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विवेकानंद के विचार जेन-जी के लिए प्रासंगिक

विवेकानंद के विचार जेन-जी के लिए प्रासंगिक

by अमोल पेडणेकर
in जनवरी 2026, युवा
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कोई भी विचार या संस्कार एक लम्बे समय के बाद वटवृक्ष बनकर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक सम्प्रेषित होता है। स्वामी विवेकानंद के जो विचार-आदर्श हैं, वह जेन-जी के लिए प्रांसगिक है। आवश्यकता है युवाओं द्वारा उसे अपने जीवन में उतारने की और एक सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ने की।

स्वामी विवेकानंद का जीवन, उनके विचार और कार्य युवाओं के लिए न केवल प्रेरणास्थान हैं, बल्कि भविष्य की दिशा तय करने वाला एक प्रकाशस्तम्भ भी हैं। आज की जेन-जी युवा पीढ़ी, जो वैश्वीकरण, तकनीक और डिजिटलीकरण के युग में उभर रही है, उसके सामने अवसरों और चुनौतियों की नई दुनिया है।

स्वामी विवेकानंद युवाओं को राष्ट्र का निर्माता मानते थे। वे कहते थे, उठो, जागो और जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए, तब तक रुको मत। इस कथन में युवाओं के लिए स्वामी विवेकानंद का विश्वास और अपेक्षा स्पष्ट दिखाई देता है। उनके अनुसार युवा वह है, जो उत्साह और विवेक दोनों का संतुलन रखता है। जो स्वावलम्बी, आत्मविश्वासी और निडर हो। जो अपने भीतर की शक्ति को पहचानकर राष्ट्रनिर्माण एवं जागरण में योगदान दे। स्वामी विवेकानंद युवाओं को स्व-शक्ति का स्रोत मानते थे। उनकी दृष्टि में युवा की सबसे बड़ी पूंजी उसका चरित्र और सकारात्मक दिशा से प्राप्त ऊर्जा है।

भारत, आज दुनिया की सबसे बड़ी युवा शक्ति वाला राष्ट्र है। यह तथ्य केवल जनसंख्यात्मक आंकड़ा नहीं, बल्कि भविष्य की सम्भावनाओं, चुनौतियों और अवसरों का संकेत है जैसे जिन देशों में युवा शक्ति दिशाहीन हुई है। नेपाल, बांग्लादेश, मेक्सिको, श्रीलंका या अफगानिस्तान वहां राजनीतिक अस्थिरता, हिंसा और सामाजिक विघटन ने विकास की गति को तहस-नहस कर दिया। इन देशों के राजनीतिक दलों ने युवाओं के कंधों पर बंदूक रखकर अपने उद्देश्य साधने का प्रयास किया और परिणाम उन राष्ट्रों के लिए अब विनाशकारी साबित हो रहा है। बांग्लादेश में युवाओं ने धार्मिक उन्माद और हिंसा का मार्ग स्वीकार किया।

हिंदू युवक पर ईश निंदा के झूठे आरोप लगाकर जिंदा जलाया गया, सरकार के कार्यालय जलाए गए, भारतीय दूतावास पर हमला किया गया। बांग्लोदश के युवाओं ने बांग्लादेश सरकार की नपुंसक प्रतिमा सम्पूर्ण विश्व के सामने निर्माण की है। भारत में भी कुछ राजनीतिक विपक्षी दल और सामाजिक संगठन इसी तर्ज पर युवा ऊर्जा को भड़काने के प्रयास में लगे हैं। वे सोशल मीडिया, छात्र संगठनों और डिजिटल प्रचार के माध्यम से देश में असंतोष का वातावरण बनाने में जुटे हैं, लेकिन प्रश्न उठता है कि क्या भारत का युवा हिंसा चाहता है? क्या वह रक्तरंजित क्रांति की राह पर चलने वाला है? उत्तर स्पष्ट है, नहीं।\

