| भारत की वास्तविक विचारधारा सनातन हिंदुत्व है— कोई राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि एक सभ्यतागत जीवन-दृष्टि। उसका आधार स्तंभ सनातन वैदिक धर्म है, जो धर्म को मत नहीं, धारण करने योग्य जीवन-व्यवस्था मानता है। |
आपने हाल के दिनों में यह खबर ज़रूर देखी होगी कि किस तरह लोकतांत्रिक प्रक्रिया से चुने गए वेनेजुएला के राष्ट्रपति को सैन्य कार्रवाई के ज़रिये गिरफ़्तार किया गया। ऐसे ऑपरेशन अचानक नहीं होते। वेनेजुएला जैसा कदम महीनों की तैयारी के बाद उठाया जाता है। राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की हर गतिविधि लंबे समय से निगरानी में थी। वे कब सोते हैं, क्या खाते हैं, कहाँ जाते हैं— यहाँ तक कि उनके निजी जीवन के छोटे-से-छोटे पहलू भी ट्रैक किए जा रहे थे।
अमेरिका इस तरह के अभियानों से पहले पूरा ढाँचा तैयार करता है, अलग–अलग परिस्थितियों में उसकी रिहर्सल कराई जाती है। शीत युद्ध के बाद लैटिन अमेरिका में इस स्तर का प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप बहुत लंबे समय से नहीं देखा गया था। जब पश्चिमी दुनिया क्रिसमस और नए साल के जश्न में डूबी हुई थी, तब यह ऑपरेशन अंतिम आदेश के इंतज़ार में तैयार खड़ा था। आदेश मिलते ही रात के अँधेरे में कार्रवाई शुरू हो गई। बताया जाता है कि उस समय डोनाल्ड ट्रम्प पाम बीच के एक क्लब में अपने अधिकारियों के साथ बैठे हुए पूरी कार्रवाई को लाइव देख रहे थे।
जल, थल और नभ— तीनों का इस्तेमाल करते हुए जिस सटीकता से यह अभियान अंजाम दिया गया, उससे साफ़ हो जाता है कि दुनिया भर के नेताओं की निंदा का ज़मीनी हक़ीक़त पर कोई असर नहीं पड़ता। एक ही रात में सैकड़ों विमानों को सक्रिय कर देना हर देश के बस की बात नहीं है। राजधानी काराकास में सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया गया, बिजली आपूर्ति काट दी गई और कुछ ही घंटों में पूरा ऑपरेशन समाप्त हो गया।
अगर इस कार्रवाई में राष्ट्रपति को मार देना ज़रूरी समझा जाता, तो अमेरिका शायद उससे भी पीछे नहीं हटता। क्यूबा से आए बॉडीगार्ड्स भी किसी काम नहीं आए। इस पूरे घटनाक्रम में अमेरिका को कोई उल्लेखनीय नुकसान नहीं हुआ—और यही आज की वैश्विक राजनीति की सबसे कठोर सच्चाई है।
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इस ऑपरेशन के कारणों पर अनेक विश्लेषण सामने आए हैं। वैश्विक बाज़ारवादी शक्तियाँ किस प्रकार काम करती हैं, इस विषय पर मैं अपने पूर्व लेख में विस्तार से चर्चा कर चुका हूँ, इसलिए यहाँ उस विश्लेषण को दोहराना आवश्यक नहीं है। किंतु कुछ घटनाएँ हैं, जिन्हें एक साथ रखकर देखने पर एक स्पष्ट प्रवृत्ति सामने आती है।
इराक में सद्दाम हुसैन को सत्ता से हटाया गया और बाद में फाँसी दी गई। यह कार्रवाई अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र के ढाँचे के भीतर होने का दावा की गई, किंतु वर्षों बाद यह स्वीकार किया गया कि जिन आधारों पर यह हस्तक्षेप किया गया था, वे तथ्यात्मक रूप से सिद्ध नहीं हो सके। इसी प्रकार, ईरान में राष्ट्राध्यक्षों की मृत्यु या सत्ता परिवर्तन से जुड़ी घटनाएँ केवल आंतरिक राजनीति तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि उनका सीधा संबंध वैश्विक भू-राजनीति से जुड़ा रहा है।
