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राष्ट्रसमर्पण का दीपोत्सव

राष्ट्रसमर्पण का दीपोत्सव

‘विलास फडणवीस स्मृति जिव्हाळा’ पुरस्कारों का नागपुर में भव्य वितरण

by हिंदी विवेक
in विशेष, समाचार..
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“जिस प्रकार सूर्य स्वयं प्रकाशमान होता है, उसी प्रकार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक अपने कर्तृत्व से समाज को प्रकाशित करते रहते हैं। परिस्थितियों के प्रहार जितने तीव्र होते हैं, उतना ही यह प्रचारक अधिक दृढ़, कणखर और तेजस्वी बनता जाता है। यही तपस्वी वृत्ति समर्थ राष्ट्रनिर्माण की नींव है।”
इन शब्दों में मान्यवरों ने संघ प्रचारकों के जीवन-व्रत का गौरव किया।

अवसर था जिव्हाळा परिवार द्वारा आयोजित ‘विलास फडणवीस स्मृति जिव्हाळा पुरस्कार’ वितरण समारोह का। यह समारोह 10 जनवरी 2026 को नागपुर स्थित आईटी पार्क में पर्सिस्टंट सिस्टम्स के ‘कविकुलगुरु कालिदास’ सभागृह में अत्यंत भव्यता के साथ संपन्न हुआ। यह कार्यक्रम सेवाव्रतियों के सम्मान और संघ प्रचारकों के आत्मीय संवाद के अथाह संगम का साक्षी बना।

जिस गीत ने भारतीयों के हृदय में देशभक्ति की चिंगारी प्रज्वलित की, उस ‘वंदे मातरम्’ गीत के डेढ़ सौ वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में गोपाल समूह के सुमधुर गायन से इस मंगल अवसर का शुभारंभ हुआ।

रा.स्व.संघ विदर्भ प्रांत के सहसंघचालक श्रीधरराव गाडगे ने अपने भाषण में विलासजी की स्मृतियों को उजागर करते हुए कहा,
“विलासजी केवल एक व्यक्ति नहीं थे, वे ऊर्जा के स्रोत थे। उनके अथाह जिव्हाळे (स्नेह) के कारण ही अनेक युवा राष्ट्रकार्य के लिए प्रेरित हुए। विलासजी के व्यक्तित्व के इस अलौकिक प्रभाव को अनुभव कर ही आज यहाँ उपस्थित पाँचों प्रचारक राष्ट्रसेवा में समर्पित हुए हैं। नई पीढ़ी के लिए इन ‘दीपस्तंभों’ को आदर्श मानना समय की आवश्यकता है।”

इस समारोह की एक विशेष विशेषता पुरस्कारार्थियों के सम्मान में मानपत्रों का वाचन रही।
श्रद्धा भारद्वाज, डॉ. अभिजित अंभईकर, गौरी बेलन, डॉ. सीमा देशपांडे और रूपा फडणवीस द्वारा किए गए मानपत्रों के भावपूर्ण और प्रभावशाली वाचन से संपूर्ण सभागृह भावविभोर हो उठा। शब्द-शब्द में पुरस्कारार्थियों के कार्यों का गौरव उपस्थित जनसमुदाय के हृदय को स्पर्श कर गया।
संघ के शताब्दी महोत्सव के अवसर पर समाज के पाँच महत्वपूर्ण क्षेत्रों (पंचपरिवर्तन) में निस्वार्थ सेवा करने वाले व्यक्तित्वों को
₹51,000, प्रभु श्रीराम की प्रतिमा, मानपत्र तथा विलासजी पर आधारित पुस्तक देकर सम्मानित किया गया।

  • • सामाजिक समरसता क्षेत्र में भंते अभय नायक थेरा को ‘संचेती फाउंडेशन पुरस्कार’ से सुनीलजी देशपांडे के हाथों सम्मानित किया गया।
    • स्वदेशी क्षेत्र में सुरेश पितळे को ‘श्री मोरेश्वर माधव देशपांडे पुरस्कार’ प्रवीण दाभोळकर के हाथों प्रदान किया गया।
    • कुटुंब प्रबोधन क्षेत्र में अधिवक्ता सीमा घाटे को ‘स्व. प्रभाकरराव मुंडले स्मृति पुरस्कार’ से पद्मश्री डॉ. धनंजय सगदेव ने सम्मानित किया।
    • पर्यावरण संवर्धन क्षेत्र में सचिन नायडू को ‘श्रीधरराव विचोरे पुरस्कार’ सुनीलजी कुलकर्णी के हाथों प्रदान किया गया।
    • नागरिक कर्तव्य क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य हेतु रविंद्र परांजपे को ‘स्व. सरस्वतीदेवी बिहारीलाल खंडेलवाल स्मृति पुरस्कार’ से वरिष्ठ प्रचारक रविंद्रजी भुसारी ने सम्मानित किया।

प्रचारकों का अंतरंग: एक प्रेरक संवाद

रविंद्र देशपांडे द्वारा पाँच वरिष्ठ प्रचारकों के साथ किए गए संवाद से अनेक हृदयस्पर्शी पहलू सामने आए। संघ प्रचारकों का जीवन सदैव कठिन होता है, किंतु वे दृढ़ संकल्प के साथ कार्य करते रहते हैं— यह सच्चाई इस संवाद से स्पष्ट हुई।

