| दरभंगा के इंद्र भवन मैदान में 15 मन, यानी लगभग 600 किलो सोना, राष्ट्र रक्षा के लिए तौलकर दान किया गया। यह घटना केवल दान नहीं, बल्कि राष्ट्र के प्रति गहन उत्तरदायित्व की मिसाल थी। |
दरभंगा रियासत की महारानी कामसुंदरी देवी के निधन से एक ऐसे युग की स्मृति ताजा हो गई है, जिसने राष्ट्रसेवा, त्याग और शिक्षा को अपना मूल मूल्य बनाया था। महारानी का जीवन केवल एक राजपरिवार की सदस्य के रूप में नहीं, बल्कि उस परंपरा के प्रतीक के रूप में देखा जाना चाहिए, जिसने भारत को संकट के समय कभी निराश नहीं किया।
महारानी कामसुंदरी देवी, दरभंगा रियासत के अंतिम महाराजाधिराज डॉ. सर कामेश्वर सिंह की तीसरी पत्नी थीं। उनका विवाह 1940 के दशक में हुआ था। महाराजा कामेश्वर सिंह का निधन वर्ष 1962 में हुआ। उनकी पहली पत्नी महारानी राजलक्ष्मी देवी का निधन 1976 में तथा दूसरी पत्नी महारानी कामेश्वरी प्रिया का निधन 1940 में ही हो गया था। तीन शादियों के बावजूद महाराजा को कोई संतान नहीं थी। बाद में महारानी कामसुंदरी देवी ने अपनी बड़ी पुत्री के पुत्र कुमार कपिलेश्वर सिंह को दरभंगा राज का ट्रस्टी नियुक्त किया।

दरभंगा राज का नाम भारतीय इतिहास में विशेष रूप से 1962 के भारत–चीन युद्ध के संदर्भ में लिया जाता है। जब देश गंभीर सैन्य और आर्थिक संकट से गुजर रहा था, तब सरकार की अपील पर दरभंगा राज परिवार सबसे पहले आगे आया। दरभंगा के इंद्र भवन मैदान में 15 मन, यानी लगभग 600 किलो सोना, राष्ट्र रक्षा के लिए तौलकर दान किया गया। यह घटना केवल दान नहीं, बल्कि राष्ट्र के प्रति गहन उत्तरदायित्व की मिसाल थी।
इतना ही नहीं, दरभंगा राज परिवार ने अपने तीन निजी विमान भी सरकार को सौंप दिए थे। लगभग 90 एकड़ में फैला निजी हवाई अड्डा भी देश को दान कर दिया गया, जिस पर आज दरभंगा एयरपोर्ट संचालित है। यह तथ्य अपने आप में बताता है कि राष्ट्रहित के सामने राजसत्ता और निजी संपत्ति का कोई महत्व नहीं था।
दरभंगा राज की भूमिका केवल युद्धकाल तक सीमित नहीं रही। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में भी इस राजघराने का योगदान ऐतिहासिक रहा है।

जब महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका से लौटे और आंदोलन को आर्थिक तथा प्रचार संबंधी संकट का सामना करना पड़ा, तब उन्होंने दरभंगा महाराज लक्ष्मेश्वर सिंह को पत्र लिखकर सहायता मांगी थी। उस पत्र के मिलते ही महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह ने आंदोलन के प्रचार-प्रसार और आर्थिक सहयोग की जिम्मेदारी संभाल ली। गांधी जी के हाथ से लिखा गया वह पत्र आज भी सुरक्षित है और यह प्रमाणित करता है कि दरभंगा राज भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का पहला बड़ा संस्थागत सहयोगी रहा।
इतिहासकारों के अनुसार, इंडियन नेशनल कांग्रेस के प्रारंभिक दौर में भी दरभंगा राज परिवार की भूमिका निर्णायक रही। कांग्रेस के संस्थापक ए. ओ. ह्यूम को वर्ष 1880 के आसपास नियमित आर्थिक सहायता दी जाती थी। ह्यूम द्वारा लिखा गया एक पत्र आज भी मौजूद है, जिसमें उन्होंने उल्लेख किया है कि यदि शेष धनराशि नहीं मिली तो कांग्रेस आंदोलन रुक सकता है। यह तथ्य बताता है कि देश का लोकतांत्रिक आंदोलन किन मजबूत सामाजिक आधारों पर खड़ा था।
शिक्षा के क्षेत्र में दरभंगा राज का योगदान भी उतना ही महत्वपूर्ण रहा है। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए महाराजा रामेश्वर सिंह ने सबसे पहले 5 लाख रुपये का दान दिया और वे इसके एसोसिएट फाउंडर रहे। मदन मोहन मालवीय के साथ उन्होंने देशभर में घूमकर विश्वविद्यालय के लिए धन संग्रह किया। इसके अतिरिक्त पटना स्थित दरभंगा हाउस को पटना विश्वविद्यालय को दान किया गया। इलाहाबाद विश्वविद्यालय, संस्कृत विश्वविद्यालय और दरभंगा में दो विश्वविद्यालयों की स्थापना में भी राज परिवार की भूमिका रही। महाराजा कामेश्वर सिंह ने तो अपनी जन्मस्थली तक शिक्षा के लिए दान कर दी थी।
विडंबना यह है कि इतने व्यापक योगदान के बावजूद दरभंगा राज की विरासत धीरे-धीरे इतिहास और सार्वजनिक स्मृति से ओझल होती जा रही है। रेलवे, पटना मेडिकल कॉलेज, पटना विश्वविद्यालय और दरभंगा एयरपोर्ट जैसे संस्थानों की नींव रखने वाले शासकों का नाम आज शायद ही नई पीढ़ी जानती हो।
यदि राजस्थान जैसे राज्यों में ऐतिहासिक राजवाड़ों को सांस्कृतिक और पर्यटन पहचान दी जा सकती है, तो बिहार में भी दरभंगा राज जैसी विरासत को सम्मान मिलना चाहिए।
महारानी कामसुंदरी देवी का निधन केवल एक व्यक्तित्व का अंत नहीं है, बल्कि उस परंपरा की याद दिलाता है, जिसने राष्ट्र, शिक्षा और समाज को सर्वोपरि रखा। यह समय है कि हम दरभंगा राज की इस ऐतिहासिक विरासत को पुनः स्मरण करें और उसे उसका उचित स्थान दें।
-रंजीत झा