इसी क्रम में आर्थिक दबाव के उपकरणों को देखें— कभी व्यापक आर्थिक प्रतिबंध लगाए जाते हैं, कभी एकतरफ़ा टैरिफ नीतियाँ लागू की जाती हैं, जिनका प्रभाव केवल संबंधित देशों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी वैश्विक आपूर्ति-श्रृंखला पर पड़ता है। इसके बावजूद अधिकांश देश खुलकर विरोध करने की स्थिति में नहीं होते। प्रतिक्रियाएँ प्रायः कूटनीतिक वक्तव्यों, औपचारिक निंदा या सीमित विरोध तक सिमट कर रह जाती हैं।
यह स्थिति इस तथ्य की ओर संकेत करती है कि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में वास्तविक निर्णय केवल सैन्य शक्ति से नहीं, बल्कि आर्थिक, वित्तीय और संस्थागत दबावों के माध्यम से भी लागू किए जाते हैं। जब ये सभी उपकरण एक ही दिशा में प्रयुक्त होते हैं, तब राष्ट्रों की औपचारिक संप्रभुता और व्यावहारिक स्वतंत्रता के बीच का अंतर स्पष्ट रूप से सामने आ जाता है।
जिसे आज ग्लोबल मार्केट फोर्सेज या डीप स्टेट कहा जाता है, वह कोई काल्पनिक षड्यंत्र नहीं, बल्कि दशकों से विकसित एक वास्तविक शक्ति-संरचना है। यह संरचना राष्ट्रों के ऊपर बैठकर काम करती है और सरकारों के बदलने से प्रभावित नहीं होती। वास्तविक नियंत्रण कुछ सीमित वित्तीय-औद्योगिक घरानों और कॉरपोरेट वंशों के हाथों में केंद्रित है, जिनका प्रभाव बैंकिंग, मुद्रा प्रणाली, हथियार उद्योग, ऊर्जा संसाधनों, मीडिया और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं तक फैला हुआ है।
वैश्विक विमर्श में जिन परिवारों और कॉरपोरेट समूहों का नाम बार-बार सामने आता है, उनमें प्रमुख रूप से—
Rothschild, Rockefeller, Morgan, DuPont, Warburg, Goldman Sachs नेटवर्क, JP Morgan नेटवर्क, BlackRock–Vanguard जैसे एसेट मैनेजमेंट समूहों से जुड़े निवेश वंश, Royal Dutch–Shell से जुड़े ऊर्जा हित, तथा यूरोपीय राजवंशों और एंग्लो-अमेरिकन फाइनेंशियल एलाइट के पुराने वंश शामिल माने जाते हैं।
इनका प्रभाव प्रत्यक्ष शासन के रूप में नहीं, बल्कि नीति-निर्माण, ऋण-व्यवस्था, युद्ध-अर्थव्यवस्था, वैश्विक मीडिया नैरेटिव और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के माध्यम से प्रकट होता है।
विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF), संयुक्त राष्ट्र, तथाकथित मानवाधिकार तंत्र, कॉमनवेल्थ और नाटो— ये सभी इसी शक्ति-संरचना के औज़ारों के रूप में कार्य करते हैं।
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गोल्ड स्टैंडर्ड से हटकर फिएट करेंसी व्यवस्था लागू करना, डॉलर को वैश्विक लेन-देन की अनिवार्य मुद्रा बनाना, और ऋण व निवेश के माध्यम से राष्ट्रों की संप्रभु नीतियों को नियंत्रित करना— यह सब किसी स्वतःस्फूर्त आर्थिक प्रक्रिया का परिणाम नहीं, बल्कि दीर्घकालिक रणनीतिक योजना का हिस्सा रहा है।
