| फिल्मी हीरो और नेताओं को अपना आदर्श मानने के बजाए यदि भारतीय युवा स्वामी विवेकानंद, स्वातंत्र्यवीर सावरकर, छत्रपति शिवाजी महाराज, डॉ. हेडगेवार जैसे राष्ट्रपुरुषों व महापुरुषों से प्रेरणा ले, उन्हें अपना आदर्श मानें और उनके पदचिन्हों पर चलें तो उनका जीवन सफल व सार्थक हो सकता है। |
भारतीय इतिहास लेखन को गहनता से देखें तो यह प्रतीत होता है कि भारत में इतिहास केवल राजाओं का युद्ध या जीवन का परिचय मात्र नहीं बल्कि समाज को प्रेरित करने वाला एक अनुपम स्रोत है। यही कारण है कि प्राचीन भारतीय इतिहास लेखकों ने रामायण और महाभारत को इतिहास के पन्नों में अंकित करना आवश्यक समझा ताकि समाज धर्म के मार्ग पर चल सके।
ऋग्वेद में हरिश्चंद्र की कथा का उल्लेख आया है अर्थात विश्व का सबसे प्राचीन ग्रंथ ईश्वर को भी उतना ही महत्वपूर्ण स्थान देता है जितना धर्म के मार्ग पर चलने वाले मनुष्य को देता है। यह भारतीय संस्कृति की अनुपम विशेषता है कि यह प्रतीक और आदर्श का चुनाव बड़ा सोच के करती है। रावण, श्रीराम से किसी भी भौतिक वस्तु के मामले में ज्यादा साधन सम्पन्न था। दैवीय शक्तियां भी उसके पास अधिक थीं, परंतु राम केवल धर्म के साथ खड़े होने के कारण ही भारतीय इतिहास दृष्टि में सभी चक्रवर्ती सम्राटों से अधिक महत्वपूर्ण हैं। भारतीय संस्कृति-सभ्यता के प्रतीक के रूप में आज भी स्थापित हैं।
पराधीनता के कालखंड में भी भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों ने राष्ट्र जागरण के लिए बड़ी सुंदरता से प्रतीकों, चिन्हों और उद्घोषों का चयन किया था। उदाहरणस्वरूप ‘वंदे मातरम’ को ही देखें तो लगता है यह मात्र एक पंक्ति नहीं अपितु भारतीय भू-सांस्कृतिक एकता के दर्शन करवाने वाला ध्येय वाक्य है। उसी प्रकार गांधी की प्रेरणा ‘श्रीराम’ हैं तो वहीं अरबिंदो ‘शक्ति’ के उपासक हैं। सुभाषचंद्र बोस विवेकानंद को मानने वाले हैं। डॉ. हेडगेवार वीर हनुमान और छत्रपति शिवाजी महाराज से प्रेरणा लेते हैं। तिलक की प्रेरणा गीता है। सूक्ष्म विश्लेषण से यह ज्ञात होता है कि भारतीय समाज आदर्शों को लेकर शुरू से ही अत्यधिक चिंतनशील रहा है। ऐसा इसलिए है क्योंकि व्यक्ति के निर्माण में आदर्शों का बड़ा महत्व होता है।
औरंगजेब और दारा शिकोह के बीच चुनाव हो तो कोई भी समझदार व्यक्ति दारा शिकोह के पीछे ही खड़ा मिलेगा क्योंकि ओसामा को आदर्श मानने वाले या याकूब मेमन को आदर्श मानने वाले व्यक्ति से आप देश को जोड़ने की अपेक्षा नहीं रख सकते। डॉ. आम्बेडकर और जोगिंदर नाथ मण्डल दोनों भारत से थे, पिछड़े वर्ग की चिंता करने वाले लोग थे, किंतु एक समझदार व्यक्ति का आदर्श आम्बेडकर हो सकते हैं, मण्डल नहीं। आदर्शों के चुनाव को लेकर भारतीय समाज की सजगता ने ही उसे विपत्तियों में हमेशा बचाए रखा है।

संघर्ष के हजार वर्षों में समाज के प्रत्येक कोने में शंकराचार्य, संत कबीर, गुरु नानक देव जैसे असंख्य आध्यात्मिक तो वहीं महाराणा प्रताप, लाचित बोरफुकन, छत्रपति शिवाजी महाराज जैसे अनेक साहसी नायकों ने वीरता और स्वदेश प्रेम के बल पर समाज को जोड़े रखा। यह आदर्श भारत की सबसे बड़ी शक्ति थी, जिसने भारतीय संस्कृति को विजय दिलाई।
