारक बनने का निर्णय उस समय लिया, जब घर की परिस्थितियाँ अत्यंत कठिन थीं। बीमार माँ, परिवार में गहरी आर्थिक तंगी ऐसे समय में उन्होंने संघ प्रचारक के रूप में निकलने का निश्चय किया। तब उनके पिता का प्रश्न स्वाभाविक था, “पहले माँ की देखभाल करो, फिर भारत माता की सेवा के लिए जाना” किंतु दुर्गानंद नाडकर्णी ने भावना और कर्तव्य के बीच कर्तव्य को चुना। यह निर्णय परिजनों को अप्रिय लगा, परंतु यही निर्णय उनके संपूर्ण जीवन की दिशा बना और राष्ट्र निर्माण हेतु अपना योगदान देने के लिए दुर्गानंद जी सारे बंधन तोड़कर संघ कार्य की राह पर निकल पड़े।
संघ की कार्यपद्धति का एक महत्वपूर्ण सूत्र है, कार्यकर्ताओं के प्रति अपनत्व भाव। प्रचारक के रूप में कार्य करते समय स्वयंसेवकों की आदतों, कठिनाइयों और रुचियों का ध्यान रखना दुर्गानंद नाडकर्णी की विशेषता थी। गोवा से मुंबई आए युवक राजन आरलेकर नामक एक प्रचारक को मछली खाने की आदत थी। प्रचारक जीवन में मछली मिलना कठिन था, इसलिए नाडकर्णी स्वयं उसे मुंबई के किसी अच्छे मांसाहारी होटल में ले जाते थे। यह घटना छोटी लग सकती है, परंतु इसमें संघ का मूल तत्व स्पष्ट होता है, यदि मनुष्य को सहेजा जाए, तो कार्य अपने आप बढ़ता है। यही राजन आरलेकर आगे चलकर बिहार और पूर्वोत्तर के एक राज्य के राज्यपाल बने हैं।
प्रचारक केवल पूर्णकालिक कार्यकर्ता नहीं होता, वह चलता-फिरता विचार, जिवंत संस्कार और आचरण के माध्यम से समाज में प्रकट होने वाली विचारधारा होता है। उसका कार्य कभी घोषणात्मक नहीं होता; वह सहवास, संवेदनशीलता और समाज के मन में उतरने वाली क्रियाओं से आकार लेता है। दुर्गानंद नाडकर्णी के सहज कार्य से इसकी अनुभूति होती है।
गोवा के शिरगांव में देवी के कौल का प्रसंग इस बात का प्रतीक है कि संघ कार्य समाज के साथ किस प्रकार एकरूप होता है। गांव के परंपरागत नियमों के अनुसार देवी की यात्रा के दिन गाँव छोड़ना वर्जित था, किंतु एक युवा स्वयंसेवक को संघ शिक्षा वर्ग में जाना आवश्यक था। नियम तोड़ने पर गाँव का विरोध तय था। यह विषय अंततः दुर्गानंद नाडकर्णी तक पहुँचा। टकराव के बजाय उन्होंने संवाद का मार्ग चुना। उन्होंने कहा कि जिस देवी की यात्रा है, उसी देवी से कौल पूछ लेते हैं। (कौल यानी भगवान से परवानगी लेना, उसकी गोवा में एक परंपरागत पद्धति है।) नाडकर्णी स्वयं उस स्वयंसेवक के परिवार के साथ मंदिर पहुँचे। यह बात पूरे गाँव में फैल गई और सैकड़ों ग्रामवासी मंदिर पहुँचे। मंदिर के पुजारी से कौल लगाने की बात कही गई, मंदिर के पुजारी ने मंदिर का दरवाजा तो खोल लेकिन स्वयं कौल लगाने से इनकार किया। उन्होंने कहा कि गांव की परंपरा के संदर्भ में मैं कोई छेड़छाड़ नहीं करूंगा। दुर्गानंद जी आप स्वयं देवी को कौल लगाइए।
दुर्गानंद जी ने स्वयं देवी को कौल लगाने की प्रक्रिया करना प्रारंभ किया। देवी के मूर्ति के दाएं बाजू में 10 फूलों के पंखुड़ियां रखी गई और बाई बाजू में 10 फूलों के पंखुड़ियां रखी गई। (यह वहां की परंपरा है कौल लगाने की) और देवी को हाथ जोड़कर दुर्गानंद नाडकर्णी जी ने आह्वान किया कि “हे माता देवी जिस प्रकार तू इस गांव की माता है, इस गांव की रक्षा करती है। आपकी सेवा में इस गांव का यह युवक निरंतर रहता है। आज आपका यही युवक इस देश की जो माता है भारत माता उसकी सेवा के लिए जा रहा है। आज आपकी यात्रा उत्सव का दिवस है। गांव की परंपरा के अनुसार किसी को गांव के बाहर जाने की अनुमति नहीं है, तो वह युवक आपकी अनुमति लेने के लिए आया है। अगर आपकी अनुमति है तो हमें दाएं बगल के पांचवी पंखुड़ियां नीचे गिरकर कॉल देना और तुम्हारा आशीर्वाद इस युवक को प्रदान करना।”
