| एसआईआर के विरोध में विपक्षी दलों की आलोचनाएं एवं ‘वोट चोरी’ और ‘नाम कटना’ जैसे आरोपों में तथ्य-सत्य नहीं है। इसलिए उन्हें जनता का समर्थन नहीं मिल रहा है। अपना अवैध वोटबैंक खिसकता देख ममता और कांग्रेस सहित सभी विपक्षी पार्टियां ‘खिसियानी बिल्ली खम्बा नोचे’ वाली कहावत को चरितार्थ कर रहे हैं। |
भारत में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव संविधान का एक आधारभूत ढांचा है जिसमें संसदीय कानून के जरिए भी परिवर्तन नहीं किया जा सकता। एक तार्किक, राष्ट्रीय सुरक्षा और जन आकांक्षाओं से सुसंगत निर्वाचक नामावली (इलेक्टोरल रोल) स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव को सुनिश्चित करने का महत्वपूर्ण आधार है। कानूनी तौर पर भारत का केंद्रीय चुनाव आयोग निर्वाचक नामावली यानी मतदाता सूची को तैयार करने और उसमें संशोधन (पुनरीक्षण) करने के लिए अधिकृत और सशक्त है।
निर्वाचक नामावली की शुद्धता बनाए रखने के लिए आयोग प्रत्येक चुनाव से पहले या आवश्यकतानुसार इसके पुनरीक्षण का आदेश देता है। अब चूंकि बार-बार होने वाले प्रवासन (पलायन) के कारण वर्तमान निर्वाचक नामावली में कई बदलाव आए हैं, जिसके परिणामस्वरूप मतदाता एक से अधिक स्थानों पर पंजीकृत हो गए हैं और मृत मतदाताओं के नाम हटाए नहीं गए हैं, इसलिए चुनाव आयोग ने ’विशेष गहन पुनरीक्षण’ की घोषणा की है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी पात्र नागरिक छूटे नहीं और कोई भी अपात्र व्यक्ति इसमें शामिल न हो।
निर्वाचक नामावली को सही रूप देने के लिए विशेष गहन पुनरीक्षण की घोषणा के बाद से विपक्षी दल लगातार इस मुद्दे पर हमलावर हैं और केंद्र सरकार की मंशा पर प्रश्न खड़े कर रहे हैं। उचित है या नहीं, इस पर चर्चा करने के पहले इस बात पर ध्यान देना आवश्यक है कि विपक्ष ने एक सुदृढ़ पूर्वधारणा बना ली है कि 2014 के बाद से देश में जो कुछ हुआ है और हो रहा है वह संविधान, संस्थाओं, राजनीतिक मर्यादाओं को कमजोर करने के लिए हो रहा है और विपक्ष ने ही 2014 के पहले राजनीतिक मर्यादाओं के मानदंड बनाए। आज विकास की राजनीति बनाम विरोध की राजनीति चल रही है।
सरकार एनआरसी और सीएए लेकर आई, राजनीतिक विरोध सिंड्रोम से ग्रसित विपक्ष को ये रास न आया। सरकार इमिग्रेशन एंड फॉरेनर्स बिल लाई, उसमें भी विपक्ष को राजनीति लगती है। सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा, सीमा सुरक्षा के मुद्दे पर बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स और नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी के अधिकार क्षेत्र बढ़ाए तो भी समस्या है। केंद्र सरकार की कल्याणकारी स्कीमों से दिक्कत है। ॠडढ से समस्या है तो फिर स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन कैसे रास आ सकता था। जिन लोगों ने संविधान, राजनीतिक-लोकतांत्रिक मूल्यों की धज्जियां उड़ाईर्ं, आज वे पंथनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक बनकर गवर्नेंस की राह में रोड़ा बन रहे हैं, जिन्होंने संसदीय मान मर्यादा को धूमिल किया। उन्हें हर संसदीय सुधार में गलतियां दिखती है।
sir की पूरी प्रक्रिया क्या है?