इस अर्थ में यह कहना अधिक यथार्थपूर्ण होगा कि
दुनिया किसी एक देश द्वारा नहीं, बल्कि सीमित वैश्विक वित्तीय-औद्योगिक अभिजात वर्ग द्वारा संचालित होती है,
जहाँ राष्ट्र अक्सर केवल प्रशासनिक इकाइयाँ बनकर रह जाते हैं।
यदि भारत वास्तव में स्वतंत्र होता, तो स्वतंत्रता के साथ ही उसकी आर्थिक, सांस्कृतिक और वैचारिक दिशा भी स्वतंत्र होती। परंतु स्वतंत्रता के बाद जो हुआ, वह सत्ता का हस्तांतरण था— तंत्र का नहीं। औपनिवेशिक शासन चला गया, किंतु औपनिवेशिक ढाँचा, सोच और नियंत्रण के उपकरण यथावत बने रहे।
स्वतंत्रता के बाद भारत की अर्थव्यवस्था को “समाजवाद” के नाम पर जिस दिशा में ले जाया गया, उसने उत्पादन, उद्यमिता और पारिवारिक स्वावलंबन को कमजोर किया। योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था के नाम पर राज्य को सर्वशक्तिमान बनाया गया और समाज को आश्रित। इसका परिणाम यह हुआ कि ग्रामीण भारत, लघु उद्योग और पारिवारिक अर्थतंत्र क्रमशः नष्ट होते चले गए। यह प्रक्रिया किसी एक भूल का परिणाम नहीं थी, बल्कि एक दीर्घकालिक वैचारिक दिशा का नतीजा थी— जिसका भारत की सभ्यतागत प्रकृति से कोई संबंध नहीं था।
इसी कालखंड में नक्सलवाद को “वर्ग-संघर्ष” के नाम पर वैचारिक संरक्षण मिला। नक्सल आंदोलन केवल एक सुरक्षा समस्या नहीं रहा; वह समाज को भीतर से तोड़ने का औज़ार बना। आदिवासी क्षेत्रों में राज्य की अनुपस्थिति, भय का वातावरण और हथियारों की आपूर्ति— इन सबके बीच संगठित धर्मांतरण को बढ़ावा मिला। पूर्वोत्तर भारत इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण है, जहाँ ड्रग्स, हथियार और मिशनरी नेटवर्क एक-दूसरे के पूरक बने। यह केवल धार्मिक परिवर्तन नहीं था, बल्कि सांस्कृतिक विच्छेदन की प्रक्रिया थी।
स्वतंत्रता के बाद ईसाई धर्मांतरण में तीव्र वृद्धि कोई स्वाभाविक सामाजिक परिवर्तन नहीं थी। यह उस वैचारिक ढाँचे का परिणाम थी, जिसमें राज्य ने स्वयं को “तटस्थ” घोषित कर लिया, किंतु समाज को असहाय छोड़ दिया। “सेकुलरिज़्म” के नाम पर बहुसंख्यक समाज की संस्कृति, परंपरा और संस्थाओं को निरंतर कटघरे में खड़ा किया गया, जबकि संगठित मतांतरण को मानवाधिकार और अल्पसंख्यक संरक्षण के आवरण में वैधता मिलती रही। यह सब उस समय हुआ, जब देश की सत्ता में बार-बार वही राजनीतिक संरचना रही, जिसने लोकतंत्र, समाजवाद, सेकुलरिज़्म, राष्ट्रवाद, राइट–लेफ्ट–सेंटर जैसी आयातित विचारधाराओं को भारत की आत्मा मानकर लागू किया।
उदारीकरण के बाद यह प्रक्रिया एक नए चरण में प्रवेश करती है। राज्य का नियंत्रण कम हुआ, पर बाज़ार का नियंत्रण बढ़ा— और वह बाज़ार स्वदेशी नहीं, वैश्विक था। उपभोक्तावाद, भौतिकतावाद और व्यक्तिवाद को प्रगति का पर्याय घोषित किया गया। परिवार— जो भारत की सबसे छोटी और सबसे मज़बूत सामाजिक इकाई था— उसे अप्रासंगिक बताने का प्रयास शुरू हुआ। विवाह, मातृत्व, पितृत्व, संयुक्त परिवार— सब पर वैचारिक हमले हुए। आज यह प्रक्रिया अपने चरम पर है, जहाँ परिवार को बाधा और समाज को बोझ बताने वाले नैरेटिव सामान्य बनाए जा रहे हैं।
