| गायक महेंद्र कपूर और अपनी मधुर आवाज से कानों में रस घोलने वाली सुमन कल्याणपुर ने गायकी के क्षेत्र में हिंदी सिनेमा को समृद्ध किया है। आज भी इनके द्वारा गाए गीत सहज ही लोगों के होंठ पर गुनगुनाते हैं। इस आलेख में इनके फिल्मी यात्रा पर गहन चर्चा की गई है। |
आज भी जब हम हिंदी सिनेमा के पार्श्वगायकों की बातें करते हैं तो सहज ही तीन नाम किशोर कुमार, मो. रफी और मुकेश याद आते हैं। जबकि हिंदी सिनेमा के इतिहास में गायकों की एक लम्बी सूची है, जिन्होंने अपनी गायकी से हिंदी सिनेमा को समृद्ध किया है। ऐसे ही एक गायक हैं महेंद्र कपूर। जिनका जन्मदिन 9 जनवरी को है। वर्ष 1934 में जन्में महेंद्र कपूर आज 91 साल के होते। उनका निधन 25 सितम्बर 2008 को अमृतसर में हुआ था। पार्श्वगायन में करियर बनाने के लिए वे कम आयु में ही मुम्बई आ गए थे। मोहम्मद रफी का उन्हें स्नेह प्राप्त हुआ। उनके सान्निध्य में उनकी संघर्ष यात्रा शुरु हुई। 1953 की फिल्म ‘मदमस्त’ के साहिर लुधियानवी के गीत ‘आप आए तो खयाल-ए-दिल-ए नाशाद आया’ से उन्होंने सिनेमा की दुनिया में अपनी यात्रा आरम्भ की और आगे चलकर निर्माता-निर्देशक बी.आर.चोपड़ा और संगीतकार रवि के पसंदीदा गायक बने। हमराज़, गुमराह, धूल का फूल, वक़्त, धुंध जैसी सुपरहिट फिल्मों में उनकी आवाज का भी योगदान था। हमराज के गीतों (नील गगन के तले, तुम अगर साथ देने का वादा करो, न मुंह छुपा के जियो, किसी पत्थर की मूरत से इत्यादि को भला कौन भूल सकता है? संगीतकार रवि ने इनमें से अधिकाश फिल्मों में संगीत दिया। उपरोक्त के अलावा महेंद्र कपूर के कुछ अतिचर्चित गीतों में चलो एक बार फिर से (गुमराह), (हमराज), लाखों हैं यहां दिलवाले (किस्मत), मेरे देश की धरती (उपकार), है प्रीत जहां की रीत सदा (पूरब और पश्चिम), फकीरा चल चला चल (फकीरा), अब के बरस तुझे (क्रांति), तेरे प्यार का आसरा (धूल का फूल) शामिल हैं।
1968 में उपकार के बहुचर्चित गीत मेरे देश की धरती सोना उगले के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायक का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था। इस महत्वपूर्ण सम्मान के अलावा उन्हें 1963 में गुमराह के गीत, ‘चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएं’ के लिए फिल्म फेयर पुरस्कार मिला था। बाद में एक बार फिर 1967 में हमराज के ‘नीले गगन के तले’ के लिए भी उन्हें फिल्म फेयर पुरस्कार मिला। उनके जीवन का तीसरा फिल्म फेयर पुरस्कार ‘रोटी कपड़ा और मकान’ के ‘और नहीं बस और नहीं’ के लिए 1974 में मिला। बाद में उन्हें पद्मश्री और महाराष्ट्र सरकार के लता मंगेशकर सम्मान से सम्मानित किया गया।
उन्होंने मराठी फिल्मों में भी पार्श्व गायन किया। उल्लेखनीय है कि उन्होंने रफी, तलत महमूद, मुकेश, किशोर कुमार तथा हेमंत कुमार जैसे चर्चित गायकों के सुनहरे दौर में यादगार सफलता प्राप्त की। महेंद्र कपूर ने रवि के अलावा अन्य संगीतकारों यथा सी. रामचंद्र, ओ. पी. नैयर और नौशाद के साथ भी काम किया और अनेक स्मरणीय गीत गाए। उन्होंने बी.आर.चोपड़ा के लोकप्रिय टीवी धारावाहिक महाभारत का शीर्षक गीत भी गाया था। उनकी सबसे बड़ी विशेषता गहरा आलाप लेना था जो उन्हें उनके मार्गदर्शक मो. रफी की आवाज से अलग करती थी। कई बार उनका गायन सुनकर लोगों को लगता था कि यह रफी साहब की आवाज है।
इसी क्रम में एक और हस्ती की चर्चा की जा सकती है जो अपनी एक अलग ही आवाज लेकर हिंदी सिनेमा की दुनिया में आईं। इनका नाम है-सुमन कल्याणपुर। संयोग ऐसा कि इनका भी जन्म जनवरी माह में हुआ था। 28 जनवरी 1937 को बांग्लादेश के शहर ढाका में हुआ था। सुमन कल्याणपुर के पिता शंकर राव हेम्मडी सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया में एक शीर्ष पद पर लम्बे समय तक ढाका में तैनात रहे। 1943 में, उनका परिवार मुम्बई आ गया। सुमन कल्याणपूर की चित्रकला और संगीत में रुचि थी। मुम्बई के प्रसिद्ध सेंट कोलंबा हाई स्कूल से स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद, चित्रकला में पढ़ाई के लिए प्रतिष्ठित सर जे.जे. स्कूल ऑफ़ आर्ट्स में प्रवेश मिला। इसके साथ ही, उन्होंने पुणे के प्रभात फिल्म्स के संगीत निर्देशक पंडित केशव राव भोले से शास्त्रीय गायन सीखना शुरू किया। शुरू में न केवल गायन में उनकी रुचि थी, लेकिन धीरे-धीरे संगीत में भी उनकी रुचि बढ़ती गई और उन्होंने उस्ताद खान, अब्दुल रहमान खान और गुरुजी मास्टर नवरंग से सीखना शुरू कर दिया।