जब विपक्षी गठबंधन ने एसआईआर प्रक्रिया पर कटाक्ष किया तो चुनाव आयोग ने उनकी मांगों को अनदेखा नहीं किया। आयोग ने एसआईआर से जुड़े दस्तावेज साझा किए और स्पष्ट किया कि बीएलए-बीएलओ स्तर पर भी सहयोग और रिपोर्टिंग की व्यवस्था है। विशेषतः बीएलओ ने आयोग को 65 लाख नामों की सूची दी, जिसमें मृत, पलायन कर चुके और पता-अज्ञात मतदाता शामिल थे।

चुनाव आयोग ने एसआईआर के दौरान हटाए गए नामों के आंक़ड़ें भी सर्वोच्च न्यायालय और जनता के सामने रखे। इस प्रक्रिया में 22 लाख मृत मतदाता, 36 लाख अनट्रेसेबल मतदाता, 7 लाख डुप्लीकेट/एक से अधिक रजिस्ट्रेशन वाले पाए गए। यह कुल मिलाकर लगभग 65 लाख मतदाता बनते हैं जो बिहार की कुल मतदाता संख्या (लगभग 7.24 करोड़) का लगभग 8-9% है।
इस प्रक्रिया के अंतर्गत आयोग नए सएमएस अलर्ट भेजकर 5.7 करोड़ मोबाइल यूजर्स को सूचित किया। बीएलओ-बीएलए-इआरओ चेन के अंतर्गत बीएलओ घर-घर फॉर्म वितरित करता है, ईआरओ संदिग्धों की जांच करता है, सीईओ लेवल तक इस पूरी प्रक्रिया का ऑब्जर्वेशन होता है। प्रत्येक विलोपन का कारण स्पष्ट किया जाता है और सुनवाई का ऑप्शन रहता है। इसके बाद भी अभी तक किसी भी बीएल ने आपत्ति तक नहीं दायर की है।
ड्राफ्ट रोल प्रकाशित करना, राजनीतिक दलों को डेटा उपलब्ध कराना और बीएलए-बीएलओ स्तर पर मतदाताओं की पहचान सुनिश्चित करना, यह सम्पूर्ण प्रक्रिया चुनाव आयोग की जवाबदेही और पारदर्शिता का परिचायक है। इसके विपरीत विपक्ष की यह टिप्पणी कि आयोग फर्जी वोट बना रहा है, तथ्यों पर आधारित नहीं बल्कि केवल आरोप-प्रत्यारोप का खेल प्रतीत होता है।
एक ओर कांग्रेस पार्टी आयोग पर प्रश्नों का उत्तर न देने का आरोप लगा रही है, वहीं उसका खुद का इस दृष्टिकोण पर दोहरा रवैया सामने आया है। राज्य स्तर पर, कर्नाटक के मंत्री केएन राजन्ना ने राहुल गांधी के कथित ‘वोट चोरी’ अभियान की राजनीति का विरोध करते हुए यह कहा कि ‘जब वोटर लिस्ट बन रही थी तब कांग्रेस नेता मौन क्यों थे?’ इन टिप्पणियों के 6 घंटे के भीतर ही उन्हें मंत्री पद से हटा दिया गया। यह पूरा घटनाक्रम विपक्ष के दोहरे रवैये की राजनीति को उजागर करता है, जिससे उनकी मंशा पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है क्योंकि ऐसा ही बिहार में हो रहा है।
निर्वाचक नामावली में सुधार क्यों आवश्यक है, इसे नॉर्थ ईस्ट के उदाहरण से समझा जा सकता है। जब 1947 के बाद पश्चिमी पाकिस्तान के साथ-साथ पूर्वी पाकिस्तान भी अस्तित्व में आया तो पूर्वी पाकिस्तान में पश्चिमी पाकिस्तान की ज्यादती के चलते लोग अवैध तरीके से पूर्वोत्तर भारत के राज्य त्रिपुरा में आए और इस घटना में 1960 के दशक में पूर्वी पाकिस्तानियों (कालांतर में बांग्लादेशियों) को राज्य से निकालने के लिए एथनिक रीजनलिज्म की भावना के अंतर्गत काम करना शुरू किया और नृजातीय स्वायत्तता की मांग इतनी तेज हो गई कि त्रिपुरा की भारत से आजादी की मांग करने वाले उग्रवादी समूहों नेशनल लिबरेशन फोर्स ऑफ त्रिपुरा और आल त्रिपुरा टाइगर फोर्स ने मांग कि 1956 के बाद से त्रिपुरा में आए उन विदेशियों जिनका नाम निर्वाचक नामावली में दर्ज हो चुका है, उसे हटाया जाए, नहीं तो त्रिपुरा में अलगाववादी आंदोलन जारी रहेगा।
इसी प्रकार अवैध तरीके से भारत के राज्यों में आने वाले प्रवासियों ने यहां सिस्टम में कॉम्प्रोमाइज करा के अपने को वोटर बनाया, राशन कार्ड बनाया, इनके आई कार्ड बने, इन्हें नॉर्थ ईस्ट के राज्यों में नकली आधार कार्ड और नकली वोटर आईडी के साथ पकड़ा गया। रोहिंग्या, कुकी चिन, चकमा आदि अवैध प्रवासियों से राष्ट्रीय सुरक्षा और पूर्वोत्तर में एथनिक हार्मनी को बनाए रखने के लिए निर्वाचक नामावली में सही सुधार अपेक्षित है और इसलिए चुनाव आयोग अपनी शक्तियों का उपयोग करते हुए पूरी संवैधानिक मर्यादा में इस प्रक्रिया को पूर्ण कर रहा है।
-विवेक ओझा

