| इस्लाम ने चौदह सौ वर्षों में बर्बरता और अतिवाद के रूप में अनेक प्राचीन सभ्यताओं को निगल लिया, पर सनातन हिन्दू सभ्यता इसलिए बची रही क्योंकि वह ‘धर्म’ है। धर्म समय, काल और परिस्थितियों से परे होता है। वह अपौरुषेय है सृष्टि का शाश्वत नियम। धर्म की एक सरल परिभाषा है. जो लोक और समाज को धारण करे, वही धर्म है। |
ईरान में उठी सत्ता-विरोधी लहर किसी वैकल्पिक राजनीतिक गुट द्वारा नहीं, बल्कि उन शक्तियों द्वारा आरंभ की गई है, जो स्वयं को पर्शियन सभ्यता की स्मृति से जोड़कर देखती हैं। यही कारण है कि वहाँ आंदोलनरत जनता देश से नहीं, बल्कि इस्लाम से आज़ादी की बात कर रही है। यह अंतर साधारण नहीं है। जब कोई समाज सत्ता से मुक्ति नहीं, बल्कि मज़हब से मुक्ति की माँग करने लगे, तब उसका अर्थ केवल राजनीतिक असंतोष नहीं रहता; वह सभ्यतागत अस्वीकार में बदल जाता है। ऐसी स्थिति में यदि ईरान में तख़्तापलट होता है, तो संसार एक असाधारण दृश्य देख सकता है—एक पूरे देश का संगठित मज़हब-परिवर्तन, जिसे नया शासन तंत्र संरक्षण दे सकता है। तब यह परिवर्तन किसी बाहरी दबाव का नहीं, बल्कि समाज की अंतर्निहित इच्छा का प्रकटीकरण होगा।
इस परिदृश्य को समझने के लिए अरब जगत की मनःस्थिति को भी देखना होगा। अरब जगत स्वयं ईरान में मज़हब-परिवर्तन होते देखना चाहता है। सुन्नी इस्लाम के भीतर दो फिरकों की स्थायी सह-अस्तित्व की इच्छा नहीं रही है। शिया फिरके का उदय और विस्तार—जिसकी शह-रग ईरान में निहित है—ने यमन, बहरीन, कुवैत और क़तर जैसे क्षेत्रों में निरंतर अस्थिरता पैदा की है। इस उथल-पुथल से सऊदी अरब लंबे समय से परेशान रहा है। ईरान में यदि मज़हब-परिवर्तन होता है, तो इस्लाम के भीतर दूसरा फिरका—शिया विचारधारा—अपने आधार से वंचित हो जाएगा। यह स्थिति अरब जगत और सुन्नी राजनीति—दोनों के लिए अनुकूल मानी जाती है।

लेकिन इस पूरे विमर्श में एक प्रश्न बार-बार सामने आता है—जब ईरान की महिलाएँ अग्नि-ध्वज लेकर खड़ी हो रही हैं, तब हम उस ऐतिहासिक क्षण की चर्चा क्यों नहीं करते, जिसने ईरान की दिशा सदियों पहले बदल दी थी? ईस्वी सन् 643 में जो हुआ, वही आज की बेचैनी का मूल है। इस्लाम से हमारा संघर्ष कोई नया नहीं है; यह हज़ार वर्षों से चला आ रहा है। भारत के विभाजन को केवल अस्सी वर्ष बीते हैं, जहाँ इस्लामी मज़हबी भीड़ ने देश को टुकड़ों में बाँट दिया। इस संदर्भ में यह स्मरण आवश्यक है कि जिसका जन्म होता है, उसका अंत भी होता है।
इस्लाम ने चौदह सौ वर्षों में बर्बरता और अतिवाद के रूप में अनेक प्राचीन सभ्यताओं को निगल लिया, पर सनातन हिन्दू सभ्यता इसलिए बची रही क्योंकि वह ‘धर्म’ है। धर्म समय, काल और परिस्थितियों से परे होता है। वह अपौरुषेय है—सृष्टि का शाश्वत नियम। धर्म की एक सरल परिभाषा है—जो लोक और समाज को धारण करे, वही धर्म है।
