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21वीं सदी का नया युद्धक्षेत्र

21वीं सदी का नया युद्धक्षेत्र

by हिंदी विवेक
in देश-विदेश, फरवरी 2026
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दुनिया भर के देशों में जो आंतरिक विद्रोह, संघर्ष, आंदोलन और क्रांति मॉडल के बाद सत्ता परिवर्तन या गृह युद्ध दिखाई दे रहा है, उसके पीछे अमेरिका और डीप स्टेट की प्रमुख भूमिका है। राष्ट्र विरोधी शक्तियां ऐसा ही कुछ भारत में भी करना चाहती है। इसलिए विपक्षी पार्टी के नेता जेन-जी को भड़काने का लगातार प्रयास कर रहे हैं।

 

21वीं सदी में किसी राष्ट्र को पराजित करने के लिए पारम्परिक युद्ध आवश्यक नहीं रह गया है। आज का युग ‘छद्म युद्ध’ (झीेुू थरी) का है, जहां सीमाओं पर टैंक और मिसाइलों से अधिक घातक हथियार हैं- विचार, नैरेटिव और डिजिटल टूलकिट। विदेशी शक्तियां अब किसी देश की आंतरिक स्थिरता, सामाजिक सद्भाव और संस्थानों की साख को लक्ष्य बनाती हैं। भारत जैसे उभरते राष्ट्र के विरुद्ध एक सुनियोजित आंतरिक विद्रोह और क्रांति प्रारूप विकसित किया गया है। इसका उद्देश्य केवल सत्ता परिवर्तन नहीं बल्कि भारत की सभ्यतागत पहचान और राष्ट्रीय आत्मविश्वास को खंडित करना है।

अमेरिका-डीप स्टेट : अदृश्य हस्त और रणनीतिक स्वार्थ

‘डीप स्टेट’ का अर्थ उन स्थायी शक्तियों से है जिनमें उच्च स्तरीय शासन तंत्र, गुप्त एजेंसियां और वैश्विक वित्तीय समूह सम्मिलित हैं, जो निर्वाचित सरकारों के होने के बाद भी अपनी दीर्घकालिक विदेश नीति चलाते हैं। अमेरिका का यह तंत्र भारत की ’रणनीतिक स्वतंत्रता’ को स्वीकार नहीं कर पा रहा है। डीप स्टेट की रणनीति का मुख्य हिस्सा उन देशों में ’नियंत्रित अस्थिरता’ पैदा करना है जो उनकी वैश्विक हेकड़ी को चुनौती देते हैं।

जब भारत अपनी सुरक्षा आवश्यकताओं के लिए स्वतंत्र निर्णय लेता है तो डीप स्टेट समर्थित थिंक-टैंक और एनजीओ सक्रिय हो जाते हैं। इनका वित्त पोषण जॉर्ज सोरोस जैसे धनकुबेरों द्वारा किया जाता है, जो खुलेआम लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में हस्तक्षेप करने की बात करते हैं। यह तंत्र केवल कूटनीतिक दबाव नहीं बनाता बल्कि स्थानीय स्तर पर ऐसे समूहों को खड़ा करता है जो सरकार के हर निर्णय को ’तानाशाही’ बताकर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की छवि बिगाड़ते हैं।

शैक्षणिक संस्थानों में वैचारिक विखंडन

विदेशी शक्तियों के भीतर सक्रिय डीप स्टेट का सबसे घातक अस्त्र हमारे शैक्षणिक संस्थानों में सक्रिय कुछ विशेष विचारधारा वाले समूह हैं। ये समूह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और आजादी जैसे नारों की आड़ में अलगाववादी विचारधारा को वैधता देते हैं। इनका लक्ष्य युवाओं के मानस में सेना के प्रति घृणा, संविधान के प्रति संदेह और राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति अनादर का विष घोलना है। डीप स्टेट ऐसे शिक्षाविदों और शोधकर्ताओं को विदेशी फेलोशिप और मंच प्रदान करता है जो भारतीय समाज के विखंडन पर ’शोध’ करते हैं। यह एक मनोवैज्ञानिक युद्ध है, जो भारत की राष्ट्रीय चेतना को भीतर से खोखला करता है।

