| शिक्षा सुधार की प्रक्रिया में शिक्षकों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। शिक्षकों को केवल नीति-निर्माण का पालनकर्ता नहीं, बल्कि सहभागी और निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। जब शिक्षक सशक्त, प्रेरित और सम्मानित होंगे, तभी शिक्षा व्यवस्था मजबूत होगी। |
वर्तमान समय में शिक्षा केवल पाठ्यपुस्तकों, परीक्षा और डिग्रियों तक सीमित नहीं रह गई है। वह समाज, अर्थव्यवस्था और राष्ट्र के भविष्य को दिशा देने वाली सबसे प्रभावशाली शक्ति बन चुकी है। किसी भी देश की प्रगति का वास्तविक आकलन उसकी शिक्षा व्यवस्था से किया जा सकता है।
भारत का शैक्षणिक परिदृश्य आज एक ऐसे निर्णायक मोड़ पर खड़ा है, जहाँ एक ओर व्यापक संभावनाएँ दिखाई देती हैं, तो दूसरी ओर गंभीर और जटिल चुनौतियाँ भी सामने हैं। इन दोनों के बीच संतुलन स्थापित कर शिक्षा को सही दिशा देना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
आज की शिक्षा व्यवस्था की सबसे बड़ी चुनौती गुणवत्ता और समानता के बीच बढ़ती खाई है। शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के विद्यालयों तथा उच्च शिक्षण संस्थानों में संसाधनों, शिक्षकों और शैक्षणिक वातावरण का अंतर स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। देश के अनेक विद्यालय आज भी बुनियादी सुविधाओं, पर्याप्त कक्षाओं, प्रशिक्षित शिक्षकों और आधुनिक शिक्षण साधनों के अभाव से जूझ रहे हैं। शिक्षक-छात्र अनुपात का असंतुलन, शिक्षकों के लिए निरंतर प्रशिक्षण के अवसरों की कमी और बढ़ता प्रशासनिक दबाव उनकी रचनात्मकता, कार्यक्षमता और मनोबल को प्रभावित करता है। परिणामस्वरूप शिक्षा का स्तर अपेक्षित रूप से सुदृढ़ नहीं हो पाता।
डिजिटल युग में शिक्षा के क्षेत्र में तकनीक ने क्रांतिकारी परिवर्तन किए हैं। ऑनलाइन शिक्षा, ई-लर्निंग प्लेटफॉर्म और डिजिटल संसाधनों ने ज्ञान के नए द्वार खोले हैं। किंतु यह सत्य भी है कि तकनीकी संसाधनों तक असमान पहुँच ने शैक्षणिक असमानता को और गहरा कर दिया है। आज भी देश के बड़े वर्ग तक इंटरनेट, स्मार्ट उपकरण और तकनीकी दक्षता समान रूप से उपलब्ध नहीं है। डिजिटल विभाजन के कारण अनेक प्रतिभाशाली विद्यार्थी मुख्यधारा से पीछे छूट जाते हैं। इसके अतिरिक्त, परीक्षा-केंद्रित शिक्षा व्यवस्था, अंकों की निरंतर होड़ और करियर को लेकर बढ़ता सामाजिक दबाव विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रहा है। शिक्षा का मानवीय, संवेदनशील और नैतिक पक्ष धीरे-धीरे हाशिए पर जाता दिखाई दे रहा है।

इन तमाम चुनौतियों के बीच शिक्षा के क्षेत्र में संभावनाओं की कोई कमी नहीं है। नई शिक्षा नीति–2020 ने भारतीय शिक्षा व्यवस्था को नई सोच और नई दिशा देने का प्रयास किया है। बहुविषयक शिक्षा, कौशल आधारित शिक्षण, नवाचार, शोध और मातृभाषा में प्रारंभिक शिक्षा जैसी अवधारणाएँ शिक्षा को अधिक समावेशी और व्यावहारिक बना सकती हैं। यदि इन प्रावधानों को ईमानदारी और प्रभावी ढंग से लागू किया जाए, तो शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सकारात्मक परिवर्तन संभव है।
तकनीक का विवेकपूर्ण और संतुलित उपयोग शिक्षा को अधिक सुलभ, रोचक और प्रभावी बना सकता है। हाइब्रिड शिक्षण मॉडल, डिजिटल पुस्तकालय, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित शिक्षण पद्धतियाँ और ऑनलाइन मूल्यांकन प्रणाली भविष्य की शिक्षा की मजबूत नींव रख सकती हैं। किंतु इसके लिए यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि तकनीक सभी विद्यार्थियों तक समान रूप से पहुँचे, न कि केवल कुछ वर्गों तक सीमित रह जाए।
आज का विद्यार्थी जिज्ञासु है, वैश्विक दृष्टिकोण रखता है और तेजी से बदलती दुनिया की चुनौतियों को स्वीकार करने की क्षमता रखता है। यदि उसे उचित मार्गदर्शन, प्रासंगिक कौशल, आलोचनात्मक सोच और नैतिक मूल्य प्रदान किए जाएँ, तो वह न केवल अपने जीवन को दिशा दे सकता है, बल्कि राष्ट्र निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। शिक्षा को केवल रोजगार प्राप्ति का माध्यम मानने के बजाय उसे जीवन, समाज और मानवीय मूल्यों से जोड़ना आवश्यक है। मूल्यपरक शिक्षा, नैतिकता, संवेदनशीलता, पर्यावरण चेतना और नागरिक कर्तव्यों को शिक्षा का अभिन्न अंग बनाया जाना चाहिए।
शिक्षा सुधार की प्रक्रिया में शिक्षकों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। शिक्षकों को केवल नीति-निर्माण का पालनकर्ता नहीं, बल्कि सहभागी और निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। जब शिक्षक सशक्त, प्रेरित और सम्मानित होंगे, तभी शिक्षा व्यवस्था मजबूत होगी। इसके साथ ही, अभिभावकों और समाज की सक्रिय सहभागिता भी शिक्षा के स्तर को ऊँचा उठाने में सहायक हो सकती है। नीति और क्रियान्वयन के बीच की दूरी को कम करना, शिक्षा को व्यवसाय नहीं बल्कि सेवा के रूप में देखना और प्रत्येक बच्चे तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पहुँचाना— यही आज की सबसे सही और आवश्यक दिशा है।
कुल मिलाकर, आज का शैक्षणिक परिदृश्य संघर्ष और संभावना— दोनों का संगम है। यदि हम चुनौतियों को स्वीकार करते हुए संभावनाओं का विवेकपूर्ण और ईमानदार उपयोग करें, तो शिक्षा न केवल व्यक्ति के भविष्य को सँवारेगी, बल्कि राष्ट्र को भी सशक्त, समावेशी और आत्मनिर्भर बनाएगी।
शिक्षा बदलेगी, तो सोच बदलेगी;
और सोच बदलेगी, तो देश का भविष्य उज्ज्वल होगा।
— भोला झा ‘गुरुजी’