दुर्गानंद जी की यह बात पूरी नहीं होती तब तक उस देवी के दाएं बगल की पांचवी पंखुड़ी नीचे गिर गई। जैसे यह दृश्य मंदिर की पुजारी ने देखा तो, मंदिर का पुजारी दरवाजा खोलकर दौड़ते हुए आश्चर्य एवं आनंद भाव से बाहर खड़े गांव के लोगों तक पहुंचा और उन्होंने कहा कि कैंप में जाने के लिए देवी ने कॉल दे दिया है।
गोवा की परंपरा के अनुसार देवी से कौल लिया गया। अंततः देवी का कौल संघ के पक्ष में पड़ा। उस क्षण संघ गाँव वालों की दृष्टि में कोई बाहरी विचार नहीं, बल्कि ग्राम-संस्कृति से जुड़ा राष्ट्रकार्य बन गया।

दुर्गानंद नाडकर्णी स्वभाव से कड़े और वाणी से स्पष्ट थे। परंतु उस स्पष्टता में अहंकार नहीं था। मनोचिकित्सक डॉ. हरीश शेट्टी कहते हैं, “वे तिलगुल देते समय कहते थे, तिलगुल लो और स्पष्ट बोलो। मीठा बोलो, ऐसा वे कभी नहीं कहते थे।” उनके शब्दों और कर्मों में कभी विरोधाभास नहीं था।
विवेक समूह के दिलीप करंबेलकर अपने अनुभव स्पष्ट करते हुए बताते हैं कि उनकी मुंज विधि में दुर्गानंद नाडकर्णी जी ने 3 घंटे तक समारोह में आने वाले सभी मान्यवरों को अपनी बनाई हुई चाय पिलाई थी। दुर्गानंद नाडकर्णी की चाय बनाने की पद्धति का स्वाद कुछ अलग ही था। उनके स्वादपुर्ण चाय के कारण भी बहुत सारे लोग संघ में जुड़ गए थे। उन्होंने यह धारणा तोड़ दी कि संघ कार्य केवल गंभीरता और कठोर अनुशासन का नाम है। करंबेलकर जी आगे कहते हैं कि उन्होंने राजाभाऊ भोंसले जैसे संघ के कर्मठ और गंभीर रूप में संघ कार्य करने वाले प्रचारक का अनुभव लिया था। उनके बाद दुर्गानंद नाडकर्णी प्रचारक आ गए। बच्चों के साथ खेलते, हँसते-बोलते दुर्गानंद नाडकर्णी ने संघ को घर-घर पहुँचाया। दुर्गानंद नाडकर्णी जी क इसी सहज मानवीय पद्धति के कारण गोवा में संघ का कार्य व्यापक रूप से फैला हुआ है। यह बात दिलीप करंबेलकर जी ने अपने मनोगत में व्यक्ति की।

गोवा के मुख्यमंत्री और देश के रक्षा मंत्री रहे मनोहर पर्रिकर के पिता कांग्रेस विचारधारा के थे। उनके साथ संवाद, सहयोग और धैर्यपूर्ण व्यवहार के माध्यम से नाडकर्णी ने संघ का विचार उनके घर तक पहुँचाया। उसी घर से देश को एक ऐसा सुपुत्र मिला, जो रक्षा मंत्री के पद तक पहुँचा। यह संयोग नहीं, बल्कि संवाद से परिवर्तन की संघ परंपरा का परिणाम था।
जीवन के अंतिम चरण में दुर्गानंद नाडकर्णी ने प्रचारक दायित्व छोड़कर आध्यात्मिक मार्ग अपनाया और आगे चलकर दुर्गानंदगिरी महाराज के नाम से वे प्रसिद्ध हुए, यही उनके जीवन की पूर्णता थी।
दुर्गानंद नाडकर्णी जी को श्रद्धांजलि देते समय मा. भैयाजी जोशी ने अपनी भावनाएँ व्यक्त करते हुए कहा कि संघ का काम गंभीरता से करने का काम है। ऐसी कोई धारणा यदि किसी के मन में हो, तो वह सही नहीं है। संघ का काम सहजता से समाज में घुल-मिलकर आगे बढ़ाने का काम है। जिन्होंने इसे समझा, वही संघ को आगे ले गए। पु. ल. देशपांडे ने व्यक्ति और वल्ली लिखते समय केवल एक ही खंड लिखा है। यदि वे संघ में आए होते, तो उन्हें संघ के व्यक्तित्वों पर आधारित कम से कम पाँच से छह खंड लिखने पड़ते। इन सबके बीच दुर्गानंद नाडकर्णी व्यक्ति थे या वल्ली यह आप तय करें।
