| हिंदी केवल हमारी भाषा नहीं, हमारी पहचान है, विरासत है, सभ्यता है। भारत की कई ऐसी लोकभाषाएं हैं जो हिंदी को अधिक उत्कृष्ट व समृद्ध बनाती हैं। हिंदी केवल भारत में ही नहीं विश्व के कई देशों में बोली और समझी जाती है यहां तक कि आज बड़े-बड़े कॉर्पोरेट्स, ई-कॉमर्स, बैंकिंग, हेल्थ-टेक, फिनटेक सभी अपने डिजिटल प्लेटफॉर्म पर हिंदी इंटरफेस को अपनाने लगे हैं। |
विश्व हिंदी दिवस केवल एक वार्षिक उत्सव नहीं, बल्कि हिंदी भाषा की वैश्विक प्रतिष्ठा और उसके उज्जवल भविष्य का प्रतीक है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि हिंदी केवल हिंदी भाषियों की भाषा नहीं, बल्कि भारत की सभ्यता, संस्कृति और विचारधारा की भावना है। विश्व हिंदी दिवस वह अवसर है, जब हम आत्ममंथन करें कि क्या हम सचमुच हिंदी की दशा और दिशा के प्रति उतने सजग हैं?
भाषा के विस्तार से देश का विस्तार होता है, यह एक ऐतिहासिक सच्चाई है। जब अंग्रेजी विश्व भाषा बनी, तो अमेरिका और यूरोप की संस्कृति एवं राजनीति ने भी अपनी गहरी उपस्थिति दर्ज कराई। इसी तरह, मंदारिन भाषा के बढ़ते व्यापक प्रभाव ने चीन की वैश्विक आर्थिक शक्ति को मजबूती दी है। अरबी-फारसी, इस्लामी सभ्यता के प्रसार का माध्यम बनी। हिंदी का विस्तार भी भारत की सांस्कृतिक, वैचारिक और आध्यात्मिक शक्ति के वैश्विक प्रसार का द्योतक है। जहां-जहां हिंदी जाएगी, वहां भारत के जीवन मूल्यों, परिवार-संस्कृति, आध्यात्मिकता और लोकतांत्रिक विचारों की संवाहिका बनेगी। हिंदी की महत्ता भाषा, संस्कृति और शक्ति की त्रिवेणी में निहित है।
हिंदी का वैश्विक परिदृश्य:-आज हिंदी विश्व की सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषाओं में दूसरे स्थान पर है। अनुमान है कि दुनिया में 135-140 करोड़ लोग हिंदी को समझते हैं और लगभग 70 करोड़ लोग इसे बोलते-समझते हैं। 33 से अधिक देशों में हिंदी भाषी समुदाय सक्रिय हैं, जिनमें फिजी, मॉरीसस, त्रिनिदाद, अमेरिका, कनाडा, यूएई, इंग्लैंड जैसे देश शामिल हैं। वैश्विक स्तर पर यूनेस्को और अन्य अंतरराष्ट्रीय भाषा अध्ययन संस्थानों की रिपोर्ट बताती है कि हिंदी सबसे तेजी से बढ़ती भाषाओं में से एक है। डिजिटल युग में भी हिंदी ने अद्भुत प्रदर्शन किया है।
गूगल के शोधों के अनुसार, हिंदी इंटरनेट उपयोगकर्ता अंग्रेजी उपयोगकर्ताओं से तेजी से बढ़ रहे हैं। सर्वविदित है कि यूट्यूब, फेसबुक, इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म पर हिंदी कंटेंट की लोकप्रियता तेजी से बढ़ रही है। इसके अलावा हिंदी फिल्मों, संगीत, वेब-सीरीज और लोकसंगीत ने वैश्विक स्तर पर अपनी एक अलग पहचान बनाई है।
विगत वर्षों में, भारत सरकार ने भी हिंदी के विकास और प्रचार-प्रसार के लिए कई ठोस कदम उठाए हैं। भारत सरकार लगातार प्रयासरत है कि हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की एक आधिकारिक भाषा बनाया जाए। कुछ प्रमुख अंतरराष्ट्रीय संस्थान जैसे यूएनडीपी, डब्लूअएचओ, यूनेस्को आदि अब हिंदी में सामग्री भी प्रकाशित कर रहे हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी-2020) ने मातृभाषा-आधारित शिक्षा को जोर दिया है। हिंदी के लिए यूनीकोड, भाषा संसाधन और एआई आधारित अनुवाद तकनीकें विकसित की जा रही हैं, जो हिंदी को तकनीकी रूप से सशक्त बनाती हैं।