इन सभी प्रक्रियाओं को यदि एक साथ देखा जाए, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि भारत की सरकारें प्रत्यक्ष रूप से नहीं, बल्कि अप्रत्यक्ष रूप से वैश्विक बाज़ारवादी शक्तियों के प्रभाव में कार्य करती रही हैं। विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF), संयुक्त राष्ट्र, तथाकथित मानवाधिकार तंत्र, कॉमनवेल्थ ढाँचा और सैन्य गठबंधन— ये सब उसी वैश्विक शक्ति-संरचना के औज़ार हैं, जिसका वैचारिक केंद्र ऐतिहासिक रूप से रोम रहा है। स्वरूप बदला है, पर नियंत्रण-तंत्र नहीं। इसीलिए यह कहना अतिशयोक्ति नहीं कि औपनिवेशिक शासन आज भी विचारधाराओं के रूप में जीवित है— लोकतंत्र, समाजवाद, पूंजीवाद, सेकुलरिज़्म, राष्ट्रवाद, राइट और लेफ्ट के नाम से।
यहाँ मूल प्रश्न उठता है— क्या भारत के संविधान में सनातन वैदिक धर्म, हिन्दू संस्कृति, वेद, उपनिषद, स्मृति, पुराण, या यहाँ तक कि भारतीय कालगणना और पंचांग का कोई आधार है? उत्तर स्पष्ट है— नहीं। हमारा संवैधानिक और प्रशासनिक ढाँचा मूलतः औपनिवेशिक है, जिसकी जड़ें इंडियन गवर्नमेंट एक्ट, 1935 में हैं। प्रतीक, शब्दावली और संस्थाएँ— सब विदेशी ढाँचे से आई हैं। जिस सभ्यता ने सहस्राब्दियों तक स्वयं को संचालित किया, उसी को आधुनिक भारत में अपनी ही भूमि पर संदिग्ध बना दिया गया।
भारत की वास्तविक विचारधारा सनातन हिंदुत्व है— कोई राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि एक सभ्यतागत जीवन-दृष्टि। उसका आधार स्तंभ सनातन वैदिक धर्म है, जो धर्म को मत नहीं, धारण करने योग्य जीवन-व्यवस्था मानता है। इसके विपरीत, आयातित विचारधाराएँ भारत को खंडित करती रही हैं— कभी वर्गों में, कभी पंथों में, कभी पहचान की राजनीति में।
हमारे नेता बार-बार यह कहते हैं कि भारत दुनिया की सबसे बड़ी डेमोक्रेसी है और अमेरिका सबसे पुरानी डेमोक्रेसी। ध्यान देने की बात यह है कि वे “लोकतंत्र” शब्द का प्रयोग नहीं करते, बल्कि डेमोक्रेसी कहते हैं। यह केवल भाषा का अंतर नहीं है, यह सोच और व्यवस्था का अंतर है।
लोकतंत्र भारतीय परंपरा का शब्द है। इसका अर्थ है— लोक की व्यवस्था, समाज की सहभागिता, धर्म और मर्यादा के साथ सत्ता का संचालन। इसमें केवल मत देना ही सब कुछ नहीं होता, बल्कि समाज की नैतिक, सांस्कृतिक और पारिवारिक संरचना भी शासन का आधार होती है।
इसके विपरीत डेमोक्रेसी पश्चिम से आई अवधारणा है। इसका अर्थ मुख्यतः संख्या-बल से सत्ता तय करना है। यहाँ मत महत्वपूर्ण होता है, पर समाज की आत्मा, संस्कृति या दीर्घकालिक परिणाम गौण हो जाते हैं। इसी कारण डेमोक्रेसी में सत्ता बदलती रहती है, लेकिन तंत्र वही बना रहता है।
अमेरिका को “सबसे पुरानी डेमोक्रेसी” कहा जाता है, लेकिन यह तथ्य अक्सर छुपा दिया जाता है कि यह व्यवस्था मूल निवासियों— रेड इंडियन्स— के लगभग पूर्ण विनाश के बाद स्थापित हुई। उनकी ज़मीन, संस्कृति और अस्तित्व समाप्त होने के बाद चर्च और औपनिवेशिक सत्ता के संरक्षण में यह प्रणाली खड़ी की गई। इसलिए इसे किसी सार्वभौमिक नैतिक आदर्श के रूप में प्रस्तुत करना अधूरा सत्य है।