दुर्गानंद नाडकर्णी समाज में सहज रूप से विचरण करने वाले प्रचारक थे। समाज में संपर्क बनाने और संवाद साधने की जो विशेष कुशलता उनमें थी, उसी कुशलता को देखकर राम जन्मभूमि आंदोलन के समय उन्हें हिंदू एकजुटता का कार्य सौंपा गया होगा। दुर्गानंद नाडकर्णी के बौद्धिक सुनकर संघ परिवार के बाहर के अनेक लोग भी कहा करते थे कि नाडकर्णी को सुनने के बाद बालासाहेब ठाकरे से भी अधिक ज्वलंत वक्तव्य सुनने का आनंद मिलता है। कभी-कभी शिवसैनिक आकर कहते थे कि हमारे बालासाहेब से भी ये आपके दुर्गानंद नाडकर्णी ज़्यादा प्रभावी बोलते हैं।
मा. भैयाजी जोशी ने अपनी भावनाएँ व्यक्त करते हुए कहा कि दुर्गानंद नाडकर्णी के विविध भावनाओं और अनेक तरंगों से भरे जीवन से हमें संघभाव आत्मसात करना चाहिए। संघ में विभिन्न आयामों से परिपूर्ण लोग होते हैं, लेकिन उनकी यह परिपूर्णता संघ को परिपूर्ण बनाने में कैसे उपयोगी होती है, यह हमें दुर्गानंद नाडकर्णी के जीवन के संघ कार्य से समझ में आता है। जो व्यक्ति अंतर्बाह्य रूप से पारदर्शी और शुद्ध होता है, वही ऐसी भाषा का प्रयोग कर समाज को अपने साथ जोड़ सकता है। गंभीर, विचारशील, हास्य-विनोद करने वाले, समय आने पर कठोर होने वाले और राष्ट्र के लिए उपयुक्त निर्णय लेने वाले ऐसे विविध गुण जिनके भीतर मिलते हैं, ऐसी व्यक्तित्व दुर्गानंद नाडकर्णी थे।

श्रद्धांजलि सभा में व्यक्त स्मृतियों से यह स्पष्ट होता है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ किसी लिखित नियम से नहीं, बल्कि ऐसे समर्पित, संवेदनशील और आचरण के माध्यम से विचार जीने वाले प्रचारकों और स्वयंसेवकों से बढ़ा है। छोटी-छोटी क्रियाएँ, सरल संवाद और स्पष्ट आचरण इन्हीं से संघ का राष्ट्रकार्य खड़ा होता है।
दुर्गानंद नाडकर्णी केवल संघ के प्रचारक नहीं थे, बल्कि राष्ट्रनिर्माण की प्रक्रिया के एक सर्जक व्यक्तित्व थे। आज के युवाओं के लिए यह श्रद्धांजलि सभा शोक नहीं, बल्कि दिशादर्शन थी। यदि व्यक्ति, समाज और राष्ट्र का निर्माण करना है, तो पहले मनुष्यों को जोड़ना सीखना होगा। यही संदेश उस श्रद्धांजलि सभा में बार-बार उभरकर आ रहा था। श्रद्धांजलि सभागार में मंच पर लगे भगवा वस्त्रधारी, स्मित हास्य वाले दुर्गानंद नाडकर्णी के चित्र को देखकर ऐसा लगता था मानो वे अपनी खोडकर, मिश्किल शैली में कभी भी कोई हल्का-सा व्यंग्य कर ही देंगे।
मुंबई के यशवंत भवन स्थित संघ कार्यालय में कल दिनांक 5 जनवरी की शाम 7.30 बजे इस श्रद्धांजली सभा का आयोजन मा. भैयाजी जोशी की उपस्थिति में रा. स्व. संघ मुंबई महानगर द्वारा आयोजित किया गया था. इस समय मुंबई महानगर संघचालक सुरेश भगेरिया, मुंबई महानगर सह संघचालक डॉ. विष्णु वझे, बिमल केडिया, रमेश देवले, संजीव परब, रमेश ओवलेकर सहित रा. स्व. संघ कोंकण प्रांत के अनेक वरिष्ठ स्वयंसेवक उपस्थित थे. कार्यक्रम का सूत्र संचालन मिलिंद करमरकर ने किया.
– अमोल पेडणेकर


शिरगाव का स्वयंसेवक अभी कहाँ है?
उल्लेखित अपनत्व भाव गोवा में भी है क्या?