| भारत-रूस के सम्बंध हमेशा से ही मजबूत रहे हैं। दोनों देशों ने ही रक्षा, अंतरिक्ष, विज्ञान, व्यापार आदि में एक-दूसरे का साथ दिया है। हाल में ही रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन की भारत यात्रा ने दोनों देशों के बीच अन्य नए अवसरों के द्वार खोल दिए हैं। |
भारत-रूस सम्बंधों का इतिहास शीत युद्ध काल से लेकर आज तक अंतरराष्ट्रीय राजनीति में स्थिरता, भरोसे और रणनीतिक आत्मनिर्भरता का प्रतीक रहा है, किंतु बदलते वैश्विक परिदृश्य-अमेरिका-चीन प्रतिद्वंद्विता, रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिमी प्रतिबंध, एशिया में शक्ति संतुलन, तथा उभरते बहुध्रुवीय संरचनात्मक परिवर्तनों के बीच यह सम्बंध अब एक नए मोड़ पर खड़ा है। राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन की हालिया भारत यात्रा ने ना केवल द्विपक्षीय साझेदारी को पुनर्परिभाषित किया है बल्कि इसने दोनों देशों के लिए नई दिशा और नए अवसरों के द्वार खोल दिए हैं।
पुतिन की इस यात्रा में दोनों देशों ने 2030 तक के लिए व्यापक आर्थिक और सामरिक सहयोग का खाका तैयार किया। यह इंडिया रशिया इकोनॉमिक को ऑपरेशन प्लान 2030 भविष्य के आर्थिक ढांचे का आधार बना है। ऊर्जा, उर्वरक, खनिज, रक्षा, लॉजिस्टिक्स, समुद्री-परिवहन, विज्ञान, अंतरिक्ष, फार्मा, हेल्थकेयर और शिक्षा-ये सभी क्षेत्र इस साझेदारी के नए स्तम्भ हैं।

भारत और रूस के बीच हुए नए समझौतों, बढ़ते आर्थिक सहयोग, उच्च-तकनीकी क्षेत्रों में उभरती साझेदारी तथा रक्षा-ऊर्जा-भू-राजनीति के बदलते मानचित्र ने स्पष्ट किया है कि यह सम्बंध केवल अतीत की मित्रता का विस्तार नहीं, बल्कि भविष्य की सामरिक आवश्यकताओं के अनुरूप एक नए दौर में प्रवेश कर रहा है।
भारत की सैन्य शक्ति के आधुनिकीकरण में रूस की भूमिका ऐतिहासिक रूप से निर्णायक रही है। शीत युद्ध के दौर से लेकर आज तक भारत की वायुसेना, थलसेना और नौसेना के अधिकांश प्रमुख प्लेटफॉर्म-फाइटर जेट, टैंक, पनडुब्बियां, मिसाइल सिस्टम और हेलीकॉप्टर-रूस की तकनीक पर आधारित रहे हैं।
2020 के बाद वैश्विक राजनीति में तीव्र बदलाव, रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिमी प्रतिबंधों ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारत अब केवल पारम्परिक रक्षा खरीद पर निर्भर नहीं रह सकता। इसी परिप्रेक्ष्य में पुतिन की भारत यात्रा के दौरान दोनों देशों ने रक्षा सहयोग की दिशा बदलते हुए इसे अधिक आधुनिक, सह-उत्पादक और साझा तकनीक आधारित बनाया है। रूस की तकनीकी विशेषज्ञता और भारत की विनिर्माण क्षमता मिलकर भारतीय सेना की भविष्य की आवश्यकताओं को घरेलू स्तर पर पूरा करने में सक्षम होंगी। इससे बाहरी निर्भरता कम होगी और आपूर्ति-श्रृंखलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित होगी।
रेसिप्रोकल एक्सचेंज ऑफ लॉजिस्टिक सपोर्ट एग्रीमेंट (रेलोस) समझौते के साथ-साथ भारत-रूस ने संयुक्त उत्पादन, रक्षा तकनीक के अनुसंधान और मेक-इन-इंडिया ढांचे के अंतर्गत हथियारों एवं प्लेटफॉर्मों के निर्माण पर विशेष जोर दिया है। इसका सबसे पहला लाभ भारत को दीर्घकालिक सैन्य आत्मनिर्भरता के रूप में मिलेगा। दूसरा बड़ा लाभ प्रौद्योगिकी हस्तांतरण है तथा तीसरा महत्वपूर्ण लाभ रक्षा निर्यात क्षमताओं का विस्तार है।
इसके अतिरिक्त रेलोस को अंतिम रूप देना अत्यंत महत्वपूर्ण निर्णय है। यह समझौता सेनाओं, नौसेना जहाजों और विमानों द्वारा एक-दूसरे की सुविधाओं के उपयोग को आसान बनाएगा, जिससे हिंद महासागर, आर्कटिक और पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में भारत की सामरिक पहुंच और अधिक मजबूत होगी।
आधुनिक मिसाइल प्रणालियां, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित सैन्य प्लेटफॉर्म और उन्नत विमानन तकनीक जैसे क्षेत्रों में रूस का अनुभव भारत की सामरिक तकनीकी क्षमता को नई ऊंचाइयों तक ले जाएगा वहीं संयुक्त उत्पादन से ऐसे हथियार और प्रणालियां विकसित होंगी जिन्हें भारत एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के देशों को निर्यात कर सकता है। यह न केवल आर्थिक लाभ देगा बल्कि भारत की सामरिक उपस्थिति को भी बढ़ाएगा।