लद्दाख : नई वैचारिक प्रयोगशाला

लद्दाख हाल के वर्षों में विदेशी शक्तियों के लिए एक नया मोर्चा बन गया है। यहां की युवा पीढ़ी को लक्षित कर विकास परियोजनाओं और सैन्य ढांचागत निर्माण को पारिस्थितिकी के लिए संकट बताकर भड़काया जा रहा है। लद्दाख की संवेदनशील भौगोलिक स्थिति (चीन-पाकिस्तान सीमा) को देखते हुए, यहां नागरिक विरोध के नाम पर सामरिक निर्माण में बाधा डालना, सीधे तौर पर राष्ट्रीय सुरक्षा को चुनौती है। यह रणनीति पर्यावरणवाद के मुखौटे में शत्रु राष्ट्रों के हितों को साधने का एक अप्रत्यक्ष तरीका है, जिसे पश्चिमी मीडिया आउटलेट्स द्वारा भरपूर समर्थन दिया जाता है।

मणिपुर : कुकी षड्यंत्र और नार्को-आतंक

मणिपुर का संकट केवल जातीय संघर्ष नहीं बल्कि एक गहरा ‘कुकी षड्यंत्र’ है। म्यांमार से हो रही घुसपैठ का लाभ उठाकर कुकी उग्रवादी ‘नार्को-टेरर’ (मादक पदार्थ व्यापार) के माध्यम से समानांतर अर्थव्यवस्था चला रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इसे धार्मिक उत्पीड़न का नाम देना भारत की अखंडता पर सुनियोजित प्रहार है। इसका लक्ष्य पूर्वोत्तर में एक विदेशी समर्थित ‘बफर जोन’ निर्मित करना है, जो भारत की ’एक्ट ईस्ट’ नीति को बाधित कर सके और पूरे क्षेत्र को अस्थिर रखे।

अल्पसंख्यक नैरेटिव और भाषाई विवाद

डीप स्टेट भारत की विविधता को ही शस्त्र की तरह प्रयोग कर रहा है। वैश्विक विमर्श द्वारा निरंतर यह नैरेटिव गढ़ा जाता है कि भारत में अल्पसंख्यक असुरक्षित हैं ताकि अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों का मार्ग प्रशस्त हो सके। कट्टरपंथी तत्वों की देशविरोधी गतिविधियों को अल्पसंख्यक अधिकारों का कवच प्रदान करना इसी टूलकिट का हिस्सा है। साथ ही ‘हिंदी विरोध’ या ‘उत्तर बनाम दक्षिण’ जैसे भाषाई व क्षेत्रीय विवादों को हवा देकर राष्ट्रीय एकता को शिथिल किया जाता है। यह सब संयोग नहीं बल्कि सुनियोजित सामाजिक इंजीनियरिंग है।

आंदोलन उद्योग और टूलकिट संस्कृति

इस मॉडल का प्रमुख औजार है ‘आंदोलन उद्योग’ :

सीएए : नागरिकता कानून को नागरिकता छीनने वाला बताकर अल्पसंख्यक भय फैलाया गया।

कृषि सुधार: सुधारों को कॉरपोरेट षड्यंत्र बताकर राजधानी को महीनों तक अवरुद्ध किया गया।

अग्निवीर: युवाओं को भ्रमित कर सेना के मनोबल और भर्ती प्रक्रिया पर प्रहार किया गया।

इन सभी आंदोलनों में एक समान पैटर्न दिखता है: स्थानीय मुद्दा, अंतरराष्ट्रीय नैरेटिव, डीप स्टेट समर्थित विपक्षी स्वर और अंततः भारत-विरोधी वैश्विक प्रचार।