भारत में भी यही डेमोक्रेसी मॉडल औपनिवेशिक काल में थोपा गया। स्वतंत्रता के बाद भी वही ढाँचा चलता रहा। सत्ता बदली, चेहरे बदले, लेकिन व्यवस्था वही रही। इसलिए भारत को बार-बार “सबसे बड़ी डेमोक्रेसी” कहा गया, न कि लोकतंत्र।
डेमोक्रेसी में समाज को वर्गों में बाँटना आसान होता है— कभी जाति के नाम पर, कभी धर्म के नाम पर, कभी वर्ग संघर्ष के नाम पर। वोट-बैंक बनते हैं, पहचान की राजनीति होती है, और असली सत्ता तंत्र के पास बनी रहती है। यही कारण है कि भारत में समाजवाद, सेकुलरिज़्म, राइट-लेफ्ट जैसी आयातित अवधारणाएँ आसानी से लागू की जा सकीं।
लोकतंत्र में समाज सशक्त होता है।
डेमोक्रेसी में समाज गिना जाता है।
यही बुनियादी अंतर है।
इस अंतर को समझे बिना भारत की राजनीति, नीतियों और सामाजिक टूटन को समझना मुश्किल है। इसलिए जब भारत को “दुनिया की सबसे बड़ी डेमोक्रेसी” कहा जाता है, तो यह सवाल पूछना ज़रूरी है— क्या यह भारत का लोकतंत्र है, या केवल एक डेमोक्रेसी मॉडल, जो बाहर से आयात किया गया है ।
अर्थात सच्चाई यह है कि आज हम केवल राजनीतिक रूप से नहीं, वैचारिक और सामाजिक रूप से भी उपनिवेश बने हुए हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि अब नियंत्रण तलवार और सेना से नहीं, बल्कि तकनीक, डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म और आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के ज़रिये किया जा रहा है। हम अपने ही देश में रहकर दूसरों की बनाई व्यवस्थाओं पर चलने को मजबूर हैं। यही आधुनिक उपनिवेश है— जो दिखता नहीं, लेकिन समाज को भीतर से नियंत्रित करता है।
हमारे प्रधानमंत्री जब कहते हैं कि दुनिया ने युद्ध दिया और हमने बुद्ध दिया, तो यह सुनने में अच्छा लगता है। लेकिन दुनिया केवल अच्छे वाक्यों से नहीं चलती। इतिहास साफ़ बताता है कि जब तक कोई राष्ट्र अपनी शक्ति नहीं दिखाता, तब तक उसकी बात नहीं सुनी जाती। इसी कारण प्राचीन भारत में राजा–महाराजा अश्वमेध यज्ञ करते थे। वह केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं था, बल्कि यह संदेश था कि यह राज्य कमजोर नहीं है और अपनी संप्रभुता की रक्षा कर सकता है।
इसी संदर्भ में इस वर्ष मई में हुए ऑपरेशन सिंदूर को देखना चाहिए। यह सिर्फ एक सैन्य कार्रवाई नहीं थी, बल्कि यह संकेत था कि भारत रक्षा और रणनीतिक तकनीक में आत्मनिर्भर होने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। इसके बाद भारत–अमेरिका संबंधों में जो असहजता दिखाई दी, वह संयोग नहीं थी। कारण साफ़ है— भारत अगर रक्षा तकनीक में आत्मनिर्भर होगा, तो वैश्विक डिफेंस कंपनियों और हथियार बाज़ार के हित प्रभावित होंगे। इसलिए दबाव बनता है, रिश्तों में खटास आती है और अप्रत्यक्ष हस्तक्षेप के रास्ते खोजे जाते हैं।