ऊर्जा सुरक्षा और दीर्घकालिक आपूर्ति की दृष्टि से देखें तो भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा ऊर्जा उपभोक्ता है। रूस से तेल आयात में बड़ी वृद्धि और दीर्घकालिक सप्लाई की प्रतिबद्धता भारत के लिए एक बड़ी उपलब्धि है। रूस भारत को सस्ती कीमतों पर कच्चा तेल, कोयला और ऊर्जा उत्पाद उपलब्ध करा रहा है, जिससे न केवल भारतीय उपभोक्ता को लाभ मिलता है, बल्कि भारतीय रिफाइनरी कम्पनियों की लाभप्रदता भी बढ़ती है। इसके अलावा, रूस के साथ नए लिक्विफाइड नैचरल गैस (एलएनजी) प्रोजेक्ट, क्रिटिकल मिनरल्स (लिथियम, निकेल, कोबाल्ट) पर सहयोग और सिविल न्यूक्लियर ऊर्जा में संयुक्त परियोजनाएं भारत के ऊर्जा भविष्य को स्थायित्व प्रदान करेंगी।

पूरा पश्चिम जब रूस पर प्रतिबंध और राजनीतिक दबाव बढ़ा रहा है, तब भारत के साथ उच्च-स्तरीय वार्ता और व्यापक समझौतों से रूस को अंतरराष्ट्रीय मंच पर राजनीतिक वैधता मिलती है। आज दोनों देश हाई-टेक क्षेत्रों-क्वांटम टेक्नोलॉजी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, साइबर सुरक्षा, स्पेस अनुसंधान, फार्मा उद्योग, सिविल न्यूक्लियर ऊर्जा, शिक्षा एवं स्किल साझेदारी, लॉजिस्टिक्स और पोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर-जैसे उभरते क्षेत्रों में गहन सहयोग विकसित कर रहे हैं। यह बदलाव केवल आर्थिक आवश्यकताओं से प्रेरित नहीं हैं बल्कि यह दोनों देशों की दीर्घकालिक रणनीतिक दृष्टि का परिणाम है।
वैश्विक स्तर पर देखें तो अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ भारत के सम्बंध गहरे हो रहे हैं, लेकिन रूस के साथ उसका जुड़ाव भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है। पश्चिम-रूस प्रतिस्पर्धा के इस दौर में भारत एक अनूठी स्थिति में खड़ा है। दोनों पक्षों के साथ संवाद बनाए रखने वाला कुछ गिने-चुने देशों में से एक। यह भारत को वैश्विक कूटनीति में पुल की भूमिका प्रदान करता है, जिससे भारत की कूटनीतिक विश्वसनीयता और बढ़ती है।
बहुपक्षीय मंचों पर रूस के साथ भारत सहयोग करता है, संयुक्त राष्ट्र के विभिन्न मंचों पर, शंघाई सहयोग संगठन, ब्रिक्स, यूरेशियन इकोनोमिक यूनियन और अन्य यूरेशियन संस्थानों में रूस का समर्थन भारत की एशियाई कूटनीति को अधिक प्रभावी बनाता है। यह भारत को यूरोप-एशिया के भू-राजनीतिक और भू-आर्थिक क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति स्थापित करने का अवसर देता है।
राष्ट्रपति पुतिन की भारत यात्रा यह स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि भारत-रूस सम्बंध भविष्य को देखते हुए एक नए युग में प्रवेश कर चुके हैं। यह साझेदारी अब केवल अतीत की विरासत नहीं, बल्कि आने वाले दशक की रणनीतिक आवश्यकताओं का प्रतिबिम्ब है। भारत को ऊर्जा, रक्षा, कृषि, तकनीक और भू-राजनीतिक संतुलन के रूप में बड़ा लाभ मिल रहा है। वहीं रूस को एशियाई बाज़ार, रणनीतिक सहयोग, राजनीतिक वैधता और आर्थिक स्थिरता मिल रही है।
मूल रूप से, यह सम्बंध आज आत्मनिर्भरता, बहुध्रुवीयता और रणनीतिक स्वायत्तता के तीन स्तम्भों पर पुनर्निर्मित हो रहा है। यही इसकी नई दिशा है और यही इस साझेदारी की वास्तविक शक्ति। यदि 21वीं सदी की बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में कोई स्थिर सम्बंध टिकने वाला है, तो वह भारत-रूस की यह परिपक्व, संतुलित और भविष्य उन्मुख साझेदारी ही है।
-डॉ. अभिषेक श्रीवास्तव