वर्तमान में सनातन की इस परम पवित्र धरा पर एक बड़ा संकट मंडरा रहा है क्योंकि युवाओं के आदर्श सिनेमा और सोशल मीडिया जगत के कुछ लोगों तक सीमित रह गया है। सूक्ष्म दृष्टि से विचार करने पर यह ध्यान आता है कि यह अभी हाल ही मैं पैदा हुआ दोष नहीं है बल्कि एक सोची-समझी रणनीति है जिसकी शुरुआत मैकोले से ही हो चुकी थी। यह तभी शुरू हो चुका था जब भारतीय अपनी समस्या का हल पश्चिम में ढूंढने के लिए पश्चिमीकरण का अंधानुकरण करने लगे थे, तब पश्चिम का आधुनिकतावाद ही प्रगति का परिचय बन गया। आधुनिक विद्वान इसे मानसिक गुलामी, कोलोनियल माइंड जैसे नाम देते हैं जिसके अंतर्गत उपनिवेश बनाया गया। समाज राजनीतिक और आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो भी जाए तब भी सांस्कृतिक रूप से उस पर उपनिवेशवादियों का ही प्रभाव दिखाई पड़ता है। उदाहरण के लिए ऑस्ट्रेलिया, अफ्रीका या अमेरिका में आपको आज भी यूरोप की संस्कृति का प्रभाव दिखेगा। चीन ने कम्यूनिस्ट रास्ता अपनाने के बाद भी ‘स्व’ को नहीं छोड़ा, किंतु साउथ कोरिया आपको पश्चिम का अंधानुकरण करता हुआ दिखाई देगा।
प्रश्न यह है कि इसमें समस्या क्या है? जब तक आप अच्छे गुणों को आत्मसात करते हैं, नई चीजे सीखते हैं तब तक समस्या नहीं है, परंतु जब आप उपनिवेशवादी की तरह ही नकल करने लगते हैं तब अपना व्यक्तिगत सौंदर्य खो देते हैं और आपकी प्रतिभा, विविधता एवं विशेषता समाप्त हो जाती है।
भारत के संदर्भ में आप स्वयं से प्रश्न कीजिए कि श्रीराम, राजा है इसलिए आपके आदर्श है या श्रीराम कर्म के कारण वे आपके लिए ईश्वर है? विवेकानंद किस कारण हमारे आदर्श है? त्याग और समर्पण करने वाले व्यक्ति भारत के आदर्श रहे हैं, किंतु पश्चिम सिकंदर को अपना आदर्श मानता है क्योंकि वह विश्वविजयी होने निकला था, इस कारण वहां सिकंदर महान है। वहां समाज को तोड़ने वाला, नशे में धुत रहने वाला व्यक्ति समाज को प्रभावित करता है।
भूमंडलीकरण के दौर में यह भारत पर भी प्रभावी होता दिखाई पड़ता है, जहां भारतीय युवाओं ने अपने आदर्शों के चयन में सावधानी रखना छोड़ दिया है। पश्चिम में गाली देने, नशे में रहने वाला व्यक्ति जब आदर्श बने तो उसकी पहुंच भारतीय युवाओं तक भी पहुंची। उस अंधी चकाचौंध में भारतीय युवा भी प्रभावित हुए। सिनेमा में कलाकार अपने अभिनय से सभी को प्रभावित करता है, परंतु क्या वह समाज को दिशा दे सकता है? क्या म. गांधी के जीवन पर अभिनय करने वाला महात्मा हो सकता है? इस चोले को पहन कर बॉलीवुड ने एकाधिकार बनाकर समाज को गुमराह करने का प्रयास किया। पूंजीवाद के अंतर्गत यह नए आदर्श खूब फले-फूले। भारत के युवाओं को उनके असली आदर्शों से तोड़कर समाज को भ्रमित करने वाले फिल्मी नायकों तक सीमित करने का प्रयास किया है।
भारत को आज भी मानसिक उपनिवेश बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि भारत का युवा अपनी जड़ों से दूर हो कर खंडित आदर्शों को पकड़े। इस आदर्श से प्रभावित युवा कभी किसी के कपड़े, किसी के स्टाइल, किसी के बोलचाल की नकल करते दिखाई देते हैं। कुल मिलाकर बाहरी आवरण को ही आदर्श मानने लगे हैं और धीरे-धीरे मानसिक गुलामी की स्थिति में फंसते जा रहे हैं। उनकी अपनी व्यक्तिगत पहचान समाप्त होती जा रही है, जिसके कारण वे पतन के मार्ग पर आगे बढ़ रहे हैं, ऐसे में आवश्यक है कि भारतीय युवा सचेत, सजग हो और अपने नैतिक मूल्यों का पालन करें।
असली भारतीय आदर्शों का अनुसरण करने से व्यक्ति सही राह और दिशा में चलता है, जिससे उसका भविष्य उज्ज्वल, सुरक्षित और समृद्ध बनता है। आज राष्ट्र को वीर शिवाजी, स्वातंत्र्यवीर सावरकर, स्वामी विवेकानंद जैसे युवाओं की राह पर चलने वाले पुरुषार्थी युवाओं की आवश्यकता है। ऐसे युवा ही परमवैभवशाली, आत्मनिर्भर, विकसित, शक्तिशाली और विश्वगुरु भारत बनाएंगे।
-शिवा पंचकरण