यह पूरा घटनाक्रम यह समझाने के लिए काफ़ी है कि दुनिया उपदेशों से नहीं, बल्कि शक्ति-संतुलन से चलती है। और यदि भारत को सुरक्षित रहना है, तो उसे अपने सनातन आर्थिक चिंतन की ओर लौटना ही होगा— ऐसी व्यवस्था की ओर, जो विकेंद्रीकृत हो, जहाँ परिवार, समाज और स्थानीय उत्पादन मजबूत हों, न कि सब कुछ कुछ कॉरपोरेट और वैश्विक बाज़ार के हाथ में चला जाए।
लेकिन केवल अर्थनीति बदलने से काम नहीं चलेगा। उससे भी बड़ा खतरा समाज को भीतर से तोड़ने की राजनीति है। मनुस्मृति दहन जैसे प्रतीकात्मक आयोजन, इतिहास और ग्रंथों को जलाने की होड़, और इसके जवाब में किसी एक व्यक्ति या प्रतीक का महिमामंडन— ये सब समाज को जोड़ने के प्रयास नहीं हैं, बल्कि जानबूझकर जातिगत उन्माद भड़काने की रणनीति हैं। इसका उद्देश्य समाधान नहीं, संघर्ष पैदा करना है।
इसी तरह वर्ग संघर्ष को लगातार ज़िंदा रखा जाता है— कभी जाति के नाम पर, कभी वर्ग के नाम पर, कभी आरक्षण और पहचान की राजनीति के ज़रिये। डेमोक्रेसी की आड़ में समाज को अलग–अलग खाँचों में बाँटकर मूल मुद्दों से भटकाया जाता है। जनता आपस में उलझी रहे, इसी में सत्ता और वैश्विक ताकतों का लाभ है।
यहाँ यह समझना ज़रूरी है कि सत्ता साधन है, साध्य नहीं।
साध्य है— अखंड भारत और संगठित, सशक्त हिंदू समाज।
यदि समाज ही कमज़ोर रहेगा, परिवार ही टूटता रहेगा, तो सत्ता चाहे किसी के पास हो, राष्ट्र सुरक्षित नहीं रह सकता।”
पश्चिम से आई डेमोक्रेसी, समाजवाद, पूंजीवाद, सेकुलरिज़्म, राइट–लेफ्ट जैसी विचारधाराओं ने भारत को समाधान नहीं दिया, बल्कि उसे स्थायी टकराव में झोंक दिया है। इनके साथ भौतिकतावाद और उपभोक्तावाद आया, जिसने परिवार व्यवस्था को सबसे ज़्यादा चोट पहुँचाई। जबकि भारत की सोच पुरुषार्थ चतुष्टय— धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष पर आधारित है, जहाँ अर्थ साधन है, साध्य नहीं, और समाज व्यक्ति से ऊपर रखा जाता है।
यदि हम आयातित विचारधाराओं के सहारे चलते रहेंगे और बाहरी शक्तियों के संकेतों पर अपने निर्णय लेते रहेंगे, तो यह तय है कि हमारे आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप के प्रयास होते रहेंगे। जैसे कृषि सुधारों के समय दबाव बना, वैसे ही किसी भी समय चुनी हुई सरकार को अप्रत्यक्ष रूप से अस्थिर करने की कोशिश की जा सकती है। वेनेजुएला इसका उदाहरण है।
इसलिए आज ज़रूरत है कि भारत रक्षा तकनीक, डिजिटल तकनीक और रोबोटिक क्षेत्रों में आत्मनिर्भर बने, और साथ ही समाज को तोड़ने वाले हर प्रयास— चाहे वह मनुस्मृति जलाने के नाम पर हो, जातिगत उन्माद के नाम पर हो या वर्ग संघर्ष की राजनीति के नाम पर— उस पर स्पष्ट रोक लगे।
यदि भारत को सच में विश्वगुरु बनना है, तो उसे पहले अपने समाज को मज़बूत करना होगा।
राष्ट्र की सबसे छोटी इकाई परिवार है, और परिवार को तोड़ने वाली नीतियाँ किसी भी राष्ट्र को भीतर से खोखला कर देती हैं।
अंत में बात बहुत सीधी है—
सत्ता साधन है, साध्य नहीं।
साध्य है— अखंड भारत और संगठित, आत्मविश्वासी हिंदू समाज।
इसे न समझा गया, तो इतिहास की चेतावनी साफ़ है—
जो आज वेनेजुएला के साथ हुआ है,
वह कल हमारे साथ भी हो सकता है।
✍️दीपक कुमार द्विवेदी

