| किसी भी स्वस्थ समाज का निर्माण क्रांति से नहीं बल्कि संक्राति से होता है। किसी से टकराव नहीं बल्कि सहअस्तित्व की भावना का विस्तार करना होगा। ऐसी सोच भारतीय जेन-जी की है। उनकी यही सोच राष्ट्र को, समाज को और आने वाली पीढ़ियोें को एक नई दिशा दे रही है। |
21वीं सदी का विश्व ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां परिवर्तन अब विकल्प नहीं, अनिवार्यता बन चुका है। युद्धों की अनिश्चितता, डिजिटल असमानता, सांस्कृतिक तनाव, आर्थिक अस्थिरता और राजनीतिक विवाद मिलकर यह संकेत देते हैं कि दुनिया एक नए रूपांतरण के करीब है। प्रश्न यह नहीं है कि परिवर्तन होगा या नहीं, प्रश्न यह है कि वह परिवर्तन कैसा होगा? क्या वह उग्र क्रांति के रास्ते से आएगा, या फिर एक शांत, क्रमिक और व्यापक संक्रांति के मार्ग से?
क्रांति का शब्द जितना आकर्षक लगता है, उसके परिणाम उतने ही अस्थिर और कई बार विनाशकारी सिद्ध हुए हैं। इतिहास बार-बार स्पष्ट करता है कि अचानक हुए परिवर्तन न तो दूरदृष्टि लेकर आते हैं, न स्थाई संस्थागत ढांचा, न ही सामाजिक संतुलन और न ही किसी नवीन अपेक्षित व्यवस्था का विकास करते हैं। फ्रांसीसी क्रांति कुछ ही वर्षों में आतंक में बदल गई और अंततः फ्रांस को नेपोलियन की सैन्य तानाशाही स्वीकार करनी पड़ी।
रूसी क्रांति ने समाज को हिंसा में धकेला तथा दुनिया को दो विरोधी ध्रुवों में बांटकर दीर्घकालिक शीत युद्ध में बदल दिया। चीन में क्रांति इस विचार तक जा पहुंची कि सत्ता बंदूक की नली से निकलती है, जिसके कारण सांस्कृतिक दमन और सामाजिक उथल-पुथल को वैध आधार प्राप्त हुआ। दक्षिण एशिया में नेपाल और बांग्लादेश युवा-आधारित क्रांतियों के परिणाम भी अस्थिर शासन और नई चुनौतियों से भरे हुए हैं।
इसके विपरीत संक्रांति जो धीरे-धीरे, संवाद, सहभागिता और स्वीकार्यता के साथ आगे बढ़ती है, समाज को भीतर से परिपक्व करती है। यह व्यवस्था को तोड़ती नहीं, उसे विकसित करती है। सभ्यताओं का स्थाई विकास सदा इसी मार्ग से हुआ है। भारत हजारों वर्षों से इसी संक्रांतिमय परिवर्तन का सर्वोत्तम उदाहरण रहा है।
भारतीयता: संक्रांति का मूल दर्शन
भारत का सांस्कृतिक मन क्रांति नहीं, संक्रांति को जीवन का स्वाभाविक रूप मानता है। वसुधैव कुटुंबकम की भावना बताती है कि समाज टकराव से नहीं, सह-अस्तित्व और सहयोग से बनता है। बौद्ध, जैन, हिंदू और सिख परम्पराओं ने करुणा, अहिंसा और समरसता को मानव आचरण का आधार बनाया। संत कबीर, गुरु नानक, मीरा, रैदास, नामदेव और चैतन्य महाप्रभु ने बिना किसी संघर्ष के समाज की चेतना को बदलने वाली अद्भुत सांस्कृतिक संक्रांतियों का नेतृत्व किया।
सम्राट अशोक का ‘जियो और जीने दो’ का सिद्धांत कलिंग युद्ध के बाद भारत ही नहीं, एशिया की सभ्यता का नैतिक मार्गदर्शक बन गया। आधुनिक भारतीय चेतना को म. गांधी ने सत्य, अहिंसा और सत्याग्रह के माध्यम से वह वैश्विक भाषा दी, जो आज भी मानवता को दिशा देती है। शीत युद्ध के समय पंचशील और गुटनिरपेक्षता ने विश्व को यह बताया कि स्थिरता का आधार शक्ति संतुलन नहीं, बल्कि सह-अस्तित्व है। यही भारतीयता की संक्रांति है, जो मानवता-केंद्रित, समावेशी और दीर्घकालीन है।

जेन-जी- भारत की नई वैश्विक संक्रांति के वाहक
