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गुलाम मानसिकता से स्वतंत्र होता भारत

गुलाम मानसिकता से स्वतंत्र होता भारत

by हिंदी विवेक
in जनवरी 2026, देश-विदेश
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भारत की गुलामी का अतीत जितना कसैला था, वर्तमान में विकसित भारत की यात्रा इतनी सुखद, सुनहरी और चुनौतीपूर्ण हैं तथा भविष्य और भी दमकता हुआ होगा। भारत ने अनगिनत गौरवपूर्ण उपलब्धियां प्राप्त की और जो दुनिया के सामने अपनी एक नई पहचान बनाई है। 

26 जनवरी भारतीय गणतंत्र दिवस मात्र संवैधानिक संरचना का उत्सव नहीं बल्कि भारत की अटूट राष्ट्रीय चेतना का उद्घोष है। 1947 में जब भारत स्वतंत्र हुआ तो कई विदेशी विश्लेषक हमारे देश के भविष्य को लेकर आशंकित थे। उनकी टिप्पणियां थीं कि भारत की स्वतंत्रता, इसकी एकता और इसका लोकतंत्र कभी टिक नहीं पाएगा। उन्हें लगता था कि विविध भाषाओं, धर्मों और संस्कृतियों का यह विशाल देश आंतरिक विरोधाभासों के कारण बिखर जाएगा। हालांकि  भारत ने अपनी संवैधानिक शक्ति और अपने नागरिकों के अदम्य विश्वास के बल पर इन सभी धारणाओं को धता बताकर अनगिनत गौरवपूर्ण उपलब्धियां प्राप्त की हैं। आज भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है व ’मदर ऑफ डेमोक्रेसी’ के रूप में पहचाना जाता है। यह गणतंत्र की विजय है जिसने भारत को एक नई पहचान दी है।

‘गुलामी की मानसिकता’ से मुक्ति

पिछले एक दशक में प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश ने एक नया आत्मविश्वास अर्जित किया है। सरकार ने स्पष्ट रूप से गुलामी की मानसिकता के प्रतीकों और प्रभावों से देश को उबारने का कार्य किया है। यह केवल भौतिक बदलाव नहीं बल्कि मानसिक स्वतंत्रता की दिशा में एक बड़ा कदम है।

राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान: इंडिया गेट पर स्थापित ‘अमर जवान ज्योति’ का ‘राष्ट्रीय युद्ध स्मारक’ में विलय, ‘राजपथ’ का नाम बदलकर ’कर्तव्य पथ’ करना  और नौसेना के ध्वज से औपनिवेशिक काल के निशान हटाकर छत्रपति शिवाजी महाराज की मुहर को शामिल करना ये सब कदम देश को उसकी विरासत पर गर्व करना सिखाते हैं।

आत्मनिर्भरता और भारतीयता का बल: ’वोकल फॉर लोकल’ और ’आत्मनिर्भर भारत’ जैसे अभियानों ने यह सिद्ध किया है कि भारत न केवल वैश्विक चुनौतियों का सामना करने में सक्षम है बल्कि वह विश्व के लिए भी समाधान प्रस्तुत कर सकता है। यह मानसिकता में आया सबसे बड़ा बदलाव है, अब हम केवल उपभोक्ता नहीं, बल्कि वैश्विक निर्माता भी हैं।

सांस्कृतिक अभ्युदय: विरासत से विकास की यात्रा

’गुलामी की मानसिकता’ से मुक्ति की यह प्रक्रिया, धार्मिक आस्था के पुनर्जागरण और सांस्कृतिक अभ्युदय के साथ गहरे से जुड़ी हुई हैं। सरकार ने ’विरासत से विकास’ के सूत्र को अपनाकर, भारत की हजारों वर्षों पुरानी सभ्यतागत पहचान को पुनः स्थापित करने का कार्य किया है।

अयोध्या में श्रीराम मंदिर: यह केवल ईंट और पत्थरों का निर्माण नहीं है बल्कि सदियों की प्रतीक्षा और बलिदान का परिणाम है। यह भारत की सांस्कृतिक चेतना का सबसे बड़ा प्रतीक है, जो दिखाता है कि लोकतांत्रिक और संवैधानिक प्रक्रिया के माध्यम से भी आस्था को उसका सम्मान मिल सकता है।

काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर और महाकाल लोक: इन भव्य परियोजनाओं ने न केवल प्राचीन धार्मिक स्थलों को आधुनिक सुविधाओं से जोड़ा है, बल्कि इन्हें वैश्विक तीर्थ और पर्यटन केंद्र के रूप में स्थापित किया है। महाकाल लोक की भव्यता भारतीय कला और आध्यात्मिकता का संगम है। इन जीर्णोद्धार कार्यों ने देशवासियों में अपनी जड़ों और इतिहास के प्रति गर्व की भावना को सशक्त किया है।

सैकड़ों वर्षों की उपेक्षित विरासतों का सम्मान: केदारनाथ, बद्रीनाथ, बुद्ध सर्किट और गुरुद्वारों से जुड़े कॉरिडोरों का विकास यह सिद्ध करता है कि भारत अब अपनी विरासत को संजोने और उसे विश्व के समक्ष प्रस्तुत करने के लिए प्रतिबद्ध है।

ये उदाहरण दर्शाते हैं कि सरकार ने किस प्रकार गुलामी की मानसकिता को छोड़कर, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के बल पर देश को आगे बढ़ाया है।

