| विश्वगुरु बनने का मार्ग तभी प्रशस्त होगा जब भारत ज्ञान, विज्ञान, संस्कृति और नैतिकता- सभी क्षेत्रों में नेतृत्व स्थापित करेगा। भारत की प्राचीन सभ्यता सदैव ज्ञान का स्रोत रही है, आवश्यकता केवल इस ज्ञान को आधुनिक भाषा, साधनों और आवश्यकताओं के अनुरूप पुनर्जीवित करने की है। |
अंतरराष्ट्रीय शिक्षा दिवस (24 जनवरी) केवल कैलेंडर की एक तिथि नहीं है बल्कि यह उस वैश्विक संकल्प की पुनर्पुष्टि है कि शिक्षा मानव विकास, सामाजिक न्याय, आर्थिक प्रगति और सांस्कृतिक समृद्धि की आधारशिला है। विश्व के विभिन्न देशों की तरह भारत भी शिक्षा को समान अवसर, सामाजिक उत्थान और राष्ट्रीय पुनरुत्थान का सबसे शक्तिशाली साधन मानता है। ऐसे समय में यह दिन हमें स्मरण कराता है कि शिक्षा केवल एक औपचारिक व्यवस्था नहीं बल्कि वह मानवीय शक्ति है जो राष्ट्रों का भविष्य गढ़ती है। भारत जैसे विविधतापूर्ण देश के लिए शिक्षा का महत्व और भी अधिक गहन है क्योंकि यह हमारी सभ्यता की निरंतरता, हमारी सांस्कृतिक चेतना और हमारी राष्ट्रीय एकता का प्रमुख कारक है।
विभाजनकारी प्रवृत्तियां और औपनिवेशिक मानसिकता स्वतंत्र भारत की प्रगति में लम्बे समय तक बाधक रहीं। स्वतंत्रता के 8 दशकों बाद भी इन दोनों सोचों ने भारत के आत्मविश्वास, मौलिकता और सांस्कृतिक ऊर्जा को क्षतिग्रस्त किया। जहां विभाजनकारी मानसिकता ने समाज को खंडित किया, वहीं औपनिवेशिक दृष्टि ने भारत को उसकी अपनी जड़ों, उसके प्राचीन ज्ञान-स्रोतों और सांस्कृतिक वैभव से दूर रखने का प्रयास किया। परिणामस्वरूप शासन, शिक्षा, साहित्य, कला और शोध तक अनेक क्षेत्रों में हम पश्चिमी मानकों के अनुकरण तक सीमित रहे, परंतु आज का नया भारत इस स्थिति को बदलने के लिए इच्छाशक्ति, क्षमता और दृष्टि-तीनों से सुसज्जित है। अंतरराष्ट्रीय शिक्षा दिवस का संदेश भी यही है कि शिक्षा वही सार्थक है, जो व्यक्ति और समाज को आत्मनिर्भर, आत्मविश्वासी और स्वाभिमानी बनाए।
भारत आज ज्ञान-आर्थिक युग में नई ऊर्जा के साथ आगे बढ़ रहा है। क्यूएस वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग्स-2026 में भारत का अमेरिका, ब्रिटेन और चीन के बाद चौथे स्थान पर पहुंचना भारतीय विश्वविद्यालयों की वैश्विक पहचान में हुए अभूतपूर्व बदलाव का संकेत है। यह परिवर्तन केवल आंकड़ों का उत्थान नहीं बल्कि भारतीय शिक्षा जगत में सामूहिक आत्मविश्वास की वृद्धि है। नवाचार और उद्यमिता के क्षेत्र में भारत ने ऐतिहासिक उपलब्धियां दर्ज की हैं- लगभग 1,76,000 स्टार्टअप्स, 118 से अधिक यूनिकॉर्न और 92,168 पेटेंट आवेदनों के साथ विश्व के शीर्ष 6 देशों में स्थान। ग्लोबल इनोवेशन इंडेक्स में 81वें स्थान से 39वें स्थान तक पहुंचना और फिनटेक अपनाने में विश्व में प्रथम स्थान प्राप्त करना, इस परिवर्तन की स्पष्ट पुष्टि है। इन उपलब्धियों से यह सिद्ध होता है कि भारत की उच्च शिक्षा प्रणाली शोध, नवाचार, फैकल्टी विकास और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के नए मार्ग तैयार कर रही है। फिर भी यह तथ्य अस्वीकार नहीं किया जा सकता कि शिक्षा की गुणवत्ता, समान अवसर और सर्वसुलभता जैसी चुनौतियां अभी भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुईं। शिक्षा का अधिकार (आरटीई) नीति ने शिक्षा को प्रत्येक बालक तक पहुंचाने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई, विशेषकर वंचित और ग्रामीण वर्गों में नामांकन बढ़ाने में, किंतु शिक्षा का उद्देश्य केवल विद्यालय पहुंचना नहीं बल्कि गुणवत्तापूर्ण, प्रासंगिक और जीवनोपयोगी शिक्षा उपलब्ध कराना है। निजी स्कूलों की बढ़ती फीस, मनमाने नियम, डिजिटल असमानता, प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी और व्यावसायीकरण जैसी चुनौतियां इस उद्देश्य को सीमित करती हैं।