भारत का जेन-जी, समझदार, जागरूक और सकारात्मक परिणामोन्मुख विचारधारा से जुड़ा हुआ युवा है। भारत की जेन-जी (1996-2012) वह पीढ़ी है जो डिजिटल दुनिया में पैदा हुई और विकसित हुई है। यह भावनात्मक नारों की बजाए तर्क, अवसर व करियर को प्राथमिकता देती है। यही वह कारण है कि हिंसक क्रांति या अराजकता के लिए उकसाने वाले राजनीतिक प्रयास भारत में बार-बार विफल होते रहे हैं। यह पीढ़ी, परिवारवाद नहीं चाहती, भ्रष्टाचार को बर्दाश्त नहीं करती, गुंडागर्दी और दंगे वाली राजनीति से दूरी रखती है, स्थिर नेतृत्व और पारदर्शिता को महत्व देती है। बीते 11 वर्षों के चुनावों में युवाओं की यह पसंद स्पष्ट रूप से दिखाई दी है। राहुल गांधी का लगातार चुनाव हारना या कांग्रेस की गिरती स्वीकार्यता यह युवाओं लोकतांत्रिक पद्धति से दिया हुआ शांत और स्पष्ट उत्तर है

इसके बावजूद कांग्रेस एवं विपक्षी दल अपनी हार का कारण देश की संवैधानिक संस्थाओं पर मढ़ने का प्रयास करते हैं, जो भारतीय युवा को कांग्रेस से और अधिक दूर धकेल देता है।

स्वामी विवेकानंद युवाओं की शक्ति को राष्ट्र की सबसे बड़ी पूंजी मानते थे, उनके शब्दों में मेरे देश की मिट्टी में वह शक्ति है कि वह सोए हुए सिंहों को जगा सकती है। यह वाक्य भारतीय युवाओं के भीतर सुप्त पड़ी अनुशासन, नेतृत्व और राष्ट्र-निष्ठा की ऊर्जा को जगाने वाला संदेश है। भारत का लोकतंत्र दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। इस लोकतांत्रिक परम्परा का गहरा प्रभाव युवाओं पर भी है। अगर सरकार की किसी नीति से असहमति हो भी, तो भारतीय युवा, सवाल उठाता है। सोशल मीडिया पर अपनी बात रखता है। शांतिपूर्ण विरोध करता है।

चुनाव में मतदान प्रक्रिया के माध्यम से अपनी राय बदल देता है, लेकिन हिंसा को माध्यम नहीं बनाता। यही वह विशेषता है जो भारत को नेपाल, बांग्लादेश, मेक्सिको या अफगानिस्तान से अलग करती है। वहां युवाओं का संगठित असंतोष राजनेताओं के हाथों में एक हथियार बन गया, जबकि भारत में युवा राजनीतिक हथियार बनने को तैयार नहीं है।

विध्वंसक स्वरूप में युवाओं का राजनीतिक उपयोग करने के प्रयास भारत में विफल क्यों होते हैं? भारत का युवा अपने करियर, शिक्षा, रोजगार और अवसरों को प्राथमिकता देता है। यह युवा, तकनीकी रूप से सिद्ध है। सम्पूर्ण विश्व भर की सभी प्रकार की जानकारी भारतीय युवाओं तक त्वरित पहुंचती हैं। वह नवाचार व स्टार्टअप की भाषा समझता है। वह विकास से जुड़े वैश्विक अवसरों से अवगत है। राजनीतिक भाव से प्रेरित नकारात्मक प्रचार और तथ्य में अंतर करना जानता है। इसीलिए ‘लोकतंत्र खतरे में है, तानाशाह आ गया है,’ जैसे नकारात्मक नेरेटिव भारतीय युवाओं में प्रभाव उत्पन्न नहीं कर पाते। युवा जानता है कि लोकतंत्र केवल नारेबाजी से नहीं, बल्कि चुनाव के परिणाम से तय होता है और गत 11 सालों में आए हुए परिणाम बार-बार युवाओं की पसंद को स्पष्ट करते हैं।