विश्व के अनेक हिस्सों में आज की युवा पीढ़ी उग्र नारों, राजनीतिक भड़कावे और तात्कालिक क्रांति की ओर आकर्षित हो रही है। पर भारत के युवा (जेन-जी) इस वैश्विक प्रवृत्ति से अलग दिखाई देती है। वे उत्तेजना नहीं, विवेक को चुनते हैं, संघर्ष नहीं, समाधान को प्राथमिकता देते हैं और अस्थिर क्रांति की बजाय स्थिर और रचनात्मक संक्रांति को अपना पथ बनाते हैं। लेकिन प्रश्न यह कि भारतीय युवा (जेन-जी) ऐसा क्यों कर रहे हैं? क्योंकि उन्हें समझ है कि समाज टूटेगा तो परिवार टूटेगा, मिट्टी नष्ट होगी तो भविष्य नष्ट होगा, जलवायु दूषित होगी तो अगली पीढ़ियां अस्तित्व संघर्ष में डूब जाएंगी।
वे अपनी जड़ों से विमुख होने को तैयार नहीं। चाहे उन्हें कितना भी भड़काया जाए, वे अपनी संस्कृति, अपनी मिट्टी, अपने कुटुम्ब और सामाजिक ताने-बाने के आधार को टूटने नहीं देंगे। भारत की यह नवपीढ़ी आधुनिकता और परम्परा के बीच असाधारण संतुलन का प्रतीक है। वे एआई, बायोटेक, अंतरिक्ष विज्ञान, डिजिटल नवाचार और स्टार्ट-अप दुनिया में अग्रणी हैं, वहीं भारतीय संस्कृति, आध्यात्मिकता, जीवन मूल्यों और पारिवारिक संरचना को भी समान रूप से महत्व देते हैं। उनका धर्म कट्टरता नहीं, मानवता का माध्यम है, उनकी आध्यात्मिकता पलायन नहीं, आत्म-विकास की शक्ति है।
वे भारतीयता की नई संक्रांति को विश्व-स्तर पर पहुंचा रहे हैं। गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, मेटा, टेस्ला जैसे वैश्विक मंचों पर एमआईटी, स्टैनफोर्ड, ऑक्सफर्ड जैसे अकादमिक संस्थानों में और इसरो, डीआरडीओ और हजारों स्टार्ट-अप्स के माध्यम से नवनिर्माण कर रहे हैं। ये युवा केवल तकनीक के निर्माता नहीं, नैतिक वैश्विक नागरिकता के वाहक भी हैं।

मानवता ऐसे समय में है जहां परिवर्तन अपरिहार्य है, पर सही दिशा अत्यंत आवश्यक भी है। क्रांतियां असंतोष की ज्वाला से जन्म लेती हैं और अधिकार स्थिर भविष्य का आधार नहीं बन पातीं जैसा फ्रांस, रूस, चीन, नेपाल और बांग्लादेश के उदाहरण स्पष्ट करते हैं। एडमंड बर्क का यह वाक्य आज भी उतना ही सत्य है ‘क्रांति व्यवस्था को बचाने नहीं, उसे नष्ट करने के लिए जन्म लेती है।’
इसके विपरीत संक्रांति संवाद, सहयोग और क्रमिक सुधार का मार्ग स्थिरता, शांति और मानव विकास का आधार बनता है। भारतीय संस्कृति की संक्रांति परम्परा बुद्ध, महावीर, अशोक और म. गांधी से लेकर आधुनिक भारत तक दुनिया को यही संदेश देती है कि गहरा परिवर्तन बिना हिंसा के भी सम्भव है।
भारतीय जेन-जी इस संक्रांति की नई ध्वज-वाहक हैं। वे जानते हैं कि भविष्य उसी का होगा जो तकनीक के साथ संस्कृति, प्रगति के साथ नैतिकता और नवाचार के साथ मानवीयता को जोड़ सके। भारत अपने इन मूल्यों और अपनी जागरूक युवा शक्ति के साथ वैश्विक संक्रांति का नेतृत्व करने की क्षमता रखता है। जैसा स्वामी विवेकानंद ने कहा था, हर व्यक्ति को महान बनाने के लिए,हर राष्ट्र को महान बनाने के लिए तीन चीजें आवश्यक हैं: अच्छाई की शक्ति में विश्वास, ईर्ष्या और संदेह का अभाव और उन सभी की सहायता करना जो अच्छा बनने और अच्छा करने का प्रयास कर रहे हैं। यही संक्रांति का सार है और यही भारत के युवा का मार्ग है।
इस आलेख को सुनने के लिए निचे दिए गए लिंक को क्लीक करें.
https://open.spotify.com/episode/0yVNxCSJw0nOLQ0sJyb7sK?si=f0Ir_jVjS_iCI_pAuity5w
-दीपक द्विवेदी

