| विवेकानंद के लिए धर्म कर्मकांड नहीं, बल्कि सेवा था— “दारिद्र नारायण की सेवा ही ईश्वर की सच्ची पूजा है।” आध्यात्मिक मानवतावाद का सर्वोत्तम उदाहरण है। शिकागो भाषण में सभी धर्मों को सत्य के विभिन्न मार्ग बताकर उन्होंने भारतीय धर्मनिरपेक्षता की एक अनूठी व्याख्या प्रस्तुत की, जो सहिष्णुता तथा समावेशिता पर आधारित है। |
भारतीय राष्ट्रवाद के बौद्धिक इतिहास में स्वामी विवेकानंद (1863–1902) का स्थान मौलिक तथा स्थायी है। वे उन विचारकों में से नहीं थे, जिनका राष्ट्रवाद मात्र राजनीतिक स्वतंत्रता, संवैधानिक सुधारों या सत्ता के हस्तांतरण तक सीमित रहा। विवेकानंद ने भारत की उस गहन समस्या को पहचाना, जो औपनिवेशिक शासन की सबसे बड़ी विरासत थी— जनमानस में आत्मविश्वास का ह्रास। वे भली-भांति समझते थे कि उपनिवेशवाद केवल राजनीतिक या आर्थिक प्रभुत्व नहीं, बल्कि मानसिक तथा नैतिक अधीनता के माध्यम से समाज को नियंत्रित करता है।
उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में भारत गहरे संकट से गुजर रहा था। ब्रिटिश साम्राज्यवाद ने राजनीतिक सत्ता ही नहीं छीनी थी, बल्कि लॉर्ड मैकॉले की शिक्षा नीति ने भारतीय ज्ञान-परंपरा को हीन और अप्रासंगिक घोषित कर दिया। इसके परिणामस्वरूप एक ऐसा शिक्षित वर्ग उभरा, जो पश्चिमी आधुनिकता से परिचित था, किंतु अपनी सांस्कृतिक जड़ों से कट चुका था। इस संकट का समाधान विवेकानंद ने न तो पश्चिमी आधुनिकता के पूर्ण त्याग में खोजा और न ही भारतीय अतीत के अंधानुकरण में। उन्होंने वेदांत और उपनिषदों को आत्मबल, आत्मगौरव और नैतिक शक्ति के जीवंत स्रोत के रूप में पुनर्स्थापित किया।
विवेकानंद का राष्ट्रवाद वेदांत दर्शन और अपने गुरु श्री रामकृष्ण परमहंस की शिक्षाओं से गहराई से जुड़ा था। उनका दृढ़ मत था कि नैतिक शक्ति और आध्यात्मिक चेतना के बिना राजनीतिक स्वतंत्रता खोखली सिद्ध होती है। इसीलिए उनका राष्ट्रवाद न संकीर्ण था, न उग्र, बल्कि मानवीय, समावेशी और सार्वभौमिक था।
12 जनवरी 1863 को कोलकाता में नरेंद्रनाथ दत्त के रूप में जन्मे विवेकानंद ने कलकत्ता विश्वविद्यालय में दर्शन, इतिहास और पाश्चात्य चिंतन का अध्ययन किया। कांट, हेगेल और स्पेंसर जैसे पश्चिमी दार्शनिकों से परिचित होने के बावजूद उनके प्रश्न बौद्धिक से अधिक आध्यात्मिक थे।
1881 में दक्षिणेश्वर में श्री रामकृष्ण परमहंस से भेंट उनके जीवन का निर्णायक मोड़ बनी। प्रारंभ में नरेंद्र में संशय था, किंतु गुरु के साथ समय बिताने पर वह संशय आध्यात्मिक अनुभव में परिवर्तित हो गया। रामकृष्ण ने उन्हें यह प्रत्यक्ष अनुभूति कराई कि सत्य केवल तर्क या बौद्धिक बहस का विषय नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष अनुभव की वस्तु है।
1893 में शिकागो की विश्व धर्म संसद में दिया गया उनका भाषण औपनिवेशिक भारत की सांस्कृतिक आत्मघोषणा था। “सिस्टर्स एंड ब्रदर्स ऑफ अमेरिका” से आरंभ हुआ यह भाषण भारतीय सहिष्णुता, बहुलतावाद और सर्वधर्म समभाव का प्रतीक बन गया।

विवेकानंद के चिंतन का केंद्र आत्मनिर्माण है। “अहं ब्रह्मास्मि” (मैं ब्रह्म हूं) की वेदांतिक अवधारणा के आधार पर वे कहते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति में अनंत शक्ति निहित है। उनका कथन— “निर्बलता सबसे बड़ा पाप है”— केवल नैतिक नहीं, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक चेतावनी है। उनका अमर आह्वान— “उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए”—अनुशासन, धैर्य और कर्तव्यबोध का सूत्र है।
युवाओं को वे राष्ट्र की “मांसपेशियां और नसें” कहते थे। “मुझे 100 ऊर्जावान युवक दे दो, मैं भारत का रूप बदल दूंगा” वाला उनका कथन सामाजिक परिवर्तन की स्पष्ट रणनीति को दर्शाता है। आज जब युवा वर्ग बेरोजगारी, तनाव, और दिशाहीनता से जूझ रहा है, विवेकानंद का युवा-केंद्रित दर्शन और अधिक प्रासंगिक हो गया है। वे युवाओं को केवल नौकरी की तलाश नहीं, बल्कि चरित्र-निर्माण तथा राष्ट्र-सेवा की प्रेरणा देते हैं।
शिक्षा को वे राष्ट्रनिर्माण का सबसे सशक्त माध्यम मानते थे। उनके अनुसार शिक्षा का उद्देश्य “मनुष्य में निहित पूर्णता का प्रकटीकरण” है। रामकृष्ण मिशन द्वारा संचालित शैक्षणिक संस्थान इस दर्शन के मूर्त रूप हैं।
विवेकानंद के लिए धर्म कर्मकांड नहीं, बल्कि सेवा था— “दारिद्र नारायण की सेवा ही ईश्वर की सच्ची पूजा है।” आध्यात्मिक मानवतावाद का सर्वोत्तम उदाहरण है। शिकागो भाषण में सभी धर्मों को सत्य के विभिन्न मार्ग बताकर उन्होंने भारतीय धर्मनिरपेक्षता की एक अनूठी व्याख्या प्रस्तुत की, जो सहिष्णुता तथा समावेशिता पर आधारित है।
महिला सशक्तिकरण पर उनके विचार भी क्रांतिकारी थे। उनका मानना था कि किसी राष्ट्र की प्रगति उसकी महिलाओं की स्थिति से आंकी जाती है। भगिनी निवेदिता का जीवन इसी दर्शन का प्रमाण है। आज भी लैंगिक असमानता की चुनौतियों के बीच यह विचार प्रासंगिक है।
स्वामी विवेकानंद का मूल संदेश स्पष्ट और शाश्वत है— आत्मनिर्माण के बिना राष्ट्रनिर्माण असंभव है। वे केवल अतीत के महान संत नहीं, बल्कि भारत के वर्तमान और भविष्य के लिए एक जीवंत वैचारिक मार्गदर्शक हैं। उन्हें केवल स्मरण करना या जयंती मनाना पर्याप्त नहीं; आवश्यकता है उनके विचारों को आत्मसात करने की, ताकि आत्मविश्वासी नागरिक, नैतिक समाज और सशक्त राष्ट्र का निर्माण हो सके।
– डॉ. संतोष झा