विदेशी मीडिया का पक्षपात और रेटिंग का खेल

अंतरराष्ट्रीय मीडिया का एक बड़ा हिस्सा इस युद्ध में एक सक्रिय पक्ष की भूमिका निभा रहा है। विदेशी समाचार संस्थान भारत की नकारात्मक छवि प्रस्तुत करने के लिए ’चयनित तथ्यों’ का सहारा लेते हैं। इसके साथ ही विदेशी रेटिंग एजेंसियां जानबूझकर ‘हंगर इंडेक्स’ या ‘प्रेस फ्रीडम इंडेक्स’ में भारत की रैंकिंग को यथार्थ से दूर नीचे दिखाती हैं। यह एक प्रकार की ’आर्थिक घेराबंदी’ है ताकि विदेशी निवेश प्रभावित हो और भारत की विकास गति रुके।संस्थानों पर प्रहार और डिजिटल उपनिवेशवाद

सेना की वीरता पर साक्ष्य मांगना, न्यायपालिका को पक्षपाती बताना और निर्वाचन प्रणाली (एतच) पर निरंतर संदेह का वातावरण बनाना- यह सब संस्थानों की साख गिराने की रणनीति है। विदेशी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एल्गोरिदम के माध्यम से भारत-विरोधी विमर्श को बढ़ावा देते हैं। एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) और डीपफेक जैसी तकनीकें अब इस युद्ध का नया हिस्सा हैं, जिनका उपयोग भ्रामक सूचनाएं फैलाकर दंगे भड़काने के लिए किया जा सकता है। यह ’डिजिटल उपनिवेशवाद’ का वह स्वरूप है जहां विदेशी सर्वर तय करते हैं कि भारतीय नागरिक क्या सोचें।

वैश्विक परिप्रेक्ष्य : भारत अकेला नहीं

यह रणनीति केवल भारत तक सीमित नहीं है। रूस में ’रंग क्रांतियों’ के माध्यम से सत्ता परिवर्तन का प्रयास हुआ। हाल ही में बांग्लादेश में जिस तरह एक नागरिक आंदोलन को सत्ता परिवर्तन के हिंसक औजार में बदल दिया गया, वह भारत के लिए एक गम्भीर चेतावनी है। अफ्रीका और पश्चिम एशिया में भी डीप स्टेट ने स्थानीय आंदोलनों को वित्त पोषित कर राष्ट्रों को अस्थिर किया है। भारत के बढ़ते वैश्विक कद को रोकने के लिए इसी ’बांग्लादेश मॉडल’ को भारत में दोहराने के संकेत बार-बार दिए जाते हैं।

समाधान की त्रिशक्ति नेतृत्व, नागरिक और संस्थान

इस बहु-आयामी संकट से निपटने के लिए भारत को एक ‘त्रिशक्ति प्रारूप’ पर कार्य करना होगा।

मजबूत नेतृत्व : विदेशी दबाव और डीप स्टेट की ब्लैकमेलिंग के विरुद्ध राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखना।

जागरूक नागरिक : टूलकिट, डीपफेक और विदेशी मीडिया के दुष्प्रचार के प्रति सजग रहना।

सशक्त संस्थान : सेना, न्यायपालिका और निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता और साख की रक्षा करना।

वैचारिक सम्प्रभुता की रक्षा

भारत आज केवल सीमाओं पर नहीं बल्कि नैरेटिव और टूलकिट के युद्ध के मैदान में खड़ा है। इसका समाधान वैचारिक सम्प्रभुता, सामाजिक समरसता और जागरूक नागरिक चेतना में निहित है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राष्ट्र-विरोध के बीच का सूक्ष्म अंतर समझना ही आज की सबसे बड़ी देशभक्ति है। जब तक भारत वैचारिक रूप से सम्प्रभु नहीं होगा तब तक विदेशी मंचों से होने वाले ये ’सुनियोजित प्रहार’ जारी रहेंगे।

–अखिलेश चौधरी

 

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