इस संवाद में पद्मश्री डॉ. धनंजय सगदेव, रा.स्व.संघ के अखिल भारतीय सह-संपर्क प्रमुख सुनील देशपांडे, सह-प्रचारक प्रमुख सुनील कुलकर्णी, विवेकानंद केंद्र के कोषाध्यक्ष प्रवीण दाभोळकर और वरिष्ठ प्रचारक रविंद्र भुसारी सम्मिलित थे। मंच पर रा.स्व.संघ विदर्भ प्रांत के सहसंघचालक श्रीधर गाडगे भी उपस्थित थे।
ये सभी प्रचारक नागपुर से ही निकले।

रविंद्र भुसारी, सुनील कुलकर्णी और प्रवीण दाभोळकर ने नौकरी से त्यागपत्र देकर, जबकि अन्य ने शिक्षा पूर्ण होते ही प्रचारक जीवन स्वीकार किया। रविंद्र भुसारी ने कहा,

“संघ प्रचारक का जीवन सदैव कठिन होता है। दो समय के भोजन की भी कोई निश्चितता नहीं होती, परंतु बिना किसी फल की अपेक्षा के वह राष्ट्रनिर्माण में लगा रहता है।”
पद्मश्री डॉ. धनंजय सगदेव ने कहा कि संघ की शिक्षा मानव सेवा है। इसी प्रेरणा से उन्होंने प्रचारक बनने का निर्णय लिया। बालासाहेब देवरस ने उन्हें वायनाड जाने को कहा। प्रारंभ में कोई बुनियादी सुविधाएँ नहीं थीं, कई बार पीछे लौटने का विचार आया, किंतु संघ की मानव सेवा की भावना मन में दृढ़ थी, इसलिए वे निरंतर कार्यरत रहे।


सुनील कुलकर्णी ने कहा कि संघ का निष्ठावान प्रचारक बनने के लिए किसी विशेष प्रेरणा की आवश्यकता नहीं होती। नागपुर के स्थानीय गृहस्थ स्वयंसेवक ही उनके प्रेरणास्रोत रहे, जिन्होंने बौद्धिक मार्गदर्शन के साथ अपना अमूल्य समय भी दिया।

प्रवीण दाभोळकर ने बताया कि विलासजी और श्रीरामजी जोशी जैसे गृहस्थ स्वयंसेवकों की प्रेरणा से उन्होंने प्रचारक बनने का निर्णय लिया।
सुनील देशपांडे ने कहा कि रामनगर क्षेत्र की शाखा की जिम्मेदारी निभाते समय वहाँ की सामाजिक स्थिति और संवेदनाओं को देखकर उन्होंने प्रचारक जीवन अपनाने का निर्णय लिया।

डॉ. धनंजय सगदेव ने वायनाड के संघर्षपूर्ण अनुभव साझा किए, जबकि रविंद्र भुसारी ने प्रचारक के ‘अकिंचन’ किंतु समृद्ध जीवन का दर्शन कराया। सुनील कुलकर्णी, सुनील देशपांडे और प्रवीण दाभोळकर ने नौकरी और पारिवारिक जीवन का त्याग कर राष्ट्रकार्य में स्वयं को कैसे समर्पित किया, यह सुनकर उपस्थित जनसमुदाय मंत्रमुग्ध हो गया।

अभिजात समारोह की भव्य समाप्ति
कार्यक्रम की शुरुआत आशुतोष फडणवीस के प्रास्ताविक से हुई। मंच पर नागेश पाटील की भी प्रमुख उपस्थिति रही।
डॉ. भाग्यलक्ष्मी देशकर ने अपने प्रवाही और सुस्पष्ट संचालन से पूरे कार्यक्रम को प्रभावी ढंग से संचालित किया।

 


सभागृह श्रोताओं से खचाखच भरा हुआ था। मंच पर पद्मश्री डॉ. धनंजय सगदेव जैसी विभूति उपस्थित थीं, वहीं श्रोताओं में भी पद्मश्री डॉ. विलासजी डांगरे सहित विभिन्न क्षेत्रों के दिग्गज, संस्थाओं के प्रतिनिधि और सामाजिक कार्यकर्ता बड़ी संख्या में उपस्थित थे।
यह समारोह इतना भावविभोर करने वाला था कि अनेक श्रोताओं ने सहज ही कहा,
“यह कार्यक्रम कभी समाप्त ही न हो।”

जैसी उत्साहपूर्ण शुरुआत थी, वैसी ही उदात्त समापन भी हुआ।
जिव्हाळा परिवार की कन्याओं ने अपने मधुर स्वर में पसायदान का गायन कर समारोह को आध्यात्मिक पूर्णता प्रदान की।
यह समारोह केवल पुरस्कार वितरण का कार्यक्रम नहीं था, बल्कि निस्वार्थ जीवनशैली के पूजन का उत्सव था। जिन तपस्वियों के जीवन पर ध्येय का चंदन रचा-बसा है, उनकी उपस्थिति से संपूर्ण वातावरण राष्ट्रप्रेम से सराबोर हो उठा।

– अमोल तपासे

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