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क्या  “एमआईएम” “मुस्लिम लीग” का पुनर्जन्म है?

क्या  “एमआईएम” “मुस्लिम लीग” का पुनर्जन्म है?

by अमोल पेडणेकर
in ट्रेंडींग, विशेष
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जब कोई निर्वाचित प्रतिनिधि ‘पूरे क्षेत्र को हरा करने’ जैसी घोषणाएं करता है, तो वह केवल एक रंग की बात नहीं कर रहा होता, बल्कि वह उस विभाजक मानसिकता को खाद-पानी दे रहा होता है, जिसने 1947 में भारत के भूगोल को लहूलुहान किया था। आज के संदर्भ में ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के बढ़ते प्रभाव की तुलना यदि स्वतंत्रता पूर्व की ‘मुस्लिम लीग’ से की जाए, तो कई भयानक  और चिंतित करने वाले साम्य नजर आते हैं।

मुंब्रा में एआईएमआईएम की महिला पार्षद के चुनकर आने के बाद यह घोषणा करना कि हम “पूरे मुंब्रा को हरा कर देंगे” केवल एक चुनावी बयान नहीं, बल्कि एक गहरी ‘कुटिल नीति’ का संकेत है। जब कोई जनप्रतिनिधि किसी क्षेत्र को विशेष मजहबी रंग में रंगने की बात करता है, तो वह भारतीय संविधान की धर्मनिरपेक्षता पर सीधा प्रहार करता है।

भारतीय राजनीति के फलक पर उभरी वर्तमान घटनाएँ, विशेषकर ठाणे के मुंब्रा जैसे क्षेत्रों में मजहबी कट्टरता के प्रदर्शन, समाज के एक बड़े वर्ग में गहरी चिंता पैदा कर रहे हैं। जब कोई निर्वाचित प्रतिनिधि ‘पूरे क्षेत्र को हरा करने’ जैसी घोषणाएं करता है, तो वह केवल एक रंग की बात नहीं कर रहा होता, बल्कि वह उस विभाजक मानसिकता को खाद-पानी दे रहा होता है, जिसने 1947 में भारत के भूगोल को लहूलुहान किया था। आज के संदर्भ में ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के बढ़ते प्रभाव की तुलना यदि स्वतंत्रता पूर्व की ‘मुस्लिम लीग’ से की जाए, तो कई भयानक  और चिंतित करने वाले साम्य नजर आते हैं।

आखिर क्यों आज का भारत स्वतंत्रता पूर्व की उस ‘मुस्लिम लीग’ की यादों से सिहर उठता है? यह जानने के लिए हमें मुस्लिम लीग का उदय और जिन्ना की देश विभाजन की रणनीति को समझना आवश्यक है। 20वीं सदी की शुरुआत में मुस्लिम लीग का गठन मुसलमानों के अधिकारों के नाम पर हुआ था,  लेकिन बैरिस्टर मोहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व में यह धीरे-धीरे एक अलगाववादी मुस्लिम पक्ष बन गया। जिन्ना की रणनीति के कुछ मुख्य पड़ाव थे। जिन्ना ने सबसे पहले ‘मुस्लिम हितों’ को राष्ट्रहित से अलग साबित किया। उन्होंने एक ऐसा नेटवर्क तैयार किया जिसने स्थानीय निकायों से लेकर केंद्रीय विधानसभाओं तक संपूर्ण देश के मुस्लिम बहुल इलाकों में अपनी पैठ बनाई। धार्मिक ध्रुवीकरण कट्टर इस्लामी रणनीति का एक महत्वपूर्ण अंग रहा है। जिन्ना ने ‘इस्लाम खतरे में है’ का नारा बुलंद कर साधारण मुस्लिमों को राष्ट्र की मुख्यधारा से काटकर मुस्लिम लीग के पीछे खड़ा किया। जब राजनीतिक बातचीत से बात नहीं बनी, तो बैरिस्टर मोहम्मद अली जिन्ना की मुस्लिम लीग ने डायरेक्ट एक्शन डे के माध्यम से 1946 में हिंसा का सहारा लिया। बंगाल प्रांत  की सड़कों पर हिंदुओं का जो कत्लेआम हुआ, वह भारत विभाजन की अंतिम मुहर थी। परिणाम 1947 में भारत का रक्तरंजित विभाजन हुआ।

ओवैसी की ‘एआईएमआयएम’ में  बैरिस्टर जिन्ना की मुस्लिम लीग वाली चाल- ढाल नजर आ रही है। इस चाल-ढाल को भी समझना आवश्यक है।स्वतंत्रता से पहले बैरिस्टर मोहम्मद अली जिन्ना ने भी स्थानीय स्तर से ही शुरुआत की थी।रणनीतिक तौर पर पहले खुद को मुस्लिमों का एकमात्र रहनुमा बताना, फिर मुसलमानों के लिए स्वतंत्र राष्ट्र की मांग करना और अंत में ‘मजहबी पहचान’ के नाम पर देश का बंटवारा। आज एआईएमआईएम की कार्यशैली देखें तो वे उसी पुराने  ‘मुस्लिम लीग’ के ढांचे पर चलती प्रतीत होती है। जिन्ना ने खुद को भारतीय मुसलमानों का एकमात्र प्रवक्ता घोषित किया था। मुस्लिम लीग से जुड़े इतिहास को हम टटोलेंगे तो वर्तमान में एआईएमआईएम की कार्यशैली मुस्लिम लीग के समांतर चलती हुई दिखाई दे रही है। जो निकट भविष्य में भारत के लिए बहुत बड़ा संकट निर्माण कर सकती है। एआईएमआईएम लोकतांत्रिक व्यवस्था का उपयोग कर रही  है, लेकिन उनकी भाषा और उद्देश्य समाज को विभाजित करने वाले, हिंदुओं के हितों को ठेस पहुंचने वाली रहे है।