पीढ़ियों के बीच का संघर्ष पुराना सत्य है। अपनी प्रत्येक पीढ़ी अगली पीढ़ी को विद्रोही मानती आई है। इसमें कोई नई बात नहीं है। 1947-64 तक राष्ट्रनिर्माण में योगदान देने वाली युवा पीढ़ी थी। 1965-80 तक की युवा पीढ़ी को संघर्ष व सैंडविच पीढ़ी कहा जाता था। 1981-95 के युवाओं को तकनीक की ओर बढ़ते मिलेनियल्स कहां जाता है। वहीं 1996-2012 में जन्मी डिजिटल टेक्नोलॉजी से लैस जेन-जी युवा कहा जाता है और 2013 के बाद निरंतर स्क्रीन से चिपकी रहने वाली पीढ़ी को जेन-अल्फा पीढ़ी कहा जाता है। भारतीय स्वतंत्रता से अब तक युवाओं की पीढ़ियों ने देश के विकास में अपना अपना सहयोग प्रदान किया है। लेकिन आज की जेन-जी और जेन-अल्फा का संघर्ष अलग है, वे दो दुनिया के बीच फंसे हैं।

मिलेनियल पीढ़ी बिना डिजिटलायजेशन (ुळींर्हेीीं वळसळींरश्रळूरींळेप) की पीढ़ी है, उसने अपने धैर्य, परंपरा, गहराई से धीमी गति से लेकिन सही तरह से प्रगति पथ पर मार्गक्रमण करना सीखा है। जेन जी और जेन अल्फा पीढ़ी डिजिटलायजेशन के साथ (ुळींह वळसळींरश्रळूरींळेप) की पीढ़ी तेज सूचना, तेज अवसर, तेज असंतोष, तेज टेक्नॉलॉजी से जुड़ी हुई हैं। दो जनरेशन में आए हुए इस अंतर को समझने में हमसे कहीं गलतियां हो रही हैं, इससे पीढ़ीगत संघर्ष बढ़ रहा है। वर्तमान युवाओं को समझने के लिए नया दृष्टिकोण चाहिए, उन्हें कोसने से नहीं, उनसे योग्य संवाद से समाधान निकलेगा।

युवाओं में अपार ऊर्जा होती है। यह ऊर्जा यदि सकारात्मक दिशा में लगे तो समाज, देश विकसित होता है, नवाचार बढ़ता है, संस्कृति सशक्त होती है, समाज संगठित होता है। लेकिन यदि यह ऊर्जा भटका दी जाए, तो वही ऊर्जा हिंसा, अराजकता और राजनीतिक लाभ के लिए उपयोग की जा सकती है। नेपाल और बांग्लादेश में यही हुआ। मेक्सिको में भी यही कहानी दोहराई गई। भारत को इस स्थिति से बचाना आवश्यक है और इसके लिए युवाओं को सजग करना आज की सबसे बड़ी राष्ट्रीय आवश्यकता है।
भारत में युवाओं में नैतिक मूल्य जागरण का कार्य कई संगठन सकारात्मक रूप से कर रहे है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने शाखाओं के माध्यम से युवाओं में अनुशासन, सामूहिकता, सेवा, कर्तव्यबोध, राष्ट्रप्रेम जैसे गुण विकसित किए हैं। भारत के सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का सबसे निरंतर, संगठित और व्यापक कार्य यदि किसी क्षेत्र में रहा है, तो वह है, युवाओं के व्यक्तित्व, चरित्र और वैचारिक दृष्टि का निर्माण।

आधुनिक भारत के बदलते सामाजिक-राजनीतिक विमर्श में पिछले चार-पांच दशकों में युवा चेतना और स्वभाव में जो परिवर्तन आया है, उसके पीछे रा. स्व. संघ के दीर्घकालिक कार्य का गहरा प्रभाव है।