यहीं धर्म और मज़हब का मूल अंतर स्पष्ट होता है। धर्म कोई किताब नहीं है। धर्म किसी एक दर्शन, किसी एक डॉक्ट्रिन से नहीं चलता। धर्म में ईश्वर सखा, मित्र और भाई के रूप में अवतरित होते हैं—धर्म की स्थापना करते हैं, धर्म का संरक्षण करते हैं। धर्म ईश्वर का ही एक रूप है, सृष्टि का स्वभाव है। इसके विपरीत मज़हब एक विचार-रचना है—एक किताब, एक पैग़म्बर और एक ईश्वर-कल्पना के इर्द-गिर्द निर्मित ढाँचा।

धर्म की परिधि अत्यंत विराट है। उसमें श्रुति और स्मृति, आगम और निगम, ब्राह्मण और श्रमण परंपराएँ, तंत्र, बौद्ध, जैन, वैष्णव, शाक्त, गाणपत्य, नौ दर्शन—वैदिक और अवैदिक—आस्तिक और नास्तिक—सब समाहित हैं। देव, दानव, गंधर्व, किन्नर, नाग, भूत-पिशाच और समस्त चराचर सृष्टि—धर्म के भीतर आती है। धर्म सिमटे तो व्यक्ति के भीतर स्वधर्म बन जाए, और फैले तो कोटि-कोटि ब्रह्मांडों को समाहित कर ले। धर्म इतना विराट है कि उसकी कोई सीमा नहीं।
इस विराटता के कारण सनातन सभ्यता हज़ारों वर्षों के आक्रमणों के बाद भी जीवित रही। इसके विपरीत मज़हब सत्ता बना सकता है, क़ानून थोप सकता है, पर समाज की आत्मा नहीं बन सकता। इसी कारण ईरान में इस्लामी मज़हब सत्ता तो बना, पर समाज को धारण नहीं कर सका।
ईरान की आज की क्रांति केवल महिलाओं या युवाओं का आंदोलन नहीं है। उसकी जड़ें मजूसियों—अग्नि-पूजक पारसियों—के इतिहास में हैं। लगभग साढ़े चौदह सौ वर्ष पहले, जब अरब-भूमि में नया मज़हब आकार ले रहा था, उसी समय रोम और फ़ारस के बीच घमासान युद्ध हुआ। फ़ारस विजयी हुआ। बाद में अरब आक्रमणों के दौरान हज़रत अबू-बकर और हज़रत उमर के काल में ईरान पर लगातार हमले हुए। रुस्तम, जाबान और नरसी जैसे वीरों ने अंतिम श्वास तक प्रतिरोध किया। अंततः ईस्वी सन् 643 में अग्नि-पूजकों की सत्ता का सूर्य अस्त हो गया।
जो लोग अपने आहुर-मज़्दा से प्रेम करते थे, वे समुद्र पार चले गए। जो रह गए, उन्होंने प्राण-रक्षा के लिए मज़हब स्वीकार किया। पर स्मृति नहीं मरी। वही स्मृति आज फिर जीवित हो उठी है। रज़ा शाह पहलवी ने एक बार उस स्मृति को जगाने का प्रयास किया—फ़ारस को ‘ईरान’ कहा, आर्यों की भूमि। शिक्षा और समाज से उग्र मज़हबी प्रभाव हटाए गए। यह प्रयास अधूरा रह गया, पर बीज बो गया।
आज वही बीज अंकुरित हो रहा है।
यदि ईरान में यह क्रांति सफल होती है और बहुसंख्यक समाज इस्लामी मज़हब को त्यागकर अपने मूल धर्मबोध की ओर लौटता है, तो यह केवल ईरान की घटना नहीं होगी। यह संसार को राजनीतिक इस्लाम की बर्बर और रक्तरंजित संरचना से मुक्त होने का मार्ग दिखा सकती है। यह सिद्ध होगा कि भय, तलवार और दमन के सहारे खड़ी सत्ता शाश्वत नहीं होती।