केवल मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में पैठ बनाना,  प्रतीक के रूप में हरा झंडा और इस्लाम खतरे में जैसे मजहबी नारे लगाना, क्षेत्रीय एवं राजनीतिक वर्चस्व के लिए शहर को ‘हरा’ करने के दावे करना हिंदू एवं राष्ट्र हित में विचार करने वाले राजनीतिक एवं आध्यात्मिक दलों को ‘हिंदू दल’ बताकर खारिज करना, सेक्युलर दलों को डराकर मुस्लिम वोटों की सौदेबाजी करना। मुस्लिम बहुल इलाकों में कट्टरता का जहर घोलना। राष्ट्रहित के मुद्दों (जैसे CAA, NRC) पर समाज को भड़काना। निर्वाचित होने के बाद प्रशासनिक तंत्र का उपयोग हिंदू हितों को कुचलने के प्रयास करना, ये सारी बातें वर्तमान में एआईएमआईएम के माध्यम से हो रहे कार्य को देखकर हमें महसूस हो रही है।

चिंता का विषय केवल एआईएमआईएम का बढ़ना नहीं है, बल्कि  राजनीतिक पार्टियों  की ‘सत्ता लोलुपता’ भी है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि भाजपा से लेकर कई प्रमुख राजनीतिक पार्टियां कई बार अपनी सत्ता की अटकलें फिट करने के लिए परोक्ष या अपरोक्ष रूप से ऐसे विभाजनकारी और समाज घातक ताकतों को खाद-पानी देते हैं। अक्सर मुख्यधारा के दल एआईएमआईएम को विपक्षी वोटों को काटने या उनमें बिखराव निर्माण करने के औजार के रूप में देखते हैं। यह अल्पकालिक लाभ दीर्घकालिक हानि में परिवर्तित होने की बहुत बड़ी संभावना है। सत्ता के छोटे से टुकड़े के लिए राष्ट्रहित और हिंदू हितों को हाशिए पर धकेलना आत्मघाती है। “वोटों के गणित के लिए एआईएमआईएम जैसी ताकतों के साथ किसी भी प्रकार का लचीलापन ‘दूसरे पाकिस्तान’ की नींव रखने जैसा होगा। इतिहास गवाह है कि तुष्टिकरण की राजनीति ने पाकिस्तान – बांग्लादेश जैसे मजहबी भस्मासुर पैदा किए हैं।

मुंब्रा में पार्षद का नारा केवल एक नगरपालिका स्तर का बयान नहीं है, बल्कि यह एक खतरनाक मानसिकता का प्रतिबिंब है। यदि आज इन गतिविधियों को लोकतांत्रिक दायरे में रहते हुए नहीं रोका गया, तो भविष्य में ‘दूसरे विभाजन’ की आहटें और तेज होंगी। हमें भविष्य में एक चेतावनी नजर आ रही है। क्या हम फिर देश विभाजन करने वाली मुस्लिम लीग जैसी पार्टी को बढ़ाने की राह पर हैं?

भारतीय राजनीति को अब ‘सजगता’ की आवश्यकता है। भारतीय जनता और विशेषकर हिंदू समाज को यह समझना होगा कि लोकतंत्र केवल संख्याबल का खेल नहीं है, बल्कि यह राष्ट्र की अखंडता को निरंतर रखने का माध्यम है। सभी राजनीतिक दलों को चेतावनी देनी होगी कि वे सत्ता की लालसा में उन ताकतों से तालमेल न बिठाएं, जो भारत के संविधान और उसकी मूल संस्कृति को चुनौती देती हैं। ऐसा कहा जाता है कि इतिहास खुद को दोहराता है।

हमें राजनीतिक दलों को यह स्पष्ट संदेश देना होगा कि राष्ट्र की अखंडता से ऊपर कुछ भी नहीं। यदि आज हम नहीं जागे, तो आने वाली पीढ़ियां हमें कभी माफ नहीं करेंगी यदि हम इतिहास से सबक नहीं लेंगे तो 1947 की  राष्ट्र विभाजन जैसी त्रासदी फिर दोहराई जाएगी, इसके लिए वर्तमान में भाजपा सहित सभी प्रमुख राजनीतिक दलों से ‘सजग राजनीति’ और ‘राष्ट्र प्रथम’ के संकल्प की आवश्यकता है।

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Tags: #AIMIM #PoliticalParty #IndianPolitics #Hyderabad #MuslimCommunity #SocialJustice #Secularism #CommunityEmpowerment #YouthInPolitics #AIMIMLeadership

अमोल पेडणेकर

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