हां, अभी भी भारत में एक चिंताजनक मानसिकता व्याप्त है, जो अंग्रेजी को बुद्धिमत्ता और उच्च सामाजिक प्रतिष्ठा का पर्याय मानती है। इस भाषाई हीनता की मानसिकता यानी अंग्रेजी को श्रेष्ठ समझने की सोच को छोड़ना होगा। तथ्य यह है कि केवल 10-12% लोग अंग्रेजी समझते हैं और मात्र 3% प्रभावी रूप से अंग्रेजी बोल पाते हैं। इस तथ्य को नकारा नहीं किया जा सकता कि मातृभाषा में पढ़ाई बच्चों के संज्ञानात्मक और तार्किक विकास के लिए अनिवार्य है। शोध बताते हैं कि बच्चे मातृभाषा में बेहतर सीखते और सोचते हैं और वैश्विक स्तर पर भी वह बेहतर प्रदर्शन करते हैं। जब बच्चा घर में ‘खा लो’ सुनता है और स्कूल में ‘ईट प्रॉपरली’ तो यह उसके मस्तिष्क पर अतिरिक्त बोझ बन जाता है। इसलिए मातृभाषा और क्षेत्रीय भाषाओं को शिक्षण में सर्वोपरि स्थान देना आवश्यक है।
हिंदी की विशिष्टताएं:- मंदारिन प्रयोगकर्ता की संख्या के आधार पर इससे आगे है, पर इसकी जटिल लिपि सीखने को कठिन बनाती है। अरबी, हालांकि धार्मिक-सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण है, पर विज्ञान, तकनीक और लोकतंत्र जैसे क्षेत्रों में उसकी भूमिका सीमित है। उर्दू की भी एक साहित्यिक विरासत है, लेकिन उसका वैश्विक विस्तार हिंदी जैसा नहीं। हिंदी अपनी वैज्ञानिक, सरल और ध्वन्यात्मक लिपि के कारण सीखने में आसान है।
हिंदी भाषाई परिवार में भोजपुरी, अवधी, राजस्थानी, मैथिली आदि कई लोकभाषाएं शामिल हैं, जो इसे और समृद्ध बनाती हैं। हिंदी आज भारत की सबसे तेजी से बढ़ती सॉफ्ट पावर बन चुकी है। विचारणीय है कि भारत की वैश्विक छवि का निर्माण भाषा-कूटनीति के माध्यम से भी होता है। योग, आध्यात्मिकता, आयुर्वेद जैसे भारतीय विषय हिंदी शब्दावली के जरिए विश्व में लोकप्रिय हुए हैं- जैसे आसन, प्राणायाम, नमस्ते, ध्यान, मंत्र। भारतीय सिनेमा, संगीत, भोजन, और अध्यात्म का विश्वव्यापी विस्तार हिंदी के साथ जुड़ा है।
इंडो-फिजी, मॉरीशस, सूरीनाम, नेपाल, यूएई, अमेरिका, कनाडा, इंग्लैंड में हिंदी अपनी व्यापक पहचान बना चुकी है। इसे हिंदी का भाषा-आधारित सांस्कृतिक प्रभुत्व कहा जा सकता है। जहां हिंदी के माध्यम से भारत के विचार, दर्शन, और संस्कृति का प्रचार-प्रसार हो रहा है।
आज बड़े-बड़े कॉर्पोरेट्स, ई-कॉमर्स, बैंकिंग, हेल्थ-टेक, फिनटेक सभी अपने डिजिटल प्लेटफॉर्म पर हिंदी इंटरफेस को अपनाने लगे हैं। ओटीटी और सोशल मीडिया के कंटेंट में हिंदी की खपत अंग्रेजी से चार गुना तेजी से बढ़ रही है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मशीन-लर्निंग के डाटा सेट में हिंदी विश्व की शीर्ष भाषाओं में शामिल हो चुकी है। यह निस्संदेह हिंदी की तकनीकी उन्नति को दर्शाता है।
हिंदी का भविष्य: अगले 25 वर्षों में यदि भारत विश्व नेतृत्व की ओर बढ़ना चाहता है, तो हिंदी उसके लिए सबसे सशक्त और स्वाभाविक माध्यम साबित होगी। इसके लिए प्राथमिक शिक्षा में मातृभाषा अनिवार्य हो, कम-से-कम 10-12 वर्षों तक। उच्च शिक्षा और तकनीकी शिक्षा का हिंदीकरण हो-इंजीनियरिंग, मेडिकल, लॉ, मैनेजमेंट में हिंदी सामग्री की उपलब्धता बढ़े। सरकारी कामकाज, न्यायपालिका, प्रशासन में हिंदी को आधारभूत भाषा का वास्तविक गौरव प्राप्त हो। वैश्विक मंचों जैसे जी20, ब्रिक्स, यूएन आदि पर हिंदी का व्यापक उपयोग सुनिश्चित हों। डिजिटल क्षेत्र में हिंदी तकनीक एआई, मशीन ट्रांसलेशन, डिजिटल शब्दकोश, भाषा संसाधन और अनुवाद प्रणाली में निवेश बढ़े।
निष्कर्षत: भविष्य उनका है, जो अपनी भाषा के साथ खड़े हैं। भारत की सभ्यता ने विश्व को विचार, संस्कृति और दर्शन दिए हैं। उसकी सॉफ्ट पावर की सबसे बड़ी ध्वजा हिंदी है। अंग्रेजी अवसर प्रदान करती है, पर पहचान नहीं। पहचान हमें अपनी भाषा हिंदी से मिलती है। जिस दिन पूरे समाज में यह स्वीकृति होगी कि हिंदी केवल भाषा नहीं, भारत की सांस्कृतिक आत्मा और डीएनए है, उसी दिन भारत की वैश्विक यात्रा क्रांतिकारी होगी। इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं कि हिंदी का विस्तार भारत के विस्तार का दूसरा रूप है और वह समय दूर नहीं जब विश्व अनुभव करेगा-भविष्य हिंदी और हिन्दुस्थानियों का है।
-कमलेश कमल