बदलती वैश्विक अर्थव्यवस्था में व्यापार, तकनीक, स्टार्टअप और नवाचार का महत्व अनेक गुना बढ़ गया है। दुनिया भर में आर्थिक प्रतिस्पर्धा, तकनीकी परिवर्तन, आपूर्ति श्रृंखला संकट और महंगाई जैसी चुनौतियां छात्रों के समक्ष ऐसे प्रश्न रख रही हैं, जिनका समाधान केवल पुस्तक-आधारित शिक्षा से सम्भव नहीं। शिक्षा अब केवल जानकारी नहीं बल्कि चिंतन, विश्लेषण, समस्या-समाधान, उद्यमिता, संवाद और नैतिक विवेक को विकसित करने का माध्यम होनी चाहिए। इसी संदर्भ में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (एनईपी) भारत की शिक्षा व्यवस्था में सबसे व्यापक और दूरदर्शी सुधार के रूप में उभरती है। यह केवल पाठ्यक्रम का नहीं बल्कि संपूर्ण सोच का परिवर्तन है- मातृभाषा में शिक्षा, बहुविषयक शिक्षण, कौशल विकास, भारतीय ज्ञान परम्परा का समावेश, शोध संस्कृति का विस्तार और तकनीक का सम्यक उपयोग इसकी प्रमुख विशेषताएं हैं।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 ने मात्र 5 वर्षों में ही शिक्षा व्यवस्था में नई दृष्टि और नई ऊर्जा का संचार किया है। उच्च शिक्षा का नामांकन 2014-15 के 3.4 करोड़ से बढ़कर 2022-23 में 4.46 करोड़ होना इसका प्रमाण है। 1947 में जहां भारत के पास मात्र 17 विश्वविद्यालय और 14% साक्षरता दर थी, वहीं आज देश में 495 राज्य विश्वविद्यालयों सहित 46,000 से अधिक संस्थान हैं, जिनमें पात्र छात्र 81% नामांकित है। यह विस्तार केवल संख्यात्मक वृद्धि नहीं बल्कि अवसरों की उपलब्धता और शैक्षणिक आकांक्षाओं के विस्तार का प्रतीक है। इसके बाद भी सकल नामांकन अनुपात (जीईआर) बढ़ाने, डिजिटल खाई को पाटने, ग्रामीण ढांचा सुदृढ़ करने और शिक्षक-छात्र अनुपात सुधारने जैसी चुनौतियां अभी भी व्यापक कार्ययोजना की अपेक्षा करती हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भारतीय भाषाओं एवं विदेशी भाषाओं के संतुलित अध्ययन का प्रावधान भविष्य की शिक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। भाषा केवल संचार का माध्यम नहीं बल्कि संस्कृति, मूल्य और सभ्यता की जीवंत अभिव्यक्ति है। इसलिए भारतीय भाषाओं का संरक्षण और संवर्धन केवल भाषायी कर्तव्य नहीं बल्कि स्व और स्वत्व के संरक्षण का सांस्कृतिक दायित्व है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारतीय भाषाओं के लिए बने कई प्रावधान अभी व्यवहार में पूरी तरह लागू नहीं हो पाए हैं। अभी भी विद्यालयी शिक्षा एवं उच्च शिक्षा में अंग्रेजी को बढ़त ही नहीं अपितु वर्चस्व प्राप्त है। नौवीं-दसवीं एवं ग्यारहवीं-बारहवीं में विद्यार्थी हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं का विकल्प नहीं चुनते। आंग्ल भाषा अथवा किसी विदेशी भाषा के साथ-साथ एक भारतीय भाषा को अनिवार्य किए बिना यह सम्भव नहीं होगा। भाषा-विवादों और राजनीतिक अड़चनों से ऊपर उठकर इस दिशा में शीघ्र समाधान आवश्यक है।
भारत के आगे बढ़ने में सबसे बड़ी अदृश्य बाधाओं में से एक रही है औपनिवेशिक मानसिकता, जो हमें अपनी भाषा, विरासत और क्षमता पर शंका करने को प्रेरित करती है। वर्षों तक यही सोच भारतीयों को यह विश्वास दिलाती रही कि श्रेष्ठता का पैमाना पश्चिम है। फलस्वरूप योग, आयुर्वेद, नाट्यशास्त्र, अर्थशास्त्र, खगोल और गणित जैसी भारतीय ज्ञान परम्पराएं द्वितीय पंक्ति में रखी गईं। प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 2035 तक गुलामी की मानसिकता से मुक्ति का आह्वान केवल राजनीतिक घोषणा नहीं बल्कि राष्ट्रीय चेतना का उद्बोधन है। जब शिक्षा भारतीय आत्मा पर आधारित होकर वैश्विक प्रतिस्पर्धा के अनुरूप विकसित होगी तब भारत का विश्वगुरु बनने का स्वप्न केवल कल्पना नहीं बल्कि सुनिश्चित भविष्य बन जाएगा।