भारतीय शास्त्रीय परंपरा में यह बात कभी विवाद का विषय नहीं रही कि जो जन्म लेता है, उसका अंत भी निश्चित है। उपनिषदों में बार-बार यही स्मरण कराया गया है कि अजन्मा केवल ब्रह्म है—न कोई मत, न कोई पंथ, न कोई मज़हब। कठोपनिषद का नचिकेता–यम संवाद इसी मूल सत्य की ओर संकेत करता है कि जन्म और मृत्यु का नियम हर उस वस्तु पर लागू होता है, जो काल के भीतर उत्पन्न हुई है। इसी भाव को गीता सरल शब्दों में कहती है—जो प्रकट हुआ है, वह एक दिन अप्रकट में लौटेगा। इस दृष्टि से यह मान लेना कि कोई मज़हब शाश्वत है, स्वयं शास्त्रीय दृष्टि के विपरीत है। शाश्वत यदि कुछ है, तो वह धर्म है, क्योंकि धर्म कोई ऐतिहासिक व्यवस्था नहीं, बल्कि सृष्टि का स्वभाव है।
यहीं हमारे समय के कई हिंदू नेतृत्वकर्ताओं से एक गहरी वैचारिक चूक हो जाती है। वे बार-बार यह कह देते हैं कि इस्लाम भारत से कभी नहीं जाएगा, कि इस्लाम हमेशा रहेगा। यह बात व्यवहारिक राजनीति के स्तर पर कही जा सकती है, लेकिन धर्म की कसौटी पर यह विचार टिकता नहीं। जो जन्मा है, उसका अंत अवश्यंभावी है—यह नियम किसी से भेद नहीं करता। किसी मज़हब को शाश्वत मान लेना, अनजाने में ही उसे धर्म के बराबर खड़ा कर देना है, जबकि हिंदू दृष्टि में धर्म और मज़हब का स्वरूप मूलतः भिन्न है। हिंदू होना किसी के अस्तित्व से डरना नहीं सिखाता, बल्कि काल के सत्य को स्वीकार करना सिखाता है।
धर्म को हमारे ग्रंथों ने कभी किसी पुस्तक, किसी पैग़म्बर या किसी सत्ता से नहीं बाँधा। मनुस्मृति की परिभाषा बहुत सीधी है—जो समाज को धारण करे, वही धर्म है। धर्म भय से नहीं चलता और न ही दमन से टिकता है। महाभारत में यह चेतावनी स्पष्ट रूप से दी गई है कि जहाँ स्त्रियों का अपमान होता है, वहाँ समाज भीतर से टूटने लगता है। ईरान की सड़कों पर आज जो नारी-शक्ति दिखाई दे रही है, वह केवल राजनीतिक असंतोष नहीं है; वह उस दबे हुए आत्मबोध का उभार है,
जिसे मज़हबी शासन ने लंबे समय तक दबाए रखा। जब शक्ति उठती है, तो असत्य अपने आप कमजोर पड़ने लगता है—यह कोई नया विचार नहीं, यह सभ्यताओं का अनुभव है।
सनातन परंपरा यह भी स्पष्ट करती है कि अधर्म का अंत बाहर से नहीं आता; वह भीतर से गलता है और अपने ही भार से टूटता है। विष्णु में स्पष्ट वर्णन मिलता है कि जब असत्य अपनी सीमा पार कर लेता है, तब उसका पतन स्वयं घटित होता है। यदि ईरान में राजनीतिक इस्लाम का अंत होता है, तो वह किसी नए मज़हब की स्थापना नहीं होगी, बल्कि उस मूल धर्म-स्मृति की वापसी होगी, जिसे इतिहास के एक दौर में दबा दिया गया था। यही प्रक्रिया भविष्य में भारत सहित अन्य सभ्यतागत समाजों में भी संभव है। धर्म को लाया नहीं जाता, धर्म को थोपा नहीं जाता—धर्म केवल स्मरण होता है। और जब स्मरण होता है, तब काल अपना निर्णय स्वयं सुना देता है।
✍️दीपक कुमार द्विवेदी