इसी प्रकार जैन सम्प्रदाय, स्वामीनारायण परम्परा के साथ विभिन्न संत परम्परा, आध्यात्मिक आश्रम, सांस्कृतिक मंच वर्तमान युवाओं को समाज और राष्ट्र की मुख्यधारा से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। युवाओं में विचार, संतुलन और सामाजिक चेतना का संचार इन्हीं माध्यमों से सम्भव हुआ है। युवाओं में सजगता समाधान और भविष्य की स्पष्ट दिशा उनके कंधों पर बंदूक रखकर राजनीति करने वालों से उन्हें बचा सकती है। भारत का युवा देश के विकास का आधार है, विनाश का साधन नहीं है। भारत का युवा नारा नहीं चाहता, वह अवसर चाहता है, वह हिंसा नहीं चाहता, वह प्रगति चाहता है, वह क्रांति नहीं चाहता, वह परिवर्तन चाहता है।

वह झूठे नैरेटिव पर नहीं चलता, वह परिणाम देखकर निर्णय लेता है। भारत का जेन-जी राजनीतिक दांव-पेंच का हथियार नहीं बनेगा, क्योंकि उसकी आंखों में एक सुनहरे भारत का सपना है। एक सुरक्षित, समृद्ध, आधुनिक और विश्वगुरु भारत का सपना। इस सपने को पूरा करने के लिए हमें युवाओं को सही दिशा, सही नेतृत्व, सही अवसर और सही मूल्य प्रदान करने होंगे। भारत का भविष्य युवाओं में है और युवाओं का भविष्य उज्ज्वल भारत में है।

 

ऐसे वातावरण में विवेकानंद के विचार आज भी जेन-जी के लिए उतने ही प्रासंगिक हैं जितने उस समय थे। स्वामी विवेकानंद के विचार वर्तमान जेन-जी को आत्मविश्वास और दिशा देते हैं। जब वर्तमान डिजिटल भ्रमजाल युवाओं को विचलित करता है तब चरित्र ही राष्ट्र की नींव है यह संदेश आवश्यक होता है। विवेकानंद की यह मान्यता है कि सर्वश्रेष्ठ आदर्श वही है जो समाज के लिए उपयोगी हो। यह विचार जेन जी की समाज से जुड़ी प्रवृत्तियों को और सशक्त बनाती है। स्वामी विवेकानंद की निडरता की शिक्षा, स्टार्टअप और नवाचार की राह पर बढ़ते युवाओं को प्रेरित करती है।

स्वामी विवेकानंद युवाओं को केवल प्रेरणा नहीं देते, बल्कि उसके भीतर छिपी असीम शक्ति में विश्वास जगाते हैं। उनके संदेश वर्तमान युग में भी अत्यंत व्यावहारिक है। भारत का भविष्य युवा के हाथों में है और विवेकानंद का यह आह्वान आज भी उतना ही प्रासंगिक है, एक समय आएगा जब भारतीय युवा विश्व का नेतृत्व करेगा। उस समय का आधार तुम्हारी मेहनत और तुम्हारा चरित्र होगा। अगर जेन-जी स्वामी विवेकानंद के विचारों को अपनी आधुनिक शैली में मोड़कर अपनाए, तो वह व्यक्तिगत चारित्र्य विकास के साथ राष्ट्र को भी एक नई ऊर्जा दे सकते हैं।

विवेकानंद ने जिस शक्ति-संपन्न युवा भारत का स्वप्न देखा था, उसे आज की जेन-जी तकनीक, रचनात्मकता और नवाचार के माध्यम से साकार कर सकती है। स्वामी विवेकानंद की 163वीं जयंती के अवसर पर यह आवश्यक है कि जेन-जी स्वामी विवेकानंद के विचार एवं संदेश से प्रेरणा लेकर चरित्र, कौशल और कर्तव्यनिष्ठा के मार्ग पर आगे बढ़ें। स्वामी विवेकानंद के विचारों को वर्तमान परिप्रेक्ष्य में समझकर अपने जीवन में ढालना और राष्ट्र उपयोग में लाना यही स्वामी विवेकानंद को वर्तमान जेन जी के माध्यम से वास्तविक आदरांजलि हो सकती है।

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Tags: #SwamiVivekananda #VivekanandaQuotes #SpiritualWisdom #IndianPhilosophy #Inspiration

अमोल पेडणेकर

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