भोर की रोशनी अभी पूरी तरह फैली भी नहीं थी कि घर-घर जाकर खाना बनाने वाली चंद्रा अपने रोज के काम के लिए निकल गई थी। चंद्रा मेहनती भी थी और अपने काम के प्रति बेहद ईमानदार भी। वह दो घरों में स्वादिष्ट भोजन बनाकर तीसरे घर में आई और फिर भोजन बनाने में व्यस्त हो गई। उसी समय उसका फोन बज उठा। स्क्रीन पर नाम उभरा-विमला देवी।
चंद्रा मुझे बहुत भूख लग रही है, उधर से कांपती, थकी-सी आवाज आई। पेट तो पीठ से चिपका जा रहा है। जल्दी आकर कुछ बना दे बेटी। चंद्रा चौंक गई, वह विमला देवी के घर काम नहीं करती थी फिर भी बोली, हां अम्मा जी, थोड़ी देर में आती हूं। आप चिंता मत करिए। फोन से फिर वही दयनीय पुकार आई, अब देर मत करना मुझसे भूख नहीं सही जा रही।
चंद्रा का दिल जैसे मोम हो गया। जिस घर में वह उस समय खाना बना रही थी, वहां जल्दी-जल्दी बाकी काम निबटाकर वह तुरंत ही विमला देवी के घर की ओर चल पड़ी।
विमला देवी लगभग 80 वर्ष की थीं। कभी फुर्तीली, हंसमुख और सामाजिक थीं, लेकिन पति की मृत्यु के बाद अकेलापन, शुगर की बीमारी और अशक्तता ने उनको बिस्तर तक सीमित कर दिया था। उनके घुटनों में बहुत दर्द रहने लगा था। अगर वह बिस्तर से उठतीं तो उन्हें धीरे-धीरे चलने के लिए भी वॉकर या व्हील चेयर की आवश्यकता पड़ने लगी थी।
बेटा-बहू अमेरिका में बसे हुए थे। कुछ साल पहले जब वे ठीक थीं तब वे उन्हें अपने पास अमेरिका बुला लेते थे, लेकिन जब से विमला देवी की तबीयत और बढ़ती उम्र ने उन्हें असमर्थ और पराश्रित बना दिया तब से बेटे सुयोग्य ने उन्हें अमेरिका बुलाना छोड़ दिया। क्योंकि अमेरिका में उनकी देखभाल करना बहुत कठिन एवं महंगा लगने लगा था। बीमार होने पर खर्च भी बहुत अधिक होता था। भारत की तरह अमेरिका में जल्दी से डॉक्टर से भेंट का समय भी न मिलता। इसलिए सब विचार करके उन्होंने बिमला देवी को भारत में रखने का निर्णय किया। उन्होंने उनकी देखभाल के लिए 24 घंटे की एक आया रख दी थी। बहू श्रद्धा में न तो इतनी श्रद्धा थी, न ही समय कि वह बूढ़ी सास की देखभाल कर सके। उन्होंने घर में सीसीटीवी लगवा दिया था। वे वहीं से बैठे सीसीटीवी के कैमरों पर निगरानी रखते थे कि सब ठीक चल रहा है या नहीं। परिचारिका ठीक से विमला देवी का ध्यान रख रही है या नहीं। आया रखने के बाद वे भी निश्चिंत से हो गए थे। हर शनिवार को मां से बात कर लेते।
भूख से तड़पती विमला देवी सोच रही थीं, श्रद्धा और सुयोग्य अमेरिका में बैठे मेरा कितना ध्यान रखते हैं, वे कैमरों पर देखते होंगे कि मैं बैठी हूं पर, कैमरों में भूख तो दिखाई नहीं दे रही होगी। कैमरे अकेलापन और परिचारिका का अचानक बिना बताए छुट्टी लेना भी नहीं दर्शा रहा होगा। विमला देवी अपनी असमर्थता, भूख और अशक्तता के कारण स्वयं को बहुत मजबूर समझ रही थीं। ऐसे में उन्हें अपने पति सुभाष जी की बहुत याद आ रही थी। जवानी के दिन उनकी आंखों में तैरने लगे थे। वे अकेली ही न जाने कितने व्यक्तियों को भोजन बनाकर खिला देती थीं। घर में आए दिन भोज पर किसी न किसी को बुलाती रहती थीं। उस समय तो आज की तरह होटल से खाना मंगाने और होटल में जाकर खाना खाने का रिवाज भी नहीं था। उस समय का उत्साह-उमंग का एक-एक पल जैसे बुढ़ापे में उन्हें मुंह चिढ़ा रहा था। जवानी के वे ऊर्जा भरे सुखद दिन उन्हें उनकी कमजोरी का और भी अधिक अहसास करा रहे थे। बुढ़ापे का ऐसा दुखदाई रूप देखकर उनकी आंखों से आंसूओं की गंगा-जमुना प्रवाहित होने लगी थी। भूख उनपर हावी होती जा रही थी, उनकी बेचैनी बढ़ती जा रही थी। उस दिन वे तन से भी अधिक मन से हार गईं थीं। अशक्त शरीर से अधिक दुख अशक्त मन का होता है।