उन्हें भारत की प्रसिद्ध और प्रतिष्ठित पार्श्व गायिकाओं में शामिल किया जाता रहा है। उन्होंने हिंदी, मराठी, असमिया, गुजराती, कन्नड़, मैथिली, भोजपुरी, राजस्थानी, बंगाली, ओडिया और पंजाबी के अलावा अन्य कई भाषाओं में भी फ़िल्मों के लिए गाने रिकॉर्ड किए हैं। निर्विवाद रूप से सुमन कल्याणपुर को मोहम्मद रफी, लता मंगेशकर, मुकेश, गीता दत्त, आशा भोसले, हेमंत कुमार, तलत महमूद, किशोर कुमार, मन्ना डे, महेंद्र कपूर और शमशाद बेगम के साथ हिंदी फिल्म संगीत के सुनहरे युग के लोकप्रिय गायिकाओं में से एक माना जाता है। संगीतकार नौशाद के संगीत निर्देशन में फिल्म ‘दरवाजा’ उनकी पहली रिलीज फिल्म मानी जाती है। उनके गाए लोकप्रिय गीतों में रफी के साथ उनके कुछ यादगार युगल गीत आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे, ना-ना करते प्यार, तुम रूठो ना हसीना, रहे ना रहे हम, परबतों के पेड़ों पर शाम का बसेरा, ये पर्वर्तों के दायरे, अजहूं ना आए बालमा, तुमने पुकारा और हम चले आये, बाद मुद्दत के ये घड़ी आई, मुझसे शादी नहीं की, दिल ने फिर याद किया, तुझको दिलदारी की कसम और चांद तकता है इधर, मन्ना डे के साथ, उन्होंने दत्ताराम के संगीत निर्देशन में लोकप्रिय गीत ना जाने कहां हम थे गाया। मुकेश के साथ उन्होंने कई लोकप्रिय युगल गीत गाए हैं, जैसे ये किसने गीत छेड़ा अखियों का नूर है तू, मेरे प्यार में तू है, दिल ने फिर याद किया, शमा से कोई नहीं, आदि। फिल्मों का नाम लिया जाए तो मियां बीबी राजी (1960), बात एक रात की (1962), दिल एक मंदिर (1963), दिल ही तो है (1963), शगुन (1964), जहां आरा (1964), सांझ और सवेरा ( 1964), नूरजहां (1967), साथी (1968) और पाकीज़ा (1971) जैसी क्लासिक फिल्मों का नाम लिया जाता है। उन्होंने संगीतकार शंकर-जयकिशन, रौशन, मदन मोहन, एस.डी. बर्मन, एन. दत्ता, हेमंत कुमार, चित्रगुप्त, नौशाद, एस.एन. त्रिपाठी, गुलाम मुहम्मद, कल्याणजी-आनंदजी और लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के लिए गाने गाए। उन्होंने 740 से अधिक फ़िल्मी और ग़ैर-फ़िल्मी गाने गाए हैं। उन्होंने 1960 के दशक में रफी के साथ 140 से अधिक युगल गीत गाए।
मराठी फिल्म ‘पसंत आहे मुलगी’ के लिए सुमन का पहला सुपरहिट गीत- ’भातुकलिचा खेल मांडिला’ था। इसके संगीतकार वसंत प्रभु थे। पुत्रा व्हावा आइसा, एकटी, मानिनी और अन्नपूर्णा इ. उनकी कुछ यादगार मराठी फिल्में हैं। सुमन कल्याणपुर की आवाज गायिका लता मंगेशकर से काफी मिलती-जुलती थी। उनके कई गीत लता की शैली से प्रभावित हैं। उनकी आवाज और लता की समानता के बारे में कल्याणपुर हमेशा अशज रही हैं। इस समानता के बारे में उन्होंने एक बार कहा था, मैं लता से काफी प्रभावित थी। अपने कॉलेज के दिनों में, मैं लता के ही गाने गाती थी। मेरी आवाज नाजुक और पतली थी… लता जी से मिलती थी… मैं क्या कर सकती थी? 1950 और 1960 के दशक को हिंदी फिल्म संगीत का स्वर्ण युग माना जाता है। इस दशक में मानों मंगेशकर बहनों (लता और आशा भोसले) का अघोषित साम्राज्य स्थापित सा हो गया था। लता-आशा की अनुपलब्धता की स्थिति में सुमन कल्याणपुर को गायन का अवसर मिलता था।
उन्हें उनकी गायन प्रतिभा के लिए सुर श्रृंगार सम्मान पुरस्कार के अलावा वर्ष 2009 में महाराष्ट्र सरकार द्वारा लता मंगेशकर पुरस्कार प्राप्त किया। सुमन कल्याणपुर अपनी मीठी आवाज और अपने गाये गीतों के जरिए हमेशा अपने प्रशंसकों के दिलों में राज करेंगी। दोनों गायकों के योगदान को संगीत प्रेमी कभी नहीं भूल पाएंगे।
-राजीव रोहित

