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बिग बॉस: मानसिक दिवालिए दर्शकों की पसंद

बिग बॉस: मानसिक दिवालिए दर्शकों की पसंद

by हिंदी विवेक
in जनवरी 2026, सामाजिक
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कहा जाता है कि जो दिखता है वो बिकता है। टीवी पर प्रसारित होने वाले बिग बॉस शो को देखना कुछ दर्शकों को बहुत रास आता है तो वहीं कुछ लोग कहते हैं कि यह मात्र दर्शकों को उल्लू बनाने वाला शो हो गया है। मनोरंजन के नाम पर इसमें अश्लीलता, निजी सम्बंध और नग्नता परोसी जाती है।

भारतीय समाज की आत्मा उसकी संस्कृति, परम्परा और मूल्यबोध में निहित है। यह संस्कृति केवल मंदिरों, ग्रंथों और पर्वों तक सीमित नहीं, बल्कि हमारे दैनिक जीवन की हर धड़कन में समाई हुई है। किंतु आज के समय में मनोरंजन के नाम पर ऐसे माध्यम उभर रहे हैं जो इस आत्मा को धीरे-धीरे क्षीण कर रहे हैं। उनमें सबसे चर्चित उदाहरण है बिग बॉस जैसा टीवी शो। प्रश्न यह है कि यह शो हमें उल्लू बना रहा है या इसके दर्शक स्वयं उल्लू बनने को तैयार हैं।

षड्यंत्रपूर्ण मनोरंजन

बिग बॉस को यदि बौद्धिक दृष्टि से देखा जाए तो यह केवल एक मनोरंजन कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक षड्यंत्रपूर्ण प्रयोग प्रतीत होता है। इसकी जड़ें पश्चिमी शो बिग ब्रदर में हैं, जहां नग्नता, अश्लीलता और अर्ध-पोर्न सामग्री को मनोरंजन का नाम देकर परोसा जा रहा है। भारत में भी उसी ढर्रे पर बिग बॉस को प्रस्तुत किया गया है, जहां विवाद, झगड़े, अपमान और निजी जीवन की गंदगी को कैमरे के सामने प्रदर्शित किया जाता है।

जहां कला का दीप बुझा दिया जाए,

वहां अंधकार ही संस्कृति कहलाए। 

भारतीय संस्कृति पर आघात

भारत की संस्कृति ने सदैव संयम, मर्यादा और शील को महत्व दिया है। हमारे महाकाव्यों में भी युद्ध और संघर्ष होते हैं, परंतु उनमें भी आदर्श और धर्म की रक्षा का भाव रहता है। इसके विपरीत बिग बॉस जैसे कार्यक्रमों में झगड़े, गाली-गलौज, अपमान और निजी सम्बंधों की अश्लीलता को मनोरंजन का नाम दिया जाता है।

मर्यादा ही भारत की पहचान है, 

बिना मर्यादा सब बेजान है।

दर्शक ही उल्लू क्यों?

परंतु प्रश्न का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यदि बिग बॉस जैसा शो चल रहा है, तो इसका कारण केवल उसका प्रसारण नहीं, बल्कि उसका दर्शक वर्ग भी है। जो लोग इसे देखते हैं, वे स्वयं अपनी बुद्धि और विवेक को तिलांजलि देकर इस अश्लील मनोरंजन को स्वीकार कर रहे हैं।

जो देखे विष को अमृत समझकर, 

वह स्वयं अपने पतन का कारण बनकर। 

बौद्धिक दृष्टिकोण

यदि हम बौद्धिक दृष्टिकोण से विश्लेषण करें तो बिग बॉस जैसे कार्यक्रम समाज में तीन प्रकार की हानियां पहुंचा रहे हैं।

नैतिक हानि: परिवार और समाज में मर्यादा का महत्व घट रहा है।

सांस्कृतिक हानि: भारतीय संस्कृति की जगह पाश्चात्य संस्कृति थोपने का प्रयास हो रहा है।

मानसिक हानि: युवाओं का ध्यान शिक्षा, सृजन और सकारात्मकता से हटकर विवाद, झगड़े और अश्लीलता की ओर जा रहा है।

ज्ञान का दीप बुझा जो देंगे, 

अज्ञान की आंधी में सब बहेंगे। 

मनोरंजन बनाम मूल्य

मनोरंजन का अर्थ केवल हंसी-ठिठोली नहीं है। भारतीय परम्परा में मनोरंजन भी शिक्षा और संस्कार का माध्यम रहा है। नाट्यशास्त्र से लेकर लोकगीतों तक, हर कला में आनंद के साथ-साथ मूल्य भी निहित रहे हैं। किंतु बिग बॉस जैसे कार्यक्रमों में मनोरंजन का अर्थ केवल विवाद और उत्तेजना तक सीमित कर दिया गया है।

मनोरंजन हो जो जीवन का दर्पण, 

वही बने समाज का सच्चा आभूषण।

समाज की जिम्मेदारी

समाज को यह समझना होगा कि किसी भी कार्यक्रम की सफलता उसके दर्शकों पर निर्भर करती है। यदि दर्शक विवेकपूर्ण होकर ऐसे कार्यक्रमों का बहिष्कार करें, तो यह स्वतः समाप्त हो जाएंगे। लेकिन यदि दर्शक इन्हें देखते रहेंगे, तो यह और अधिक बढ़ते जाएंगे।

दर्शक ही तय करें राह नई, 

तो संस्कृति फिर खिलेगी सही।

निष्कर्ष

बिग बॉस केवल एक टीवी शो नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक षड्यंत्र है। यह हमें उल्लू बना रहा है, परंतु उससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि हम स्वयं उल्लू बनने को तैयार हैं। यदि हम अपनी संस्कृति, अपने मूल्य और अपने विवेक को बचाना चाहते हैं, तो हमें ऐसे कार्यक्रमों का विरोध करना होगा।

जागो भारत के नौजवान, 

संस्कृति का रखो सम्मान। 

आज आवश्यकता है कि हम अपनी आंखें खोलें और विवेकपूर्ण निर्णय लें। बिग बॉस जैसे कार्यक्रमों को देखकर हम केवल समय ही नहीं, बल्कि अपनी संस्कृति और मूल्य भी खो रहे हैं। इसलिए यह कहना उचित होगा बिग बॉस उल्लू बना रहा है, परंतु उससे भी बड़ा सत्य यह है कि उसके दर्शक ही उल्लू हैं।

– अनिल जैन 

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