पर अच्छा हुआ उसी समय चंद्रा पहुंच गई उसने दरवाजा खटखटाया तो भीतर से कमजोर आवाज आई- आ जा बेटी, दरवाजा खुला है अंदर जाकर चंद्रा का हृदय भर आया। विमला देवी कुर्सी पर झुकी-झुकी बैठी थीं। चेहरे पर थकान, आंखों में विनती और होंठों पर सूखी पपड़ियां पड़ी थीं।
अम्मा जी, आपने कुछ खाया कि नहीं? चंद्रा ने पूछा।
नहीं चंद्रा, सुबह से एक दाना भी मुंह में नहीं गया है। मुझे बहुत बेचैनी हो रही है।
चंद्रा ने देखा कि घर में कोई मिठाई है क्या? मेज पर एक डिब्बे में लड्डू रखे थे। चंद्रा ने कहा, अम्माजी जब तक मैं खाना बनाऊं आप पहले एक लड्डू खा लीजिए। आपकी बेचैनी कम हो जाएगी। हो सकता है आपका शुगर का स्तर कम हो रहा हो। चार नंबर वाली मेमसाहब को भी ऐसी बेचैनी होती है तब वे कुछ मीठा खा लेती हैं।
लड्डू खाकर बिमला देवी को कुछ आराम आया। वे शांति से बैठ गईं।
चंद्रा ने बिना देर किए रसोई संभाल ली। उसने मूंग की दाल, भिंडी की सब्जी, दही और नरम फुल्के बनाकर थाली में सजाए और बिमला देवी के पास ले जाकर बोली, अम्मा जी, भोजन तैयार है। आप भोजन कर लीजिए।
भोजन की सुगंध फैलते ही तथा सजी थाली को देखकर जैसे विमला देवी के चेहरे पर जीवन लौट आया।
उन्होंने पहला कौर लिया तो आंखें नम हो गईं। कहने लगीं, बेटी तेरे हाथ में तो जादू है। कितना स्वादिष्ट भोजन बनाया है तूने। सच, तूने मेरी जान बचा दी। भूख इंसान को कितना व्याकुल कर देती है।
वे भूख के कारण जल्दी जल्दी भोजन कर रही थीं। हर कौर जैसे तृप्ति की कहानी कह रहा था। साथ ही उन्हें तृप्त देखकर चंद्रा को भी आत्मिक सुख की प्राप्ति हो रही थी। क्योंकि
भूखे को जो भोज दे, करता पुण्य अपार।
कौर-कौर में ज्यों बसे, ईश्वर का उपहार।
वह कहने लगी, अम्मा जी, आपको प्रसन्न देखकर मैं भी बहुत खुश हूं। इस दुनिया में भूखे को खाना खिलाना ही असली पूजा है। भगवान को प्रसन्न करने का सबसे सरल रास्ता है।
जैसे-जैसे विमला देवी की भूख शांत होती जा रही थी, उनके खाने की गति धीरे-धीरे कम होती जा रही थी।
जब वे भोजन कर चुकीं तो उन्होंने कांपते हाथों से चंद्रा का सिर सहलाया-बेटी, तेरे हाथों में केवल स्वाद ही नहीं एक अपनापन है। क्योंकि भोजन का स्वाद घी-मसालों से ही नहीं बढ़ता बल्कि, देने वाले की आत्मीयता एवं प्रेमिल भावनाओं से भी बढ़ता है। आज भोजन करके मेरी आत्मा तृप्त हो गई है। तुझे बहुत-बहुत आशीर्वाद। आज तूने मुझे यह एहसास दिला दिया कि दुनिया अभी भी अच्छी है। ले, ये 100 रुपए तू रख ले। नहीं अम्माजी, मेरे किए का मुझे फल मिल चुका है। आपको भोजन करवाकर मुझे जो आनंद मिला है, उसके आगे इन रुपयों का कोई महत्व नहीं है।
चंद्रा ने रुपये नहीं लिए। उसे लग रहा था जैसे सेवा का आनंद कहीं भीतर से गूंज रहा हो। आशीर्वादों ने जैसे उसके जीवन में खुशी, शांति, संतोष, उल्लास तथा तृप्ति का भंडार भर दिया हो। क्योंकि सेवा का सुख, लेने वाले से अधिक देने वाले को तृप्त करता है।
सेवा से बढ़कर नहीं, जग में है सौभाग्य।
परहित जो करता रहे, वह सच्चा सुख पाए॥