सशक्त लोकतंत्र और जन-सहभागिता की शक्ति

भारत की सबसे बड़ी उपलब्धि उसका सशक्त लोकतंत्र है। यह ऐसा लोकतंत्र है जो केवल चुनावी प्रक्रिया तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें जनता की सक्रिय सहभागिता केंद्र में है।

मतदान का कीर्तिमान: वर्ष 2024 के लोकसभा चुनावों में 90 करोड़ से अधिक लोगों ने जिस शांतिपूर्ण और उत्साहपूर्ण तरीके से अपने मताधिकार का उपयोग कर सरकार को चुना, वह विश्व इतिहास में एक अभूतपूर्व घटना है। यह आंकड़ा भारत के लोकतंत्र की जड़ों की गहराई और मजबूती को दर्शाता है।

लोक-कल्याण हेतु नीतियां: इस वायब्रेंट डेमोक्रेसी में नीतियां बंद कमरों में नहीं बनतीं बल्कि वे जनता की आकांक्षाओं को प्रतिबिम्बित करती हैं। जनधन योजना, आयुष्मान भारत और स्वच्छ भारत अभियान जैसी नीतियां सीधे तौर पर गरीबों और वंचितों के जीवन में सुधार लाने के उद्देश्य से बनाई गई हैं।

डिजिटल गवर्नेंस: आधार, प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण और यूपीआई जैसे डिजिटल माध्यमों ने देश के शासन को पारदर्शी, त्वरित और भ्रष्ट्राचार मुक्त बनाया है। इसने आम नागरिक को सशक्त किया है, जिससे यह सिद्ध होता है कि भारत का लोकतंत्र विश्व में सर्वाधिक उन्नत है।

गणतंत्र की चुनौतियां: आंतरिक सुरक्षा और राष्ट्रहित

इतनी गौरवशाली उपलब्धियों के बावजूद भारतीय गणतंत्र आज भी कुछ गम्भीर चुनौतियों का सामना कर रहा है, जिन पर नियंत्रण पाना ’विकसित भारत’ के लिए आवश्यक है।

आंतरिक सुरक्षा और राष्ट्रविरोधी कृत्य: सीमा पार आतंकवाद, नक्सलवाद और कुछ क्षेत्रों में देशविरोधी कृत्य देश की एकता और सम्प्रभुता के लिए गम्भीर संकट हैं। सरकार ने कठोर नीतियां अपनाई हैं। जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 को समाप्त कर देश की संवैधानिक और भौगोलिक एकता को मजबूत किया गया है।

धर्मांतरण और सामाजिक विघटन: बलपूर्वक या प्रलोभन के माध्यम से किए जाने वाले धर्मांतरण के प्रयासों पर रोक लगाना आवश्यक है ताकि सामाजिक समरसता बनी रहे। सरकार का मूल मंत्र ’सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास, सबका प्रयास’ इस समस्या का समाधान है, जो सभी नागरिकों को संवैधानिक दायरे में सम्मान और समान अवसर प्रदान करता है।

‘विकसित भारत 2047’ का लक्ष्य

भारतीय गणतंत्र अब मात्र अस्तित्व की लड़ाई नहीं लड़ रहा बल्कि वैश्विक नेतृत्व के लिए तैयार हो रहा है। ’विकसित भारत 2047’ का लक्ष्य एक ऐसा राष्ट्रीय संकल्प है जो भारत को एक विकसित, समृद्ध और आत्मनिर्भर राष्ट्र बनाने पर केंद्रित है।

आर्थिक विकास: भारत को विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनाना इस लक्ष्य का केंद्र है। ’मेक इन इंडिया’ और उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजनाओं के माध्यम से विनिर्माण क्षेत्र को बढ़ावा दिया जा रहा है।

ज्ञान और नवाचार: शिक्षा, अनुसंधान और नवाचार में निवेश से भारत को एक ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था में बदला जा रहा है। चंद्रयान-3 और अन्य वैज्ञानिक उपलब्धियां यह दर्शाती हैं कि भारत विज्ञान और प्रौद्योगिकी में विश्व का नेतृत्व करने को तैयार है।

जी-20 जैसे मंचों पर भारत की सफल अध्यक्षता और यूक्रेन संघर्ष जैसे वैश्विक संकटों में भारत की संतुलित कूटनीति ने यह सिद्ध किया है कि भारत अब एक निर्णायक वैश्विक शक्ति है जो केवल अपने हितों की नहीं बल्कि ’वसुधैव कुटुम्बकम’ के सिद्धांत पर विश्व कल्याण की बात करता है।

भारतीय गणतंत्र की यात्रा एक ऐसी गौरवशाली यात्रा है, जिसने प्रत्येक आशंका को विश्वास में और हर चुनौती को अवसर में बदला है। प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में गुलामी की मानसिकता को त्यागकर आत्मविश्वास और सांस्कृतिक गौरव को पुनः स्थापित किया गया है।

आज जब देश अपनी विरासत पर गर्व कर रहा है और सशक्त लोकतंत्र में करोड़ों नागरिकों की भागीदारी के साथ नीतियां बना रहा है तब ’विकसित भारत 2047’ का लक्ष्य मात्र एक सपना नहीं बल्कि एक साकार होने वाला राष्ट्रीय संकल्प है। भारत का गणतंत्र केवल संविधान की प्रतियां नहीं बल्कि करोड़ों नागरिकों की सामूहिक इच्छाशक्ति का प्रतीक है। यह यात्रा न केवल भारत के लिए, बल्कि पूरे विश्व के लिए एक प्रेरणा है कि कैसे विविधता में एकता और लोकतंत्र की शक्ति से किसी भी लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है।

– अजय धवले

 

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